Aug 13, 2010

एंडे चेची अफ्रीका


जी. एस. रोशन
                                                                                                                     
एंडे चेची अफ्रीका
तुम वो बच्ची हो जिसे उन्होंने
एक खेल का मैदान बनाने के लिए
मस्ती में चीखते-चिल्लाते और ठोकरों से उछाल-उछालकर
जिंदा दफ़ना दिया।


काफी हद तक वैसा ही सब चलता है यहां भी
यहां वे थूकते हैं हमारी जमीनों और संतानों पर
और चले जाते हैं आहिस्ता-आहिस्ता दूर, बेधड़क
और जब फसल पककर तैयार होती है
पौधों के पतले तने पुष्ट और मजबूत होते हैं
जब दानों में उतरता है दूध और मेहनतकश  आंखों में रोटी के सपने
वे आते हैं और ले जाते हैं अनाज
बेच देते हैं किसी बड़ी सी बेकरी के मालिक को
बिस्किट बनाने के लिए...

और हमारा क्या, मेरी बहन अफ्रीका,
बची-खुची झूरन-झारन के इंतजार में
हम दोनों के मुंह खुले ही रह जाते हैं।

एक मोटे ब्रश  से हमें एक ही झूठे रंग से पोत दिया जाता है
जैसे कि पूरा अफ्रीका एक जैसा हो, या पूरा भारत
जबकि हम दोनों के बीच एक जैसा सिर्फ खालीपन है
जो हमारे पेट से लेकर हमारे हाथों तक फैला है,
और हमारे खाली हाथों के आसपास खाली-खाली बजते वो पुराने गीत हैं
जो सबकुछ भरपूर होने के बारे में थे।

इसलिए मेरी बहन, अफ्रीका,
हम दोनों एक दूसरे के लिए गाते हैं शोकगीत
इस उम्मीद में कि हम मौत से भी जगायेंगे एक दिन, एक-दूसरे को।
हमारे खाली पेटों को बजाकर निकाली गयी सलामी की धुन
जो सुनायी दी पृथ्वी के किनारों तक तेज बजते नगाड़ों सी
उससे भी तेज धड़कते हुए हम चलेंगे
अपने जिंदा लोगों की जीने की अदम्य इच्छा के साथ।

तुम दाल लेकर आना एंडे चेची अफ्रीका
मैं भात लेकर आऊंगा
हम सूरज की रोशनी से दूर भगायेंगे अंधेरे को
हम मेडागास्कर में खोलेंगे अपने टिफिन तोड़ेंगे अपने खाने के निवाले
तुम फिर से सिखाना मुझे अपने पैरों पर ठीक से चलना
और मैं तुम्हें सुनाऊंगा कहानियां अपने सफर के बारे में
हम करेंगे छपछप समंदरों के पानी में... बिना डरे।

उनकी मत सुनना एंडे चेची अफ्रीका
जो हमारा नाम लेकर, हमारे भाई बनकर तुम्हारे पास पहुंचे हैं
जो अपने मुनाफाखोर वादों को जिस धागे में पिरोकर लाते हैं
उसे वो तुम्हें ही बेच देते हैं अपने बालों का जूड़ा बांधने के लिए।

अगर तुम मां से पूछोगी तो वो तुम्हें बतायेंगी चेची
कि तुम्हारी जमीन पर दौड़ रहे इनके पीतल के रथ के पहिये
उन इंसानों की जिंदगी से सने हैं
जो यहां हिंदुस्तान के बीचोंबीच से लेकर हर कोने तक
खेतों, जंगलों, खदानों और कारखानों में फैले हैं
और जिनका नाम कभी उड़ीसा है, कभी दंतेवाड़ा, या
    अफ्रीका, अफ्रीका, अफ्रीका...


  • मलयालम में एंडे चेची का अर्थ होता है-मेरी बहन


अंग्रेजी से अनुवाद-विनीत तिवारी

(रोशन मलयालम और अंग्रेजी में कविता लिखते हैं. अफ्रीका सहित कई महाद्वीपों में रह चुके हैं. इन दिनों इंदौर में रिसर्चर हैं. )
दैनिक भास्कर से साभार

उसूलों की वजह से भगत सिंह को नहीं बचा सके गाँधी


करीब 87साल के कुलदीप नैयर महाभारत के संजय की तरह हैं। पिछले छह दशकों से इस भारतीय प्रायद्वीप में घटी सभी बड़ी घटनाओं को उन्होने अपनी निगाहों से देखा है,महसूस किया है। भारत-पाकिस्तान और बंग्लादेश के आसमान में कुलदीप की निगाहें हमेंशा चौकन्नी रहती हैं। देश विभाजन, पाकिस्तन से युद्ध, गांधी की हत्या, इंदिरा का आपातकाल, बंग्लादेश का निर्माण, पंजाब में आतंकवाद,इंदिरा -राजीव गांधी की हत्या,बाबरी मस्जिद का विध्वंस हर एक घटना के गवाह हैं कुलदीप नैयर। देश-विदेश करीब 80पत्र-पत्रिकाओं ने उनके लेख-रिपोर्ट छपते हैं। स्टेटस्मैनऔर द इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार से लंबे समय तक जुड़े रहे।

 कुलदीप नैयर से विश्वदीपक की बातचीत


सबसे पहले शुरुआत आपके जन्म से। आपका जन्म 14अगस्त को हुआ था। बड़ा दिलचस्प इत्तफाक है। आप उस दिन पैदा हुए जब पाकिस्तान बना। पैदा हुए पाकिस्तान में और आपका देश हिंदुस्तान?

हां,क्या कहें इसे। अब इत्तफाक है तो है। मैं 14अगस्त 1923 को सियालकोट में पैदा हुआ। और इसी दिन पाकिस्तान भी बना। लेकिन एक बात ये है कि पहले मैं पैदा हुआ उसके बाद पाकिस्तान पैदा हुआ।

आपके लेखन को प्रो पाकिस्तानी माना जाता है?

मैं प्रो पाकिस्तान नहीं हूं लेकिन एंटी पाकिस्तान भी नहीं हूं। मैं चाहता हूं कि दोनों देश के बीच मित्रता हो। अमन चैन कायम हो। और लोगों में संबंध बढ़ें। ताल्लुकात बेहतर हों। लोगों के स्तर पर भी और सरकार के स्तर पर भी। हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों के प्लूरलिज्म कायम रहें।

ये सच है कि पाकिस्तान का जन्म धर्म के आधार पर हुआ था लेकिन 13 अगस्त को ही जिन्ना ने साफ साफ कह दिया था कि या तो आप हिंदुस्तानी हैं या पाकिस्तानी। हर आदमी अपने अपने हिसाब के मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा जा सकता है। पाकिस्तान के जन्म से एक दिन पहले ही जिन्ना ने राजनीति और धर्म को अलग कर दिया था।

जिन्ना हमारे देश में विलेन तौर पर याद किए जाते हैं। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार खलनायक के तौर पर हिंदुस्तान की मानसिकात में उनकी छवि है। आपकी जिन्ना से मुलाकात हुई थी?

जिन्ना मैटर ऑफ फैक्ट के आदमी थे। वो कोई दूसरे नेताओं की तरह आदर्श नहीं बघारते थे। और न ही कोई भाषण देते थे। उनको जो करना था वो करते थे। मुझे याद है जिस कॉलेज में मैं पढ़ता था जिन्ना उसमें एक बार भाषण देने आए थे। जिन्ना ने वो छोटा वाला चश्मा (मोनो लॉग) पहन रखा और हरे रंग का सूट पहना था। लेकिन वहां सुनने वालों की कमी थी। तो मेरा एक दोस्त हबीब जो कश्मीरी था और मुस्लिम लीग का सदस्य था। उस समय तक ऐसा हो चुका था कि हिंदू कॉग्रेसी होने लगे थे और मुसलमान मुस्लिम लीक के साथ थे। उसने हम सबको जिन्ना का भाषण सुनने के लिए बुलाया था। लेकिन अच्छा होता कि जिन्ना भारत से अलग न होते। उस इलाके में (पाकिस्तान का वर्तमान पंजाब) में जिन्ना का असर नहीं था। उनका ज्यादा असर यूपी बिहार और बंगाल में था। अब इस इलाके को मिलाकर पाकिस्तान तो बनाया नहीं जा सकता लिहाजा पश्चिमी हिस्से को मिलाकर ही पाकिस्तान बना।

कायदे आजम जिन्ना का जो स्थान पाकिस्तान में है वही स्थान भारत में महात्मा गांधी का है। महात्मां गांधी को आपने पहली बार कब और कहां देखा। और अब जबकि पूरी दूनिया को अहिंसा को सबसे ज्यादा जरूरत हैं कैसे याद करते हैं गांधी को?

