Apr 14, 2011

अन्ना हजारे से आठ सवाल

 
गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये....


 डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इतिहास के पन्ने पटलकर देखें तो पायेंगे कि जब संविधान बनाया गया था तो किसने सोचा होगा कि पण्डित सुखराम, ए. राजा, मस्जिद ध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संविधान निर्माता डॉ. अम्बेड़कर को गाली देने वाले अरुण शौरी जैसे लोग भी मन्त्री के रूप में संविधान की शपथ लेकर माननीय हो जायेंगे? जब सीवीसी अर्थात् मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया था तो किसी ने सोचा होगा कि इस पद पर एक दिन दागी थॉमस की भी नियुक्ति होगी? किसी ने सोचा होगा कि मुख्यमन्त्री के पद पर बैठकर नरेन्द्र मोदी गुजरात में कत्लेआम करायेंगे?जिससे पूरे संसार के समक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि तहस-नहस हो जायेगी?

इसलिए गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये.

राजनेताओं से निराश और अफसरशाही से त्रस्त भोले देशवासियों द्वारा बिना कुछ जाने समझे कथित गॉंधीवादी  अन्ना हजारे के गीत गाये जा रहे हैं.गाये भी क्यों न जायें,जब मीडिया बार-बार कह रहा है कि एक अकेले अन्ना ने वह कर दिखाने का विश्‍वास दिलाया है,जिसे सभी दल मिलकर भी नहीं कर पाये अर्थात् उन्होंने देश के लोगों में जन लोकपाल बिल पास करवाने की आशा जगाई है.लेकिन नए मीडिया माध्यमों ने कई ऐसी बातें खोज निकली है जिसे बाजारू मीडिया नहीं बता सका है.  वैब-मीडिया ने जो तथ्य उजागर किये

1. अन्ना हजारे असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस :मुम्बई में हिन्दीभाषी लोगों को जब बेरहमी से मार-मार कर महाराष्ट्र से बाहर खदेड़ा जा रहा था तो अन्ना हजारे ने इस असंवैधानिक और आपराधिक कुकृत्य का विरोध करने के बजाय राज ठाकरे को शाबासी दी और उसका समर्थन करके असली भारतीय नहीं,बल्कि असली मराठी माणुस होने का परिचय दिया .

2. अन्ना हजारे ने दो विवादस्पद पूर्व जजों के नाम सुझाये : पहले हैं -पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा जो संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ के हितों के लिये काम करते हैं.  संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ को भ्रष्ट अफसरशाही एवं राजनेताओं के गठजोड़ के कारण भारत की पवित्र नदियों को जहरीला बनाने और कृषि-भूमि में जहरीले कैमीकल छोड़कर उन्हें बंजर बनाने की पूरी छूट मिली हुई है जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी सही ठहरा दिया है ये कैसे सम्भव हुआ होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है.ऐसी खतरनाक कम्पनी को देश से बाहर निकालने हेतु देशभर में राष्ट्रभक्तों द्वारा वर्षों से जनान्दोलन चलाया जा रहा है. इस आन्दोलन को कुचलने और इसे तहस-नहस करने के लिये कम्पनी ने अपार धन-सम्पदा से सम्पन्न एक ‘‘कोका-कोला फाउण्डेशन’’ बनाया है, जिसके प्रमुख सदस्य हैं पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा

3. दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े जो संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर शोषित एवं दमित वर्ग अर्थात्-दलित,आदिवासी और पिछड़ों के विरुद्ध निर्णय देने से नहीं हिचकिचाये : अन्ना हजारे द्वारा सुझाये गये दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े जो सुप्रीम कोर्ट के जज रहते संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर आरक्षण के विरोध में फैसला देने के लिये चर्चित रह चुके हैं.

4. वकालती हुनर के जरिये बीस करोड़ सम्पत्ति एक लाख में ले लेने वाले शान्तिभूषण को बनाया सह अध्यक्ष : उक्त दोनों जजों की सारी असलियत अनशन के दौरान ही जनता के सामने आ गयी, तो अन्ना हजारे वित्तमन्त्री प्रणव मुखर्जी को अध्यक्ष एवं अपनी ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शान्तिभूषण को सह-अध्यक्ष बनाने पर सहमत हो गये, जो 1977 में बनी पहली गैर-कॉंग्रेसी सरकार में मन्त्री रह चुके हैं.
हजारे की ओर से समिति के सह अध्यक्ष बने शान्तिभूषण एवं उनके पुत्र प्रशान्त भूषण (दोनों जन लोकपाल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति में हैं) ने 2010 में अपने वकालती हुनर के जरिये इलाहाबाद शहर में बीस करोड़ से अधिक बाजार मूल्य की अचल सम्पत्ति एवं मकान मात्र एक लाख में ले ली और स्टाम्प शुल्क भी नहीं चुकाया.
5. बाबा रामदेव और अन्ना हजारे कितने गॉंधीवादी और अहिंसा  समर्थक हैं? हजारे ने अनशन शुरू करने से पूर्व गॉंधी की समाधि पर जाकर मथ्था टेका और स्वयं को गॉंधीवादी कहकर अनशन की शुरूआत की, लेकिन स्वयं अन्ना की उपस्थिति में अनशन मंच से अल्पसंख्यकों को विरुद्ध बाबा रामदेव के हरियाणा के कार्यकर्ता हिंसापूर्ण भाषणबाजी करते रहे जिस पर स्वयं अन्ना हजारे को भी तालियॉं बजाते और खुश होते हुए देखा गया. यही नहीं अनशन समाप्त करने के बाद हजारे ने आजाद भारत के इतिहास के सबसे कुख्यात गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को देश का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया.

6. एनजीओ और उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला : अन्ना हजारे ने सेवा के नाम पर विदेशों से अरबों का दान लेकर डकार जाने वाले और देश को बेचने वाले कथित समाजसेवी संगठनों (एनजीओ)के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, सरकारी बैंकों का अस्सी प्रतिशत धन हजम कर जाने वाले भारत के उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला!आखिर क्यों?  क्योंकि इन्हीं सबके मार्फत तो अन्ना के अनशन एवं सारे तामझाम का खर्च वहन किया जा रहा था

7. अन्ना के अनुसार देश का आम मतदाता सौ रुपये में और दारू की एक बोतल में बिक जाता है.  अब अन्ना को ये कौन समझाये कि मतदाता ऐसे बिकने को तैयार होता तो संसद में आम लोगों के बीच के नहीं, बल्कि अन्ना के करीब मुम्बई में रहने वाले उद्योगपति बैठे होते. अन्ना जी आम मतदाता को गाली मत दो, आम मतदाता ही भारत और स्वयं आपकी असली ताकत हैं

8. लोकपाल कौन होगा?  ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि हजारे के प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को यदि संसद पास कर भी देती है,तो इस सबसे शक्ति सम्पन्न संवैधानिक संस्था का मुखिया अर्थात् लोकपाल कौन होगा? क्योंकि जिस प्रकार का जन-लोकपाल बिल ड्राफ्ट बनाये जाने का प्रस्ताव है, उसके अनुसार तो लोकपाल इस देश की कार्यपालिका,न्यायपालिका और व्यवस्थापिका से भी सर्वोच्च होगा
उसके नियन्त्रणाधीन केन्द्रीय एवं सभी राज्य सरकारें भी होगी और वह अन्तिम और बाध्यकारी निर्णय लेकर लागू करने में सक्षम होगा. बाबा राम देव तो लोकपाल को सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष दर्जा देने की मांग कर रहे हैं
ऐसे में देश के सवा सौ करोड़ लोगों की ओर से मेरा सीधा सवाल यह है कि यदि गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? आने की सम्भावना को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता है.

