Sep 14, 2010

बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री क्यों नहीं?


बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद 'मुख्यमंत्री मुस्लिम हो' को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा, जिसके पीछे लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे।

पंकज कुमार

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात,सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं।

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो। इसका सीधा मतलब हुआ कि अगर विधानसभा चुनाव के बाद लालू-पासवान के गठजोड़ वाली सरकार बनी तो राज्य में मुख्यमंत्री के साथ दो उपमुख्यमंत्री भी होंगे। लेकिन लालू-पासवान की इस मंशा पर शक और सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे अहम सवाल कि सत्ता में आने पर मुस्लिम उपमुख्यमंत्री ही क्यों, मुख्यमंत्री क्यों नहीं? दूसरा सवाल क्या यह मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति नहीं है? तीसरा सवाल क्या यह जनभावना है? चौथा सवाल जब संयुक्त तौर पर सीट और कुर्सी का बंटवारा हुआ उस वक्त यह घोषणा क्यों नहीं की गई? पांचवा सवाल सामाजिक ध्रुवीकरण के बदले विकास के मुद्दे चुनावी एजेंडा क्यों नहीं?


लालू-पासवान: चुनाव की यारी
ऐसे कई सवाल हैं जो लालू-पासवान की टीम द्वारा मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की वकालत को कटघरे में खड़ा करते हैं। सवाल यह भी है कि किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री पद पर आसीन करने के मुद्दे पर फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू प्रसाद और रामविलास पासवान आपस में भिड़ गए। इस प्रकरण के बाद पासवान ने समर्थन देने से मना कर दिया। आखिर 2010 विधानसभा चुनाव आते-आते पासवान का मुस्लिम प्रेम पीछे क्यों छूट गया? यह लालू-पासवान की राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या है? फरवरी 2005 में लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे,जबकि रामविलास पासवान किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े थे।

नाक की इस लड़ाई की वजह से बिहार को राष्ट्रपति शासन और साल के भीतर दूसरी बार चुनाव का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि पांच साल पहले पासवान ने ही मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा दिया, लेकिन इस बार जब भावी मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी का मौका आया तो लालू के नाम पर सहमति दे दी। इतना ही नहीं उपमुख्यमंत्री पद पर अपने छोटे भाई पशुपति पारस की दावेदारी करने में जरा भी देरी नहीं की। इस ऐलान पर जब खलबली मची तब जाकर पासवान ने गठबंधन सरकार बनने पर मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया।

बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद मुख्यमंत्री किसी मुस्लिम को बनाने को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा,उसके पीछे भी लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे। उनकी मंशा बिहार में लालू प्रसाद यादव से बड़े जनाधार वाला नेता के तौर पर उभरने की थी। इतना ही नहीं वह अपनी छवि दलित नेता तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे। 2005 में  लोजपा प्रमुख का गुप्त एजेंडा यह था कि मुस्लिम-दलित समीकरण के जरिए राज्य के करीब 32फीसदी वोट पर सेंध लगा सके। लेकिन लालू यादव ने रामविलास पासवान के इस राजनीतिक दांव को कामयाब नहीं होने दिया। उन्होंने एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को बनाए रखने के लिए सरकार नहीं बनाना ही बेहतर समझा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।

दोनों दलों के प्रमुखों का यह ऐलान उनके आत्मविश्वास में कमी, कमजोर पड़ती सियासत और चुनाव पूर्व हार के डर को भी दिखाता है। वर्ष 1990 में लालू यादव ने जब बिहार की सत्ता संभाली तो उस वक्त मुस्लिमों ने भागलपुर दंगों की वजह से कांग्रेस से दूरी बनाई और जनता दल को वोट दिया। वर्ष 1997में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का गठन किया और अल्पसंख्यकों को बीजेपी के साम्प्रदायिक चेहरे का डर दिखाकर वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे। लेकिन 2005 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने जेडीयू नेता नीतीश कुमार का सेक्युलर चेहरा पेश किया,तो आरजेडी का एमवाई (मुस्लिम-यादव) तिलिस्म टूट गया।

लालू से मोहभंग हो चुके अल्पसंख्यकों ने न सिर्फ आरजेडी से बल्कि एलजेपी से भी किनारा कर लिया। पिछले पांच साल में नीतीश सरकार की कार्यशैली से अल्पसंख्यक समाज में रोजगारोन्मुख,भयमुक्त और गैर संप्रदायवाद का संदेश गया है। मुस्लिम वोटरों के इस रुख से लालू-पासवान की परेशानी बढ़ना लाजिमी है। यही वजह है कि दोनों नेता एमवाईडी (मुस्लिम-यादव-दलित)समीकरण का हथकंडा अपना रहे हैं।


किसकी लाज बचाएं मुसलमान : किसके साथ जाएँ मुसलमान
 राजनीति के माहिर दोनों नेता जातीय समीकरण की बदौलत करीब 11फीसदी यादव, 16 फीसदी दलित और राज्य की आबादी के करीब 16फीसदी मुस्लिम वोटरों को गोलबंद कर सत्ता का सुख भोगना चाहते हैं। इस पूरी आबादी को जोड़ा जाए तो यह कुल आबादी का 43फीसदी है। मुस्लिम उपमुख्यमंत्री का शिगूफा इसी कड़ी का एक हिस्सा भर है। आरजेडी-एलजेपी का कहना है कि राज्य में दो-दो उपमुख्यमंत्रियों  का होना कोई नई बात नहीं है। अगर दोनों नेताओं को लगता है कि इस समीकरण से मुस्लिम-यादव-दलित मतदाता एक हो जाएंगे और उनका गठबंधन जीत जाएगा, तो वह इस तरह के दर्जनों उपमुख्यमंत्रियों की घोषणा कर सकते हैं।

आरजेडी प्रमुख लालू यादव की पार्टी ने बिहार में लगातार 15 साल तक एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के भरोसे शासन किया, पिछड़े समुदाय के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय ने भी लालू यादव का पूरा साथ दिया। जातीय-धार्मिक भावना उभारकर आरजेडी लगातार तीन बार सत्ता में बनी रही और इस बार भी रोजी-रोटी, सामाजिक बराबरी के बदले जज्बाती सवालों पर गोलबंदी की जा रही है। अच्छा तो यह होता कि लालू-पासवान जनभावनाओं को ख्याल में रख कर रोजी-रोटी, गरीबी, बिजली, सड़क, पानी, भ्रष्टाचार, सूखा, लालफीताशाही को मुद्दा बनाते और बिहार की जनता के सामने बेहतर विकल्प पेश करते। इसमें कोई शक नहीं कि विधानसभा चुनाव में जाति का प्रभाव रहेगा ही।

दोनों नेता भले ही अक्टूबर 2005विधानसभा चुनाव की हार को आरजेडी-एलजेपी गठबंधन का टूटना और लोगों में भ्रम की स्थिति को कारण बता रहे हों, लेकिन सच यह है कि बिहार की जनता तुच्छ राजनीति से तंग आ चुकी थी  और उन्हें जनता से जुड़े सरोकार वाली सरकार चाहिए थी। यही वजह है कि अक्टूबर में विधानसभा चुनाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव में आरजेडी चार सीटों पर सिमट गई,जबकि रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा का सूपड़ा साफ हो गया। राज्य में इसके बाद हुए उपचुनाव में भी एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत मिली। इस बीच यह जरूर हुआ कि सितंबर 2009 में बिहार विधानसभा के 18 क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में एनडीए गठबंधन 13 सीटों पर हार गया। बटाईदारी विवाद से उत्पन्न विशेष उन्मादपूर्ण परिस्थिति में वे उपचुनाव हुए थे। तब से अब तक राज्य की राजनीतिक परिस्थिति व मनःस्थिति बदल गई लगती है।

लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने राजनीति के गुर समाजवादी जननेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया जी से भले ही सीखे हों, लेकिन सत्तासुख के लालच ने दोनों नेताओं को अपने सिद्धांतों से भटका दिया है। मौजूदा राजनीति को देखकर लगता है कि आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान सामाजिक सरोकारों के मुद्दों से दूर होते जा रहे है। लालू-पासवान की जोड़ी जब से राज्य और केंद्र की सत्ता से दूर हुई है तब से दोनों कदमताल मिलाते चल रहे है। उन्हें पता है कि जब तक उनके पास संख्या बल नहीं होगा, तब तक दिल्ली और पटना में उन्हें पूछनेवाला कोई नहीं।


लेखक दूरदर्शन में 'जागो ग्राहक जागो' कार्यक्रम में बतौर सहायक प्रोडूसर 
काम कर चुके हैं, फिलहाल एक पाक्षिक अख़बार में सहायक संपादक हैं इनसे  kumar2pankaj@gmail.com पर  संपर्क किया जा सकता है.

Sep 12, 2010

क्यों न हो उच्च नैतिकता की मांग !


महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा?


