Mar 28, 2011

छात्रा के साथ सपा नेता ने किया बलात्कार


लड़की अभी कोमा में है और पुलिस बयान के इंतज़ार  में है. उधर अपराधी खुले घूम  रहे हैं और पीड़ित परिवार से  बयान वापस लेने का दबाव बना रहे हैं...


जनज्वार. उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष ने बीए प्रथम वर्ष की छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया है. लेकिन पुलिस ने अभीतक इस मामले में कोई कदम नहीं  उठाया है.आरोपी अप्पू मणि  त्रिपाठी  सपा विधायक ब्रह्मा शंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा  रहा  है. 

समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि  ने कथित तौर पर अगवा कर 19 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म किया है। मामले की शिकायत दर्ज करा दी गई है लेकिन अभी तक किसी को हिरासत में नहीं लिया गया है। इस मामले में पुलिस की निष्क्रियता को लेकर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा )  जिला मुख्यालय पर सोमवार को धरना प्रदर्शन करेगी ।


सपा प्रमुख मुलायम सिंह : किसके पक्ष में

आरोपी सपा जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि त्रिपाठी कसया विधानसभा क्षेत्र के विधायक ब्रह्माशंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस महकमे पर दबाव देखा जा रहा और अभी तक इस सिलसिले में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

घटना 20मार्च होली के दिन की है। बाबा राघवदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा बबली (बदला हुआ नाम) अपने रिश्तेदार के घर जा रही थी। उसी दौरान रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोका और मुंह पर कुछ लगा दिया,जिससे लड़की बेहोश हो गई। होश आने के बाद लड़की ने खुद को अस्पताल में पाया। उक्त बातें पीड़िता के मामा जेपी मिश्रा ने लड़की के हवाले से बताया।

लड़की के मामा ने बताया कि  बबली 20 मार्च से लापता थी। 21 मार्च को पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसके बाद 23 मार्च को एक शख्स का फोन आया कि अपनी लड़की को लेने के लिए देवरिया खास इलाके में कौशल्या भवन आ जाइए। वहां पहुंचने के बाद अप्पू के चाचा व कांग्रेस नेता मुकुल मणि त्रिपाठी ने लड़की के अपने घर में होने से इंकार कर दिया। बबली जिले के भटनी थाना क्षेत्र में मिश्रौली दीक्षित गांव की रहने वाली है।

उसके बाद लड़की के मामा को फोन करने वाले ने  दुबारा  बताया कि आपकी लड़की बीआरडी कॉलेज के पीछे रेलवे लाइन पर बेहोश पड़ी हुई है। फोन करने वाले के बातचीत के आधार पर बबली के मामा रेलवे लाइन के किनारे पहुँचते उससे पहले फिर एक बार फोन आया और अबकी सदर अस्पताल में लड़की के होने की बात बताई गयी. 

इस मामले में कार्रवाई के बावत पूछने पर भटनी थाना के थानाध्यक्ष  ने बताया कि अक्कू मणि और बड़े मिश्र के खिलाफ  एफआइआर  दर्ज कर ली गयी है,लड़की के ठीक होने के बाद उसका बयान दर्ज किया जाएगा और कोई कार्रवाई होगी।

ऐसे में सूबे की सरकार और खासकर महिला मुख्यमंत्री मायावती के प्रशासन पर सवाल खड़े होते हैं कि अगर लड़की बयां नहीं दे पायेगी तो क्या कार्रवाई नहीं होगी.    वहीं लड़की के परिजनों पर तमाम तरह से दबाव डाले जा रहे हैं और मामले को मोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।



 
इस सम्बंध में और जानकारी के लिए इनसे बात की जा सकती है।

जेपी मिश्रा-08423752550

भटनी थानाध्यक्ष देवेंद्र सिंह-09454401409

संघर्ष की संस्कृति के कमांडर कमला प्रसाद


कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था...


विनीत तिवारी
उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वो आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था,और साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने,काम करने के दौरान हुई खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियाँ सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था।

कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे तो वे उसके सामने ही संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि सबका पूरा विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।

मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ और हर जगह कोने-कोने में छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार कमलाजी के साथ अपने परिचय का जिक्र करते। ये देखने का तो मौका नहीं मुझे मिला लेकिन अंबुजजी, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार ये जाना कि कमलाजी ने एक संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएँ कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते थे। रिजर्वेशन तो दूर की बात, कभी-कभी सीट न मिलने पर भी घंटों खड़े रहकर संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे।

वे अपने वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाईजी को कहा करते थे और कमलाजी ने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़ाया। नामवरजी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे और कार्यक्रम व योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बँटाते थे,लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो।

उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है - ये सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आये,ये मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्रजी ने जैसे कमलाजी के काम के वजन में जितना हो सके उतना हिस्सा बँटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।

कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन,किसी हद तक पठन-पाठन भी संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा।