 
(जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र 'प्रेसपालिका' के सम्पादक.विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, चिन्तक, शोधार्थी तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार, मनमानी,मिलावट,गैर-बराबरी आदि केविरुद्ध संघर्षरत.उनसे   dr.purushottammeena@yahoo.in   पर संपर्क किया जा सकता है .)  




 


Apr 12, 2011

आदमी की कीमत पर बाघ


आधा दर्जन लोगों पर हमला करने और कई मवेशियों को अपना शिकार बनाने वाले एक बाघ की मौत से सरकार इतनी आहत हुयी है कि उसने दो महिलाओं समेत सात लोगों को जेल में डाल दिया है... 

कमल भट्ट

आदमी की कीमत पर बाघ की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानने वाली सरकार और प्रशासन ने बाघों के मामले में जो रवैया अपनाया है उससे लोग न केवल डरे हैं, बल्कि उनके लिए इधर कुंआ, उधर खाई वाली स्थिति है। एक  तरफ ग्रामीणों को बाघ के हमले का डर है तो दूसरी तरफ अपनी बात कहने पर जेल का रास्ता तैयार है।

पिंजरे में जलता हुआ बाघ
पिछले महीने उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के धामधार गांव में बाघ को जिन्दा जलाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है और वन विभाग की कार्यवाही के खिलाफ लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है।आधा दर्जन लोगों पर हमला करने और कई मवेशियों को अपना शिकार बनाने वाले एक बाघ की मौत से सरकार इतनी आहत हुयी है कि उसने दो महिलाओं समेत सात लोगों को जेल भेजा है। इन लोगों की जमानत जिला न्यायालय पौड़ी से खारिज हो चुकी है। गांव में लगी पीएसी फिलहाल हटा दी गयी है,लेकिन ग्रामीण और मवेशी अपनी-अपनी जगह पर कैदी बने हैं।


गौरतलब है कि सरकार के लिए बाघ को बचाना प्राथमिकता में है। जितने बाघ बचेंगे,सरकार को ईनाम मिलेगा। पिछले महीने 22 -23 मार्च को पौड़ी जनपद का एक सुदूरवर्ती गांव अचानक स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन गया। कोटद्वार से सत्तर किलोमीटर दूर रिखणीखाल विकासखण्ड के धामधार गांव में ग्रामीणों ने एक बाघ को इसलिये जिन्दा जला दिया कि उसने एक सप्ताह तक उनके मवेशियों को अपना निवाला बना दिया और तीन लोगों को जख्मी कर दिया।

घटना को देखने-सुनने वालों को लगा कि इस गांव के लोगों ने किस क्रूरता  के साथ तमाम कायदे-कानूनों को ताक में रखकर एक निरीह प्राणी को मार डाला। उत्तराखण्ड जैसे राज्य में जहां की सरकार बाघ के संरक्षण पर ही जिन्दा है उसके लिये इस ‘पवित्र काम’ में व्यवधान डालने वाले लोग किसी राष्ट्रद्रोही से कम नहीं हो सकते। परिणामस्वरूप दो महिलाओं सहित सात लोगों को संगीन धाराओं में जेल में डाल दिया गया। उनकी जमानत किसी अदालत में नहीं हो पा रही है। गांव के लोगों से प्रशासन को इतना खतरा हुआ कि गांव के बाहर पीएसी का पहरा लगा दिया गया।

बाघ को मारने की सरकारी कहानी का यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष इस बात को उद्घाटित करता है कि वन विभाग और सरकारी नुमाइंदों के लिए आम आदमी का जीवन कितना सस्ता है। बाघ मारने की यह कहानी धामधार गांव की है। यहां पिछले महीने 22 मार्च को एक गुलदार शेखर चंद्र की गौशाला में घुस आया।

इससे पहले एक अन्य ग्रामीण नरेंद्र कुमार की गाय को बाघ ने मार डाला था, इसलिये लोग सतर्क थे। गौशाला में जानवरों की आवाज सुनकर ग्रामीणों को पता चला कि गुलदार गौशाला में घुस आया है। उन्होंने गौशाला के दरवाजे को बाहर से बंद कर ताला लगा दिया। ग्रामीणों ने चाबी रथुआढाब के रेंजर को सौंप दी। उन्हें उम्मीद थी कि वन विभाग वाले बाघ को ऐसी जगह छोडक़र आयेंगे जहां से जानवरों और लोगों की हिफाजत की जा सकेगी। लेकिन रेंजर और उनके अधीनस्थों ने बाघ का क्या किया, इसका पता लोगों को नहीं चल पाया।

बाइस  मार्च को वन विभाग ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की। रात तकरीबन नौ बजे रेंजर और उनके साथ आये कर्मचारियों ने गौशाले का ताला खोलकर बाघ को बाहर निकाल दिया। इसके बाद बाघ बाहर गांव में खुला घूमने लगा। आजाद होने के एक घंटे बाद यानी रात के दस बजे बाघ ने दो ग्रामीणों गजे सिंह और यशपाल पर हमला कर उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया। दूसरे दिन सुबह पांच बजे भगत सिंह नामक व्यक्ति को बुरी तरह घायल कर दिया। उसका इलाज राजधानी के दून अस्पताल में चल रहा है।

गांव में उत्पात मचाने के बाद इत्तफाक से बाघ फिर से शेखर चंद्र की गौशाला में घुस गया। वन विभाग की कार्यवाही से आक्रोशित और बाघ से डरे ग्रामीणों ने फिर से गौशाला में ताला लगाकर बाघ को बंद कर दिया। वन विभाग ने बाघ को फिर से गांव में छोड़ दिया। इस खबर से लोगों का आक्रोशित होना स्वाभाविक था।

धामधार और उसके आसपास के गांवों के एक-डेढ़ हजार लोग गांव में इकट्ठा हो गये। इस खबर को सुनकर वन विभाग के आला अधिकारी भी मौके पर पहुंच गये। ग्रामीणों को समझाते हुए डीएफओ ने आश्वासन दिया कि इस बार बाघ को पिंजरे में कैद किया जायेगा। विभाग ने बाघ को पिंजरे में कैद कर लिया। ग्रामीणों को आश्वस्त करते हुए वनाधिकारियों ने कहा कि इसे दूर जंगल में छोड़ दिया जायेगा। ग्रामीण बाघ को चिडिय़ाघर में छोडऩे की मांग करने लगे।