देखो,गांधी जी से मेरी सीधी मुलाकात कभी नहीं हुई। मैंने गांधी जी को बिड़ला हाउस के लॉन में देखा था। मैं जब विभाजन के बाद जब पाकिस्तान से आया तो दरियागंज में अपनी मौसी के यहां रुका। 13 सितंबर को मैं पाकिस्तान से चला था और 15 या 16 को मै दिल्ली पहुंचा। और सीधे भागकर गांधी को देखने के लिए बिड़ला हाउस पहुंचा। उस वक्त गांधी जी लॉन में टहल रहे थे। और उनके साथ वही दो लड़कियां (उनका इशारा आभा और –की ओर था) थी। मैंने उनको गेट के बाहर से ही प्रणाम किया था। हां, जब उनकी हत्या हुई थी तब मैंने उसको रिपोर्टर के तौर पर जरूर कवर किया था।

आजादी के बाद राष्ट्रभाषा को लेकर काफी विवाद हुआ था। कहते हैं कि पंडित नेहरू अंग्रेजी को ‘सबिसिजडियरी’ भाषा लिख देने से नाराज हो गए थे। और फिर इस मसले में आपको भी सफाई देनी पड़ी थी?

देखो, बात उस समय की जब मैं गृहमंत्री पंडित गोविंद बलल्भ पंत के साथ काम कर रहा था। नेहरू प्रधानमंत्री थे। नेहरू संसदीय समिति की उस रिपोर्ट से नराज थे जिसमें पंत जी ने अंग्रेजी के आगे सबसिडियरी लिख दिया था। पंत जी ही उस संसदीय समिति के अध्यक्ष थे। तब पंत ने मुझसे कहा कि आप दिल्ली की हर लाइब्रेरी की खाक छान मारिए। और जितनी भी डिक्शनरी मिले देखिए। मैंने कई डिक्शनरी देखी और फिर पंत जी बताया कि सबसिडियरी औऱ एडिशनल करीब-करीब एक ही अर्ध में प्रयुक्त किए जाते हैं।

ऐसा नहीं था कि नेहरू के मन में हिंदी को लेकर हिकारत का भाव था लेकिन वो चाहते थे कि जो नॉन हिंदी के लोग हैं उन्हे भी हिंदी आनी चाहिए। और फिर,उत्तर पूर्व,दक्षिण के लोग तो बिल्कुल भी हिंदी नहीं जानते थे इसीलिए वो मानते थे कि आजादी के बाद ही कहीं भाषा के मसले पर विरोध न होने लगे। इसीलिए वो चाहते थे कि हिंदी को तब तक न लाग किया जाय जब तक नॉन हिंदी भाषी लोग इसे स्वीकार नहीं कर लेते।

नेहरू को एक राजनेता और राष्ट्रनिर्माता के रूप में कैसे याद करते हैं?आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका क्या सोच था, क्या रोडमैप था?

नेहरू से मेरी 2-3दफा की मुलाकाते हैं। नेहरू की सोच आधुनिक थी। अंग्रेजी के मामले में उनकी यही सोच काम करती थी। उनका मानना था कि अंग्रेजी वर्ल्ड लैंग्वेज है। पर सियालकोट में मैंने पहली बार नेहरू को देखा था। मेरे ख्याल से 1939के आसपास की बात है। चुनाव प्रचार पर आए थे। नेहरू का ड्रेस तो वही था जो वो पहनते थे लेकिन उस दिन नेहरू ने उस दिन गुलाब नहीं लगा रखा था। मुझे याद है। उनके साथ शाह शेख अबदुल्ला भी थे।

आपने माउंटबेट को कवर किया है। लेडी माउंटबेटन से भी आप मिले थे। नेहरू और लेडी माउंटबेटन के बीच अफेयर की चर्चा आज तक होती है। कैसा प्यार था ये प्लूटोनिक या कुछ और।

देखो, मैंने बहुत कोशिश की इस बारे में तथ्य जुटाने की। तुम्हे क्या लगता है कि एक पत्रकार के रूप में मैं इस बड़े स्कूप को छोड़ता कभी। ने पूरी कोशिश की मेहनत की लेकिन कामयाब नहीं हो पाया। यहां तक कि मैंने सोनिया गांधी से भी नेहरू की पत्रावली देखने की इजाजत मांगी लेकिन उन्होने इंकार कर दिया। नेहरू के पत्र वगैरह तो अभी इन लोगों के पास हैं। दोनों के बीच प्यार रहा होगा। लेकिन बहुत व्यक्तिगत था वो। सार्वजनिक जीवन में कभी भी इसका प्रदर्शन नहीं हुआ।

कॉलेज के जमाने में आप जिन्ना से मिले। गांधी को भी देखा और नेहरू के साथ काम किया लेकिन जब किताब लिखने की बारी आई तो आपने भगत सिंह को चुना क्यों ? क्या आप उनसे प्रभावित हैं?

हां, मैं भगत सिंह से प्रभावित हूं। वो 23 साल की उम्र में मर गया देश के लिए शहीद हो गया। उसके विचार कम उम्र होने के बाद भी जबर्दस्त क्रांतिकारी थे। लेकिन किताब लिखने का विचार 80 के दशक में लाहौर में आया। मैं वहां गया हुआ था एक पंजाबी सम्मेलन में। वहां मैंने देखा कि पूरे हॉल में सिर्प और सिर्फ एक तस्वीर है। वो है भगत सिंह की। मैंने आयोजकों से पूछा कि यहां तुम लोगों ने भगत सिंह की तस्वीर क्यों लगा रखी है। यहां तो इकबाल की तस्वीर होनी चाहिए जिन्होने पाकिस्तान का स्वप्न देखा था। उन लोगों ने कहा कि सिर्फ एक ही पंजाबी ने देश के लिए कुर्बानी दी है और वो है भगत सिंह। तभी मैंने तय कर लिया कि भगत सिंह और उनके दर्शन को देश के सामने सपष्ट करना है। वैसे तो उनके बारे में लगभग हर बात लिखी जा चुकी है लेकिन एक क्रांतिकारी और एक आतंकवादी के बीच के फर्क को ऐतिहासिक खोजबीन और तथ्यों के जरिए स्पष्ट करना जरूरी था।

भगत सिंह की क्या प्रासंगिकता है आज के जमाने में। खासतौर से तब जब गांधी के बरक्स उनकी तुलना की जाती है। कहा जाता है कि गांधी भगत कि बढ़ती लोकप्रियता से परेशान थे। वो चाहते तो इरविन के साथ समझौते के दौरान भगत को बचा सकते थे?

भगत सिंह की प्रासंगिकता पहले भी थी। और आज भी है। बल्कि मैं तो ऐसे कहता हूं कि ज्यों-ज्यों वक्त गुजरेगा भगत की प्रासंगिकता बढ़ती जाएगी। वो जवान था और हीरो था। युवा वर्ग हमेशा भगत के विचारों के प्रभावित होगा। गांधी की भी प्रासंगिकत बढ़ेगी लेकिन दोनों के बीच अंतर तरीकों का है और वो रहेगा। भगत सिंह बंदूक (हिंसा का रास्ता) छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और गांधी को ये मंजूर नहीं था। गांधी को हिंसा कतई मंजूर नहीं थी। उन्होने इरविन से कहा भी था कि इसको छोड़ दीजिए। लेकिन न तो भगत अपना रास्ता छोड़ने के लिए तैयार थे और न ही अंग्रेज भगत को छोड़ना चाहते थे। गांधी जी ने भगत की लोकप्रियता से डरकर नहीं बल्कि अपने उसूलों की वजह से नहीं बचा पाए। अब कॉग्रेस का कराची सम्मेलन ही ले लीजिए। पहले गांधी की बात नहीं सुनी गई लेकिन आखिर में गांधी की ही बात माननी पड़ी।

एक गांधी और थी इंदिरा गांधी। जिन्होने देश पर आपातकाल लगाया था। आपको भी जेल में बंद कर दिया था। इंदिरा को कैसे आंकते हैं आप?