‘वसुधा’ में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वो ऐसे लोगों की बिरादरी में थे जिन्होंने संगठन के लिए,और नये रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।

प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ ‘वसुधा’ का संपादन - दरअसल इतना काम आदमी कर ही तब सकता है जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। ये एक बड़े विज़न वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी।

करीब एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे तभी देश भर से आये संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वाँ जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर के उनके शरीर पर असर भले दिखने लगे थे लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहाँ बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी,ढेर सारी योजनाएँ थीं। साम्प्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए,किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, ये सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।

उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा जो कमलाजी ने शुरू की थी लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएँगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें उपने साथ बनाये रखने का तरीका है और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।



(लेखक प्रगतिशील लेखक संघ के  मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव हैं,उनसे  comvineet@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)



Mar 27, 2011

उत्तराखंड में दबंगों ने की दलित की हत्या


लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो...

नरेन्द्र देव सिंह

पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट विकास खण्ड क्षेत्र में पिछले 19 मार्च को दो दबंगो ने एक दलित की पीट-पीट कर हत्या कर दी। बीच-बचाव करने आई मृतक की पत्नी को भी दबंग सवर्णों ने लात-घूसों से मारा।

मृतक लक्ष्मण राम अपने भाई का बेरीनाग में दाह संस्कार करके शुक्रवार की शाम करीब साढ़े सात बजे चैली गांव में वाहन से उतरे तो वहां पर नशे में धुत चैली गांव के ही निवासी विक्की और नरेन्द्र ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। दोनों युवकों ने लक्ष्मण राम को लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटने के बाद 500 मीटर नीचे खेतों में फेंक  दिया, जिससे लक्ष्मण राम की मौत हो गयी।

इस घटना से गांव में दहशत का माहौल बन गया है। राजस्व पुलिस ने दोनों हत्यारोपी युवकों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। जांच-पडताल करने के बाद पता चला है कि हत्या का कारण पुरानी रंजिश थी,जिस कारण दोनों  युवकों ने लक्ष्मण राम की हत्या कर दी। लेचुराल जोशी गांव में अनुसूचित जाति की संख्या कम है और सामान्य जाति की संख्या ज्यादा है।
लक्ष्मण की पत्नी हरूली  देवी : कहाँ है न्याय  

लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो। हत्यारोपी विक्की चैली गांव का उपप्रधान है। नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रामीण ने बताया कि विक्की शुरु से ही आपराधिक किस्म का व्यक्ति है। विक्की और इसके साथी मिलकर गांव में अवैध खनन भी करते हैं,इसके साथ ही यह लोग विकास के पैसों की भी बंटरबांट करते हैं। लक्ष्मण राम पूर्व में भी इन सब के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। कुछ दिन पूर्व ही लक्ष्मण राम ने ग्राम विकास अधिकार व अन्य सरकारी कर्मचारियों के सामने इन लोगों की करतूतों का खुलासा किया था।

अधिकारियों के सामने निडर होकर लक्ष्मण राम ने कहा कि यह लोग अवैध खनन करते हैं। यह बात विक्की और उसके साथियों का नागवार गुजरी,इसलिए विक्की और नरेंद्र ने शराब के नशे में धुत होकर 19 मार्च को लक्ष्मण राम को लाठी-डंडो से पीट-पीट कर मार डाला। बदमाशों ने मृतक की पत्नी हरूली देवी को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी लात-घूसों से मारा और जाति सूचक गालियां दीं। हरूली देवी ने जब मदद के लिए गांव वालों को पुकारा तो उनकी मदद को कोई नहीं आया। हरूली देवी अपनी पति के लाश के पास पूरी रात अकेली बैठे रही।

हरूली देवी कहती हैं, ‘पति को पिटते देख जब मैं बीच-बचाव के लिए गयी तो उन लोगों ने मुझे भी मारा-पीटा। उन लोगों ने मुझसे कहा ‘तुझे भी जान से मार देंगे, तु यहां से चली जा, हम किसी से भी नहीं डरते‘। मैंने गांव वालों को मदद के लिए आवाज लगाई लेकिन गांव में इन लोगों का इतना आतंक है कि डर के मारे कोई भी मदद को आगे नहीं आया। मैं शाम साढ़े सात बजे से लेकर सुबह तक अपने पति की लाश के पास बैठी लेकिन कोई नहीं आया। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

इस मामले में जिला पुलिस और जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए हैं। पहले भी इस प्रकार की घटनायें घट चुकी हैं। ऐसे में साफ है कि राज्य में होने वाले दलित उत्पीड़न के मामलों में पुलिस कैसे अपने राजनीतिक आकाओं के का मूंह ताक रही है।



लेखक युवा पत्रकार है, उनसे  narendravagish@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

 
 
 
 
 

मेरी मम्मी को न छीनो !