ग्रामीणों के मुताबिक झल्लाये रेंजर ने उनसे कहा चिडिय़ाघर में उसके गुजारे के लिए हमें आठ-दस किलो मांस के पैसे प्रतिदिन के हिसाब से देने होंगे। इसके लिए विभाग के पास पैसा नहीं है, इसलिए बाघ को जंगल में ही छोड़ा जायेगा। विभाग के अडिय़ल रवैये से क्षुब्ध होकर डेढ़ हजार लोगों ने पिंजरे में कैद बाघ पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी।

वन विभाग और प्रशासन के लिए यह बड़ी घटना थी, वन्य जंतु अधिनियम के अधीन घोर अपराध था। प्रशासन हरकत में आया। उसने वन्य जंतु अधिनियम-1972 की धारा 9, 52, 53 और आईपीसी की धारा 147, 252, 332 के तहत दो महिलाओं सहित सात लोगों को बाघ मारने के जुर्म में जेल भेज दिया।

शेखर चंद्र की इसी गौशाला में घुसा था बाघ
यहां से बाघ और आदमी के बीच का संघर्ष शुरू हो गया है। सरकार और कानून बाघ के पक्ष में हैं,जबकि ग्रामीणों के सामने एक तरफ लोकतंत्र के कानून को बचाने की जिम्मेदारी है,दूसरी ओर फिर से बाघ का निवाला बनने का संकट। फिलहाल कानून ने अपना काम किया है। जिला न्यायालय पौड़ी से ग्रामीणों की जमानत खारिज हो गयी है। गिरफ्तार लोगों में बाघ के हमले में गंभीर रूप से घायल यशपाल की मां भी शामिल है। जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है उसमें धामधार के अलावा कुमाल्डी, छर्ता, ढिकोलिया और कदरासी का एक-एक ग्रामीण भी शामिल है।

इस पूरे मामले में प्रशासन ने जो रवैया अपनाया है, वह लोकतंत्र में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर नये सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों को डराने के लिए प्रशासन ने गांव के बाहर भारी पुलिस बल लगा दिया। इसमें पीएसी की एक टुकड़ी भी शामिल है। गांवों में गेहूं की फसल कटने को तैयार है। ग्रामीण बाघ के डर से खेतों में नहीं जा रहे हैं। पड़ोस के चौडग़ांव में बाघ देवेंद्र कुमार नामक व्यक्ति को घायल कर चुका है।

बाघ के डर से गांवों की खड़ी फसल बर्बाद हो रही है। देखभाल न होने से सुअर भी खेती को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस बीच क्षेत्र के कई छोटे-बड़े नेताओं के हस्तक्षेप के बाद पीएसी तो हटा दी गयी है, लेकिन लोगों का भय दूर नहीं हुआ है। गांव में पांच बजे बाद कफ्र्यू का सा माहौल है। लोग अपने घरों में कैद हैं। एक तरफ बाघ का खतरा है, दूसरी तरफ प्रशासन का। अब धामधार गांव की किस्मत बाघ तय करेगा, क्योंकि सरकार की नजर में ग्रामीण बाघ के हत्यारे हैं।

(पाक्षिक पत्रिका ‘जनपक्ष आजकल’ से साभार)

रंग लायी अन्ना की कुर्बानी


अन्ना ने न कोई विश्वविद्यालय  बनाया,न ही किसी प्रकार का उद्योग स्थापित किया,न ही कोई टापू खरीदा,न ही मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों या केंद्रीय मंत्रियों को अपने किसी आयोजन में बुलाकर अपना मान-सम्मान बढ़ाने का प्रयास किया...

तनवीर जाफरी 

वयोवृद्ध गांधीवादी नेता एवं समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे का, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से तंग आकर किया गया आमरण अनशन समाप्त हो गया। केंद्र सरकार ने अन्ना हज़ारे की अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया।
वैसे तो भ्रष्टाचार का विरोध किए जाने की बातें सार्वजनिक रूप से सभी राजनीतिक दलों के सभी राजनेता करते देखे जा सकते हैं। वे भी जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं तथा वे भी जिन्होंने अपने थोड़े से समय के राजनीतिक जीवन में ही अकूत धन-संपत्ति कमा डाली है। और वे भी जो भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देते हैं तथा उनसे हर प्रकार के लाभ उठाते हैं।

यदि इस प्रकार के पाखंडी राजनेता या अधिकारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाएं तो निश्चित रूप से इसे महज़ एक पाखंड या ढकोसला ही कहा जाएगा। परंतु जब भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की लगाम अन्ना हज़ारे,अरविंद केजरीवाल तथा किरण बेदी या स्वामी अग्रिवेश जैसे समर्पित एवं फक्कड़ लोगों के हाथों में हो तो देश की जनता का ध्यान इनकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

कुछ ऐसा ही नज़ारा तब देखने को मिला जब महात्मा गांधी की सत्य,अहिंसा व बलिदान की नीतियों का अनुसरण करते हुए 73 वर्षीय अन्ना हज़ारे संसद में जन लोकपाल विधेयक पारित कराए जाने की मांग को लेकर 5 अप्रैल से आमरण अनशन पर बैठ गए। उनके समर्थन में न केवल पूरे देश में अनशन, भूख-हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, जुलूस व रैलियां शुरु हुईं, बल्कि विदेशों में भी उनके समर्थन में रैली व मार्च आयोजित किए जाने के समाचार आए।

सवाल यह उठता है कि जब केंद्र में मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार व योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार शासन कर रही हो और कांग्रेस पार्टी स्वयं को गांधी की विचारधारा की आलमबरदार पार्टी बताने का भी दम भरती हो ऐसे में अन्ना हज़ारे जैसे वरिष्ठ गांधीवादी नेता को आमरण अनशन तक जाने की ज़रूरत ही क्यों महसूस हुई। मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अन्ना हज़ारे द्वारा सुझाए जा रहे जन लोकपाल विधेयक से आखिरकार तब सहमत हुए जब अन्ना हज़ारे अपने तमाम साथियों सहित अनशन पर बैठे तथा इस आंदोलन को असंगठित होने के बावजूद ऐतिहासिक समर्थन मिला।

गत् 40वर्षों से विचाराधीन लोकपाल विधेयक को आखिऱ जन लोकपाल विधेयक के रूप में काफी पहले परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए था। यदि राजनीतिज्ञ स्वयं को इतना ही साफ-सुथरी तथा बेदाग छवि वाला समझते होते तो अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन शुरु करने के एक ही दिन बाद शरद पवार जैसे नेता जोकि स्वयं को प्रधानमंत्री पद का सबसे मज़बूत दावेदार समझने की गलतफहमी भी पाले हुए थे, भ्रष्टाचार के विरुद्ध बने मंत्रिमंडलीय समूह से त्यागपत्र न दे डालते।

बहरहाल,अन्ना हज़ारे की कुर्बानी रंग ले आई है। जन लोकपाल विधेयक सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक का स्थान संभवत:लेने को है। देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने विशेषकर उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार को समाप्त करने अथवा नियंत्रित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