इंदिरा के साथ हमारे संबंध तो दोस्ती के थे। एक दफा वो बाल कटा के आई तो उसने मुझसे पूछा कि देखो मैं कैसी लग रही हूं। लेकिन जब उसने आपातकाल लगाया था तब उसने मुझे भी बंद कर दिया। तिहाड़ जेल में बंद था मैं। हालांकि उसने तब के दिल्ली कमिश्नर को मेरे पास हाल चाल लेने के लिए पूछा था। लेकिन मुझे मेरे गिरफ्तारी की वजह पता नहीं चल पा रही थी। बात में पता चला कि इंदिरा मेरे लिखने से नाराज थी। मैंने उसको एक चिट्ठी लिखी थी और कहा था कि तुम्हारे पिता कहा करते थे कि मुझे गैर जिम्मेदार (irresponsible press ) प्रेस मंजूर है लेकिन प्रेस पर पांबदी कतई मंजूर नहीं। और तुमने तो प्रेस को ही बैन कर दिया। इंदिरा ने कहा कि प्रेस वाले अनाप शनाप लिखने लगे हैं। और गैर जिम्मेदार चीजें छप रही हैं।

अच्छा,इंदिरा के पति फिरोज को भी देखा होगा आपने। गांधी परिवार की लिगेसी में वो कहीं फिट नहीं बैठते। कहीं भुला दिए गए हैं वो। क्या उनको जानबूझकर दरकिनार किया गया?

गांधी परिवार की लिगेसी में फिट बैठने का कोई कारण नहीं लेकिन यही गांधी परिवार के ही लोग हैं जो उनको फिट नहीं होने देते। जानबूझकर। वैसे वो बहुत जबर्दस्त आदमी थे। संसद में फिरोज के नाम का हॉरर (खौफ ) रहता था। वो जोरदार वक्ता थे। उस जमाने के घोटालों का पर्दाफाश उन्होने ही किया था। उद्योगपतियों में फिरोज के नाम का खौफ रहता था। संचार घोटाले को फिरोज ही सामने लाए थे।

एक और गांधी हैं राहुल गांधी –जिसे देश के भविष्य के रूप में पेश किया जा रहा है। आपने गुलामी के दौर की फिर आजादी और उसके बाद करीब 60साल से देश की राजनीति को देखा है। आपको राहुल के अंदर कोई जीनियस नजर आता है। या लगता है कि उनके अंदर वो उर्जा है?

अब क्या कहें यहां के लोग पागल हैं। राहुल के अंदर कोई जीनियस नहीं है। लेकिन हमारे देश में वंश की राजनीति चलती है तो चलती है। ये वंशवादी राजनीति का ही असर है। जैसे इंदिरा से मिला राजीव को उसी तरह से राजीव से मिला राहुल को। वैसे राहुल के मुकाबले उसकी बहन प्रियंका ज्याद मैच्योर है। ज्यादा समझदार है।

पत्रकारिता का आपका बड़ा लंबा कैरियर है। क्या अनुभव हैं आपके पत्रकारिता के बारे में। पिछले कई सालों में तेजी से बदलाव हुए हैं। आपने शुरुआत तो उर्दू रिपोर्टर के तौर पर की थी?

हां,सच बात है मैंने अपना कैरियर उर्दू रिपोर्टर के तौर पर शुरु किया था। जब मैं पाकिस्तान से भारत आ गया थां। चांदनी चौक में रह रहा था। मेरे आहाते में ही एक आदमी दिन भर खांसता रहता था। बड़ा डिस्टर्ब होता था। मैंने पूछा लोगों से कि भई कौन है ये। पता चला कि वो मौलाना मोहना साहब थे। मैं उनके पास गया। उन्होने मुझसे पूछा कि क्या करते हो मैंने कहा कि उर्दू रिपोर्टर हूं। तब मैं ‘वहादत’के लिए लिखा करता था। धीरे धीरे उनसे दोस्ती हो गई। उन्होने मुझे दो सलाह दी थी। पहला ये कि शेर ओ शायरी करना छोड़ दो दूसरा उर्दू में नहीं अंग्रेजी में लिखना शुरु करो-देश में उर्दू का कोई भविष्य नहीं।

हिंदी पत्रकारिता के बारे में क्या ख्याल है आपका। पिछले कुछ सालों में तो पैसा लेकर खबरें छापने की बातें सामने आई हैं। जब तक जिंदा थे प्रभाष जोशी इस मामले में लिख रहे थे और इसको जोर शोर से उठा रहे थे?

देखिए हिंसी की सबसे बड़ी समस्या ये है कि हिंदी का संपादक पढ़ता ही नहीं। कुछ लोगों को छोड़कर। अपवाद हर जगह होते हैं। अब आज हिंदी पत्रकारिता में कोई खबर के लिए नहीं होती। अब तो वही है जो पिया मन भाए। यानि मालिकों को जो पसंद हो वही छपेगा। बात ऐसी भी नहीं है कि केवल हिंदी पत्रकारिता का स्तर गिरा है।स्तर अंग्रेजी पत्रकारिता का भी गिरा है। लेकिन फिर भी यहां स्थिति थोड़ी बेहतर है।

आप राज्यसभा सांसद भी रहे हैं। क्या अनुभव हैं आपके संसदीय राजनीति के। क्या आपको लगता है कि हमारे देश की संसद जनता की आकांक्षाओं इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है। बहुत से संगठन तो संसदीय राजनीति को खारिज करते हैं?

अब देखिए संसदीय राजनीति की अपनी समस्याएं हैं। लेकिन तरीका तो यही है। इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी है। काम करने का उतना प्रभावी नहीं हैं। लेकिन पिछले 50-60 साल से हम वोट कर रहे हैं। एक प्रैक्टिस (अभ्यास)हो गई है। राजनीति अभ्यास का भी मामला है। सही है लोग इससे नाराज है। और इसे खारिज भी करते हैं लेकिन ये अच्छा ही है। जितनी तरह की बाते होंगी जितनी तरह की आवाजें होगी उतना ही अच्छा है देश के लिए। देश की जो विविधता है वो यही है।

अब जबकि भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी आजादी की सालगिरह मना रहे हैं। 64वीं सालगिरह। पाकिस्तान के शायर फैज अहमद फैज याद आते हैं। उन्होने भारत की आजादी को दाग दाग उजाला करार दिया था। आपकी उनसे दोस्ती?

हां, फैज से हमारी अच्छी दोस्ती थी। लाहौर में दोस्तों के घर पर हमारी महफिलें जमती थीं। वो दारू पीता और था और बैठते ही बोलत निकाल लेता था। लेकिन वो टू नेशन थियरी को नहीं मानता था। वो बॉर्डर को भी नहीं मानता था। वो आजादी को मानता था लेकिन इसे अधूरा करार देता था।

(यह साक्षात्कार अहा ज़िन्दगी में प्रकाशित हो चुका है)


Aug 11, 2010

चिदंबरम की इजाजत के बगैर आजाद की हत्या नहीं !



माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय  प्रवक्ता रहे आजाद की हत्या को लेकर कल भी संसद में सवालों का क्रम जारी रहा। वित्तमंत्री से गृहमंत्री बने पी चिदंबरम ने संसद में भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के सवाल पर कहा कि ‘मामला प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र का है,केंद्र कैसे जांच के आदेश  दे सकता है।’आजाद की हत्या के बाद देश में जारी गहमा-गहमी के मद्देनजर देखें तो इस मामले में तीन पक्ष उभरकर सामने आते हैं। पहला माओवादियों का,दूसरा सरकार का और तीसरा इन दोनों की कड़ी बने स्वामी अग्निवेश का। माओवादी कहते हैं-आजाद की हत्या सरकार ने की है,सरकार कहती है-उसने मुठभेड़ में मारा है और अग्निवेश  साफ संदेह व्यक्त करते हैं कि जिस दिन वे माओवादियों की ओर से 72 घंटे के युद्धविराम की तारीख घोषित  करने वाले थे, उससे पहले ही खुफिया एजेंसियों ने आजाद को ट्रैप कर लिया था और सरकार ने हत्या का मन।

सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश से अजय प्रकाश  की बातचीत


माओवादी प्रवक्ता आजाद और स्वतंत्र पत्रकार हेमचद्र पांडे की हत्या के बाद जब आप केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम से मिले तो शांतिवार्ता की क्या संभावना जान पड़ी?

कोई संभावना नहीं दिखी और निराषा हुई। मैंने उनसे पूछा कि माओवादियों की तरफ से शांतिवार्ता की अगुवाई कर रहे आजाद की हत्या क्यों की गयी तो,चिदंबरम साहब ने कहा कि यह सवाल आंध्र पुलिस से पूछिये। मामला राज्य सरकार का है इसलिए इस बारे में मैं कोई जवाब नहीं दे सकता। उनके व्यवहार से ऐसा लगा कि वे शांतिवार्ता  के लिए अब इच्छुक नहीं हैं।

आपको लगता है कि आजाद की हत्या केंद्रीय गृहमंत्री की इजाजत के बगैर पुलिस कर सकती है?

मुझे भी संदेह है। क्योंकि जब चिदंबरम ने कहा उस वक्त भी और अभी भी मुझे विश्वास  नहीं है कि बगैर उनकी इजाजत के आजाद की हत्या पुलिस ने की होगी।

आजाद पर इनाम था इसलिए सरकार ने मार डाला, पत्रकार हेमचंद्र की हत्या क्यों की गयी?