दो माएं और बीच में अदालत. मामला एक बेटी का. दोनों माँ  का दावा,  बेटी उनकी है. जाहिर है  होगी तो किसी एक की ही.इस जिरह में बीत गए सात साल और अंत में अदालत ने  जो फैसला दिया, उसने  एक माँ  से बेटी को अलग  कर दिया. फ़िल्मी लगने वाली इस कहानी के पीछे का सच, समाज और अदालत दोनों के लिए सवाल छोड़ जाता है....  

चैतन्य भट्ट

‘मुझे बचा लो मम्मी, मुझे अपने से दूर मत करो, मैं कहीं जाना नही चाहती, मैं आपके साथ ही रहूंगी'- जबलपुर के जिला अदालत परिसर में मासूम वंशिका की आवाज हर उस इंसान को द्रवित कर रही थी जो उस वक्त वहां मौजूद था.सात साल की वंशिका बार-बार वकीलों और पुलिस के हाथों से छूटकर उसे पालने वाली मां आशा पिल्ले की गोद में आ गिरती थी,पर देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश उसे जन्म देने वाली मां के पक्ष में था इसलिये पुलिसकर्मी और अधिवक्ता भी मजबूर थे.उन्हें आदेश मिला था कि वे वंशिका को उसको जन्म देने वाली मां के हाथों में सौप दें.


कोर्ट परिसर में बिलखती आशा पिल्लै
 पुलिस की मदद से जब वंशिका को तबस्सुम की गोद में डाला गया, तब उसे सात साल तक अपने सीने से लगाकर रखने वाली और उसका लालन पोषण करने वाली आशा पिल्ले और उसके पति रवि पिल्र्ले की आँखों से आसुंओं की अविरल धारा बह निकली. आशा पिल्ले तो अदालत परिसर में ही बेहोश हो गई.

सात साल की वंशिका की यह कहानी किसी फिल्मी कथानक से कम नहीं है.मानवीय भावनाओं से लबरेज दो माँओं के बीच फंसी वंशिका को तो इस बात का इल्म ही नहीं था कि उसे जन्म देने वाली कोई और है और उसे पालने वाली कोई और.उसने तो जबसे होश संभाला था, खुद को आशा पिल्ले की गोद में ही पाया था. वह उसकी मां थी. जो उस पर रात-दिन अपनी ममता लुटाती रहती थी.पर वक्त ने सात साल बाद ऐसा पलटा खाया कि वंशिका को अपनी उस मां के पास जाना पड़ा जो उसे जन्म देने के बाद लावारिस हालात में उत्तर प्रदेश के जालौन के एक अस्पताल में छोडकर न जाने कहां चली गई थी.

उरई की रहने वाली तबस्सुम का विवाह उस्मान मंसूरी के साथ हुआ था. विवाह के चार महीने बाद ही उस्मान मंसूरी की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. उस वक्त तबस्सुम के पेट में अपने पति की निशानी पल रही थी.चूंकि विवाह के चार महीने बाद ही उसका पति उसे इस दुनिया में अकेला छोडकर चला गया था. इसलिये उसकी मानसिक दशा गड़बड़ा गई. इस बीच तबस्सुम के  दिन पूर हो गये और उसे उरई के डॉ. गुप्ता के अस्पताल में उसके किसी परिचित ने भरती करवा दिया,जहां तबस्सुम ने एक बच्ची को जन्म दिया.


ऐसी थी वंशिका                फोटो - सतन  सिंह
 बच्ची को जन्म देने के दो-चार दिन बाद ही वह अचानक अस्पताल से न जाने कहां चली गई.एक नवजात शिशु को अस्पताल में कैसे रखा जाये, इस बात की चिन्ता डा. गुप्ता को थी. तभी उन्हें याद आया कि उनके एक परिचित मनोज गुप्ता ने उनसे कहा था कि उनके जबलपुर में रहने वाले मित्र रवि पिल्ले और उनकी पत्नी आशा पिल्ले विवाह के सत्रह साल बाद भी संतान का मुंह नहीं  देख पाये हैं. यदि उनकी निगाह में कोई बच्चा हो जिसे वे गोद ले सकें, तो उन्हें सूचना दे देना.

डॉ.गुप्ता ने इस बात की सूचना मनोज गुप्ता को दी कि एक नवजात बच्ची उनके अस्पताल में है जिसकी मां उसे छोडकर चली गई है. यदि उनके मित्र उसे गोद लेना  चाहें तो जालौन आकर ले जायें. मनोज गुप्ता ने यह खबर जब जबलपुर के यादगार चौक में रहने वाले रवि पिल्ले को दी तो वे और उनकी पत्नी आशा पिल्ले खुशी से झूम उठे.उसी रात वे दोनों जालौन के लिये रवाना हो गये और उस बच्ची को लेकर जबलपुर आ गये. उस वक्त यह बच्ची मात्र एक महीने की थी.

पिल्ले दम्पति को संतान की बेहद लालसा थी, अतः उन्होंने उस पर अपना पूरा प्यार लुटा दिया. वे उसे अपने कलेजे से लगाकर रखते. इसका नाम भी उन्होंने रखा ‘वंशिका.’आशा रात रातभर जागकर उसकी सेवा करती, रूई के फोहे  से उसे दूध पिलाती.अपनी पत्नी के चेहरे पर खुशी देखकर रवि पिल्ले को भी संतोष होता.