निश्चित रूप से जनप्रतिनिधि व उच्चाधिकारी अब जन लोकपाल विधेयक के भयवश दोनों हाथों से देश को लूटने की अपनी प्रवृति से बाज़ आ सकेंगे। देश के नौजवानों से लेकर बुज़ुर्गों तक ने इस आंदोलन को बिना किसी निमंत्रण अथवा रणनीति के जिस प्रकार व्यापक समर्थन दिया तथा हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में जो उत्साह दिखाया वह भी न केवल काबिले तारीफ था बल्कि इसे देखकर इस बात का भी साफ अंदाज़ा हो रहा था कि देश का बहुसंख्यक वर्ग वास्तव में भ्रष्टाचार तथा भ्रष्टाचारियों से बेहद दु:खी है।
खासतौर पर उन जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार से जो कि जनता द्वारा पांच वर्षों के लिए निर्वाचित तो इसलिए किए जाते हैं ताकि वे अपने क्षेत्र का समग्र विकास करते हुए देश के बहुमुखी विकास में अपनी भागीदारी निभाएं। परंतु आमतौर पर यही प्रतिनिधि भ्रष्टाचार,स्वार्थ तथा परिवारवाद में ऐसा उलझकर रह जाते हैं गोया कि जनता ने इन्हें लूट-खसोट करने,देश को बेच खाने तथा अपने परिवार को जनता की छाती पर जबरन सवार कर देने का लाईसेंस दे दिया हो।

इस दौरान चली भ्रष्टाचार संबंधी राष्ट्रीय बहस में उन राजनीतिक दलों को बढ़चढ़ कर अन्ना हज़ारे का समर्थन करते देखा गया जिनके राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री सभी पर घोर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। परंतु ऐसे दल व इनके नेता भी हज़ारे को समर्थन देते और कांग्रेस की गठबंधन सरकार को कोसते व भ्रष्टाचारी बताते दिखाई पड़े। जबकि नैतिकता का तकाज़ा तो यही है कि अन्ना हज़ारे के आंदोलन का समर्थन तथा भ्रष्टाचार का मुखरित होकर विरोध करने का अधिकार केवल उसी को होना चाहिए जिसका दूर-दूर तक भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना न हो।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार से लडऩे की आड़ में अपनी कोई संपत्ति अर्जित नहीं की। न ही उन्होंने कोई विश्वविधालय बनाया,न ही किसी प्रकार का उद्योग स्थापित किया,न ही कोई टापू खरीदा,न ही मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों या केंद्रीय मंत्रियों को अपने किसी आयोजन में बुलाकर अपना मान-सम्मान  बढ़ाने का प्रयास किया।

उनके किसी भक्त ने हज़ारे को शायद इस योग्य भी नहीं समझा कि वह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से संघर्ष करने के लिए कम से कम उन्हें एक हेलीकॉप्टर तो ‘गुप्तदान’में दे देता?परंतु इन सभी सांसारिक एवं भौतिक संसाधनों के अभाव के बावजूद इस वरिष्ठ गांधीवादी ने अपने आमरण अनशन के बल पर केंद्र सरकार सहित पूरे देश-दुनिया में रह रहे भारतवासियों को झकझोर कर रख दिया।

 हज़ारे की इस कुर्बानी ने उन तमाम तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधियों को भी बौना कर दिया जो कि बातें तो भ्रष्टाचार से लडऩे की करते हैं परंतु अपने साथ भ्रष्टाचारियों का ही समर्थन भी रखते हैं। और ज़रूरत पडऩे पर इन्हीं भ्रष्टाचारियों के दल को लाखों रुपये चंदा देने से भी नहीं हिचकिचाते। अन्ना हज़ारे ने न तो कभी किसी राजनीतिक दल के गठन की इच्छा ज़ाहिर की, न ही क भी सत्ता अपने हाथ में लेकर उसमें स्वयं सुधार किए जाने जैसा कोई स्वार्थपूर्ण खाका तैयार किया। उन्होंने वही किया जो गांधी जी किया करते थे। अर्थात् सत्य,अहिंसा और बलिदान के मार्ग पर चलकर सरकार, देश तथा दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करना।

इस महान गाँधीवादी नेता अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने एक बार फिर यह भी प्रमाणित कर दिया है कि महात्मा गाँधी के आदर्श व उनके सिद्धांत आज भी न केवल प्रासंगिक हैं बल्कि पूरी तरह जीवित भी हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि इस गांधीवादी आंदोलन का समर्थन वह लोग करते भी दिखाई दिए जो गांधीवादी विचारधारा के प्रबल विरोधी हैं।

बेशक ऐसी शक्तियों द्वारा हज़ारे को दिया जाने वाला समर्थन उनके अपने स्वार्थवश दिया गया समर्थन ही था। परंतु हज़ारे ने गांधी जी के मार्ग पर चलते हुए एक बार फिर देश में महात्मा गांधी की याद को ताज़ा कर दिया है। इतना ही नहीं,आज की जिस पीढ़ी ने महात्मा गांधी के बारे में केवल पढ़ा है परंतु देखा नहीं,वह पीढ़ी भी अन्ना हज़ारे के इस आमरण अनशन को देखकर यह कल्पना करने लगी है कि वास्तव में महात्मा गांधी भी अहिंसा का दामन थामकर इसी प्रकार अंग्रेज़ों से भी अपनी बातें मनवाते रहे होंगे।

हिंसा का सिद्धांत यही होता है कि किसी को मार कर,किसी का घर जलाकर या किसी की बस्ती उजाड़ कर अपनी बातें मनवाने का प्रयास किया जाए। इस देश में इस विचारधारा के समर्थक भी काफी सक्रिय हैं तथा यही लोग महात्मा गांधी को कोसते भी रहते हैं। दूसरी ओर अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपनी मांग पूरी करवाने का एकमात्र गांधीवादी तरीका यही होता है कि आमरण अनशन,सांकेतिक भूख हड़ताल, क्रमिक अनशन या उपवास आदि रखकर तथा स्वयं दु:ख उठाकर व अपनी जान को खतरे में डालकर अपनी जायज़ मांगों को पूरा करवाने हेतु सत्ता केंद्र को अपने घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जाए। जैसाकि अन्ना हज़ारे व उनके समर्पित साथियों ने कर दिखाया है।

अन्ना हज़ारे के इस बलिदानपूर्ण कदम ने जहां भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने में अपना परचम बुलंद किया है वहीं जंतर मंतर पर किए गए उनके आमरण अनशन ने देश को एक बार फिर महात्मा गांधी की याद ताज़ा कर दी है। निश्चित रूप से देश को अन्ना हज़ारे जैसे एक-दो नहीं हज़ारों अन्ना हज़ारे चाहिए जो समय-समय पर गांधी दर्शन को जीवित रख सकें तथा समय पडऩे पर इसी प्रकार सरकार को सचेत करते रहें।

Apr 11, 2011

जो लहू बह रहा है उसे रोक पाओगे अन्ना


कामायनी बाली महाबल  


आज मेरा रोम रोम चीख रहा है                  

एरोम तुम्हारे लिए

चीख पुकार तो कब से दबी थी

गुस्सा भी चीख- चीख के निकला था

vt स्टेशन पे तुम्हारी रिहाई की गुहार लगाकर

मानों तन और मन ऐसा थरका था

लोगों को तुम्हारे बारे में बताना

लोगों को अफ्प्सा काले कानून के बारे में बता कर

मानो मन कुछ तो हल्का हुआ था


लेकिन कुछ दिन से इस देश की गुहार देखकर

अन्ना हजारे पर प्यार देख कर

देश के कोने कोने से भ्रष्टाचार  के यह एक आवाज़ सुनकर

खुश तो हूँ,

पर मेरा दिल चीख चीख के रो रहा है

मेरा दिमाग, मेरा तन.... इस क्रांति पे खुश है

पर मेरा दिल मेरे  साथ नहीं है

मेरा दिल तम्हारे पास है इरोम

वोह तुम्हारे लिए रो रहा है

वोह इस देश को समझ नहीं पा रहा है

आखिर एक दिल है......