राजू रंजन प्रसाद

मृणाल वल्लरी का लेख मैंने दो बार पढ़ा। पहले आपके ब्लॉग  पर और पुनः इसे जनसत्ता में। कहना होगा कि इस लेख में मुझे ऐसा कुछ लगा जिससे कह सकता हूं कि दो बार पढ़ने में लगा मेरा श्रम बेकार नहीं गया। किन्हीं को अगर ‘नवोदित’ पत्रकार की ‘बाल-सुलभ’ टिप्पणी लगी हो, तो मात्र इस कारण से मैं इस लेख को ‘खारिज’ नहीं कर सकता।

इस लेख में मुझे लगा कि पत्रकार (संयोग कहिए कि वह महिला पत्रकार हैं,यद्यपि  मैं इस तरह के विभाजन में दिलचस्पी नहीं रखता।) की एक पीढ़ी तैयार हो रही है जो किसी भी मुद्दे को एक ‘संवेदनात्मक जुड़ाव’ के साथ, जिसे आप प्रतिबद्धता कह ले सकते हैं, उठाने के खतरे झेलने को तैयार है।

कुछ लोग इसे ‘नाम कमाने की भूख’और ‘नारीवादी उच्छ्वास’ से भी जोड़कर देख सकते हैं। जिनके अंदर प्रतिबद्धता और ईमानदारी की आग नहीं होती, वे ऐसी बातें बड़ी ही सहजता से कह सकते हैं। बगैर किसी दुविधा और अपराध-बोध के। यहां तो लोग महात्मा गांधी तक की ईमानदारी और वचनबद्धता को ‘मजबूरी का नाम गांधी’साबित कर डालते हैं। मृणाल तो फिर भी ‘नवोदित’ हैं।

इस लेख से अगर माओवाद विरोधी अथवा कुछ अवांछित कहे जा सकनेवाले संदेश गये हैं तो इसके कुछ कारण भी हैं। कुछ कारणों को लेख में अंतर्निहित माना जा सकता है तो कुछ को मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर महोदय द्वारा सृजित साजिश के रूप में। साजिश  का यह खेल खेला गया लेख की प्रस्तुति के स्तर पर। याद करें कि अखबार में इस लेख का शीर्षक ‘लाल क्रांति के सपने की कालिमा’था। मॉडरेटर महोदय ने इसका शीर्षक लगाया ‘क्या माओवादी दरअसल बलात्कारी होते हैं?’

एक नक्सल मिजाज का आदमी ऐसे शीर्षक से भरसक बचेगा। यह लेखिका का पहले से दिया हुआ शीर्षक नहीं था, बल्कि मॉडरेटर द्वारा सनसनी फैलाने के लिए गढ़ा गया। तिसपर मॉडरेटर की माओवाद की पक्षधरता! मुझे यह आसानी से हजम होनवाली बात नहीं लगती। अफसोस की बात तो यह है कि कुछ क्रांतिवीर ऐसी गलतियों की तरफ ध्यान न दिलाकर, उल्टे लोगों को अविनाश  जी का ‘पॉलिटिकल स्टैण्ड’ बताने लगते हैं।

स्त्री-अस्मिता’ की लड़ाई लड़नेवाले अरविन्द शेष  को बताना चाहिए था कि खुद मॉडरेटर महोदय स्त्रियों के यौन-शोषण के आरोपी रहे हैं। ईमानदार पाठकों-पत्रकारों से हमारी अपेक्षा है कि ऐसे दोहरे चरित्रवाले टिप्पणीकारों की हरकत पर वे नजर रखेंगे।

मृणाल की इस बात से कि माओवादी शिविरों  में महिलाओं का यौन शोषण होता है,मुझे इनकार नहीं है। शायद किसी को न होगा। अलबत्ता इसे ‘आम बात’ कहने पर असहमति बनती है। लेखिका को यह ‘आम बात’ बाहर की दुनिया में नजर आनी चाहिए थी। कहना चाहिए था कि हमारे समाज में महिलाओं का यौन शोषण ‘आम बात’ है, ऐसी कुछ घटनाएं माओवादी शिविरों तक में देखी जा सकती हैं।

वल्लरी का मानना सही है कि माओवादी शिविरों में भर्ती किये जानेवाले कामरेडों को मार्क्सवाद  की कड़ी शिक्षा  से गुजरना पड़ा होगा। यह भी कि उनके पास एक आदर्श  समाज स्थापित करने का सपना है। और सारा त्याग,सारी कुर्बानी भी उसी के लिए है। तो कम-से-कम वहां तो एक उच्च नैतिकता का मॉडल प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। बेशक  ऐसी मांग की जानी चाहिए।

चौकी-चौके में अंतर नहीं                    फोटो: अजय प्रकाश
लेकिन हमें मानना पड़ेगा कि इसमें सिर्फ माओवादी ही विफल नहीं रहे हैं। भारत की अन्य जो दूसरी मार्क्सवादी  पार्टियां हैं उनकी पोलित ब्यूरो में भी क्या कम्युनिस्ट समाज की नैतिकता वाला मानदंड स्थापित हो सका है?शायद नहीं। आज भी इन मार्क्सवादी  पार्टी कार्यालयों में चाय बनाने और झाड़ू लगानेवाले क्या उससे ऊपर उठ सके हैं? जाहिर है, उत्तर नकारात्मक होगा। हम-आप सब जानते हैं कि इन वामपंथी पार्टियों में भी खून देनेवालों की अलग श्रेणी है तो फोटो खिंचानेवालों की अलग ही प्रजाति है।

हम यह भी जानते हैं कि महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय  के प्रतिष्ठित  मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा ?

वल्लरी पूछती हैं कि ‘क्या मुकम्मल राजनीतिक शिक्षण  के बिना पार्टी में कॉमरेडों की भर्ती हो जाती है?’ जिसके अंदर मार्क्सवाद के लिए थोड़ी भी सदास्था बची है,ऐसे सवाल उठेंगे। कुछ दिनों पहले केरल के पूर्व सीपीएम सांसद कुरिसिंकल एस मनोज को व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था प्रकट और अभिव्यक्त करने के लिए पार्टी की सदस्यता से जब हाथ धोना पड़ा था, तो मैंने भी अपने लेख में यही सवाल उठाया था कि ऐसे लोगों को जिनकी दृष्टि प्रगतिविरोधी एवं अवैज्ञानिक समझ पर आधारित हो,क्या कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया जाना चाहिए ?

क्या कारण है कि लगभग पचास वर्षों तक सीपीएम (बिहार) के नेता रह चुके चुनाव की घोषणा होने से ठीक पहले जदयू का दामन थाम लेते हैं। हमें इन तमाम सवालों को (यौन शोषण  समेत) सिर्फ माओवाद के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि एक व्यापक संदर्भ में उठाना चाहिए।

Sep 11, 2010

दुष्प्रचार और भीतरघात साथ-साथ


सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है.


नीलाभ



मेरे खयाल में अंजनी ने मृणाल वल्लरी के दुष्प्रचार का बहुत सही जवाब दिया है, हालांकि जनसत्ता, उसके गुर्गे, आम मीडिया, और कुछ स्वघोषित ब्लौगिये समाज सेवी और "सच्चाई के ठेकेदार" अपना शोर जारी रखे हुए हैं. यहां कुछ बातों को समझ लेना बहुत ज़रूरी है.

पहली बात तो यह है कि हमारी जनता जिन मुद्दों पर अपनी लड़ाई लड़ रही है,वे पहले की तरह सिर्फ़ ज़मीन या श्रम पर अधिकार की लड़ाई नहीं रह गयी है,न यह किसी एक फ़िरन्गी ताक़त और उसके पिट्ठुओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा संघर्ष है.यह लड़ाई विश्व पूंजी और उनके दलालों के ख़िलाफ़ है जो एक नये उपनिवेशवादी ढांचे को लागू करके हमारे देश पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं.वेदान्त हो या पॉस्को  या एनरौना  या टाटा या जिन्दल -- इनका सूत्र संचालन अब amrika  , जापान, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश और आवारा पूंजी के हाथ में है.

दूसरी बात यह है कि सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है. इसलिए नरसिंह राव हों या मनमोहन सिंह, पी. चिदम्बरम हों या मोनटेक सिंह आहलूवालिया -- ये सब उनके प्राक्रितिक सहयोगी हैं.

तीसरी बात,नव उपनिवेश्वादियों और उनके स्वाभाविक सहयोगियों के मनसूबे तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक "बांटो और लूटो"की पुरानी आज़मूदा नीति पर अमल न किया जाये,चुनांचे देशवासियों के एक अच्छे-ख़ासे तबक़े को इस लूट का चूरा देना अनिवार्य होता है.परम्परागत रूप से मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा इसका लाभार्थी बनता है.यही वजह है कि पत्रकारिता और शिक्षक दिवसों पर पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के गुण गानेवाले और त्याग और बलिदान और संयम का राग अलापने वाले आज अश्लील तनख़्वाहों का मज़ा लेते हुए सच्चाई के अलमबरदार बने हुए हैं.दिलचस्प बात यह है कि परम्परागत रूप से यही तबका परिवर्तन का विरोधी भी होता है और परिवर्तन का पक्षधर भी इसलिए सत्ताधारी और उसके गुर्गे इसके परिवर्तन विरोधी हिस्से को अपने आक्रमण के हाथ और हथियार बनाते हैं.

पढाई करतीं महिला गुरिल्ला                  फोटो: अजय प्रकाश
स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी इसी परिवर्तन विरोधी,सत्ता समर्थक तबक़े के सबल प्रतिनिधि हैं और इन्हें पूंजीवादियों के पिट्ठुओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए.एक अगर बाहर से दुष्प्रचार करते हुए जनद्रोह कर रहा है तो दूसरा भीतरघात करके.

खैर,ये बातें बहुत प्राथमिक स्तर की बातें हैं और आप सब इन्हें जानते ही हैं.इस पृष्ठभूमि को पेश करने के पीछे मेरा आशय दोहरा है.

पहले तो यह कि अगर हम स्वामी अग्निवेश के वर्गीय चरित्र और भीतर्घत के उनके इतिहास से परिचित थे तो हमने उन्हें छत्तीसगढ़,झारखण्ड और अन्य इलाक़ों में आदिवासियों से कन्धा मिला कर लड़ रहे साथियों और हमारी दमनकारी,जनविरोधी सरकार के बीच इतने संवेदनशील मामले पर स्वयंभू मध्यस्थ बनने का अवसर ही क्यों प्रदान किया ?आज़ाद और उनके साथियों ने भी उन्हें अपनी ओर से मध्यस्थता करने की ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी ?शान्ति-वार्ता को विफल करने का इरादा गृहमन्त्री पी.चिदम्बरम का ही नहीं था,कहीं-न-कहीं इस में स्वामी अग्निवेश का भी बहुत योगदान है.और जिस तरह से आज़ाद और हेम चन्द्र पाण्डेय की निर्मम हत्या की गयी और फिर उसके बाद गिरफ़्तारियों और सनसनीखेज़ और सरासर झूठे रहस्योद~घाटनों का सिलसिला शुरू हो गया है,उससे यह साफ़ है कि स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी एक ही विराट थैली के चट्टे-बट्टे हैं.झूठी ख़बरों और दुष्प्रचार का जो तूमार मृणाल वल्लरी ने बांधा है वह गृहमन्त्री और सरकार की धोखेधड़ी का ही एक शाख़साना है.