समय के साथ बच्ची बढ़ती गई, उसे उन्होंने स्कूल में भरती करवा दिया.वंशिका सुबह स्कूल  जाती और जब तक वापस नही लौट आती आशा दरवाजे पर बैठी उसकी राह तकती रहती.पर उसे पता नहीं था कि उसकी इस खुशी पर ग्रहण लगने वाला है.वंशिका को गोद लेने के चार साल बाद 28 जून 2008 को एक महिला पुलिसकर्मी के साथ पिल्ले दम्पति के  घर आई और उसने कहा ‘‘मेरा नाम तबस्सुम है. मैं उरई की रहने वाली हूं, आप लोग जिस बच्ची को लेकर आये हैं वह मेरी बच्ची है. मैं उसे वापस लेने आई हूं.’’

इतना सुनते ही पिल्ले दम्पति के पैरों तले की जमीन खिसक गई. उन्हें सपने में भी इस बात कर अंदाजा नही था कि चार साल बाद ऐसी कोई परिस्थिति पैदा हो जायेगी.पुलिसकर्मी ने उन्हें बताया कि तबस्सुम ने जबलपुर एसडीएम की अदालत में धारा 97 के तहत एक आवेदन लगाया है, जिसमें उसने कहा है कि पिल्ले दम्पति उसकी बच्ची को चुराकर ले आये हैं. एसडीएम ने तबस्सुम के आवदेन पर कार्यवाही करते हुये आदेश पारित किया है कि वंशिका को उसकी मां तबस्सुम की अभिरक्षा में सौप दिया जाये.

 इस आदेश के खिलाफ पिल्ले दम्पति ने जिला न्यायालय में एक अरजी लगाई. जिला न्यायालय ने एसडीएम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुये निर्देश दिये कि वंशिका को पिल्ले दम्पति की अभिरक्षा में ही रहने दिया जाये.

अंशिका को पैदा करने वाली मां तबस्सुम : जीत की ख़ुशी!  फोटो-  सतन सिंह
 मगर तबस्सुम ने हार नहीं मानी और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पिल्ले दम्पति में उसकी बेटी को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है. जबकि वह उसकी मां है और उसने वंशिका को जन्म दिया है.

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस याचिका को स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई शुरू की.तबस्सुम की ओर से उनके अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि बच्ची पर सबसे बडा और पहला हक उसे जन्म देने वाली मां का है. अब वह मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा अपनी बच्ची का भरण पोषण कर सकती है,जबकि पिल्ले दम्पति की ओर से उनके अधिवक्ता जयंत नीखरा ने तर्क देते हुये कहा कि पिल्ले दम्पति बच्ची का लालन पोषण बेहतर तरीके से कर रहे हैं.उन्होंने कहा कि तबस्सुम के पास रोजगार को कोई साधन नहीं है और वह बच्ची की देखरेख  नहीं कर पायेगी.

चूंकि मामला बेहद संवदेनशील था, इसलिए न्यायमूर्ति द्वय दीपक मिश्रा और आरके गुप्ता ने कैमरा प्रोसीडिंग का सहारा लिया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने पहले वंशिका और तबस्सुम को अपने चेम्बर में बुलाकर वंशिका से कहा, ‘ये तुम्हारी मां है तुम्हे  इसके साथ जाना होगा.’यह सुनते ही वंशिका रोने लगी.तब न्यायमूर्तियों ने आशा को अपने चेम्बर में बुलाया और वंशिका से पूछा,‘क्या तुम इसके साथ रहना चाहती हो.’यह सुनते ही वंशिका दौड़कर आशा पिल्ले की  गोद में जाकर  छिप  गई.

एक मासूम बच्ची की इच्छा जानते हुये न्यायमूर्ति गण ने अपने आदेश में कहा कि यह प्रमाणित नहीं होता कि रवि पिल्ले और आशा पिल्ले ने वंशिका को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है इसलिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का कोई आधार नहीं बनता.बालिका जन्म के बाद से पिल्ले दम्पति के पास है. उसका लालन पोषण अच्छी तरह से हो रहा है. वह स्कूल जा रही है.

पर न्यायालय केवल यह स्थापित कर रहा है कि बच्ची अवैधानिक रूप से नहीं रखी गई है, लेकिन बच्ची के पालन पोषण का अधिकार और दायित्व का प्रश्न किसी सक्षम न्यायालय में ही निर्णित होगा. उच्च न्यायालय के इस निर्णय से तबस्सुम की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकर स्वतः ही खारिज हो गई तथा वंशिका रवि पिल्ले की ही अभिरक्षा में बनी रही.