तुम दस साल से भी ज्यादा से भूख हड़ताल पे हो

तुम्हारे साथ एक भी भारतवासी नहीं आया

तुम AFSPA के काले कानून के खिलाफ हो

तुम्हें किसी ने नहीं अपनाया


किसी को मत बताना इरोम

यह एक ऐसी पहेली है

जिसका जवाब इंसानों के साथ बदलता है

हम अन्ना हजारे के साथ हैं

यह हमारी देश भक्ति है

हम अन्ना हजारे के साथ हैं

हम आम जनता के साथ हैं


जब हम तुम्हारे साथ है

हम देशद्रोही है

जब तुम्हारे साथ हैं

हम फ़ौज और जवानों के खिलाफ है

हम इस देश की सुरक्षा के खिलाफ है


भ्रष्टाचार तो बचपन से हमें

हमारी किताबों में भी एक गलत चीज़ है बताया गया है

पर इरोम, देश भक्ति हमें

केवल अपने देश को बचाना ही सिखाएगी


देश, फ़ौज, पुलिस ---देश भक्ति का अटूट अंग बन गए हैं

वह मेरी तुम्हारी  लड़ाई में हमारे दुश्मन बन गए हैं

भ्रष्टाचार में लाखों करोड़ों के घपले हैं

पर आफ्सपा , जैसे काले कानून के कारण

इस देश भक्ति के कारण

लाखों करोड़ों देशवासी मौत की नींद  सो गए गए हैं

उनके मरने से उनके परिवार भी मर गए हैं

और हम सब उनको आतंकवादी का  नाम देकर....

देशभक्ति का प्रमाण देकर कहीं सो गए


इरोम, हम सरकार की इस बर्बरता को

देशभक्ति के परदे में देख नहीं पाते

कब हमारे देश वासी जागेंगे

और हम देश वासी बाद में , पहले इंसान हैं

इस एहसास को जान पायेंगे


कब इरोम कब

कब हजारों लाखों तुम्हारे साथ भी

भूख हड़ताल पे जायेंगे

कब इरोम कब

हमारे देशवासी

इस देशभक्ति का

मुखौटा  हटाएँगे


अन्ना हजारे तुम्हारी जीत हो गयी है

तुम्हारे 85 घंटों के अनशन से

लोकपाल बिल आएगा.......

इरोम शर्मीला के दशक के अनशन पे

AFPSA हटा नहीं है

अन्ना क्या आप इरोम के साथ बैठोगे ?

क्या आप कानून के नाम पर जो लहू बह रहा है ?

उसको रोक पाओगे ?
 
 
 
 
 
वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता. विनायक सेन की रिहाई में लगे अग्रणी लोगों में एक. बतौर पत्रकार पांच साल तक युएनाई और इंडियन एक्सप्रेस में स्वास्थ्य,महिला और मानवाधिकार मसलों पर लेखन. उन्होंने   यह कविता 8 अप्रैल को तब लिखी थी जब अन्ना ने आमरण अनशन अगले दिन खत्म करने की घोषणा की.




ईमानदारी के इकलौते चाँद अन्ना

अन्ना के पास जैसे मोदी की पसंदगी का जवाब है,ऐसा ही कोई जवाब पेप्सी के लिए हो. वैसे भी विकास के दौर में गाँधी के आदर्श दूसरे गाँधी यानि अन्ना ढो भी नहीं सकते. यह दौर तो भ्रष्टाचार के खिलाफ राहुल बजाज जैसों से समर्थन लेने का है...

जंतर मंतर डायरी - अंतिम किस्त

बात अब अनशन से आगे बढ़ चुकी है और अन्ना हजारे के पवित्र आन्दोलन का लगातार विस्तार जारी है.कल के हुए विस्तार के मुताबिक उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के विकास पुरुष नीतीश कुमार भातें हैं.

लेकिन अन्ना के इस मत पर सवाल उठने लगे हैं.सवाल उठाने वालों में उनके अपने और पराये दोनों हैं.तो अन्ना भी इन सवालों से विचलित नहीं हो रहे.बड़े ही अहिंसक तरीके से बारीक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं.जैसे अन्ना को नरेन्द्र मोदी पसंद हैं, मगर गुजरात 2002 में नरसंहार कराने वाले मोदी नहीं, विकास वाले मोदी.

पेप्सी कम्पनी की सौगात दिखाता एक अनशनकारी  

वैसे भी अन्ना और उनके सहयोगी बारीकी का बड़ा ध्यान रखते हैं. जन लोकपाल विधेयक के लिए 5 अप्रैल से अनशन पर बैठे अन्ना ने 9 अप्रैल को जब अनशन खत्म किया तब भी उनके सहयोगियों ने 'देश में कौन ईमानदार है जो अन्ना को जूस पिलाएगा'को लेकर बारीकी का निर्वाह किया था.जिसके बाद बाबूराव ऊर्फ अण्णा हजारे ने शनिवार को एक बच्ची के हाथ से नींबू पानी पीकर अपना अनशन खत्म कर दिया.उनके सहयोगियों का मत था की ईमानदारी के इकलौते चाँद अन्ना ही हैं, बाकि तो....

लेकिन अनशन पर बैठे अन्य 400 लोगों को पेप्सी कम्पनी का निंबुजा(बोतल बंद नींबू-पानी)  पिलाया गया, वह भी काफी अपमानजनक तरीके से. इस पर भ्रष्टाचार विरोधियों को कोई तकलीफ न हुई.  जाहिर है फिर सवाल उठा होगा की भारत समेत दुनिया के किसानों-मजदूरों का खून चूस, पर्यावरण के सवालों को ताक पर रख जल दोहन करने वाली पेप्सी कंपनी के उत्पाद से अनशन तोड़ने में अन्ना को भ्रष्टाचार की बू क्यों नहीं आई. अन्ना के गृह जनपद महाराष्ट्र के अहमद नगर से अनशन पर बैठे दत्तात्रय गोपीनाथ चाह्वान कहते हैं, 'मैं हतप्रभ था नींबू-पानी की बोतल पकड़ कर. कौन नहीं नहीं जनता की पेप्सी क्या करती है.'   

सवाल है की क्या नींबू पानी या जूस का इंतजाम इतना मुश्किल था. जो चैनल और एनजीओ  वाले  लोगों के लिए थाली बजाने से लेकर मोमबत्ती तक का इंतजाम करा रहे थे, उनसे ही कह दिया होता तो वह ख़ुशी-ख़ुशी  इंतजाम कर देते.अनशन तोड़ा जा रहा है, नींबू- चीनी मिलाया जा रहा है, का विजुअल  भी   तो अच्छा  बनता. 