ऐसे में इस भूल-ग़लती के लिए कौन ज़िम्मेदार है जो कवि मुक्तिबोध के शब्दों में "आज बैठी है जिरह-बख़्तर पहन कर तख़्त पर दिल के" ? कितनी prophetic, भविष्यसूचक हैं आगे की पंक्तियां --

छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुल्तानी जिरह-बख़्तर बना है सिर्फ़ मिट्टी का,
वो -- रेत का-सा ढेर -- शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ़ सन्नाटा !!
( लेकिन, ना ज़माना सांप का काटा )
भूल ( आलमगीर )
मेरी आपकी कमज़ोरियों के स्याह
लोहे का जिरह-बख़्तर पहन, ख़ूंख़ार
हां ख़ूंख़ार आलीजाह;

वो आंखें सचाई की निकाले डालता,
करता, हमें वह घेर ,
बेबुनियाद, बेसिर-पैर...

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते ताम-झाम में,
शाही मुक़ाम में ! !

लिहाज़ा, अगर हमें आगे स्वामी अग्निवेशों के भीतरघात से बचना है तो हमें और भी सावधान रहना होगा और यहां "हम"से मेरा आशय उन सभी से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस संघर्ष में जुटे हुए हैं. रही बात मृणाल वल्लरी जैसी पत्रकारों की, तो वे दुष्प्रचार के बल पर ही पनपते हैं. बैक्टीरिया की तरह. उनके पास कुछ पिटे-पिटाये वाक्य होते हैं, कुछ परम्परागत गालियां, बिना पढ़े कुछ भी उध्रृत करने की ग़ैर-ईमानदारी --चाहे वह मार्क्स का कोई वाक्य हो या एंगेल्स का या मौक़ा-मुहाल पडने पर वेदों का.

जनसत्ता के  सम्पादक को अपनी बिक्री से ग़रज़ है सच-झूठ से नहीं.कवि शमशेर के हवाले से कहूं तो "जो नहीं है जैसे कि ईमानदारी उसका ग़म क्य,वो नहीं है."और इसलिए क्या अब समय नहीं आ गया कि एक वैकल्पिक मीडिया,एक सबल सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा किया जाये और छिट्पुट ढंग से काम करने की बजाय एकाग्र ढंग से लोगों को गोलबन्द किया जाये.




जनसत्ता की कालिमा में, राजसत्ता की चमक


जनसत्ता के सम्पादकीय पेज पर छपे लेख ' लाल क्रांति के सपने की कालिमा'में मृणाल वल्लरी  ने 'हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका में,सिरमौर बनी अंग्रेजी की उतरन'  को पत्रकारिता के न्यूनतम मानदंडों का मखौल  उड़ाते हुए जिस अधिकारिता से पेश किया है उसपर अंजनी कुमार का आलेख.
अंजनी  कुमार

एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी भी इन सारे मोर्चों पर न तो एक साथ लड़ सकती है और न ही लड़ते हुए गलतियों से बच सकती है। लेकिन गलतियों के खौफ से न तो सपने छोड़े जा सकते हैं और न ही उन्हें मारा जा सकता है। सपने देखना जरूरी है,लेकिन वह दिवास्वप्न न हो। सवाल उठाना जरूरी है,लेकिन वह खारिज करने वाला न हो। उनका जमीनी रिश्ता हो तो वह परिवेश से संवाद और खुद के भीतर एक सर्जक को जन्म देता है। अन्यथा सपने मारने की परम्परा तो चलती ही आ रही है। आप भी इसमें शामिल हैं तो यह कोई नई बात नहीं होगी। आज जरूरत सनसनीखेज खबर की नहीं,वस्तुगत सच्चाई से रू-ब-रू कराने वाली ख़बरों और इसे पेश करने वाले साहसी पत्रकारों की है।

उमा मांडी यानी सोमा मांडी के आत्मसमर्पण एवं सीपीआई (माओवादी)के नेताओं पर बलात्कार के आरोप की कहानी 24अगस्त को टाइम्स ऑफ  इंडिया ने सनसनीखेज तरीके से पेश  की। एक स्त्री की गरिमा और आम परम्परा तथा विशाखा निर्देशों (महिला हितों की रक्षा के लिए बना कानून)की धज्जी उड़ाते हुए इस अखबार ने उमा मांडी के फोटो और मूल नाम को भी छापा। इस घटना के लगभग दो हफ्ते बाद जनसत्ता में उसी कहानी को सच मानते हुए न केवल माओवादियों पर बल्कि लाल क्रांति पर कीचड़ उछालने वाला मृणाल वल्लरी का लेख छपा।

बीच के दो हफ़्तों में इस संदर्भ में तथ्य संबधी लेख,खबर और प्रेस रिपोर्ट भी छपकर सामने आये,लेकिन न तो लेखिका को पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों की चिंता थी और न ही 'जनसत्ता'को सच को प्रतिष्ठा प्रदान करने की। लगता है कि उनकी चिंता 'कालिमा'को सनसनीखेज तरीके से पेश  करने की थी और इसके लिए माओवादी आसान पात्र थे। ठीक वैसे ही जैसे किसी भी जनपक्षधर नेतृत्व को माओवादी घोषित कर पूरे जनांदोलन को सनसनीखेज बनाकर कुचल देने के लिए पूर्व कहानी गढ़ लेना। आइए, दो हफ्ते में गुजरे कुछ तथ्यों पर नजर डालें।

द टेलीग्राफ में 29अगस्त को प्रणब मंडल के हवाले  से सोमा यानी उमा मांडी के कथित आत्मसमर्पण की कहानी पर खबर छपी। इस रिपोर्ट के अनुसार उमा मांडी 20अप्रैल को कमल महतो के साथ मिदनापुर से 15किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-6पर पोरादीही में गिरफ्तार हुई थीं। कमल महतो को पुलिस ने 17अगस्त को कोर्ट में पेश कियालेकिन  सोमा की गिरफ्तारी नहीं दिखाई गयी। इस रिपोर्टर के अनुसार इस बात की पुष्टि  न केवल उनके रिश्तेदार, बल्कि पुलिस के एक हिस्से ने भी की।

 इसी तारिख को  'यौन उत्पीड़न और राजकीय हिंसा के खिलाफ महिला मंच'ने एक प्रेस रिपोर्ट जारी कर टाइम्स ऑफ़  इंडिया के खबर की तीखी आलोचना करते हुए कुछ सवाल उठाये। एक सवाल का तर्जुमा देखिये :-आत्मसमर्पण के समय उमा द्वारा दिये गये बयान को ही आधार बनाकर खबर दे दी गयी। इसे अन्य स्रोतों से परखा नहीं गया। इस खबर को बाद में भी अन्य स्रोतों के बरक्स नहीं रखा गया। ज्ञात हो कि उपरोक्त मंच में एपवा से लेकर स्त्री अधिकार संगठन और एनबीए जैसे 60संगठन और सौ से ऊपर व्यक्तिगत सदस्य हैं। 11सितम्बर  के तहलका (अंग्रेजी) में बोधिसत्व मेइती की खबर के अनुसार ज्ञानेश्वरी रेल त्रासदी के आरोप में 26मई को हीरालाल महतो को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने हीरालाल को एक दूसरी पुलिस जीप में हथकड़ी के साथ बांधी गयी उमा मांडी के सामने पेश करते हुए कहा- यह तुम्हें जानती है कि तुम माओवादी सहयोगी हो। उमा मांडी को पुलिस की जीप में और साथ में पुलिस को  वर्दी में देखने वाले ग्रामीणों के बयान को भी इस रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है।

 मानिक मंडल ने 31अगस्त को प्रेस क्लब, दिल्ली में बताया कि उमा मांडी की कहानी पुलिस द्वारा गढ़ी गयी है। उन्होंने अपने जेल अनुभव सुनाते हुए जेल में बंद पीसीपीए के कार्यकर्ताओं के उन पत्रों का हवाला दिया जिसमें उमा मांडी के पुलिस इन्फोर्मर होने की बात कही गयी है। इस पत्र के कुछ अंश तहलका ने जारी किये हैं। पूरा पत्र संहति ब्लॉग पर कुछ दिनों बाद अंग्रेजी में देखा जा सकेगा।

उपरोक्त तथ्यों के अलावा यदि हम प.मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा के उमा मांडी के आत्मसमर्पण के समय के और बाद के बयानों को देखें तब भी इस मुद्दे के ढीले पेंच नजर आयेंगे। एक संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दे पर इन तथ्यों को नजरअंदाज कर लेख लिख मारने और छाप देने के पीछे न तो जल्दीबाजी का मामला दिख रहा है और न ही लापरवाही का। क्योंकि यहाँ हम इस तथ्य से भी वाकिफ हैं कि मृणाल वल्लरी लंबे समय से पत्रकारिता कर रही हैं, 'जनसत्ता' से जुड़ी हुई हैं और उन्हें युवा संभावनाशील पत्रकारों में शुमार किया जाता है। इसी तरह संपादक ओम थानवी के नेतृत्व वाली जनसत्ता की संपादकीय टीम भी ऊँचे दर्जे की पत्रकारिता के लिए स्थापित है।

राजेन्द्र यादव के शब्दों में ले-देकर यही एक अखबार है। यह अखबार भी सीपीआई माओवादी के बारे में अपनी ही पत्रकार के लेख को छापते समय पत्रकारिता की न्यूनतम नैतिकता को तक नजरअंदाज कर जाता है कि उमा मांडी उस पार्टी की सदस्य है भी या नहीं और इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध है भी है या नहीं। यह अखबार पीसीपीए और सीपीआई माओवादी के बीच के फर्क को भी नजरअंदाज कर जाता है। ठीक वैसे ही जैसे गॉधीवादी हिमांशु को माओवादी घोषित कर दिया जाता है। इसी अंदाज में मृणाल वल्लरी सीपीआई माओवादी पार्टी, माओवादी और मार्क्सवादी होने का फर्क मिटाकर मनमाना लिखने की खुली छूट हासिल कर लेती हैं। गोया पत्रकारिता न होकर सब धान बाइस पसेरी वाली दुकान हो।