इसी सवाल पर चिदंबरम ने मुझे माओवादियों के उत्तरी क्षेत्र के नेता अजय का बयान दिखाया जिसमें लिखा था कि हेमचंद उनकी पार्टी का सदस्य था। मगर मैंने हेमचंद्र को लेकर गुड्सा उसेंडी के बयान की चर्चा की तो वह चुप हो गये। मुझे ऐसा लगता है कि हेमचंद्र की हत्या उस अपराध के अकेले चश्मदीद  होने की वजह से कर दी गयी ताकि कोई सबूत शेष  न रह जाये।

गृहमंत्री ने जांच के बारे में कोई आश्वासन  दिया?

जांच की मांग को स्पष्ट  रूप से इनकार कर गये। यह बताने में लगे रहे कि माओवादियों ने पिछले एक साल में मुखबीर होने के शक में 142 हत्याएं कीं, आपलोग इनकी जांच की मांग क्यों नहीं करते। मैंने कहा कि आप सरकार हैं, इसकी जांच कीजिए। हम तो हमेषा ही हिंसा के विरोधी रहे हैं। लेकिन इस बहाने आजाद और हेमचंद्र की हत्या की जांच की बात टरकाते रहे। अंत में उन्होंने कह दिया कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता,आंध्र प्रदेश की गृहमंत्री से मिलिये।

हेमचंद्र को आप किस आधार पर पत्रकार मानते हैं?

जैसे ही मुझे सूचना मिली की आंध्र प्रदेश के जंगलों में पुलिस की हत्या का शिकार एक उत्तराखंड का पत्रकार भी हुआ है तो मैंने तत्काल इसकी तस्दीक उत्तराखंड के जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता शाशेर सिंह बिष्ट से की। उन्होंने कहा कि ‘मैं उसे और उसकी पत्नी बबीता दोनों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और वह पत्रकार था।’इसी आधार पर मैंने चिदंबरम साहब से कहा कि पत्रकार हेमचंद्र माओवादी नहीं था।

माओवादियों और सरकार से वार्ता को लेकर कुछ बातें साझा करने के लिए 18जून को आपने प्रेस कांफ्रेंस रखी थी जिसे ऐन मौके पर टाल दिया गया?

हम माओवादियों से मिले पत्र के आधार पर 10,15और 20जुलाई को यानी इन तीन तारीखों में से किसी एक तारीख को 72घंटे के युद्धविराम के लिए घोशित करने वाले थे। उन्होंने मुझे इतनी छूट दी थी कि इन तीन में से जो भी तारीख मैं घोशित करूंगा,पार्टी उसे स्वीकार कर लेगी। मगर उसकी पूर्व शर्त थी कि सरकार भी कुछ कदम आगे बढ़े, जिसका बहुत साफ आश्वासन  चिदंबरम साहब ने दिया था। मगर बाद में हमें लगा कि माओवादी वार्ता के लिए इच्छुक हैं, पर सरकार कुछ चाहती ही नहीं है। ऐसे में मेरे लिए संकट हो गया कि मैं उस दिन प्रेस कांफ्रेंस में क्या कहूंगा और मुझे ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा।

क्या आपको लगता है कि सरकार आजाद को पकड़ने की पहले ही तैयारी कर चुकी थी और इसके लिए सरकार ने आपका उपयोग किया है?

इसका कोई प्रमाण तो नहीं है,लेकिन मुझे लगता है कि खुफिया एजेंसियां कांफ्रेंस की तारीख तक आजाद को ट्रैप कर चुकी थीं। इस संदेह का सबसे पुख्ता कारण उस कांफ्रेंस का टलना है जिसमें सरकार को भी वार्ता के लिए समान दिलचस्पी दिखानी थी। पहले इसकी भनक होती तो मैं यह गलती कभी नहीं करता। सरकार ने उपयोग तो किया ही, मुझे यह भी लगता है कि तैयारी भी कम थी। अब जबकि दोबारा मैं चिदंबरम से मिलकर आ चुका हूं, कह सकता हूं कि सरकार इस समस्या को सुलझाने के प्रति गंभीर नहीं है। वह उलझाये रखने में अपनी सफलता देख रही है।

इस सिलसिले में आपका अगला कदम क्या है?

हमें लग रहा है कि देश को सरकार के भरोसे छोड़ने के नागरिक शक्ति  जगानी चाहिए। यह नागरिक शक्ति  ही शासकों  को मुल्क की जरूरत बतायेगी। इसकी शुरूआत हमलोग क्रांति दिवस के मौके पर कलकत्ता से 9अगस्त पदयात्रा से कर रहे हैं। इसमें देषभर के गांधीवादी और शांति चाहने वाले लोग शामिल होंगे और लालगढ़ पहुंचकर 15 अगस्त को तिरंगा फहरायेंगे। यहां पिछले 2 वर्षों  से धारा 144 लगी हुई है। यह एक राश्ट्रीय स्तर का आंदोलन होगा जिसे इस विश्वास से खड़ा किया जायेगा कि सरकार की शर्तों पर नागरिक समाज नहीं,बल्कि समाज की जरूरतों से सरकार चलेगी।

(द पब्लिक एजेंडा में छपे साक्षात्कार  का संपादित अंश)  


शारीरिक परिवर्तन, सामाजिक विद्वेष


उन अपवित्र हाथों के छूने से अचार खराब हो जाता है।  फूल वाले पौधों और तुलसी को महिलाएं पानी नहीं देतीं और न ही उनके पास बैठती हैं। मुझे याद है कि तुलसी का गमला रास्ते से हटाकर ऐसी जगह रख लिया जाता था, जहां अपवित्र महिलाओं की परछाईं  न पड़े। माहवारी और बच्चा जनने के दौरान पंजाब-हरियाणा की महिलाओं को किन स्थितिओं से गुजरना होता है,बता रही हैं युवा  पत्रकार...

मनीषा भल्ला

मासिक धर्म जवान हो रही किसी भी लड़की के जीवन की ऐसी घटना है जिसके बाद फिर वह सभी की 'लाडली' नहीं रह जाती। मां का ही अपनी बेटी के प्रति नजरिया बदल जाता है। मां को लगता है कि आज के बाद से बेटी के प्रति समाज की नजरें बदल जाएंगी।

 मां अपनी बेटी को तरह-तरह की हिदायतें देने लगती है। उठने- बैठने के तरीके सिखाने लगती है। कई घरों में मांओं को दूसरे रिश्तेदारों से फुसफुसाते देखा जाता है। मां अचानक चिंतित हो जाती है। वह इसे शारीरिक परिवर्तन कम सामाजिक परिवर्तन ज्यादा मानती है। अबोध बच्ची को लगता है कि पता नहीं उसके साथ क्या हो गया है और अब न जाने क्या हो जाएगा। यहां तक कि मैंने मांओं को रोते देखा है कि बेटी अब जवान हो गई है।


 पंजाब और हरियाणा में घूमते दस साल बीत गए। बचपन में गांव (पंजाब में) काफी आना-जाना रहता था। इसलिए उस परिवेश का अहसास है। पंजाब और हरियाणा दोनों खेती के लिहाज से देश के विकसित राज्य हैं। प्रतिव्यक्ति आय, तकनीक, रुपया और डॉलर दोनों बरसते हैं यहां। गुड़गांव जैसे जिलों में आसमान छूती इमारतें विकास की इबारत लिख रही हैं, मगर यह अधूरा सच है। इन्हीं राज्यों के बाशिंदों को बेटियों का पैदा होना मंजूर नहीं। कन्या भ्रूणहत्या में सबसे आगे हैं ये दोनों राज्य। यानी महिलाओं के मामले में इस समाज के एक तबके की सोच अभी भी पुरानी और दकियानूसी है।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो इन राज्यों के ज्यादातर घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अलग-थलग कर दिया जाता है। हरियाणा में इस दौरान महिलाएं घर, खेत और पशुओं का काम तो करती हैं, लेकिन कुछ कामों से उन्हें वंचित कर किया जाता है। हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों में महिलाएं मासिक धर्म के दौरान अचार को हाथ नहीं लगातीं,क्योंकि उस समयावधि में उन्हें पवित्र नहीं समझा जाता है और माना जाता है कि अपवित्र हाथों के छूने से अचार खराब हो जाता है। तब फूल वाले पौधों और तुलसी को महिलाएं पानी नहीं देतीं और न ही उनके पास बैठती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से फूल मुरझा जाते हैं। मुझे याद है कि हमारी एक रिश्तेदार तुलसी का गमला रास्ते से हटाकर ऐसी जगह रख लेती थी जहां माहवारी के दौरान लड़कियों और महिलाओं की उस पर परछाईं भी न पड़े।

