Mar 27, 2011

उत्तराखंड में दबंगों ने की दलित की हत्या


लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो...

नरेन्द्र देव सिंह

पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट विकास खण्ड क्षेत्र में पिछले 19 मार्च को दो दबंगो ने एक दलित की पीट-पीट कर हत्या कर दी। बीच-बचाव करने आई मृतक की पत्नी को भी दबंग सवर्णों ने लात-घूसों से मारा।

मृतक लक्ष्मण राम अपने भाई का बेरीनाग में दाह संस्कार करके शुक्रवार की शाम करीब साढ़े सात बजे चैली गांव में वाहन से उतरे तो वहां पर नशे में धुत चैली गांव के ही निवासी विक्की और नरेन्द्र ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। दोनों युवकों ने लक्ष्मण राम को लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटने के बाद 500 मीटर नीचे खेतों में फेंक  दिया, जिससे लक्ष्मण राम की मौत हो गयी।

इस घटना से गांव में दहशत का माहौल बन गया है। राजस्व पुलिस ने दोनों हत्यारोपी युवकों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। जांच-पडताल करने के बाद पता चला है कि हत्या का कारण पुरानी रंजिश थी,जिस कारण दोनों  युवकों ने लक्ष्मण राम की हत्या कर दी। लेचुराल जोशी गांव में अनुसूचित जाति की संख्या कम है और सामान्य जाति की संख्या ज्यादा है।
लक्ष्मण की पत्नी हरूली  देवी : कहाँ है न्याय  

लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो। हत्यारोपी विक्की चैली गांव का उपप्रधान है। नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रामीण ने बताया कि विक्की शुरु से ही आपराधिक किस्म का व्यक्ति है। विक्की और इसके साथी मिलकर गांव में अवैध खनन भी करते हैं,इसके साथ ही यह लोग विकास के पैसों की भी बंटरबांट करते हैं। लक्ष्मण राम पूर्व में भी इन सब के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। कुछ दिन पूर्व ही लक्ष्मण राम ने ग्राम विकास अधिकार व अन्य सरकारी कर्मचारियों के सामने इन लोगों की करतूतों का खुलासा किया था।

अधिकारियों के सामने निडर होकर लक्ष्मण राम ने कहा कि यह लोग अवैध खनन करते हैं। यह बात विक्की और उसके साथियों का नागवार गुजरी,इसलिए विक्की और नरेंद्र ने शराब के नशे में धुत होकर 19 मार्च को लक्ष्मण राम को लाठी-डंडो से पीट-पीट कर मार डाला। बदमाशों ने मृतक की पत्नी हरूली देवी को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी लात-घूसों से मारा और जाति सूचक गालियां दीं। हरूली देवी ने जब मदद के लिए गांव वालों को पुकारा तो उनकी मदद को कोई नहीं आया। हरूली देवी अपनी पति के लाश के पास पूरी रात अकेली बैठे रही।

हरूली देवी कहती हैं, ‘पति को पिटते देख जब मैं बीच-बचाव के लिए गयी तो उन लोगों ने मुझे भी मारा-पीटा। उन लोगों ने मुझसे कहा ‘तुझे भी जान से मार देंगे, तु यहां से चली जा, हम किसी से भी नहीं डरते‘। मैंने गांव वालों को मदद के लिए आवाज लगाई लेकिन गांव में इन लोगों का इतना आतंक है कि डर के मारे कोई भी मदद को आगे नहीं आया। मैं शाम साढ़े सात बजे से लेकर सुबह तक अपने पति की लाश के पास बैठी लेकिन कोई नहीं आया। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

इस मामले में जिला पुलिस और जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए हैं। पहले भी इस प्रकार की घटनायें घट चुकी हैं। ऐसे में साफ है कि राज्य में होने वाले दलित उत्पीड़न के मामलों में पुलिस कैसे अपने राजनीतिक आकाओं के का मूंह ताक रही है।



लेखक युवा पत्रकार है, उनसे  narendravagish@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

 
 
 
 
 

मेरी मम्मी को न छीनो !