ऐसा ही मनमानापन कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दिखा। पुलिस के बयान पर एक आदिवासी युवा लिंगाराम जोकि दिल्ली में पत्रकारिता कि पढाई कर रहा है, को सीपीआई माओवादी को प्रवक्ता घोषित करते हुए यह बताया गया कि वह दिल्ली में माओवादी समर्थक के यहाँ छिपा हुआ है। यदि यह अपढ़ होने तथा  अधकचरेपन का परिणाम होता तो इसे दुरूस्त किया जा सकता है, लेकिन यह सचेत और सतर्कता का परिणाम है। इस मनमानेपन के पीछे पुलिस व शासन तंत्र की डोर कसकर बंधी हुई है। अन्यथा सिर्फ सरकारी बयान के संस्करण के आधार पर लाल क्रांति की चिंता का मनोजगत इस तरह खड़ा नहीं होता और न ही इस तरह की पत्रकारिता से हम रू-ब-रू होते।

मसलन,किसी आंदोलन का मूल्यांकन पार्टी संगठन,विचारधारा और कार्य अनुभव तथा हासिल के मद्देनजर करते हैं। सीपीआई माओवादी पार्टी के संगठन, विचारधारा,कार्य और हासिल के बारे में लेखों, रिपोर्टों आदि की लंबी फेहरिस्त है। ये आमतौर पर उपलब्ध हैं। ठीक इसी तरह अन्य पार्टियों,संगठनों तथा सरकारी तंत्र के कार्यों के बारे में भी तथ्य उपलब्ध हैं। मृणाल वल्लरी यह जरूर बताएं कि किस सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट में माओवादी बलात्कारी के रूप में चित्रित हैं। इसी तरह आप सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टों में सीपीएम व हरमाद वाहिनी,भाजपा,कांग्रेस तथा उनके सलवा जुडुम इत्यादि के चेहरे को भी देखें। ऑपरेशन ग्रीन हंट के कारनामों को देखें।

 नक्सलबाडी उभार के समय 1967में सिद्धार्थ शंकर  रे ने एक तकनीक अपना रखी थी। इसमें पुलिस या आम छोटे दुकानदार को गोली मारने का काम खुफिया के आदमी किया करते थे,लेकिन परचे नक्सलियों के छोड़े जाते थे। आज छत्तीसगढ़ से लेकर मिदनापुर तक में यही कहानी चल रही है। इसमें नये तत्व शामिल हो गये हैं और नये खिलाड़ी भी शामिल हुए हैं। आपने 'लापता' महिलाओं का जिक्र करते हुए पीसीपीए के मिलिशिया पर बलात्कारी और अपहरणकर्ता होने का आरोप मढ़ा है। जिस दिन आपका लेख छपा है उसी दिन के 'जनसत्ता' में यह भी खबर है कि सीपीएम ने नंदीग्राम में 2500लोगों के बेघर होने की सूची सौपी है। आप बंगाल के प्रति चिंतित हैं और इससे निष्कर्ष निकालना चाहती हैं तो वहॉ के गैर माक्र्सवादियों से लेकर आईबी की सरकारी रिपोर्ट पर भी नजर डालें।

अब तक सीपीएम के नेतृत्व में पूरे जंगलमहल में हरमद वाहिनी ने 86 कैंप लगा रखे हैं, एकदम सलवा जुडुम की तर्ज पर। हत्या के बाद शव पर माओवादी साहित्य का जल चढ़ाने वाले हरमद वाहिनी के बलात्कार,हत्या और  गायब करने के कारनामों के बारे में 'नारी इज्जत बचाओ कमेटी'के पत्र और प्रेस रिपोर्ट देखिये। पीसीपीए के डुप्लीकेट पर्चे और पोस्टर जिनका रंग मूल पीसीपीए से अलग है, के बारे में जानने के लिए एपीडीआर की रिपोर्ट को देखिए। किसी भी आन्दोलन में भटकाव हो सकता है। इन पर बात करते समय ठोस सच्चाइयों का जिक्र जरूरी है। स्रोत के बारे में न्यूनतम जॉच-पड़ताल जरूरी है।

हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका  
इन संदर्भों को भूलकर आन्दोलन,नक्सलवाद व माओवाद पर पत्रकारिता करना भोलापन नहीं है। यह एक ऐसा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार है जिसके चलते आंदोलनों के प्रति संवेदनहीनता और उदासीनता का माहौल बनता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी तरह की पत्रकारिता ने हर विस्फोट को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाया जिसका फायदा फासिस्ट हिन्दूत्ववादी ताकतों ने उठाया। इसने बहुसंख्यक आबादी को मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रही और उनकी तकलीफों के प्रति संवेदनहीन बनाने में एक कारक की भूमिका अदा की।

मृणाल वल्लरी महिला आंदोलन की चुनौतियों को जिस संदर्भ में रखकर चिंता जाहिर कर रही हैं और निष्कर्ष निकाल रही हैं उसमें पुलिसिया संस्करण छोड़ कोई संदर्भ नहीं है। उनकी चिंता और तर्क महिला के प्रति उनके सरोकार के प्रकटीकरण हो सकते हैं,लेकिन महिला मुक्ति का सवाल पुलिसिया संस्करण से हल करने का उनका प्रयास उस संस्करण की व्याख्या होकर ही रह गया है।

मृणाल वल्लरी पूछती हैं कि ”मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?“जाहिरा तौर पर उनका जोर कॉमरेडों की बंदूक एवं खौफ पर है और उत्तर नकारात्मक है। वह मानकर चल रही हैं कि बंदूकें सिर्फ कॉमरेडों यानी पुरुषों के पास हैं। जो भी आन्दोलन के बारे कखग जानता होगा वह इस अज्ञानता पर हंस ही सकता है। खौफ से सपने टूटते भी हैं और खौफ पैदाकर सपने देखे भी जाते हैं। यह अपने देश में विभिन्न पार्टियॉ व उनकी सरकारें खूब करती आ रही हैं। आप जहाँ रह रही हैं वहॉ अनुभव से इसी तर्क तक ही पहुंचा जा सकता है और उसे ही आप आजमाने की कोशिश कर रही हैं।

खौफ के खिलाफ खड़े होने की भी एक तर्क प्रणाली है और उससे उपजा हुआ सपना एक तर्क और लोकरंजकता से लबरेज भी होता है। यह एक ऐसी आम सच्चाई है जिसे गीत में भी ढाला जा सकता है और विचार व सिद्धांत में बदला भी जा सकता है। इस पूरी प्रकिया में गलतियाँ भी हो सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग की लूट में कुछ अच्छाईंयां दिखती रह सकती हैं। लेकिन मूल मसला सपने का है। सामंती व्यवस्था वाले हमारे समाज में दलित, स्त्री,अल्पसंख्यक,आदिवासी और राष्ट्रियताएँ जिस उत्पीडन की शिकार हैं उससे मुक्ति का रास्ता बहुस्तरीय संघर्षों से होकर जाता है।


Sep 10, 2010

हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका में, सिरमौर बनी अंग्रेजी की उतरन


लोगों से दूर होती पत्रकारिता के बीच-बहस में कई दफा ऐसा हुआ जब हमने मृणाल को उन चिंताओं को सुनते और  साझा करते देखा.देखकर लगा कि संभव है मृणाल बदली होंगी.एक दीदी की याद में अख़बारों की लघुपत्रिका में उन्होंने जो फलसफा लिखा था उसके मर्म को बूझी होंगी और किसी के सामने भले नहीं, लेकिन खुद से उस जवाबदेही के प्रति गंभीर हुई होंगी,जिसकी वजह से उनकी दीदी का घर कुछ दिनों के लिए बेतरतीब हो गया था. 

मगर यह तो हमारा सोचना था, जो उन्हें पत्रकार मानते हैं. मृणाल तो पत्रकारिता को कभी दोस्तों की सुनवाई में तो कभी अंग्रेजियत की सरपरस्ती में कुर्बान किये देती हैं और लोग हैं जो  कहते हैं,लिखने के लिए कभी दिल्ली से दूर तो जाइये.'लाल क्रांति के सपने की कालिमा' लेख में मृणाल ने माओवादी पार्टी के नेताओं पर जो आरोप लगायें हैं और  जिन भटकावों की ओर इशारा किया है उसका आधार किसी एक पीड़िता से मुलाकात के बाद का भी होता तो लेख पर गौर किया जा सकता था.  लेकिन यहाँ तो अंग्रेजी के उतरन को ऐसे परोसा जा रहा है मानों जनसत्ता की कोई विशिष्ट खोज हो.
इन्ही प्रश्नों के जवाब  के लिए सरोकारी लेखकों को  जनज्वार आमंत्रित करता है.