पिल्लै दंपति और अंशिका : बिछड़ने से पहले                            फोटो- सतन सिंह
 उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ तबस्सुम ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अवकाश याचिका दायर की और नवंबर 2009 में उच्चतम न्यायालय ने पिल्ले दम्पति को नोटिस जारी किये.मामले की सुनवाई 17 फरवरी को जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस अशोक गांगुली की खंडपीठ ने की.

सुनवाई के दौरान तबस्सुम ने बताया कि उसे आशंका है कि उसे उसकी बच्ची नही दी जायेगी. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने उसकी अंतरिम राहत की अर्जी स्वीकार करते हुये वंशिका को तबस्सुम की अभिरक्षा में सुपुर्द करने के आदेश जारी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. यह आदेश शाम को फैक्स के जरिये मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय पहुंचा. इसके तारतम्य में दोनों ही प़क्षों को 18 फरवरी को जिला न्यायालय में बुलाया गया,जहां वंशिका को तबस्सुम के हवाले कर दिया गया.अदालती आदेश में यह भी कहा गया  कि पुलिस तबस्सुम और वंशिका को पूरी सुरक्षा दे. जालोन एसपी को भी ये निर्देश दिये गये हैं कि वे तबस्सुम और वंशिका की पूरी हिफाजत करें.


अदालती आदेश के बाद अपनी बेटी को उरई ले जाने वाली तबस्सुम ने इस संवाददाता से कहा कि 'मुझे न्याय पर पूरा भरोसा था. अपनी कोख से जन्मी बच्ची को पाने के लिये मुझे इतनी लम्बी लडाई लड़नी पड़ी. खुदा करे ऐसा किसी और मां के साथ न हो.'

दूसरी तरफ वंशिका से बिछड़ने के बाद आशा पिल्ले कहती है,'मैंने तबस्सुम से उसकी बच्ची छीनी नहीं थी, वह उसे छोडकर चली गई थी. सात साल मैंने उसे अपने कलेजे से लगाकर रखा. मैंने उसे किन नाजों से पाला है यह मेरा दिल ही जानता है. मुझे हर पल वंशिका की याद सतायेगी. मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नही आता. मैंने भले ही उसे जन्म नहीं दिया, पर मैं भी एक औरत  हूं और वंशिका पर  मैंने अपनी पूरी ममता लुटाई है.




राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।






Mar 26, 2011

खदानों की लूट में बसपा- सपा दोनों शामिल



जनज्वार. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में फिर एक बार खदानों की खुली लूट का मामला सामने आया है.सुचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई जानकारी में उजागर हुआ है कि ज्यादातर  खनन  करने  वालों  में वे जनप्रतिनिधि ही शामिल हैं जिनके कंधे पर उन खदानों को बचाने की जिम्म्मेदारी थी. 

खनन कर्ताओं की सूची जारी करते हुए जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने बताया कि सूचना अधिकार कानून के तहत जिले के खान अधिकारी से प्राप्त वैध खनन कर्ताओं की सूची के अनुसार जनपद में गिट्टी बोल्डर के मात्र 155,सैण्ड़ स्टोन के मात्र 107, लाल मोरम के मात्र 4 और बालू मोरम के मात्र 25खनन कर्ता  ही वैध पट्टाधारक है। लेकिन इस जिले में हजारों की संख्या में अवैध खनन हो रहा है।

उदाहरण देते हुए उन्होनें बताया कि राकेश गुप्ता का सलखन गांव में क्रशर चल रहा है और पटवध गांव में कैमूर सेंचुरी एरिया में मुरैया पहाड़ी में पत्थर का खनन कार्य हो रहा है। जबकि इन दोनों ही कार्यो की उन्हे अनुमति प्राप्त नहीं है। पर्यावरण विभाग ने उन्हे क्रशर चलाने की अनुमति नहीं दी है और खनन विभाग ने उन्हे खनन हेतु पट्टा नही दिया बावजूद इसके उनका यह गैरकानूनी कार्य खुलेआम चल रहा है।

इसी प्रकार दुद्धी तहसील में कनहर नदी पर बालू खनन हेतु मात्र एक जगह कोरगी में ही खनन की लीज मिली हुई है पर वहां पोलवां और पिपरडीह समेत तमाम गांवों में खुलेआम कनहर नदी से बालू का खनन कराया जाता है। राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट पर रोक के सम्बंध में जन संघर्ष मोर्चा द्वारा बार-बार उत्तर प्रदेश शासन व जिला प्रशासन को पत्रक देने और दो माह से जिला मुख्यालय पर जारी अनिश्चितकालीन धरने अनशन के बाद भी प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की।

दरअसल राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट में सत्ताधारी दल के बड़े पदाधिकारी और नेता सीधे तौर पर शामिल है इसलिए स्थानीय प्रशासन भी इन पर हाथ डालने से कतरा रहा है। खान विभाग से प्राप्त सूची को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस लूट की मलाई खाने में सभी शामिल रहे है चाहे वह वर्तमान विधायकगण हो या सत्ता के विरूद्ध लाठी खाने की बात करने वाले प्रमुख विपक्षी दल के नेतागण।