दो माएं और बीच में अदालत. मामला एक बेटी का. दोनों माँ  का दावा,  बेटी उनकी है. जाहिर है  होगी तो किसी एक की ही.इस जिरह में बीत गए सात साल और अंत में अदालत ने  जो फैसला दिया, उसने  एक माँ  से बेटी को अलग  कर दिया. फ़िल्मी लगने वाली इस कहानी के पीछे का सच, समाज और अदालत दोनों के लिए सवाल छोड़ जाता है....  

चैतन्य भट्ट

‘मुझे बचा लो मम्मी, मुझे अपने से दूर मत करो, मैं कहीं जाना नही चाहती, मैं आपके साथ ही रहूंगी'- जबलपुर के जिला अदालत परिसर में मासूम वंशिका की आवाज हर उस इंसान को द्रवित कर रही थी जो उस वक्त वहां मौजूद था.सात साल की वंशिका बार-बार वकीलों और पुलिस के हाथों से छूटकर उसे पालने वाली मां आशा पिल्ले की गोद में आ गिरती थी,पर देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश उसे जन्म देने वाली मां के पक्ष में था इसलिये पुलिसकर्मी और अधिवक्ता भी मजबूर थे.उन्हें आदेश मिला था कि वे वंशिका को उसको जन्म देने वाली मां के हाथों में सौप दें.


कोर्ट परिसर में बिलखती आशा पिल्लै
 पुलिस की मदद से जब वंशिका को तबस्सुम की गोद में डाला गया, तब उसे सात साल तक अपने सीने से लगाकर रखने वाली और उसका लालन पोषण करने वाली आशा पिल्ले और उसके पति रवि पिल्र्ले की आँखों से आसुंओं की अविरल धारा बह निकली. आशा पिल्ले तो अदालत परिसर में ही बेहोश हो गई.

सात साल की वंशिका की यह कहानी किसी फिल्मी कथानक से कम नहीं है.मानवीय भावनाओं से लबरेज दो माँओं के बीच फंसी वंशिका को तो इस बात का इल्म ही नहीं था कि उसे जन्म देने वाली कोई और है और उसे पालने वाली कोई और.उसने तो जबसे होश संभाला था, खुद को आशा पिल्ले की गोद में ही पाया था. वह उसकी मां थी. जो उस पर रात-दिन अपनी ममता लुटाती रहती थी.पर वक्त ने सात साल बाद ऐसा पलटा खाया कि वंशिका को अपनी उस मां के पास जाना पड़ा जो उसे जन्म देने के बाद लावारिस हालात में उत्तर प्रदेश के जालौन के एक अस्पताल में छोडकर न जाने कहां चली गई थी.

उरई की रहने वाली तबस्सुम का विवाह उस्मान मंसूरी के साथ हुआ था. विवाह के चार महीने बाद ही उस्मान मंसूरी की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. उस वक्त तबस्सुम के पेट में अपने पति की निशानी पल रही थी.चूंकि विवाह के चार महीने बाद ही उसका पति उसे इस दुनिया में अकेला छोडकर चला गया था. इसलिये उसकी मानसिक दशा गड़बड़ा गई. इस बीच तबस्सुम के  दिन पूर हो गये और उसे उरई के डॉ. गुप्ता के अस्पताल में उसके किसी परिचित ने भरती करवा दिया,जहां तबस्सुम ने एक बच्ची को जन्म दिया.


ऐसी थी वंशिका                फोटो - सतन  सिंह
 बच्ची को जन्म देने के दो-चार दिन बाद ही वह अचानक अस्पताल से न जाने कहां चली गई.एक नवजात शिशु को अस्पताल में कैसे रखा जाये, इस बात की चिन्ता डा. गुप्ता को थी. तभी उन्हें याद आया कि उनके एक परिचित मनोज गुप्ता ने उनसे कहा था कि उनके जबलपुर में रहने वाले मित्र रवि पिल्ले और उनकी पत्नी आशा पिल्ले विवाह के सत्रह साल बाद भी संतान का मुंह नहीं  देख पाये हैं. यदि उनकी निगाह में कोई बच्चा हो जिसे वे गोद ले सकें, तो उन्हें सूचना दे देना.