लाल क्रांति के सपने की कालिमा

मृणाल वल्लरी

‘वे बलात्कारी हैं। यहां आते ही मैं समझ गयी थी कि अब कभी वापस नहीं जा पाऊंगी।’ मुंह पर लाल गमछा लपेटे उमा एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार को बताती है। उमा कोई निरीह और बेचारी लड़की नहीं है। वह एक माओवादी है। कई मिशनों पर बुर्जुआ तंत्र के पोषक सिपाहियों और लाल क्रांति के वर्ग शत्रुओं को मौत के घाट उतारने के कारण सरकार ने उस पर इनाम भी घोषित किया, लेकिन अपने लाल दुर्ग के अंदर उमा की भी वही हालत है, जो बुर्जुआ समाज में गरीब और दलित महिलाओं की।

बकौल उमा,माओवादी शिविरों में महिलाओं का दैहिक शोषण आम बात है। वह जब झारखंड के जंगलों में एक कैंप में ड्यूटी पर थी, तो भाकपा (माओवादी) ‘स्टेट मिलिटरी कमीशन’ के प्रमुख ने उसके साथ बलात्कार किया। उसने उमा को धमकी दी कि वह इस बारे में किसी को न बताये, लेकिन उमा ने यह बात किशनजी के करीबी और एक बड़े माओवादी नेता को बतायी। उमा के मुताबिक इस नेता की पत्नी किशनजी के साथ रहती है। लेकिन उमा की शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उसे इस मामले में चुप्पी बरतने की सलाह दी गयी।

नक्सल शिविरों में यह रवैया कोई अजूबा नहीं है। कई महिला कॉमरेडों को उमा जैसे हालात से गुजरना पड़ा। अपने दैहिक शोषण के खिलाफ मुखर हुई महिला कॉमरेडों को शिविर में अलग-थलग कर दिया जाता है। यानी क्रांतिकारी पार्टी में उनका राजनीतिक कॅरिअर खत्म। कॉमरेडों की सेना में शामिल होने के लिए महिलाओं को अपना घर-परिवार छोड़ने के साथ निजता का भी मोह छोड़ना पड़ता है।

उमा बताती है कि नक्सल शिविरों में बड़े रैंक का नेता छोटे रैंक की महिला लड़ाकों का दैहिक शोषण करता है। अगर महिला गर्भवती हो जाती है,तो उसके पास गर्भपात के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। क्योंकि गर्भवती कॉमरेड क्रांति के लिए एक मुसीबत होगी। यानी देह के साथ उसका अपने गर्भ पर भी अधिकार नहीं। वह चाह कर भी अपने गर्भ को फलने-फूलने नहीं दे सकती। महिला कॉमरेड का गर्भ जब नक्सल शिविरों की जिम्मेदारी नहीं तो फिर बच्चे की बात ही छोड़ दें। शायद शिविर के अंदर कोई कॉमरेड पैदा नहीं होगा! उसे शोषित बुर्जुआ समाज से ही खींच कर लाना होगा। जैसे उमा को लाया गया था। उसे अपने बीमार पिता के इलाज में मदद के एवज में माओवादी शिविर में जाना पड़ा था।

माओवादियों की विचारधारा का आधार भी कार्ल मार्क्स हैं। उमा को पार्टी की सदस्यता लेने से पहले ‘लाल किताब’ यानी कम्युनिज्म का सिद्धांत पढ़ाया गया होगा। एक क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य होने के नाते उम्मीद की जाती है कि नक्सल लड़ाकों को भी पार्टी कार्यक्रम की शिक्षा दी गयी होगी। उन्हें कम्युनिस्ट शासन में परिवार और समाज की अवधारणा बतायी गयी होगी। यों भी,पार्टी शिक्षण क्रांतिकारी पार्टियों की कार्यशैली का अहम हिस्सा होता है और होना चाहिए।

मार्क्सवादी-माओवादी लड़ाकों के लिए ‘कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र’बालपोथी की तरह है,जिसमें मार्क्स ने कहा है – ‘परिवार का उन्मूलन! कम्युनिस्टों के इस ‘कलंकपूर्ण’ प्रस्ताव से आमूल परिवर्तनवादी भी भड़क उठते हैं। मौजूदा परिवार, बुर्जुआ परिवार, किस बुनियाद पर आधारित है? पूंजी पर, अपने निजी लाभ पर। अपने पूर्णत: विकसित रूप में इस तरह का परिवार केवल बुर्जुआ वर्ग के बीच पाया जाता है। लेकिन यह स्थिति अपना संपूरक सर्वहाराओं में परिवार के वस्तुत: अभाव और खुली वेश्यावृत्ति में पाती है। अपने संपूरक के मिट जाने के साथ-साथ बुर्जुआ परिवार भी कुदरती तौर पर मिट जाएगा, और पूंजी के मिटने के साथ-साथ ये दोनों मिट जाएंगे।’

एक कम्युनिस्ट व्यवस्था का परिवार पर क्या प्रभाव पड़ेगा? एंगेल्स कहते हैं कि ‘वह स्त्री और पुरुष के बीच संबंधों को शुद्धत: निजी मामला बना देगी, जिसका केवल संबंधित व्यक्तियों से सरोकार होता है और जो समाज से किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अपेक्षा नहीं करता। वह ऐसा कर सकती है, क्योंकि वह निजी स्वामित्व का उन्मूलन कर देती है और बच्चों की शिक्षा को सामुदायिक बना देती है। और इस तरह से अब तक मौजूद विवाह की दोनों आधारशिलाओं को निजी स्वामित्व द्वारा निर्धारित पत्नी की अपने पति पर और बच्चों की माता-पिता पर निर्भरता – को नष्ट कर देती है। पत्नियों के कम्युनिस्ट समाजीकरण के खिलाफ नैतिकता का उपदेश झाड़ने वाले कूपमंडूकों की चिल्ल-पों का यह उत्तर है। पत्नियों का समाजीकरण एक ऐसा व्यापार है जो पूरी तरह से बुर्जुआ समाज का लक्षण है और आज वेश्यावृत्ति की शक्ल में आदर्श रूप में विद्यमान है। हालांकि वेश्यावृत्ति की जड़ें तो निजी स्वामित्व में हैं, और वे उसके साथ ही ढह जाएंगी। इसलिए कम्युनिस्ट ढंग का संगठन पत्नियों के समाजीकरण की स्थापना के बजाय उसका अंत ही करेगा।’

बुर्जुआ समाज साम्यवादियों की अवधारणा पर व्यंग्य करता है और मार्क्स भी उसका जवाब व्यंग्य में देते हैं। मार्क्स के मुताबिक,बुर्जुआ समाज में औरतों का इस्तेमाल एक वस्तु की तरह होता है। निजी संपत्ति की रक्षा के लिए राज्य आया और इसी निजी संपत्ति का उत्तराधिकारी हासिल करने के लिए विवाह। विवाह जैसे बंधन के कारण स्त्री निजी संपत्ति हो गयी। लेकिन उसी बुर्जुआ समाज में अपने फायदे के लिए औरतों का सार्वजनिक इस्तेमाल भी होता है। वह चाहे सामंतवादी राज्य हो या पूंजीवादी, सभी में औरत उपभोग की ही वस्तु रही। एक कॅमोडिटी।

आखिर कम्युनिस्ट शासन में परिवार कैसा होगा?इस शासन में निजी संपत्ति का नाश हो जाएगा, इसलिए संबंध भी निजी होंगे। कम्युनिस्ट शासन औरत और मर्द दोनों को निजता का अधिकार देता है। इन निजी संबंधों से पैदा बच्चों की परवरिश राज्य करेगा, इसलिए यह कोई समस्या नहीं होगी।

उमा की बातों को सच मानें तो कम्युनिज्म की यह अवधारणा नक्सल शिविरों में क्यों नहीं है?क्या मुकम्मल राजनीतिक शिक्षण के बिना पार्टी में कॉमरेडों की भर्ती हो जाती है?सोच के स्तर पर वे इतने अपरिपक्व क्यों हैं कि महिला कॉमरेडों के साथ व्यवहार के मामले में बुर्जुआ समाज से अलग नहीं होते। कम से कम नक्सल शिविरों में तो आदर्श कम्युनिस्ट शासन का माहौल दिखना चाहिए! लेकिन यहां तो महिला कॉमरेड एक ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रूप में देखी जा रही है।

कहीं भी एक ही प्रकार का शोषण अपने अलग-अलग आयामों के साथ अपनी मौजूदगी सुनिश्चित कर लेता है। उमा के मुताबिक अगर किसी बड़े कॉमरेड ने किसी महिला को ‘अपनी’घोषित कर दिया है तो फिर वह ‘महफूज’है। यानी उसकी निजता की सीमा उसके घोषित संबंध पर जाकर खत्म हो जाती है। अब उसके साथ एक पत्नी की तरह व्यवहार होगा। जो किसी की पत्नी नहीं,वह सभी कॉमरेडों की सामाजिक संपत्ति!

जंगल के बाहर के जिस समाज को अपना वर्ग-शत्रु मान कर माओवादी आंदोलन चल रहा है, क्या वहां महिला या देह के संबंध उसी बुर्जुआ समाज की तर्ज पर संचालित हो रहे हैं,जिससे मुक्ति की कामना के साथ यह आंदोलन खड़ा हुआ है?जबकि एंगेल्स कम्युनिस्ट शासन में इस स्थिति के खात्मे की बात करते हैं। लेकिन कॉमरेडों ने शायद किसी रटंतू तरह एंगेल्स का भाषण याद किया और भूल गये।

वहीं आधुनिक बुर्जुआ समाज में महिलाओं की निजता के अधिकार की सुरक्षा के लिए कई उपाय किये गये हैं। यह दूसरी बात है कि व्यावहारिक स्तर पर ये अधिकार कुछ लड़ाकू महिलाएं ही हासिल कर पाती हैं। लेकिन इसी समाज में अब वैवाहिक संबंधों में भी बलात्कार का प्रश्न उठाया गया है। यानी विवाह जैसे सामाजिक बंधन में भी निजता का अधिकार दिया गया है। एक ब्याहता भी अपनी मर्जी के बिना बनाये गये शारीरिक संबंधों के खिलाफ अदालत में जा सकती है। कार्यस्थलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए यौन हिंसा की बाबत कई कानून बनाये गये हैं।

यहां बुर्जुआ समाज का व्यवहार जनवादी दिखता है। लेकिन गौर करने की बात यह है कि पूंजीवादी समाज में भी महिलाओं को अपने शरीर से संबंधित ये अधिकार खैरात में नहीं मिले हैं। पश्चिमी देशों में चले लंबे महिला आंदोलनों के बाद ही स्त्रियों के अधिकारों को तवज्जो दी गयी। यह भी सही है कि महिला अधिकारों के कानून बनते ही सब कुछ जादुई तरीके से नहीं बदल गया। अभी इन अधिकारों के लिए समाज में ठीक से जागरूकता भी नहीं पैदा हो सकी है कि अतिरेक मान कर इन कानूनों का विरोध किया जाने लगा है। दहेज, घरेलू हिंसा या यौन शोषण के खिलाफ बने कानूनों को समाज के अस्तित्व के लिए खतरा बताया जाने लगा है। देश की अदालतों में माननीय जजों को भी इन अधिकारों के दुरुपयोग का खौफ सताने लगा है। इस चिंता में घुलने वाले चिंतक महिलाओं के शोषण का घिनौना इतिहास और वर्तमान भूल जाते हैं।