सूची पर गौर करें तो आप देखेगें कि बसपा के राबर्ट्सगंज विधानसभा से विधायक सत्यनारायण जैसल ने अपनी पत्नी मीरा जैसल के नाम वर्ष 2010 में  2020 तक के लिए सैण्ड स्टोन की 4 एकड़ में लीज करायी है. बसपा के ही राजगढ़ विधानसभा से विधायक अनिल मौर्या ने बिल्ली मारकुण्ड़ी में वर्ष 2003 में दस साल के लिए लीज करायी है। इन्ही अनिल मौर्या द्वारा मिर्जापुर के अहरौरा के सोनपुर गांव में लगाये गये क्रशर प्लान्ट में तो बस्ती के निकट ही ब्लास्टिंग करायी जा रही है।

उससे उड़ रही घूल ने ग्रामवासियों को टी0बी0 का बड़े पैमाने पर शिकार बना लिया है, हमारी टीम ने वहां जाकर देखा कि दलित जाति के एक ही परिवार के दो भाई छैवर व जय सिंह की टी0बी0से मौत हो गयी और बालकिशुन, राधेश्याम, मल्लां, रामधनी, शारदा, जसवन्त, बल्ली जैसे दर्जनों दलित परिवार टी0बी0 के मरीज बन जिन्दगी और मौत से जूझ रहे है, जबकि इस क्रशर प्लान्ट का नाम भी वैध क्रशरों में नहीं है।

बसपा के पूर्व सांसद रहे नरेन्द्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी मालती देवी के नाम पटवध गांव में 2003 में दस साल की पत्थर खनन की लीज करायी हुई है। बसपा के जिला महासचिव दाराशिकोह की तो दो खनन लीज है और कुलडोमरी क्षेत्र से जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके मनोज पाण्डेय, सुभाष पाल, सड़क निर्माण क्षेत्र में पूरे जनपद में एकाधिकार कायम कर रहे उमाशंकर सिंह की दो लीजे है तो लखनऊ के गोमती नगर की आई0वी0आर0सी0एल0 इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड प्रोजेक्ट लिमिटेड ने बालू खनन के सात पट्टे हासिल किए है।

इस पट्टों के बारे में लोगों का कहना है कि यह सीधे बसपा के नेताओं द्वारा संचालित किया जा रहा है। राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट में बसपा के साथ-साथ उसकी विपक्ष बनने का दावा करने वाली सपा के बडे़ नेतागण भी बराबर के साझेदार है। मुलायम सरकार के रहते इटावा निवासी सपा के नेता धर्मवीर सिंह यादव ने राबर्ट्सगंज के बिल्ली मारकुड़ी में 2007 जनवरी में दस साल के लिए पत्थर खनन की लीज प्राप्त कर ली। सपा के जिला महासचिव रमेश वैश्य की तीन लीज है तो बसपा छोड़ सपा में शामिल हुए रमेश दूबे भी खनन पट्टे के मालिक है।

इस जनपद में ऐसा लगता है कि नेताओं को राजनीति के तोहफे के रूप में इस क्षेत्र को कानूनी और गैर कानूनी दोनों तरीके से चैतरफा लूटने की अनुमति मिली हुई है। यहां की सोन नदी को बंधक बना लिया गया है और सर्वोच्च  न्यायालय के आदेशों के बाद भी नदी की धार को बांधकर बालू का खनन किया जा रहा है। सेंचुरी  एरिया और वाइल्ड जोन में जहां ताली बजाना भी मना है वहां ब्लास्टिंग की जा रही है।

इसके खिलाफ जन संघर्ष मोर्चा द्वारा विगत 20जनवरी से जिला मुख्यालय पर धरना दिया जा रहा है परन्तु आजतक प्रशासन ने यहां की जनता के जीवन से जुड़े इन महत्वपूर्ण सवालों को हल नही किया। प्रशासन की लोकतांत्रिक आंदोलनों की अवहेलना का यह रूख यहां बडे़ आक्रोश को जन्म दे रहा है। ग्रामीणों ने फैसला लिया है कि यदि प्रशासन राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट को नही रोकता तो इसकी रक्षा के लिए ग्रामीण खुद मार्च करेगें और अवैध खनन बंद करायेगें।



 

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का निधन



प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव रहे  कमला प्रसाद ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं।

उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना।

इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमलाप्रसादजी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प. बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुनः सक्रिय किया।

उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएँ भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। ‘वसुधा’ के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक सम्पादन की भी एक मिसाल बनाया।

कमलाप्रसादजी रीवा विश्वविद्यालय  में हिन्दी के विभागाध्यक्षरहे,मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिन्दी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही।

उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को,बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुँचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है।

कमलाप्रसादजी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढाँचा देश में खड़ा किया,वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएगा। और प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमलाप्रसादजी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करती है।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्ताव