डॉ.गुप्ता ने इस बात की सूचना मनोज गुप्ता को दी कि एक नवजात बच्ची उनके अस्पताल में है जिसकी मां उसे छोडकर चली गई है. यदि उनके मित्र उसे गोद लेना  चाहें तो जालौन आकर ले जायें. मनोज गुप्ता ने यह खबर जब जबलपुर के यादगार चौक में रहने वाले रवि पिल्ले को दी तो वे और उनकी पत्नी आशा पिल्ले खुशी से झूम उठे.उसी रात वे दोनों जालौन के लिये रवाना हो गये और उस बच्ची को लेकर जबलपुर आ गये. उस वक्त यह बच्ची मात्र एक महीने की थी.

पिल्ले दम्पति को संतान की बेहद लालसा थी, अतः उन्होंने उस पर अपना पूरा प्यार लुटा दिया. वे उसे अपने कलेजे से लगाकर रखते. इसका नाम भी उन्होंने रखा ‘वंशिका.’आशा रात रातभर जागकर उसकी सेवा करती, रूई के फोहे  से उसे दूध पिलाती.अपनी पत्नी के चेहरे पर खुशी देखकर रवि पिल्ले को भी संतोष होता.

समय के साथ बच्ची बढ़ती गई, उसे उन्होंने स्कूल में भरती करवा दिया.वंशिका सुबह स्कूल  जाती और जब तक वापस नही लौट आती आशा दरवाजे पर बैठी उसकी राह तकती रहती.पर उसे पता नहीं था कि उसकी इस खुशी पर ग्रहण लगने वाला है.वंशिका को गोद लेने के चार साल बाद 28 जून 2008 को एक महिला पुलिसकर्मी के साथ पिल्ले दम्पति के  घर आई और उसने कहा ‘‘मेरा नाम तबस्सुम है. मैं उरई की रहने वाली हूं, आप लोग जिस बच्ची को लेकर आये हैं वह मेरी बच्ची है. मैं उसे वापस लेने आई हूं.’’

इतना सुनते ही पिल्ले दम्पति के पैरों तले की जमीन खिसक गई. उन्हें सपने में भी इस बात कर अंदाजा नही था कि चार साल बाद ऐसी कोई परिस्थिति पैदा हो जायेगी.पुलिसकर्मी ने उन्हें बताया कि तबस्सुम ने जबलपुर एसडीएम की अदालत में धारा 97 के तहत एक आवेदन लगाया है, जिसमें उसने कहा है कि पिल्ले दम्पति उसकी बच्ची को चुराकर ले आये हैं. एसडीएम ने तबस्सुम के आवदेन पर कार्यवाही करते हुये आदेश पारित किया है कि वंशिका को उसकी मां तबस्सुम की अभिरक्षा में सौप दिया जाये.

 इस आदेश के खिलाफ पिल्ले दम्पति ने जिला न्यायालय में एक अरजी लगाई. जिला न्यायालय ने एसडीएम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुये निर्देश दिये कि वंशिका को पिल्ले दम्पति की अभिरक्षा में ही रहने दिया जाये.

अंशिका को पैदा करने वाली मां तबस्सुम : जीत की ख़ुशी!  फोटो-  सतन सिंह
 मगर तबस्सुम ने हार नहीं मानी और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पिल्ले दम्पति में उसकी बेटी को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है. जबकि वह उसकी मां है और उसने वंशिका को जन्म दिया है.

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस याचिका को स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई शुरू की.तबस्सुम की ओर से उनके अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि बच्ची पर सबसे बडा और पहला हक उसे जन्म देने वाली मां का है. अब वह मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा अपनी बच्ची का भरण पोषण कर सकती है,जबकि पिल्ले दम्पति की ओर से उनके अधिवक्ता जयंत नीखरा ने तर्क देते हुये कहा कि पिल्ले दम्पति बच्ची का लालन पोषण बेहतर तरीके से कर रहे हैं.उन्होंने कहा कि तबस्सुम के पास रोजगार को कोई साधन नहीं है और वह बच्ची की देखरेख  नहीं कर पायेगी.