जनवादी महिला आंदोलनों ने ही भारत में स्त्री अधिकारों की लड़ाई की बुनियाद रखी। यहां जब स्त्री के हकों को कुचलने की कोशिश की जाती है तो जनवादी पार्टियां ही उनकी हिफाजत के आंदोलन की अगुआई करती हैं। लेकिन अति जनवाद का झंडा लहराते माओवादी शिविरों में महिला लड़ाकों की देह सामंतवादी रवैये की शिकार क्यों है?उमा ने यह भी बताया कि राज्य समिति का एक सचिव अक्सर गांवों में जिन घरों में शरण लेता था,वहां की महिलाओं के साथ बलात्कार करता था और इसके लिए उसे सजा भी दी गयी थी।

सवालों को टालने के लिए इसे एक कुदरती जरूरत मानने वालों की कमी नहीं होगी। लेकिन फिर कश्मीर,अफगानिस्तान या दुनिया के किसी भी हिस्से में सैन्य अभियानों के दौरान महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार सहित तमाम अत्याचारों के बारे में क्या राय होगी? यहां यह तर्क भी मान लेने की गुंजाइश नहीं है कि ऐसी अराजकता निचले स्तर के माओवादी कार्यकर्ताओं के बीच है जो कम प्रशिक्षित हैं। यहां तो सवाल शीर्ष स्तर के माओवादी नेताओं के व्यवहार पर है।

जंगलमहल की क्रांति का जीवन पहले भी पत्रकारों और दूसरे स्रोतों से बाहर आता रहा है। अभी तक लोग क्रांति के रूमानी पहलू से रूबरू हो रहे थे कि किस तरह कठिन हालात में बच्चे-बड़े, औरत-मर्द क्रांति की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन लाल क्रांति के अगुआ नेताओं का रवैया भी मर्दवादी सामंती संस्कारों से मुक्त नहीं हो सका।

इस बीच ताजा खबर यह है कि पश्चिम बंगाल में माओवादियों की सक्रियता वाले इलाकों में कई वैसी महिलाएं ‘लापता’ हैं, जिन्होंने माओवादी दस्ते या उनके जुलूसों में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इनमें से एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता छवि महतो के मामले का खुलासा हो पाया है,जिसे पीसीपीए के मिलीशिया उठा कर ले गये थे। उसके साथ पहले सामूहिक बलात्कार किया गया,फिर उसे जमीन में जिंदा गाड़ दिया गया।

क्रांति का समय तो तय नहीं किया जा सकता। लेकिन जो तस्वीरें दिख पा रही हैं,उनके मद्देनजर मार्क्सवादी-माओवादी कॉमरेडों से अभी ही यह सवाल क्यों न किया जाए कि भावी क्रांति के बाद कैसा होगा उनका आदर्श शासन?मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?
(जनसत्ता  से  साभार )
 
 
 

हिंसा का बौद्धिक समापन


माओवादियों से मध्यस्तता के मामले में गृहमंत्री से मिले पत्र को लेकर हर जगह 'सूक्ति वचन' के तौर पर  पढ़ने वाले स्वामी अग्निवेश की यह कला नयी नहीं है.शम्सुल इस्लाम ने अपने पत्र में 2002के गुजरात नरसंहार के बाद स्वामी अग्निवेश पर सांप्रदायिक होने के जो तथ्य गिनाएं   हैं, वह हतप्रभ करने वाला है.

हालाँकि स्वामी अग्निवेश की चालाकी और सत्तानिष्ठा  की आलोचना के बरख्स  उनको चाहने वाले कुछ  लोगों ने जनज्वार को कहा कि शांति यात्रा में शामिल बाकि को जब चिदंबरम ने बुलाया ही नहीं और चिठ्ठी स्वामीजी को दी तो  इसमें स्वामी जी का क्या दोष.हालाँकि अब इस मामले में स्वामीजी को सीधे जवाब देना चाहिए और इस मुगालते से निकल लेना चाहिए कि सवाल पूछने वालों की औकात क्या है बजाय की गलतियों को सुधारें ?बहरहाल हम उनके द्वारा हासिल किये गए दो पत्रों को एक साथ प्रकाशित कर रहे हैं जिससे कि सबको पता चल सके कि स्वामी जी के पत्र हासिल करने की कला नयी नहीं है, और  न ही राजसत्ता के भीतर पैदा हुई विकट स्थिति में  सत्ताधारी पार्टियों के साथ गलबहियां होने की बात नयी.

अपने को शांति और अहिंसा का दूत कहने वाले स्वामी अग्निवेश ने अपने साथियों और विश्वास करने वालों पर जो आघात किया है,उस हिंसा को सरोकारी जनता हमेशा याद रखेगी क्योंकि राजसत्ता के हिंसा का यह बौद्धिक समापन है.


माओवादियों से वार्ता के सन्दर्भ  में गृहमंत्री का पत्र और गुजरात दंगे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पत्र अग्निवेश के नाम



Sep 9, 2010

गुजरात नरसंहार के बाद भी उठा था सवाल

भाग - १
माओवादियों और सरकार के बीच शांतिवार्ता में  स्वामी अग्निवेश की भूमिका पर  उनके साथियों ने ही जो सवाल उठाये हैं  (शांति दूत की जगह चुनावी एजेंट बने अग्निवेश !) , वह साफ कर देता है कि स्वामी जी  की शांतिवार्ता नायकत्व की चालाकी थी.स्वामी अग्निवेश की इस चालाकी से निराश वह लोग जो उन्हें पहले से एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष शख्सियत मानते रहे हैं,उन्हें तब और निराशा होती है जब २००२ के गुजरात नरसंहार को लेकर  प्रो.शम्सुल इस्लाम, स्वामी अग्निवेश की गतिविधियों को केंद्र में रख एक हिन्दू सांप्रदायिक नेता के बतौर  विश्लेषित एक खुला पत्र जारी करते हैं. 

यह पत्र उन सभी लोगों को हतप्रभ कर देने वाला है जो स्वामी जी को धर्मनिरपेक्ष मानते हैं और उन वामपंथियों के लिए ककहरा है जो स्वामी जी से लाल सलाम सुनकर लहालोट हुए जा रहे हैं.शम्सुल इस्लाम द्वारा लिखित यह पत्र गांधीवादी नेता स्व.निर्मला देश पाण्डेय और स्वामी अग्निवेश को संबोधित है.याद होगा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भारत आगमन पर जब पुरे देश में जबरदस्त विरोध हो रहा था,तो जो पांच सामाजिक कार्यकर्त्ता बुश के स्वागत में मिलने गए थे उनमें स्वामी अग्निवेश और देशपांडे भी शामिल थीं.  


मनमोहन सिंह का मुखड़ा लिए शम्सुल: विरोध दर्ज कराया
शम्सुल इस्लाम 


निर्मला दीदी और स्वामी जी,

आप दोनों की आत्मा पवित्र है और हममें से कई मानते हैं कि आप दोनों सच के आलंबरदार हैं!इसके बावजूद, अप्रैल 1 से 4 2002 के दौरान गुजरात में ‘करुणा की तीर्थयात्रा’ (पीओसी) नामक कार्यक्रम के दौरान आपके व्यवहार से हमें गहरी निराशा हुई है और हमारे दिल को चोट पहुंची है.अगर आप सचमुच वैसे ही हैं जैसा कि आप दावा करते हैं तो हमारी मांग है कि आप हमारे कुछ सवालों का जवाब दीजिए!

इन सवालों को आप ये कहकर खारिज नहीं कर सकते कि निशांत नाट्य मंच भी उस भीड़ का हिस्सा था जो पीओसी (पीस  कमिटी )में शामिल था  और हम कैसे आपसे सवाल करने की जुर्रत कर सकते हैं? निश्चित तौर पर हम सब पीओसी के अछूत हैं,लेकिन इस देश के अछूतों को भी आप जैसी पवित्र आत्माओं की मंशा जानने का हक है.हम आपको बताना चाहते हैं कि ये मुद्दा इसलिए नहीं उठा रहे हैं कि हम व्यक्तिगत रूप से आहत हैं,बल्कि उस जरूरी वजह से उठा रहे हैं जिससे धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ संघर्ष कमजोर पड़ रहा है.ये फासीवादी ताकतों की मजबूती की वजह से नहीं हो रहा है,बल्कि उन गद्दारों की गुप्त मंशाओं के कारण हो रहा है जो लोकतांत्रिक और सहिष्णु होने का चेहरा चिपकाए घूमते हैं.

आप इस तथ्य से भलीभांति अवगत हैं कि यहां पर उठाए जा रहे बहुत से मुद्दे पीओसी के दौरान हर दिन आपके संज्ञान में लाए गए हैं.तब आपसे से ये अनुरोध किया गया था कि इन मुद्दों पर पूरे ग्रुप के सामने चर्चा होनी चाहिए,लेकिन आपने उन बातों को तवज्जो नहीं दी और पीओसी को बपौती की तरह इस्तेमाल किया.

हमारे सवाल कुछ इस तरह हैं- 

1. क्या यह सच है कि ‘केन्द्रीय आर्य युवक परिषद’, दिल्ली के बैनर तले मुस्लिम विरोधी और दलित विरोधी दो पेज का पर्चा बांटा गया था?ये वही संगठन है जो पीओसी को एक अप्रैल को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक विदा करने आया था.पीओसी के सदस्यों ने जब इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उनसे क्या कहा गया था? क्या आपने इस तरह का फासीवादी पर्चा बांटने वालों के खिलाफ कहीं एफआईआर दर्ज कराई थी?इस तरह के पर्चे देश के एक खास समुदाय के खिलाफ जहर फैलाने का काम कर रहे थे और ये भारतीय दंड संहिता का सरेआम उल्लंघन हैं?