इन महिलाओं का पूजा-पाठ या किसी भी शुभ माने जाने वाले काम में शरीक होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। शादी के दौरान शगुन की रस्मों में वो शरीक तो होती हैं, लेकिन उनकी कोई भूमिका नहीं होती। मसलन, वह दूल्हे या दुल्हन को हल्दी नहीं लगा सकती, प्रसाद नहीं बना सकती। किसी ऐसी चीज को हाथ नहीं लगा सकती जो पूजा की हो। शादी के सामान को हाथ नहीं लगा सकती।


 मासिक धर्म के दौरान महिला किसी नवजात बच्चे को तक गोद में नहीं ले सकती। मुझे याद है कि जब मेरी बहन की बेटी हुई थी तो उसे देखने के लिए घर में जो भी महिला रिश्तेदार आती थी,मेरी नानी उससे बाकायदा पूछती थीं 'तुम ठीक हो न...'। नानी कहती हैं कि नवजात को ऐसी औरत गोद लेती है तो बच्चे पर भूत-प्रेत का साया आ जाता है।

परिवार के लिए मासिक धर्म न हुआ,हौवा हो गया। मां ही बेटी से इस बारे में बात नहीं करती तो पिता या भाई का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। खासकर ग्रामीण हरियाणा में ज्यादातर मांएं इस बारे में लड़कियों से बात करना सही नहीं समझती। सबसे ज्यादा दिक्कत उन बच्चियों को होती है जिन्हें पहली बार माहवारी होती है। ग्रामीण लडकियां नैपकिन इस्तेमाल नहीं करतीं,ऐसे में घर में उनके लिए अपने गंदे कपड़े धोना,बार-बार कपड़ा बदलना या गंदे कपड़े फेंकना मुश्किल हो जाता है। वह गंदे कपड़े छुपाकर रखती हैं और नजरें बचाकर उसे फेंकती हैं। यही नहीं,ज्यादातर लड़कियों को जब पेट दर्द और उल्टियां होती हैं तो मैंने खुद देखा है कि परिवार में कोई दवा कराना तो दूर, उनका हाल भी जानना मुनासिब नहीं समझता।

हरियाणा में माहवारी के दिनों में महिलाएं खाना तो बनाती हैं,लेकिन आज भी कुछ ब्राह्मण,राजपूत और बनिया जातियों  में महिलाओं को चौका करने की इजाजत नहीं है। ग्रामीण पंजाब में कई घरों में माहवारी से गुजर रही महिलाओं की जूठन नहीं खाई जाती,उनके बर्तन अलग होते हैं। इसे छूआछूत माना जाता है। इनके हाथ से कोई खाने की चीज नहीं ली जाती।

कमोबेश यही हालात तब होते हैं जब महिलाएं बच्चे को जन्म देती हैं। दोनों ही राज्यों में जच्चा-बच्चा को घर का सबसे पीछे का अंधियारा कमरा दिया जाता है। जो न तो हवादार होता है और न वहां कोई आ सकता है। हवादार इसलिए नहीं क्योंकि माना जाता है कि जच्चा को हवा नहीं लगनी चाहिए। इससे जच्चा का शरीर फूल सकता है या फिर उस पर कोई बाहरी हवा (भूत-प्रेत)लग सकती है। पंजाब में कहा जाता है कि छिले (बच्चा पैदा होने के बाद सवा महीने का समय)की एक अलग महक होती है, जो भूतों को आकर्षित करती है। इसलिए जच्चा के सिरहाने लहसुन बांधा जाता है, तो कभी कोई तावीज।

पंजाब में माना जाता है कि अंधेरे कमरे में जच्चा-बच्चा को इसलिए भी रखा जाता है क्योंकि बच्चे की लैटरीन और बच्चे के दूध को किसी की नजर न लग जाए। औरत के कच्चे शरीर में हवा न घुस जाए। हरियाणा में दस दिन तक जच्चा को रोटी नहीं दी जाती। कहते हैं कि महिला के रोटी खाने से जो दूध बच्चा पिएगा उससे बच्चा अंगड़ाईयां लेगा। ऐसे में महिला को छिओणी दी जाती है। जो गर्म पानी में देसी घी मिलाने से बनती है। पंजाब में भी महिला को कुछ दिनों तक खाने के लिए नहीं दिया जाता है। उसे सिर्फ पंजीरी और दूध दिया जाता है।


Aug 9, 2010

बड़ी होती लड़कियां


मासिक चक्र के दौरान महिलाओं के प्रति समाज कैसा रवैया रखता है, इस बारे में सरसरी तौर पर जायजा ले रहीं हैं, हरियाणा से विपिन चौधरी


छोटी बच्चियों को माँ की तरह बड़ा होना अच्छा लगता है, तभी मौका मिलते ही वह अपनी माँ की साड़ी अपने शरीर पर लपेट लेती है.शीशे के सामने खड़ी होकर अपने नन्हे से माथे पर बिंदी लगाकर खुश होती हैं.वहीं पास में ही खड़ी हुई उसकी माँ बेटी को चुपचाप देखती हुई मन ही मन उसके  बड़े होने के चाव से डरने लगती है, क्योंकि  माँ जानती है बड़ी होती लड़की को इंसान से ज्यादा एक शरीर की तरह देखा जाता है. यही शरीर हज़ार लानत- मलानतों का कारण बनता रहा है.

दूसरी तरफ एक लड़के का बड़ा होना अनेक खुशियों को जन्म देने का कारण बनता है. बड़ा होना वैसे तो कई नियामतों को साथ लाता है, पर हमारे समाज में लड़कियाँ डर को अपने बगल में लेकर बड़ी होती हैं. कारण अनेक  हैं. हम सब जानते हैं कि कारण होने से कहीं ज्यादा बना दिए जाते हैं.

 एक भारतीय लड़की को उसका परिवार और समाज़ अनेकों हिदायते देता है.ज्यादा ज़ोर से न बोलने की मनाही, लड़कों के साथ ज्यादा घुलने-मिलने की मनाही.खिलखिला कर हँसने तक की मनाही है. और जैसे ही लड़कियाँ 13-14 की उम्र पार करती हैं, तब हर महीने होने वाली माहवारी के कारण बड़ों द्वारा घर में कई चीज़ें न छूने  की सख्त हिदायत दे दी जाती है.खासकर,रसोईघर में न जाने और खाने-पीने की चीज़ें न छूने की मनाही.माहवारी, दरअसल, प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो यह संकेत देती है कि एक बच्ची अब माँ बनने काबिल हो गयी है. मासिक धर्म शरीर में हो रहा एक शारीरिक परिवर्तन होता है, जिसमे योनि के माध्यम से गर्भाशय से रक्त का प्रवाह होता है. यह चक्र लगभग पचास साल तक चलता है. मगर इस सहज स्वाभाविक शारीरिक चक्र को समाज ने हव्वा बना दिया है.

ये हिदायतें हमारे शास्त्रों-पुराणों से शुरू हुई और आज तक बनी हुई हैं. पहले माहवारी की शुरुआत लड़की के लिये हैरानी-परेशानी का सबब बन जाती थी.यदि इसके बारे में पहले से ही घर में माँ, भाभी या बड़ी बहन ने न बताया हो तो लड़की अचानक परेशान हो जाती और फिर उस समस्या को अपनी सहेली को बताती थी.सहेली चूंकि उसी की हमउम्र होती,इसलिए अपनी सीमित जानकारी से जो कुछ बताती उससे मामला और उलझ जाता था.मगर आज सूचनातंत्र के व्यापक प्रचार से सब जागरूक हो चुके हैं। आजकल की लड़कियों से कुछ भी ढका-छुपा नहीं है यह तो हमारे समय की बातें हैं. साईंस की क्लास मे टीचर जब reprodective system पढ़ाती थी तो  लड़कियों के कान लाल हो जाते थे.

वर्ष 1900 के प्रारंभ में लड़कियों को आमतौर पर पहली माहवारी 14 या 15 की उम्र में शुरू होती थी, मगर अब बेहतर पोषण और आधुनिक खानपान की वजह से 8 -16 की उम्र के बीच लड़कियां रजस्वला होने की अवस्था में पहुँच जाती हैं. हर महीने माहवारी से पहले लड़कियों में  शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन के कारण चिड़चिड़ापन, तनाव, सूजन इत्यादि लक्षण दिखते हैं,लेकिन वह अपनी तरफ बिलकुल भी ध्यान नहीं देती. महिलाएं खासतौर पर भारतीय समाज खुद से ज्यादा दूसरों का  ख्याल रखती है.