बहरहाल, अन्ना के पास जैसे मोदी की पसंदगी का जवाब है,ऐसा ही कोई जवाब पेप्सी के लिए हो. वैसे भी विकास के दौर में गाँधी के आदर्श दूसरे गाँधी यानि अन्ना ढो भी नहीं सकते. क्योंकि यह दौर तो भ्रष्टाचार के खिलाफ राहुल बजाज जैसों से समर्थन लेने का है.

हुआ यूं कि मंच पर विराजमान स्वामी अग्निवेश अनशनकारियों से कह रहे थे कि आप लाइन लगाकर आ जाइए, मैं आपको जूस दूंगा. वह भी पेप्सी का. हालांकि अग्निवेश खुद अनशन पर नहीं बैठे थे और दोनों टाइम सात्विक खाना खा रहे थे.

इस अभियान का नेतृत्व अधिकतर वही लोग कर रहे थे जिन्होंने पेप्सी और कोका कोला के खिलाफ केरल से लेकर बनारस तक झंडा बुलंद किया हुआ है.अनशन खत्म होने पर यही लोग पेप्सी का निंबुजा बांट रहे थे. धन्य हैं आप लोग और आपकी माया.  चलिए! कोई बात नहीं, अण्णा का अनशन तो टूटा. वरना सैकड़ों लोग एक जन लोकपाल के लिए खाना-पीना छोड़कर अनशन पर बैठे थे. जिद थी कि लोकपाल नहीं मिला तो जान दे देंगे.

अण्णा ने जब अनशन शुरू किया तो मांग की थी कि सरकार उनके जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार करे. इसके बाद कहा कि अगर नया कानून बनाने के लिए कोई समिति बनती है तो उसका अध्यक्ष उनकी ओर से होगा. उन्होंने कुछ नाम भी उछाले, इनमें कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह का नाम प्रमुख था.

ऐसे में सवाल अब यह उठता है कि जिस जन लोकपाल विधेयक का 33पेज का मसौदा अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और संतोष हेगड़े ने मिलकर तैयार किया था, अण्णा उससे पीछे क्यों हटे और नया मसौदा तैयार करने पर राजी क्यों हुए?

दूसरी बात यह कि क्या प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, संतोष हेगड़े और अण्णा हजारे को क्या इतना पता नहीं था कि किसी भी विधेयक को संसद में पेश करने का अधिकार उसके अध्यक्ष को होता है. संसद में विधेयक वही पेश कर सकता है, जो उसका सदस्य हो. अगर पता था तो उन्होंने प्रारूप बनाने वाली समिति के अध्यक्ष पद के लिए जिद क्यों की?

जंतर-मंतर पर कई लोग इन सवालों का उत्तर ढूंढ़ते नजर आए, तो कई लोगों को लग रहा था कि अण्णा बैकफुट पर आ गए हैं.हुजूर! अगर बैठफुट पर ही आना था तो,इतना बड़ा अभियान क्यों चलाया?

नेताओं के प्रति नफ़रत का यह आलम है                                            
जंतर-मंतर पर शनिवार को कालेज के दो छात्र भी अण्णा को समथर्न देने आए थे. दोनों अण्णा के समर्थन में जमकर नारे लगा रहे थे. 'भारत माता की जय.' उनमें एक ने दूसरे से अचानक पूछा, 'यार ये शांति भूषण कौन हैं?' दूसरे ने कहा 'अबे! नहीं जानता शांतिभूषण जी, प्रशांत भूषण जी के डैडी हैं.' पहले छात्र ने अचानक एक दूसरा सवाल फिर आसमान में फेंका, 'अबे! ये शांतिभूषण तो अब तक कहीं नजर नहीं आ रहे थे, अचानक कहाँ से टपक पड़े.' इसके जवाब में दूसरे ने कहा 'भाई! इतने भोले भी मत बनो. अरे यार, जब राजनीति में वंशवाद चल सकता है तो अभियानों में क्यों नहीं.'

मुझे लगा कि शायद पहला वाला लड़का यह नहीं जानता है कि शांतिभूषण कितने बड़े वकील हैं, क्या-क्या रह चुके हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ कब से लड़ रहे हैं.

दिन बीतते-बीतते यानी शाम को आश्चर्य तब हुआ,जब देश के सबसे नए औद्योगिक घराने के स्वामी और इस अभियान को तन,मन और धन से समर्थन देने वाले बाबा रामदेव (रामदेव ने शनिवार को अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया स्थित नेचुरामिक एलएलसी नाक की कंपनी का अधिग्रहण किया है.)  ने भी यही सवाल उठा दिया.

उन्होंने कहा कि लोग उनसे कह रहे हैं 'लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए जो समिति बनाई गई है उन्हें उसमें से वंशवाद की बू आ रही है.' बाबा को जंतर-मंतर अभियान के पीछे एक लंबी कहानी भी नजर आई, जिसके एक पात्र वे खुद हैं. लेकिन रामदेव जी ने कहानी का पर्दाफाश नहीं किया, क्योंकि कहानी स्वांत: सुखाय की है. आप लोग रामदेव जी के नए उपक्रम के लिए उन्हें शुभकामनाएँ दें और उसके बेहतर भविष्य की कामना करें!

रामदेव का कहना है कि उनके साथ अण्णा एंड कंपनी ने छल किया है.वे किरण बेदी के साथ गठबंधन के प्रयास में हैं.

चलते-चलते एक बात और.बात शायद 20वीं सदी के अंतिम दिनों की है,जब देशभर के मंदिरों में गणेश की प्रतिमाओं ने लड्डू खाना छोड़कर दूध पीना शुरू कर दिया था.असर यह हुआ कि लोग बिना कुछ सोचे-समझे दूध लेकर चल दिए थे, गणेश जी को दूध पिलाने. आस्था का सवाल था. उस समय भी मीडिया ने इसे खूब दिखाया था, बिल्कुल अण्णा की तरह. बाद में क्या पता चला, यह तो आप जानते ही हैं. अण्णा के अभियान को दिखाने वाला यह मीडिया उस समय अभी पैदा ही हुआ था, लेकिन पूत के पांव पालने में ही नजर आने लगते हैं.