Mar 25, 2011

नहीं सुना राजगुरु और सुखदेव का नाम

संजय स्वदेश

भगत सिंह का बलिदान दिवस 23 मार्च अब   बीत चुका   है। हर साल की तरह इस बार भी एकाद संगठन के प्रेस नोट से अखबार के किसी कोने में भगत सिंह के  श्रद्धांजलि की खबर भी छप चुकी  होगी.शहर में कही धूल खाती भगत सिंह की मूर्ति पर माल्यपर्ण भी हो चुका होगा। कहीं संगोष्ठी हुई  होगी तो कहीं भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता बता कर उनसे प्रेरणा लेने की बात कही गयी होगी. फिर सब कुछ पहले जैसे समान्य हो जाएगा और अगले वर्ष फिर बलिदास दिवस पर यही सिलसिला दोहराया जाएगा।

मगर भगत सिंह के विचारों से किसी का कोई लेना देना नहीं होगा. यदि लेना-देना होता तो आज युवा दिलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ धधकने वाली ज्वाला केवल धधकती हुई घुटती नहीं। यह ज्वाला बाहर आती। सड़कों पर आती। सरकार की चूले हिला देती। फिर दिखती कोई मिश्र की तरह क्रांति। भ्रष्टाचारी सत्ता के गलियारे से भाग जाते। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। युवाओं का मन किसी न किसी रूप में पूरी तरह से गतिरोध की स्थिति में जकड़ चुका है।
बाएं से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव : मुल्क के लिए कुर्बानी  

वह भगत सिंह को क्यों याद करें। उस क्या लेना-देना क्रांति से। आजाद भारत में क्रांति की बात करने वाले पागल करार दिये गये हैं। छोटे-मोटे अनेक उदहारण है। एक-दो उदाहरण को छोड़ दे तो अधिकतर कहां खो गये, किसी को पता नहीं।

गुलाम भारत में भगत सिंह ने कहा था-जब गतिरोधी की स्थितियां लोगों को अपने शिकंजे  में जकड़ लेती हैं तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरुरत होती है। अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण  छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाए, ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो

शहीद भगत सिंह के नाम भर से केवल कुछ युवा मन ही रोमांचित होते हैं। करीब तीन साल पहले नागपुर में भगत सिंह के शहीद दिवस पर वहां के युवाओं से बातचीत कर स्टोरी की। केवल इतना ही पूछा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जानते हो, ये कौन थे। अधिकर युवाओं का जवाब था - भगत सिंह का नाम सुना है। उनके बाकी दो साथियों के नाम पता नहीं था। वह भी भगत सिंह को शहीद के रूप में इसलिए जानते थे,क्योंकि उन्होंने भगत सिंह पर अधारित फिल्में देखी थी या उस पर चर्चा की थी।

देश के अन्य शहरों में भी यदि ऐसी स्टोरी करा ली जाए तो भी शत प्रतिशत यही जवाब मिलेंगे। लिहाजा सवाल है कि आजाद भारत में इंसानियत की रूह में हरकत पैदा करने की जहमत कौन उठाये। वह जमाना कुछ और था जो भगत सिंह जैसे ने देश के बारे में सोचा। आज भी हर कोई चाहता है कि समाज में एक और भगत सिंह आए। लेकिन वह पड़ोसी के कोख से पैदा हो। जिससे बलिदान वह दे और राज भोगे कोई और।

भगत सिंह ने अपने समय के लिए कहा था कि गतिरोधी की स्थितियां लोगों को अपने शिकंजा में कसे हुए है। लेकिन आज गतिरोध की स्थितियां वैसी है। बस अंतर इतना भर है कि स्थितियों का रूप बदला हुआ है। मुर्दे इंसानों की भरमार आज भी है और क्रांतिकारी स्पिरिट की बात करने वाले हम जैसे पालग कहलाते हैं।
 
 
दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े संजय स्वदेश देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोटर्ल से लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं.उनसे sanjayinmedia@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



 

लूट के खिलाफ धरना

आदिवासी का दर्जा पायी जातियों के लिए पंचायत चुनाव में सीटें आरक्षित न करने के कारण कई गांव में पंचायतों का गठन नहीं हो पाया,जिससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया है...


राजेश सचान 

जन संघर्ष मोर्चा की तरफ से 20जनवरी से सोनभद्र जिला कचहरी में राष्ट्रीय सम्पत्ति की लूट के खिलाफ पर्यावरण और आम आदमी की जीवन रक्षा के लिए अनिश्चितकालीन धरना दिया जा रहा है।

इस इलाके की हालत यह है कि जिला प्रशासन के हेडक्वार्टर से चंद किलोमीटर ही दूर सोन नदी के बीच में ढेर सारे पुल बनाए गए है। प्रशासन यह भी नहीं बताता कि किस अधिकार के तहत पुल बने है और कौन इनको संचालित कर रहा है। पर्यावरण संकट के साथ किसानों की सिचांई के लिए बनी सोन लिफ्ट परियोजना पर भी संकट आ गया है, इसके पम्प में पानी की कमी से सिल्ट जमा हो रहा है परिणामतः किसानी बरबाद हो रही है।