ज्यादातर घरों में शुचिता का आतंक इतना गहरा होता है कि लड़की का रसोईघर में जाना निषेध हो जाता है, इसी सन्दर्भ में मुझे याद आता है जब मेरी एक सहेली के माँ-पिता दोनों गाँव गये थे तो वह "उन दिनों" में अपने नन्हे से भाई से खाना बनवा रही थी और खुद रसोईघर से बाहर खड़ी होकर निर्देश देती जा रही थी, यानि वह भी उसी साफ़-सफाई वाले आतंक से पीडित थी. आज भी मेरी प्रोग्रसिव सहेलियाँ अचार खराब होने का कारण माहवारी के दौरान उनका हाथ लगना बताती हैं तो मुझे आश्चर्य होता है। जरूरत इस बात की है कि माहवारी से अचार खराब होने वाला मिथक भी खतम होना चाहिये, क्योंकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं हैं।

हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में माहवारी के दौरान युवतियाँ कुँए से पानी लाती है. ढोर-डंगरों के लिए चारा तैयार करती हैं, उपले पातथी हैं। लड़कियाँ काम न करें तो घर कैसे चलेगा. महीने के चार-पाँच दिन वे आराम करें, यह संभव नहीं है। खेतों का काम मेहनत का काम है जो शरीर की मजबूती की माँग करता है। इसीलिए यहाँ किसी तरह का छूआछूत देखने को नहीं मिलता। हाँ, पुराने समय में दादी, नानी ने गाँव में अपने घर परिवारों में ऐसा होता देखा है,जबकि शहर में आज भी कहीं-कहीं इस तरह की प्रपंच जरूर देखने को मिलते हैं.

आज सैनिटरी नेपकिन का करोड़ों का बाज़ार है,जबकि अमेरिका जैसे विकसित देश में औरतें इस दौरान सूती कपडे का इस्तेमाल करती है। आज बाजार निर्धारित करता है कि हमें क्या इस्तेमाल करना है और हम आँख मूदकर विश्वास कर लेते हैं. साफ़-सफाई की लिहाज से सैनिटरी नेपकिन साफ़ और सुविधाजनक है, पर गरीब की जेब की मुताबिक नहीं है. इसका मतलब बाजार सिर्फ अमीरों और उच्च मध्यम वर्ग की जरुरत को ध्यान में रखता है. गरीब की उसे परवाह नहीं है.

किसी भी तरह से सहज जीवन में माहवारी की इस सहज शारीरिक प्रक्रिया का हव्वा नहीं बनाया जाना चाहिये. आखिर इसी प्रक्रिया से गुज़रकर एक लड़की जननी बनती है.




Aug 8, 2010

मां जब अछूत होती है

 
कालकोठरी के पांच दिन और जहाँ मां बनना पाप है के बाद झारखण्ड से युवा पत्रकार मोनिका के आये लेख को देख लगता है कि स्त्रियों की नैसर्गिक जरूरतों के खिलाफ जो अपराध हो रहा है,उसको लेकर  सभी धर्मों,पंथों और विचारों की सामूहिक चुप्पी है, एक मान्यता प्राप्त एकता है.  


 मोनिका

स्त्री के शरीर में हो रहे प्राकृतिक बदलावों को अपशकुन और प्रदूषणकारी भी माना जाता है,यह सुनकर आश्चर्य होता है और दुख भी। ईश्वर की सबसे सुंदर रचना और जननी के रूप में स्थापित स्त्री तभी पूजी जाती है जब वह देवी होती है। अन्यथा उसका शरीर ही उसके लिए अभिशाप होता है।

यह जानकर दुख होता है कि मासिक चक्र और प्रसव के दौरान स्त्रियों को तरह-तरह की परंपराओं के नाम पर कई अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में जब मैंने महीने भर पहले मां बनी एक आदिवासी युवती से बात की, तो उसकी बातें चौंकाने वाली थी। पढ़ी लिखी शहरों में रहने वाली महिलाएं फिर भी इन परंपराओं का शिकार कम ही बनती हो, लेकिन उनका क्या जो घर से एक कदम निकालने से पहले भी घरवालों की मर्जी पर निर्भर करती हो।


झारखण्ड के एक गाँव में लड़कियां: जागरूकता ही जोर पकड़ेगी
बसंती नाम की इस युवती को एक बेटी हुई है। घर-घर झाड़ू पोंछा करने वाली बसंती कहती है कि अब मेरी बेटी को भी वहीं सब झेलना पड़ेगा, जो मैंने झेला है। हमारे यहां जब किसी लड़की को मासिक चक्र शुरू होता है, तो उसे घर के किसी ऐसे कमरे में रखा जाता है, जहां लोगों का कम आना जाना होता है। घर और खेतों में श्रम संबंधी सभी काम महिलाएं कर सकती है। लेकिन रसोई में खाना नहीं बना सकती और ना ही पूजा सामग्री ही छू सकती है। और अगर महिला शादी-शुदा है तो उसे अपने पति के पास भी सोने की मनाही है। अतिरिक्त कमरा ना होने की स्थिति में तो पति के कमरे में ही नीचे एक चटाई और चादर दिया जाता है।

गर्म चाय, अचार, अंडे आदि खाने की मनाही होती है। अगर कोई महिला गर्भवती है तो आदिवासी समाज में खेती के काम काज करने की मनाही नहीं होती,लेकिन पूजा में शामिल होने नहीं दिया जाता। जब बच्चे का जन्म होता है तो अस्पताल की बजाय दाई के द्वारा ही प्रसव कराया जाता है। फिर चाहे स्थिति कितनी भी खराब क्यों ना हो। अधिकतर महिलाएं पांच छह दिन के अंदर ही काम करने लगती है, लेकिन 21 दिन तक उसे रसोई में जाने की इजाजत नहीं होती। तीन दिन बाद सिंदवार के पत्तों को पानी में डालकर नहलाया जाता है और घर के एक कमरे में 21दिन तक बाकी सभी सदस्यों से दूर रखा जाता है।


सम्पन्नता की चमक: अपराध बराबर का
आंध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में तो मासिक धर्म की शुरुआत में लड़की को कमरे में कैद रखा  जाता है। ऐसा करने के पीछे मान्यता  है कि अगर रजस्वला  लड़की या महिला की परछाई किसी पर पड़ जाये,तो उसे चेचक हो जाता है या  फिर वह शारीरिक विकलांगता का शिकार हो सकती  है। वहीँ  मारवाड़ी समाज में महिलाओं को इस दौरान रसोई में प्रवेश करने नहीं दिया जाता, जमीन पर सोने की व्यवस्था होती है और  पानी, अचार और पूजा सामग्री को छूने नहीं दिया जाता है।

आंध्र प्रदेश समेत कई इलाकों में प्रसव के दौरान महिला को आरामदायक बिस्तर की जगह ईटों से बनी संरचना पर बिठाया जाता है। पानी और शराब मिलाकर मंत्रोच्चार किया जाता है और प्रसव का काम दाई के द्वारा ही होता है। इसके लिए किसी अंधेरे कमरे को चुना जाता है। बच्चे के जन्म के बाद प्रसव के दौरान गर्भाशय के बाहर आने पर दाई द्वारा पैर से उसे अंदर की ओर धकेला जाता है, जिससे सबसे ज्यादा महिलाएं संक्रमण की शिकार होती है। स्त्री का खाना पीना भी मिट्टी के बर्तन में ही होता है और वह 41 दिन तक अछूत मानी जाती है।

इन्हें नहीं पता कि स्त्री होना सजा है



किसी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में उसका भाग लेना भी अपशकुन माना जाता है। यह सब केवल गांवों या अनपढ़ वातावरण वाले घर में ही नहीं होता,बल्कि शहरों में भी अधिकांश घरों में ऐसी परंपराएं अब भी देखने सुनने को मिलती है। जो कहीं ना कहीं इस बात का प्रमाण है कि हमारा समाज आज भी स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरीक समझता है. वह भी उसके जीवन को ताक पर रखकर।

Aug 7, 2010

कालकोठरी के पांच दिन


उत्तराखंड  में महिलाओं  को माहवारी होने पर किन परेशानिओं  से से जूझना होता है, मां बनने पर समाज परम्पराओं और देवताओं के नाम पर  उनसे कैसा अमानवीय बर्ताव करता है, "जहाँ मां बनना पाप है," लेख में हमने देखा. अब इस मुद्दे पर और तफशील में जाते हुए देश के पूर्वी राज्य  बिहार में माहवारी के दिनों में महिलाओं से कैसा व्यवहार होता है, इसको जानने के लिए  पढ़ें पत्रकार मृणाल वल्लरी को.