Apr 10, 2011

जंतर-मंतर पर धरना है


मृत्युंजय  


भ्रष्टाचारी कांग्रेस की लीला की बलिहारी

लोकपाल, दिक्पालों के बस, जनता है बेचारी

नेता-अफसर सब लीलाधर, सत्ता मद में चूर

मिस्टर राहुल कुछ फरमाओ बोलो तनिक हुजूर



अन्ना बैठा है अनशन पर चश्मा हिन्दुस्तानी

संग साथ हैं जन गण मन, सो बेकल हो गयी रानी

कांग्रेस की बिल्ली को है याद आ रही नानी

एक आँख से दुनिया देखे साधो यह बौरानी



भाजपाईयों की नौटंकी, दसटंकी है चालू

कहाँ नहीं है भ्रष्टाचारी कौन नहीं घोटालू

यह ढांके तो वह खुल जाए वह ढांके तो पोल

राजनीति की चतुर चिकटई, यह दुनिया है गोल



नक्शा झाड़ रहे मंत्रीगण स्विस बैंक के बूते

टाटा, बाटा, अम्बानी के चाटो भईया जूते

धूर-मलाई चाभो, चाभो जनता के अरमान

सौ करोड़ की करो तस्करी, ऊंची भरो उड़ान



पान चबाओ, भीतर डालो मजदूरों का रक्त

नए नए बाबाओं के तुम नए नवेले भक्त

नाजायज पैसे के मारे जब अफराए पेट

चूरन फांक दलाली का फिर नया खोल दो रेट



अन्ना बाबा याद नहीं क्या यहीं कहीं सुखराम

हर्षद मेहता, तेलगी साहब सब करते विश्राम

यहीं यहीं पर शीबू सोरेन, यहीं प्रमोद महाज़न

राजा, कलमाडी, मधु कोड़ा, रामलिंगम सत्यम



लालू की यह चारागाह, यह माटी है बोफोर्स की

शशि थरूर की, मोदी की और तिकड़म-ताले-सोर्स की

अभिनन्दन हो औ वंदन हो, आरती करो शैतान की

इस माटी का तिलक लगाओ धरती यह बलिदान की



मन मोहा खूंखार सिंह ने माँगी मांगे तीन

अन्ना बाबा समझे रहना ये हैं चतुर प्रवीन

जान न देना और समझना इनकी मेहीं चाल

जन गण के संग राग जोड़ना अठहत्तरवें साल



गांधी बाबा की समाधि पर आयोजित हो यज्ञ

समिधा नाजायज पैसा हो, होता जन सर्वज्ञ

लपटें निकलें संघर्षों की, यज्ञ धूम आन्दोलन

शुद्ध होय यह भूमि हमारी मुदित होएं जन गण मन



लोकपाल बिल से निकलेगी, होगी बहुत लड़ाई

दम लेकर औ जोड़ के कान्धा भिड़ने की रुत आई

दुश्मन है खूंखार चतुर्दिक पसरी है परछाई

आगे बढ़, तैयारी कर, है लम्बी बहुत चढ़ाई


 

जन संस्कृति मंच के सदस्य और कवि. उनसे  mrityubodh@gmail.com संपर्क किया जा  सकता है. यह कविता समकालीन जनमत से साभार प्रकाशित की जा रही है.


   
 

Apr 9, 2011

रामदेव ने कही छलने की बात, तो प्रशांत भूषण इस्तीफे को तैयार


रामदेव का गुस्सा यहीं नहीं रुका। उन्होंने मसौदा समिति के सह अध्यक्ष शांति भूषण और समिति के सदस्य प्रशांत भूषण पर भी निशाना  साधते हुए कहा कि मुझे समिति गठन में वंशवाद  की बू आ रही है..

जंतर - मंतर डायरी - 6


भ्रष्टाचार  खत्म हो, इसके लिए सरकार से लोकपाल विधेयक की मसौदा समिति बनवाने में सफल रहे अन्ना हजारे 98 घंटे के अनशन के बाद देश  में हीरो के तौर पर उभरे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ इसी जागरूकता का असर है कि कल शाम पांच बजे  से आयोजित आंदोलन के समाहार के लिए दिल्ली के इंडिया गेट पर आयोजित सभा में जब चर्चित टीवी पत्रकार बरखा दत्त पहुंची, तो लोगों ने उन्हें स्टूडियो समेत खदेड़ दिया। गौरतलब है कि टूजी स्पैक्ट्रम घोटाले मामले में बरखा दत्त पर मीडिया दलाल नीरा राडिया के साथ मिलकर भ्रष्टाचार  करने के आरोप हैं।



लेकिन इसी के साथ खबर यह भी है कि भ्रष्टाचार के विरोध में शुरू हुई पहल को अभी बढ़ाये 12 घंटे भी नहीं बीते थे कि अन्ना के सहयोगियों में मनमुटाव और आरोपों का सिलसिला शुरू हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की सर्वाधिक मुखर आवाज और अन्ना हजारे आंदोलन के मुख्य सहयोगी योगगुरु रामदेव ने हरिद्वार के पतंजलि पीठ में प्रेस वार्ता कर कहा कि, ‘मेरे साथ हजारे ने छल किया है। जो अन्ना हजारे सिर्फ महाराष्ट्र में जाने जाते थे, सालभर पहले पतंजलि में लाकर उनका परिचय मैंने उत्तर भारत की जनता से कराया और उसी समय बात हुई थी कि हमलोग भ्रष्टाचार के खिलाफ मिलकर लड़ेंगे।’

रामदेव के लगाये इन आरोपों से एक बात तो जाहिर है कि देश में भ्रष्टाचार मुखालफत के एकमात्र नुमाइंदा बनकर घूम रहे बाबा रामदेव को अन्ना हजारे ने बड़ा झटका दिया है। जाहिर तौर पर अन्ना हजारे की जो छवि मीडिया ने जनता के बीच परोसी है उसके बाद रामदेव के लिए दुबारा अपना वह जलवा पाना, मुश्किल होगा। अन्ना के उसी प्रताप का नतीजा है कि  निजी मैनेजमेंट  कॉलेज आईआईपीएम  के प्रमुख अरिंदम चौधरी ने उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए   एक करोड़ रूपये देने
का ऐलान किया है.  

रामदेव अन्ना के बारे में कहते भी हैं ‘चार दिन चला यह आंदोलन पूर्व नियोजित और योजनाबद्ध है, जिसकी कई संदेहास्पद परतें हैं।’ अब रामदेव उन परतों को खोलने में भले हिचकें, लेकिन अन्ना के बहाने कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से रामदेव से भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति के शिखर पुरुष का तमगा छीन लिया है। कल तक जो लोग भ्रष्टाचार विरोध के तौर पर रामदेव को जानते थे,उन्हें अब अन्ना नजर आयेंगे। रामदेव का रिस्क कांग्रेस इसलिए भी नहीं लेना चाहती थी कि रामदेव राजनीतिज्ञ बन जायें, तब भी भाजपा के साथ ही उनका मेल बनेगा।

इसी वर्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव ने रैली कर अपनी मंशा की नुमाईश भी कर दी थी। 'स्वाभिमान मंच' के आयोजन में हुई रैली में कांग्रेस के कुछ नेताओं के नाम भी चर्चा में आये थे जिनकी काली कमाई स्विस बैंक में जमा है। वैसे तो रामदेव और कांग्रेस के बीच कई टकराहटें हुईं, मगर इस रैली के बाद रामदेव की ओर से कांग्रेस ने खुली चुनौती मानी। इधर, भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रशांत भूषण, रामदेव, अग्निवेश, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल समेत कुछ और लोगों के नेतृत्व में  बैठकों और रैलियों का सिलसिला जारी रहा। जाहिर तौर पर 5अप्रैल से अन्ना हजारे का धरना उन्हीं तैयारियों का परिणाम था, जिसके बाद देश सूरत बदलने की उम्मीद कर रहा है।