इसी तरह वन क्षेत्र में जो कानून बने है उनकी अवहेलना करके क्रशर चल रहे है। सेचुंरी एरिया व वाइल्ड जोन में जहां ट्रांजिस्टर भी बजाना मना है, वहां खुलेआम ब्लास्टिंग करायी जा रही है। यहां की पहाडियों को खत्म कर लखनऊ और अन्य जगहों का सुदंरीकरण किया जा रहा है। पानी का कितना गहरा संकट है अभी से लोग इसे महसूस कर रहे है। पानी के इस संकट के चलते रिहन्द बांध का प्रदूषित पानी पीने को लोग मजबूर होते है।

इस प्रदूषित पानी को पीने से पहले भी कमरी ड़ाड, लभरी, गाढ़ा जैसी जगहों पर लोग मर चुके है और अभी भी बेलहत्थी गांव के रजनी टोला में पंद्रह बच्चे मर चुके है। बावजूद इसके जल संकट के हल की और न ही प्रदूषित पानी से लोगों को बचाने की कोई व्यवस्था है। उलटा जेपी समूह पानी के संकट को और बढ़ाने में लगा हुआ है इस समूह द्वारा बिजली बनाने के लिए जमीन से जल को निकाला जा रहा है।

अनपरा,ओबरा तापीय परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर सरकारी सम्पत्ति की लूट हो रही है। इस लूट के कारण यह पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है। यहां 20 -25 वर्षो से एक ही स्थान पर नियमित रूप से मजदूर काम करते है,इन मजदूरों का प्रबंधन इन परियोजनाओं का प्रबंधतंत्र ही करता है लेकिन मात्र कमीशनखोरी लिए इन परियोजनाओं में ठेकादारों के जरिए मजदूरों से काम करवाया जा रहा है। स्थिति इतनी बुरी है कि जिलाधिकारी के निर्देशन में हुए समझौतों का भी अनुपालन औद्योगिक इकाईयां नही करती है।

 खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन  किया जा रहा है। वनाधिकार कानून को जनपद में विफल कर दिया गया है। आदिवासियों तक के दावों को उपजिलाधिकारी स्तर पर खारिज कर दिया गया है और जिन्हें  दिया भी गया है उन्हे चार बीधा की काबिज जमीन पर दस बिस्वा का पट्टा थमा दिया गया है,कोलों को आदिवासी का दर्जा ही नहीं मिला परिणामस्वरूप वह आदिवासी होने के बावजूद इस कानून के लाभ से वंचित हो गए है, रिहन्द विस्थापितों और अन्य वनाश्रित जातियों के दावों को तो रद्दी की टोकरी के ही हवाले कर दिया गया है।

 जनपद में आदिवासी का दर्जा पायी जातियों के लिए पंचायत चुनाव में सीटें आरक्षित न करने के कारण कई गांव में पंचायतों का गठन नहीं हो पाया, जिससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया है। जिला प्रशासन ने कई गांवों में प्रशासनिक समिति के गठन की अवैधानिक कार्यवाही करते हुए चुने हुए प्रधानों के अधिकार तक छीन लिए है।

में यहां चैतरफा लूट हुई है, इस बात को विभिन्न जांच टीमों तक ने स्वीकार किया है। इस योजना में करोड़ों रूपया मजदूरों की मजदूरी बकाया है। जनपद का आदिवासी भुखमरी की स्थिति में जी रहा है और गेठी कंदा जैसे जहरीली जड़ को खाने को मजबूर है। किसानों के सिचांई हेतु बनी परियोजनाएं लम्बित पड़ी है और जो चल भी रही है उनकी दशा दयनीय है। ऐसी स्थिति में जनपद को पर्यावरणीय क्षति और प्राकृतिक व सरकारी सम्पदा की हो रही लूट से बचाने और जनपद के किसानों, मजदूरों व आम आदमी की जिन्दगी से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर यह अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है।

इस धरने का समर्थन समाजवादी जनता पार्टी,सोशलिस्ट पार्टी (लोहियावादी)जैसे तमाम दलों ने किया,अधिवक्ताओं ने भी बडे पैमाने पर इस आंदोलन का समर्थन किया है। इस धरने में औद्योगिक इकाईयों में काम करने वाले मजदूर,किसान और आदिवासी पहली बार एक मंच पर आकर अपनी लड़ाई को लड़ रहे है।

धरने के इतने दिन बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन का रवैया गैरजबाबदेह और संवेदनहीन बना हुआ है। पूरा प्रशासन लोकतांत्रिक आंदोलन को विफल करने में लगा है। बहरहाल आंदोलन जारी है प्रशासन की अवहेलना के खिलाफ पूरे जिलें में पुतले जलाए जा रहे है। आने वाले समय में क्रमिक अनशन, आमरण अनशन और जेल भरों की तैयारी की जा रही है।