2. ट्रेन (फ्रंटियर मेल) के अंदर हिंदी के जिस पर्चे को बांटा गया था उसे यहां फिर से दोबारा छपवाया गया.निश्चित तौर पर आपके पास इस पर्चे की मूल कॉपी होगी.और अगर नहीं है तो हम इसकी फोटोकॉपी आपको भेज सकते हैं.जिस संगठन के लोग पर्चे बांट रहे थे उसका नेतृत्व अनिल आर्य नाम का आदमी कर रहा था.ये वही अनिल है जिसने न केवल स्वामी जी और निर्मला दीदी का फूलों का हार पहना कर स्वागत किया था,बल्कि पूरे कार्यक्रम की फोटोग्राफी भी की थी.ये फोटोग्राफ दिल्ली के कई अखबारों में प्रकाशित हुए थे और जांच के लिए अभी भी उपलब्ध हैं.

 अनिल आर्य ने मार्च 31,2002को 'गुजरात दंगों की सच्चाई क्या है?'शीर्षक से जो पर्चा बांटा था उसका एक नमूना देखें...

 ये (गुजरात दंगे)सांप्रदायिक नहीं थे,बल्कि ये पाकिस्तान और पश्चिमी देशों द्वारा भारत के खिलाफ भड़काया गया (एक किस्म)गृहयुद्ध था.पाकिस्तान की आईएसआई और मुस्लिम एजेंट गुजरात के गांव-गांव तक पहुंच चुके हैं. हमने मुस्लिम कार्यकर्ताओं के साथ लंबी बातचीत की. बातचीत के दौरान उन लोगों ने हमें बताया कि माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह चौधरी के राज में हुए दंगों के दौरान हिंदुओं के खिलाफ लड़ते हुए औऱ लोगों की हत्या करते हुए उन्होंने इसका लंबा अनुभव प्राप्त कर लिया है.मुसलमानों की पुरानी और नई पीढ़ी लड़ाई में माहिर हो चुकी है.परिस्थिति के मुताबिक उनके पास हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज उड़ाने की क्षमता है.सिमी के कई कार्यकर्ताओं ने हमें बताया कि उनका मकसद हिंदू बहुल इलाकों में बम गिराना है,आतंक फैलाना है और इन इलाकों को अपने कब्जे में लेना है.अहमदाबाद, पुरानी दिल्ली,है दराबाद और अजमेर को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है.

गले में गमछा लटकाए अनिल आर्य, स्वामी अग्निवेश के साथ
आज स्थिति ये है कि गुजरात के हर हाईवे के नजदीक पाकिस्तानी एजेंटों ने अपनी कॉलोनी बना ली है.बड़े-बड़े घर,हॉल और आधुनिक सुख-सुविधाओं और तहखानों से सजी-धजी हजारों मस्जिदों का निर्माण किया गया है.मुस्लिम गुंडों और आपराधिक गैंगों की उपस्थिति से आतंक फैल रहा है.हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फंसाकर उनसे शादी करना और फिर उनका धर्म परिवर्तन कराना आम बात हो चुकी है. आतंक फैलाकर हिंदू कॉलोनियों को खाली कराया जा रहा है.
{ हस्ताक्षर- मित्र महेश आर्य (अध्यक्ष आर्य केन्द्रीय सभा, अहमादाबाद), शरद चंद्र आर्य (मंत्री आर्य केन्द्रीय सभा, अहमदाबाद), अनिल आर्य (अध्यक्ष, केन्द्रीय आर्य युवक परिषद, दिल्ली) 

3. क्या यह सच है कि पीओसी के अधिकांश सदस्य गांधी आश्रम द्वारा संचालित एक दलित स्कूल में ठहरे थे और इस स्कूल के लड़के और लड़कियों (उम्र- 5 साल से 12 के बीच) को पानी भरने, बिस्तर सजाने और सफाई करने के काम में लगाया गया था? क्या ये सच है कि इन बच्चों को रात के 2 बजे उठा दिया जाता था और अगले दिन का खाना बनवाया जाता था? क्या वहां ऐसे लोग भी मौजूद जिन्होंने इस तरह की अमानवीय स्थितियों का विरोध किया था और खाने से इंकार किया था?

4. क्या ये सच है कि पीओसी के सदस्यों को गैरमुस्लिम इलाकों में जाने और शाति का संदेश प्रसारित करने की इजाजत नहीं दी गई?ऐसा क्यों हुआ कि हममें से कुछ लोगों ने जब पर्चा बांटने की कोशिश की तो उनको ऐसा करने से मना कर दिया गया.ऐसा क्यों हो रहा था कि केवल मुस्लिम राहत शिविरों में तो हम पीओसी का बैनर लगाते थे,लेकिन जब दूसरे इलाकों में होते थे तो इसे छिपाकर रखते थे?क्या आप ये मानते थे कि गैर मुस्लिम इलाकों में शांति का संदेश प्रसारित करने की कोई जरूरत नहीं,ये केवल मुसलमानों की समस्या है?क्या आपको वड़ोदरा की वो घटना याद है जहां धर्मनिरपेक्ष लोगों के एक स्थानीय समूह ने आपको सड़क पर उतरने के लिए बाध्य कर दिया था और निशांत नाट्य मंच ने हिंदुओं के बीच सांप्रदायिकता के मसले पर जोरदार हस्तक्षेप किया था.

5. देलोल गांव में जो हुआ क्या आपको उस बारे में शर्म आती है? हो सकता है आप इसे भूल गए होंगे, लेकिन हम उन घटनाओं को एक बार फिर सिलसिलेवार तरीके से आपके सामने रखना चाहते हैं?यह गांव वड़ोदरा और गोधरा हाईवे के बीच में है और दुर्भाग्य से मुसलमानों के संपूर्ण सफाये की वजह से सुर्खियों में है.मुसलमानों की संपत्तियों को यहां पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है और करीब 30 लोगों की हत्या की गई है. जब हम लोग गोधरा में थे तो इस गांव के कई मुसलमानों ने दीदी और स्वामीजी से अनुरोध किया वो इस गांव का दौरा करें.

गोधरा में इस बात का ऐलान किया गया था कि हमारी यात्रा इसी गांव में जाकर समाप्त होगी. हम दो बसों में सवार होकर इस गांव में पहुंचे.वहां पहुंचने पर हमने देखा कि जिन दो बसों में आप लोग सवार थे उसे वहां पार्क कर दिया गया है.स्वाभाविक तौर पर निशांत के लोग गांव में गए और उन्होने वहां भगत सिंह,रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला और चंद्रशेखर आजाद की तस्वीरों के साथ सांप्रदायिक सौहार्द के गीत गाने शुरु किए.इन गीतों में कहा गया था कि हम सबके शहीद एक हैं, हमारी विरासत एक है इसलिए धार्मिक पहचान के आधार पर लड़ाई व्यर्थ है.

गांव की सभी औरतें, बूढ़े, और बच्चे जो कि हिंदू थे बड़ी तन्मयता के साथ इन गीतों को सुन रहे थे. हम करीब 30 -35 मिनट तक गांव में थे तभी विश्व हिंदू परिषद के लोग 20-25 युवकों के साथ मारने-पीटने के मकसद के साथ गालियों की बौछार करते हुए हमारी तरफ बढ़े. हम गीत सुनते रहे, जबकि वो लोग हाथापाई पर उतर आये.गांव के लोगों ने बीचबचाव किया और उनसे चले जाने के लिए कहा.तभी अचानक पुलिस की एक जीप वहां प्रकट हुई और पुलिस अधिकारी हमें ये कहते हुए डांटने लगा कि जब आपके नेताओं ने वहां जाने की हिम्मत नहीं की तो आप यहाँ कैसे हैं? तब तक हमें ये नहीं मालूम था कि आप दोनों ने बस में ही रहने का फैसला किया था और पुलिस को भी ये बात मालूम थी.हम लोग अभी भी इस बात से व्यथित हैं कि आपने खुले तौर पर हमसे ये बात साझा नहीं की.

आखिर में हम ये जानना चाहते हैं कि अगर आपने इस गांव में नहीं जाने का फैसला किया था तो फिर गांव के बाहर अपनी बस क्यों पार्क की?क्या आप इस बात का इंतजार कर रहे थे कि हममें से किसी को पीट दिया जाए?

(पत्र का शेष भाग अगली पोस्ट में देखें  )

अनुवाद - विडी 



फिर मोदी सरकार के खिलौना बने ?

 
भाग- 2
 

6. आपको हमें ये बताना ही होगा कि अहमदाबाद के जहांपुर राहत शिविर में जहां दंगा पीड़ित हजारों मुसलमान अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे थे, क्या हुआ था? ऐसा क्यों हुआ कि स्वामीजी के भाषण के बाद उनमें से सैकड़ों की तादात में औरतें, बड़े-बूढ़े और जवान हमारा पीछा कर रहे थे? क्या आपने कभी ये समझने की कोशिश की थी कि स्वामीजी के अमानवीय और असंवेदनशील भाषण ने उनको दुख पहुंचाया या कोई और वजह है?क्या आपको हमारे सदस्यों द्वारा विश्व हिंदू परिषद के गुंडों की तर्ज पर भगवा गमछा और बैंड बांधना याद है?क्यों दो बूढ़ी महिलाओं ने स्वामी जी को वहां से भाग जाने के लिए कहा था?आपको ये भी बताना होगा कि भागते वक्त सारे वाहनों के ले जाने से भीड़ और उत्तेजित हो गई थी.(निर्मला दीदी वहां नहीं आई थीं क्योंकि वो सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत में व्यस्त थीं. ...ऐसा दीदी के दो सहायकों ने बताया था) क्या आपने भागते वक्त निशांत के दूसरे साथियों के बारे में भी सोचा था. जॉन दयाल, उतिराज और दो बौद्ध साथियों के भीड़ के बीच फंस जाने के बारे में क्या आपने सोचा था? क्या आपको मालूम है कि हमारे ग्रुप का एक साथी गुस्साई भीड़ को समझाने के मकसद से सूमो के ऊपर चढ़ गया था,ताकि लोगों को ये समझा सके कि विश्व हिंदू परिषद या हत्यारे मोदी से हमारा कोई संबंध नहीं है? क्या आपने अपनी कायरता और मूर्खता के परिणाम के बारे में सोचा था?