मृणाल वल्लरी

प्रेमा नेगी की पोस्ट ने विचलित कर दिया। ऐसा सच जानने, देखने, भोगने के बाद भी प्रेमा के लिखे ने दिमाग में एक हलचल सी मचा दी। कुदरत ने स्त्री की जिस देह को नेमतों से नवाजा उसे समाज ने विडंबनाओं का भंडार बना दिया।

दुनिया की सारी सभ्यताओं ने मातृत्व को आला दर्जा दिया। लेकिन मातृत्व के लिए सबसे जरूरी प्रक्रिया से जब वही स्त्री देह गुजर रही होती है तो उस दौरान वह एक ऐसी गंदगी का ढेर बन जाती है जिसे छूकर इंसान अपवित्र हो जाए। प्रेमा जी ने पहाड़ के एक गांव की कुरीतियों का जिक्र किया। लेकिन स्त्री देह की इस नैसर्गिक प्रक्रिया को हिकारत बनाने में पहाड़ और मैदान की संस्कृति हैरतअंगेज तरीके से कदमताल करती नजर आती है।

सामाजिक जड़ता के खिलाफ एक नयी दुनिया की उम्मीद
बिहार के गांवों में भी उन पांच दिनों से गुजरने की प्रक्रिया के दौरान  किशोरी से लेकर महिलाएं तक, एक नर्क की जिंदगी जीती हैं. बिहार के बिहटा के एक गांव की लड़की जो पटना में पढ़ रही थी उसने बताया कि जब से वह अपने परिवार से दूर हॉस्टल में रहने के लिए पटना आई है उसकी जिंदगी में हर महीने के पांच दिनों का और इजाफा हो गया है। गांव में उन पांच दिनों के दौरान उसे एक अलग कमरे में रहना पड़ता था। और मौसम चाहे जो भी हो पांच दिन नहाना मना है।
उस समय में जब शरीर को सफाई की सबसे ज्यादा जरूरत होती है,नहाने की मनाही कितने तरह के रोगों को बुलावा देती है यह अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन गांव तो गांव पटना जैसा शहर भी इस मसले पर कूपमंडूक बना हुआ है। मेरी पड़ोस की एक महिला जिसे हम भाभी कहते,वह कई  पुरुषों के परिवार में अकेली महिला थी। उनके घर के एक पुरुष सदस्य की मौत हुई। मौत के बाद घर में हो रहे कर्म-कांड के दौरान उनके लिए शारीरिक रूप से अपवित्र होना वर्जित था। क्योंकि उस दौरान वो खाना बनातीं तो उसे कोई नहीं खाता।

उन्होंने मुझे पुर्जे पर एक दवा लिख के लाने को दी। मैंने पूछा कि यह किस चीज की दवा है। उन्होंने बताया कि इस दवा को खा लेने से उनका मासिक चक्र आगे बढ़ जाएगा, वो आराम से घर के काम कर सकेंगी। मैंने पूछा कि उन्हें इस दवा के विषय में कैसे पता चला। उन्होंने हंसते हुए कहा कि गांवों में तो छठ और अन्य पूजा-त्योहारों के समय महिलाएं धड़ल्ले से इस दवा का इस्तेमाल करती हैं। मैंने अचरज से पूछा कि गांवों में भी यह दवा आसानी से मिल जाती है,  तो उन्होंने कहा कि जरूरत है तो मिलेगी ही। मैं आवश्यकता और पूर्ति के इस रिश्ते से हैरान हो गई। भाभी ने बताया कि घर में अकेली महिला होने के कारण वो अक्सर इस दवा का इस्तेमाल करती हैं। मैंने पूछा कि इस दवा का कोई साईड इफेक्ट नहीं है।

 शिक्षा का अधिकार  : अब सामाजिक बराबरी की तैयारी
उन्होंने कहा कि इस वजह से उनका पूरा मासिक चक्र अनियमित होने के साथ कुछ और भी शारीरिक समस्याएं होती हैं। लेकिन उन्हें इस बात की अब चिंता नहीं है क्योंकि वे दो बच्चों की मां बन चुकी हैं। यानी उनका शरीर एक मां बनने की मशीन है और मां बनने के बाद उनके शरीर के कल-पुर्जों की उपयोगिता उनके लिए खत्म हो गई और वे अंधविश्वास और कुरीतियों की रक्षा के लिए उन कल-पुर्जों के साथ मनमानी कर रही हैं। अंधविश्वास के नाम पर अपने शरीर के साथ इतना बड़ा खिलवाड़। अगर गांव के अनपढ़ लोग कुरीतियों को ढो रहे हैं तो उनके बारे में थोड़ा समझा जा सकता है। लेकिन शहरी  महिलाएं भी इन परंपराओं को ढोती हैं, तो दुख होता है।

सस्ता सैनिटरी नैपकिन :   बंदिशों से मुक्ति की एक सार्थक पहल
आज भी गांवों और कस्बों में इन परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई आगे नहीं आता। सरकार भी परिवार नियोजन और जच्चा-बच्चा की रक्षा को लेकर प्रचार-प्रसार तक ही सीमित रहती  है। इन कुरीतियों के खिलाफ कोई पहल नहीं दिखती। शहरों में तो सेनेटरी नैपकिन ने लड़कियों की आजादी के थोड़े रास्ते खोले हैं लेकिन गांवों की किशोरियों को तो उन पांच दिनों के लिए कालकोठरी में बंद होने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है। घरेलू उपायों पर निर्भरता के कारण स्कूल-कॉलेज जाना बंद हो जाता है।

अगर उन दिनों इम्तिहान और किसी तरह की प्रतियोगिता में भाग लेना हो तो फिर शरीर की मजबूरी आधा मनोबल पहले ही तोड़ देती है। गांवों में घर की बेटियों की शादी के लिए सोने के गहने और रेशमी साड़ियां तो जमा की जाती हैं लेकिन स्कूल जाती लड़कियों के लिए सेनेटरी नैपकिन पर खर्च करना उन्हें बेमानी लगता है।जो परिवार यह खर्च उठा सकते हैं वे तो नहीं उठाते लेकिन बहुत परिवार ऐसे भी हैं जो घर में चार-पांच बेटियों के लिए महीने में इतना खर्च नहीं कर सकते।

टाटा ने सस्ती कार और वाटरप्यूरिफायर तो ला दिया लेकिन कोई कंपनी क्या इन लड़कियों की मुसीबतों को कम करने के लिए आगे आएगी। आखिर अभी तक इसे लड़कियों की बुनियादी जरूरत की तरह क्यों नहीं देखा जा रहा। क्या गांवों में सरकारी मदद से लड़कियों के लिए सस्ते सेनेटरी नैपकिन का इंतजाम नहीं किया जा सकता। आज के दौर में स्कूल  और कॅरियर बनाने की चाह रखनेवाली लड़कियों के लिए यह रोटी,कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरत है।



Aug 6, 2010

जहां मां बनना पाप है

प्रेमा नेगी

मैदानी जिसे धरती का स्वर्ग कहते हैं,संयोग से मैं उस धरती के स्वर्ग पर जन्मी। मैं उन्हीं पहाड़ों में पढ़ी-लिखी और बड़ी हुई। बहुतेरी मान्यताओं और अंधविश्वासों  को  मुझे भी झेलना पड़ा और कुछ को मानने के लिए परिवार वालों ने मजबूर भी किया। मगर बच्चे को जन्म देने वाली माओं को अमानवीयता की इस स्थिति से गुजरना पड़ता होगा,यह मेरी जानकारी में भी नहीं था।

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड की चोटियों को देख सैलानियों को लगता है कि यहां धरती का स्वर्ग बसता होगा। लेकिन पहाड़ की महिलाओं का जीवन पहाड़ से भी ज्यादा कठिन होता है,इसे हम उत्तराखंडी बखूबी जानते हैं। बच्चे को जन्म देने के दौरान एक महिला को नया जीवन मिला होता है और वह अपने शरीर को हिलाने में सक्षम नहीं होती। उस अवस्था में उत्तराखण्ड के ग्रामीण इलाकों में उस महिला को नवजात बच्चे के साथ पेट से निकली गंदगी और उसके सफाई में लगे कपड़े-बिछावन को खुद उठाकर घर से दूर फेंकने जाना पड़ता है।
परंपरा के नाम पर जच्चा को दी जाने वाली इस शारीरिक और मानसिक सजा के बाद वह कैसा महसूस करती होगी, इसे समझना संवेदनशील  समाज के लिए बहुत मुश्किल नहीं है। वहां की महिलाओं से यह पूछने पर कि उस गंदगी को दाई क्यों नहीं फेंकती तो कई ने लगभग एक जैसा ही जवाब दिया कि किसी के पेट की गंदगी को कोई क्यों हाथ लगायेगा?जिसकी गंदगी है, उसे वही दूर फेंककर आये तो अच्छा होता है। यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, पर ये सच है।