और यहां हालत यह है कि 12 घंटे भी नहीं बीतते हैं, उम्मीद का उभार आरोपों और छले जाने के रूप में हो रहा है। संयोग से यह संदेह जनता को पहले से था, मगर बाबा इस पर तब मुंह तब खोल रहे हैं, जब मसौदा समिति को तय करने को लेकर अन्ना ने उनसे कोई राय नहीं ली। जो मीडिया जनांदोलनों को घोड़े की पाद न समझे, वह मोमबत्ती उपलब्ध कराने से लेकर टेंट के जुगाड़ तक में लगी रही. आखिर कुछ तो वजह रही होगी। अगर यह कहा जाये कि पिछले छह महीने से एक के बाद एक घोटालों की जो परतें खुल रही थीं और जनता का गुस्सा बढ़ रहा था,कांग्रेस ने क्या उसे लपेटकर लोकपाल बिल मसौदा के बहाने कोने में नहीं रख दिया है।

कांग्रेस बखूबी जानती थी कि बढ़ते भ्रष्टाचार की राजनीतिक अभिव्यक्ति देर-सबेर होगी, तो क्यों नहीं समय रहते कुछ आसान रास्ता निकल जाये। कारण कि राजनीतिक अभिव्यक्ति मसौदे की मांग पर नहीं थमती, जहां सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने अपने को ठहरा लिया है। यह अन्ना के साथ मीडिया की सरकारी तैयारी का ही नतीजा था कि अन्ना के दिल्ली में अनशन की घोषणा के बाद से ही लगातार मीडिया अनशन को कवरेज दे रहा था। अन्यथा उसी जंतर-मंतर पर दो-दो लाख की रैलियां होती हैं,मगर उसका लाइव प्रसारण तो दूर, विज्ञापनों के बीच छिपी खबर को देखने के लिए कई बार पन्ने पलटने पड़ते हैं।


इसका दूसरा उदाहरण पुलिसिया रवैये का देखकर समझा जा सकता है। डंडे, बूट और बंदूक के लिए प्रसिद्ध पुलिस ने अन्ना अनशन को देखने आ रही भीड़ में से किसी को गाली भी बकी हो, डंडा लहराया हो या फिर कनॉट प्लेस जाम हो जायेगा, इस डर से रास्ता रोका हो, अब तक ऐसी कोई खबर नहीं है। अगर हमलोग भूलें न हों तो करीब तीन साल पहले चर्चित समाजकर्मी और गांधीवादी मेधा पाटकर योजना आयोग के पास धरना दे रही थीं।

उनके साथ भी बड़े बुद्धिजीवी (उनमें से बहुतेरे जो अन्ना के साथ दिख रहे थे), मध्यवर्ग के युवक-युवतियां, कलाकार, निर्देशक आदि भी समर्थन में धरने पर बैठे थे। मगर योजना आयोग में तैनात सुरक्षा बलों ने उनके साथ जो बदसलूकी की थी, उसे वह लोग तो नहीं भूले होंगे जिन्होंने अखबारों में छपी तस्वीरें देखी होंगी। लेकिन अन्ना के यहां तो बच्चों, विक्लांगों, अंधों और सेरिब्रल पैल्सी रोग से पीड़ित बच्चों से लेकर दुधमुहे बच्चों तक को लेकर लोग ऐसे आ रहे थे, मानो इंडिया गेट के नूर में झांयी आ गयी हो।

रामदेव अपना यह गुस्सा अमेरिका की एक दवा कंपनी नेचुरामिक के खरीद के अवसर पर जाहिर कर रहे थे। रामदेव के पतंजलि ट्रस्ट ने इस अमेरिकी कंपनी को खरीद लिया है और वह अब हर्बोवेद के नाम से जानी जायेगी। बहरहाल, रामदेव का गुस्सा यहीं नहीं रुका। उन्होंने मसौदा समिति के सह अध्यक्ष शांति भूषण और समिति के सदस्य प्रशांत भूषण पर भी निशाना साधते हुए कहा कि मुझे समिति गठन में वंशवाद की बू आ रही है। दरअसल, शांति भूषण और प्रशांत भूषण में बाप-बेटे का रिश्ता है। वहीं रामदेव ने किरण बेदी को समिति से बाहर रखने पर भी अफसोस जताया।

रामदेव के उठाये जा रहे सवालों के मद्देनजर लोकपाल बिल मसौदा समिति के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने इसे 'संयोग' तो अन्ना ने 'बेमतलब' का बताया है। वहीं वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि ‘अलबत्ता तो मैं समिति में शामिल होने को तैयार नहीं था, फिर भी अगर लोगों की तरफ से ऐसी मांग उठी तो मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं।’

ऐसे में सामाजिक संगठनों और इनसे जुड़े नेताओं को समझना होगा की अगर आपसी अंतर्विरोधों का निपटारा सरोकार को केंद्र में रखे बगैर हुआ  तो मुश्किलें गहराती जाएँगी, जिसका सीधा फायदा सरकार को होगा.  वैसे भी सरकार के पास वर्ल्ड सोशल फोरम 2004, इंडिया सोशल  फोरम   2006 और एनएपीएम का उदाहरण सामने है, जहाँ विवाद, वादों और बातों के सिवा कुछ भी अब शेष अब नहीं बचा है.



राष्ट्रभक्ति का पाकेट साइज़ संस्करण


हिमांशु कुमार

राष्ट्रभक्ति का पाकेट साइज़ सेफ संस्करण

ना जेल जाने का डर,ना घर तोड़े जाने का खतरा

ना दस साल तक अनशन करने और फिर भी ना सुने जाने का खतरा

ना माओवादी, देशद्रोही, आतंकवादियों के हमदर्द होने का इलज़ाम लगने का खतरा

ना ऐश ओ आराम को थोड़ी देर के लिए थोडा भी छोड़ने की ज़रुरत है

आपके पास एक कार होनी चहिये ताकी जैसे ही चैनल वाले बोलें

आप तुरंत इवेंट में पार्टिसिपेट करने के लिए पहुँच सकें

आप गरीब जैसे बिलकुल ना दीखते हो (वर्ना चैनेल का कमरा आप पर नहीं रुकेगा )

आप देश के असली मुद्दों को ना जानते हो नहीं तो आप पूरे जोश से यहाँ भारत माता की जय नहीं बोल पाएंगे

आप को अंग्रेज़ी आती हो

आपके मन में और जुबान पर भाजपा का विरोध ज़रा भी ना हो

एक तिरंगा झंडा हो , वर्ल्ड कप वाला चलेगा

मोमबत्ती भी साथ लेते आयें अगर लाना भूल जाएँ तो चैनल वालों से ले ले वो इंडिया गेट पर मोमबत्तियां बांटते हैं

इस से आप अपने मन पर जमे अपराध बोध से मुक्ति भी पा लेंगे और

आज़ादी की दूसरी लडाई जीतने और देशभक्त होने का फील गुड अहसास भी प्राप्त करेंगे

तुरंत संपर्क करें
जंतर मंतर (माफ़ कीजिये पता बदल गया है,नया पता शीघ्र ही चैनेल के मार्फ़त आपको बता दिया जायेगा )



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.