निर्मला देश पांडे : कई छवियाँ
7. ऐसा क्यों हुआ कि पीओसी के सदस्यों द्वारा इकट्ठा किया गया राहत चंदा प्रभावितों तक नहीं पहुंचा और उसे दानदाताओं को वापस करना पड़ा?ये तथ्य है कि गोधरा के राहत शिविर की दयनीय हालात सुनकर पीओसी की एक महिला सदस्य इस कदर व्यथित हुई कि उसने प्रस्ताव रखा था हमें तुरत-फुरत पैसा इकट्ठा करना चाहिए,ताकि इसे जल्दी से जल्दी पीड़ितों तक पहुंचाया जा सके. एक घंटे के अंदर करीब 4500 रुपए इकट्ठा किए गए थे. यह प्रस्ताव भी रखा गया था कि ये चंदा उस एजेंसी को सौप देना चाहिए जिससे केड्रिक प्रकाश और तीस्ता सीतलवाड़ जुड़े हुए थे और जो सांप्रदायिक मुद्दों पर काम कर रहे थे.यहां पर भी स्वामीजी ने सलाह दी कि इसे हिंदू और मुसलमान पीड़ितों के बीच बांट देना चाहिए.इसीलिए इसे दो हिस्सों में विभाजित कर हिंदू और मुसलमान पीड़ितों में बांट दिया गया था.लेकिन थोड़ी ही देर बाद ये साफ हो गया था कि विश्व हिंदू परिषद इस पैसे को लेकर नाराज हो गया था और उसने इसे वापस कर दिया था.इस परिस्थिति में ये पैसा उन लोगों को दिया जाना चाहिए था जिनको इसकी जरूरत थी.आपको हमें ये बताना होगा कि पैसा चंदा देने वालों को वापस क्यों कर दिया गया था?

8. हमें ये जानने का हक है कि ये पीओसी किसने आयोजित की थी? हम लोग ये मान रहे थे कि इसे दिल्ली के लोगों ने आयोजित किया था और गुजरात जाने का असली मकसद नरसंहार के पीछे की ताकतों का पर्दाफाश करना था.मगर अचानक हमने आपको अटल बिहारी बाजपेयी का हस्ताक्षरित पत्र लहराते हुए देखा,जिसमें अटल बिहारी बाजपेई ने इस यात्रा को आशीर्वाद दिया था.अटल बिहारी बाजपेई का ये खत नैनीताल के उनके बेस ऑफिस से लिखा गया था.आपको किसी नेता से ये पत्र लिखवाने या हासिल करने की इजाजात किसने दी थी?

9. ज्यादातर सदस्यों को 700 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से दिए गए, लेकिन हमें शक है कि आपने दूसरे स्रोतों से भी रुपया इकट्ठा किया था. क्या आप हमें पीओसी की बैलेंस शीट दिखा सकते हैं?

10. ऐसा क्यों हुआ कि हमारी हर दिन की मांग के बावजूद किसी सदस्य के साथ कोई बातचीत नहीं की गई? हमने दो वजहों से इस मांग पर जोर दिया.नंबर एक-अभियान की दिशा के बारे में पता लगाना और मुसलिम पीड़ितों के पास विश्व हिंदू परिषद जैसे भगवा झंडे लेकर जाने जैसे मुद्दों पर राय जानना. जुरूपुरा के राहत शिविर में इस तरह के आपराधिक दिखावे पर क्या प्रतिक्रिया हुई ये हम सबको पता है.दूसरा-पीओसी के सदस्यों को सांप्रदायिकता विरोधी अभियान के बारे में समझाना था,क्योंकि उनमें से अधिकतर उग्र सांप्रदायिक थे और फासीवादी हिंदू विचारों से ओतप्रोत थे.जैसे –मध्यप्रदेश के एक युवा स्वामीजी बस में किसी को बता रहे थे कि मुसलमानों ने सदियों से हमारी औरतों की हत्या की है और उनके साथ बलात्कार किया है.अब जबकि हिंदू कुछ सप्ताह के लिए कुछ ऐसा कर रहे हैं तो हमें विरोध क्यों करना चाहिए?हमें अभियान के दौरान क्यों कहा जा रहा था कि वीएचपी-बीजेपी-मोदी-अटल-बजरंग दल का नाम नहीं लेना है?क्यों कहा जा रहा था कि विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचानी है?

पहुँच हर जगह, पकड़ हर मोर्चे पर
11 . क्या आप सांप्रदायिक-फासीवादी मोदी सरकार के हाथ का खिलौना नहीं बने?क्या आपने मोदी सरकार का अनुचर बनकर हमें जान बचाने के लिए भागने पर मजबूर नहीं कर दिया?आपको भलीभांति मालूम है कि जुरूपुरा के कैंप की शर्मनाक घटना के बाद हम लोगों ने आपके छिपे हुए मंतव्य को ताड़ते हुए आपके साथ न जाने का फैसला किया था और हम अहमदाबाद के ईश्वर भवन में ही रुक गए थे, जहां हम पिछली रात से रुके हुए थे. शाम को दो बौद्ध साथी एक ऑटो रिक्शा में भागते हुए आए और हमें बताया कि आपकी मार्फत उनको जानकारी मिली है कि पीओसी के मुसलिम सदस्यों की जान खतरे में है,क्योंकि विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने उन पर हमला करने की धमकी दी है.यह एक बेहद दिलचस्प वाकया था.इसके पहले विश्व हिंदू परिषद के गुंडों ने शांति के काम रहे हर संगठन पर हमला किया था, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के. सात अप्रैल को उन्होंने साबरमती आश्रम में बिला किसी भेदभाव के इसे फिर से अंजाम दिया.वास्तव में वो हिंदू कार्यकर्ताओं पर ज्यादा गुस्सा थे.हालांकि इस बार वो पीओसी के हिंदू कार्यकर्ताओं को जाने देने के लिए तैयार थे और केवल मुसलिम कार्यकर्ताओं पर हमला करने वाले थे.

हम इस बात को पक्के तौर पर मानते हैं कि मोदी सरकार और इसकी गुप्तचर एंजेसियों के साथ सांठगांठ करके आप दोनों ने इस तरह का सीन तैयार किया कि हमें ईश्वर भवन जैसे सुरक्षित जगह को खाली करना पड़े. ये सब इसलिए किया गया क्योंकि हममें से दो सदस्य मुसलमान थे.ईश्वर भवन के एक कर्मचारी ने बताया कि वो हमें भवन से इसलिए बाहर करना चाहते थे क्योंकि स्वामीजी और मैडम हमें अपने ग्रुप के साथ रखने के लिए तैयार नहीं थे. उसने ये भी बताया कि आप और गुजरात की गुप्तचर एंजेसियां इस बात के लिए परेशान थीं कि निशांत के लोग 4अप्रैल को सांप्रदायिकता विरोधी प्रदर्शन कर सकते हैं. उस दिन प्रधानमंत्री को अहमदाबाद आना था. दीदी और स्वामीजी! बताइए कि आपने हमें इस खतरे के बारे में क्यों नहीं बताया, जबकि हममें से दो मुसलमान थे? क्या आपने इस खतरे के खिलाफ कोई एफआईआर दायर की थी?

सामाजिक काम का जलवा:  बस तू ही तू
12. आपने पीओसी के दौरान महात्मा गांधी की तस्वीर ले चलने से क्यों इंकार दिया था? हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि हम लोगों ने आप दोनों को महात्मा गांधी की तस्वीर ले चलने की सलाह दी थी,क्योंकि गुजराती लोग महात्मा गांधी की शांति और सांप्रदायिक सदभाव के मसीहा के रूप में पूजा करते हैं.महात्मा गांधी की तस्वीर साथ लेने से ये संदेश भी साफ हो जाता कि जिन लोगों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी वो एक बार फिर गुजरात को नष्ट करने पर आमादा हैं.आपने ये कहते हुए इस सलाह को खारिज कर दिया कि इससे समस्या बढ़ सकती है.

कृपया इन सवालों का जवाब देने में कुछ वक्त जाया कीजिए.हम इस बहस को उन मित्रों तक तक ले जाना चाहते हैं जो फासीवाद, धार्मिक असहिष्णुता और मानवता के प्रति संवेदनशील हैं.ये बहस उन (छिपे हुए)गद्दारों के बारे में हमें और जानकारी मुहैया कराएगी जो हिंदू  फासीवादियों के काम को और आसान बनाते हैं.

स्वयंभू लोकतांत्रिक और महान धर्मनिरपेक्ष स्वामी अग्निवेश से कुछ और सवाल -

1. स्वामीजी के नेतृत्व में चलने वाले 'बंधुआ मुक्ति मोर्चा' द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेसों को वर्ष1998-2004 के दौरान आरएसएस और बीजेपी के नेताओं ने कितनी बार संबोधित किया?
2. क्या ये सच है कि आप सन 2000 में आर्य समाजियों का एक प्रतिनिधि मंडल लेकर प्रधानमंत्री बाजपेयी के निवास स्थान पर गए थे और आपने व्यक्तिगत तौर पर उन्हे केसरिया रंग की पगड़ी पहनाई थी?
3. क्या ये सच है कि आपने सन 2000 में बीजेपी के पक्ष में प्रचार किया था?
4. वर्ष 1998-2004 के दौरान जब स्वामीजी को ऑल इंडिया रेडियो में स्लॉट दिया गया तो उस वक्त मंत्री कौन था?
 
आपके जवाब के इंतजार में,

शमशुल इस्लाम, नीलिमा शर्मा, ब्रह्म यादव, जावेद अख्तर
मार्च 2002