बच्चे को जन्म देना किसी भी महिला के लिए जीवन की सबसे कठिन घड़ी होती है। बाकियों को भले ही इसका आभास न हो, मगर सच है कि बच्चे को जन्मने के दौरान वो जीवन और मौत के बीच से गुजरती है। और मौत की दहलीज से वापस लौटने के बाद उसे जो करना पड़ता है,वह वाकई चौंकाने वाला है। मगर यहां के समाज में इस अमानवीयता को परंपरा कहते हैं और मां बनने के बाद सजायाफ्ता हुई औरत जितनी ज्यादा इस नवटंकी को निभाती है,वह उतनी कद्रदां होती है। हमने अपनी ताई, भोजी (भाभी) और मां से पूछा, कहा भी कि वह कुल देवता कितना पापी होगा जो एक मां को यह सजा मुकर्रर करता होगा। लेकिन सभी इस अंतहीन तकलीफ पर हंस पड़े मानो कि इस दुनियादारी को समझने की मेरी उम्र ही न हुई।

उत्तराखण्ड के आर्थिकी की रीढ़ कही जाने वाली महिलायें पुरानी रुढ़ियों की शिकार हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में महिलायें माहवारी की तरह ही बच्चा जनने के दौरान भी घर से अलग-थलग रहती हैं। मासिक धर्म के दौरान जैसे उस महिला को तीन दिन तक कोई छू नहीं सकता वैसे ही जच्चा को नामकरण संस्कार से पहले तक कोई छू नहीं सकता। अगर जच्चा से बच्चे को कोई अपने पास लेता है तो वह गोमूत्र छिड़ककर शुद्धीकरण करने के पश्चात् बच्चे को छूता है।


हालांकि नामकरण के बाद भी एक विषेश समयावधि (जन्म से बाईस दिन) तक जच्चा घर की रसोई और मंदिर वाले कमरे में प्रवेश नहीं कर सकती है। सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं के मुताबिक अगर कोई भी जच्चा को छूने के बाद बिना गोमूत्र छिड़के घर के अंदर प्रवेश करता है तो छूत लग जाती है। इसके पीछे वहां के लोग तर्क देते हैं कि अगर किसी ने इसे नहीं माना तो कुलदेवता नाराज हो जाते हैं जिससे किसी की तबीयत तक खराब हो सकती है। यानी कि आधुनिकता का लिबास पहने तथाकथित सभ्य समाज की कई ऐसी सच्चाइयां हैं जिन पर आज सहज विश्वास करना मुश्किल है।

सामाजिक रूतबे के हिसाब से तो उत्तराखण्ड की महिलाएं वहां की आर्थिकी की रीढ़ हैं बावजूद इसके पुरुष  वर्चस्ववादी मानसिकता और पुरानी रूढ़ियां यहां के समाज में कूट-कूटकर भरी हैं। मासिक धर्म के दौरान भी जो मासिक चक्र उस महिला विषेश तक ही सीमित होना चाहिए उसको वहां हौवा बना दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे कि कोई अपषकुन हो गया हो। इस बात का पता घर के सदस्यों से लेकर आस-पड़ोस के लोगों को तक चल जाता है। ऐसा महसूस होता है जैसे स्त्रियों का अपना कोई निजत्व ही नहीं है।
उन दिनों में जबकि वह औरत शारीरिक कष्ट  झेल रही होती है उसे अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक आराम की जरूरत होती है वह ओढ़ने-बिछाने के लिए तक पर्याप्त बिस्तर नहीं ले सकती है। उसे एक कंबल या गुदड़ी के सहारे ठंडी रातें गुजारनी पड़ती हैं। ठंड के दिनों में तो महिलाएं अतिरिक्त कष्ट सहती हैं। ऐसा नहीं है कि माहवारी के दौरान वह महिला कोई काम नहीं करती है। खेतीबाड़ी से लेकर जंगल से घास-लकड़ी लाने का काम रोजाना की तरह करती है। शुरुवाती दो-तीन दिनों तक तो उस महिला को दूध या दूध से बनी चाय तक नहीं दी जाती है। इसके पीछे भी सारगर्भित तर्क पेश किया जाता है। समाज के ठेकेदार दावा ठोककर कहते हैं कि जिस दुधारू के दूध से चाय बनेगी, वह बीमार पड़ जायेगी नहीं तो उसे छूत लग जायेगी और वह दूध देना बंद कर देगी।

मेरे गांव में एक एक बच्चे के जन्म होने के ग्यारहवें दिन यानी नामकरण के दिन उसकी मौत हो गयी। इसके लिए वहां के लोगों ने उस बच्चे की माँ को ही जिम्मेदार ठहराना शुरू  कर दिया। कहा गया कि इसने बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ही नमक-मिर्च और मसाले वाला खाना खाना शुरू कर दिया था, जिसका असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ा और बच्चा जिंदा नहीं रह सका। लोग मानते हैं नमक तो बच्चे के लिए जहर का काम करता है।

गौरतलब है कि बच्चे के जन्म के बाद कई दिनों तक जच्चा को बिना नमक या न के बराबर नमक दिया जाता है। जब उसे बहुत अच्छे यानी स्वास्थ्यवर्धक भोजन की जरूरत होती है तब लगभग ग्यारह दिनों तक अधिकांश  महिलाओं को दूध भी नहीं दिया जाता। कहा जाता है कि जिस भैंस या गाय का दूध उस जच्चा को दिया जायेगा वह बिगड़ जायेगी, मतलब दूध देना बंद कर देगी या उसे कोई और दिक्कत होगी। लोग बाकायदा उदाहरणों के माध्यम से इन बातों को समझाते हैं। हालांकि अब कुछ समझदार यानी पढ़े-लिखे लोग डेयरी से खरीदकर जच्चा को दूध देने लगे हैं,पर अधिकांश जगह यह संभव नहीं है।

जिन औरतों के पति रोजी-रोटी के चलते पहाड़ से पलायन कर चुके हैं और बच्चे बहुत छोटे हैं,घर में बड़ा-बुजुर्ग कोई नहीं है या किसी कारणवश महिला संयुक्त परिवार में नहीं रहती है तो उसको माहवारी या फिर बच्चे के जन्म के दौरान और भी ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बच्चों और खुद के भोजन के लिए आसपास के लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। चूंकि पुरानी मूल्य-मान्यताओं और अंधविष्वास के चलते वह तय मानदंडों का पूरी तरह निर्वहन करती है इसलिए घर में प्रवेश नहीं करती है।

आखिर माहवारी और बच्चे के जन्म के दौरान महिला में ऐसे कौन से परिवर्तन आ जाते हैं जो इसे लेकर इस तरह की रूढ़ियां हैं। क्यों हैं इसे लेकर इतनी भ्रांतियां? मजेदार बात तो ये है कि यह मासिक धर्म को लेकर जो सामाजिक मान्यताएं हैं वह सिर्फ विवाहितों पर लागू होती हैं। कुंवारी लड़कियों पर कोई नियम लागू नहीं होता।

मन में ख्याल आता है क्या विवाहित स्त्रियों की माहवारी के दौरान या बच्चा जन्मने के बाद विश स्रावित होने लगता है!ऐसी महिलाओं के षरीर से स्पर्ष के बाद उसका अपना बच्चा भी अगर बिना गोमूत्र छिड़के घर के अंदर प्रवेष कर जाता है और यह बात बड़े-बुजुर्गों को पता चल जाती है तो उस घर में बखेड़ा खड़ा हो जाता है। उनमें छुआछूत को लेकर तमाम तरह के विकार दिखने शुरू हो जाते हैं। उनके मुताबिक देवताओं के नाम की बभूति लगाने के बाद ही उसकी छूत उतरती है।

देखा जाये तो ऐसे अंधविश्वासों  को बढ़ावा देने में औरतें खुद भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि ये कहें कि उन्हीं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तो यह गलत नहीं होगा। जो सास इन सड़ी-गली मूल्य-मान्यताओं को ढोती चली आ रही है वह चाहती है कि उसकी बहू भी उन रूढ़ियों को निभायें। इसी तरह इसने एक परंपरा का रूप लिया होगा जो आज भी जारी है। पढ़ी-लिखी और जागरूक महिलाएं भी इसकी गिरफ्त से पूरी तरह नहीं छूटी हैं। वे एक तरह से इन्हें निभाकर बढ़ावा ही देती हैं। हालांकि नई पीढ़ी ने इन रूढ़ियों का कुछ हद तक विरोध करना शुरू किया है, मगर विरोध करने वालों में अभी भी खासकर स्त्रियों की उपस्थिति नाममात्र की ही है।