चूंकि मामला बेहद संवदेनशील था, इसलिए न्यायमूर्ति द्वय दीपक मिश्रा और आरके गुप्ता ने कैमरा प्रोसीडिंग का सहारा लिया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने पहले वंशिका और तबस्सुम को अपने चेम्बर में बुलाकर वंशिका से कहा, ‘ये तुम्हारी मां है तुम्हे  इसके साथ जाना होगा.’यह सुनते ही वंशिका रोने लगी.तब न्यायमूर्तियों ने आशा को अपने चेम्बर में बुलाया और वंशिका से पूछा,‘क्या तुम इसके साथ रहना चाहती हो.’यह सुनते ही वंशिका दौड़कर आशा पिल्ले की  गोद में जाकर  छिप  गई.

एक मासूम बच्ची की इच्छा जानते हुये न्यायमूर्ति गण ने अपने आदेश में कहा कि यह प्रमाणित नहीं होता कि रवि पिल्ले और आशा पिल्ले ने वंशिका को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है इसलिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का कोई आधार नहीं बनता.बालिका जन्म के बाद से पिल्ले दम्पति के पास है. उसका लालन पोषण अच्छी तरह से हो रहा है. वह स्कूल जा रही है.

पर न्यायालय केवल यह स्थापित कर रहा है कि बच्ची अवैधानिक रूप से नहीं रखी गई है, लेकिन बच्ची के पालन पोषण का अधिकार और दायित्व का प्रश्न किसी सक्षम न्यायालय में ही निर्णित होगा. उच्च न्यायालय के इस निर्णय से तबस्सुम की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकर स्वतः ही खारिज हो गई तथा वंशिका रवि पिल्ले की ही अभिरक्षा में बनी रही.


पिल्लै दंपति और अंशिका : बिछड़ने से पहले                            फोटो- सतन सिंह
 उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ तबस्सुम ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अवकाश याचिका दायर की और नवंबर 2009 में उच्चतम न्यायालय ने पिल्ले दम्पति को नोटिस जारी किये.मामले की सुनवाई 17 फरवरी को जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस अशोक गांगुली की खंडपीठ ने की.

सुनवाई के दौरान तबस्सुम ने बताया कि उसे आशंका है कि उसे उसकी बच्ची नही दी जायेगी. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने उसकी अंतरिम राहत की अर्जी स्वीकार करते हुये वंशिका को तबस्सुम की अभिरक्षा में सुपुर्द करने के आदेश जारी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. यह आदेश शाम को फैक्स के जरिये मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय पहुंचा. इसके तारतम्य में दोनों ही प़क्षों को 18 फरवरी को जिला न्यायालय में बुलाया गया,जहां वंशिका को तबस्सुम के हवाले कर दिया गया.अदालती आदेश में यह भी कहा गया  कि पुलिस तबस्सुम और वंशिका को पूरी सुरक्षा दे. जालोन एसपी को भी ये निर्देश दिये गये हैं कि वे तबस्सुम और वंशिका की पूरी हिफाजत करें.


अदालती आदेश के बाद अपनी बेटी को उरई ले जाने वाली तबस्सुम ने इस संवाददाता से कहा कि 'मुझे न्याय पर पूरा भरोसा था. अपनी कोख से जन्मी बच्ची को पाने के लिये मुझे इतनी लम्बी लडाई लड़नी पड़ी. खुदा करे ऐसा किसी और मां के साथ न हो.'

दूसरी तरफ वंशिका से बिछड़ने के बाद आशा पिल्ले कहती है,'मैंने तबस्सुम से उसकी बच्ची छीनी नहीं थी, वह उसे छोडकर चली गई थी. सात साल मैंने उसे अपने कलेजे से लगाकर रखा. मैंने उसे किन नाजों से पाला है यह मेरा दिल ही जानता है. मुझे हर पल वंशिका की याद सतायेगी. मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नही आता. मैंने भले ही उसे जन्म नहीं दिया, पर मैं भी एक औरत  हूं और वंशिका पर  मैंने अपनी पूरी ममता लुटाई है.




राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।






Mar 26, 2011

खदानों की लूट में बसपा- सपा दोनों शामिल



जनज्वार. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में फिर एक बार खदानों की खुली लूट का मामला सामने आया है.सुचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई जानकारी में उजागर हुआ है कि ज्यादातर  खनन  करने  वालों  में वे जनप्रतिनिधि ही शामिल हैं जिनके कंधे पर उन खदानों को बचाने की जिम्म्मेदारी थी. 

खनन कर्ताओं की सूची जारी करते हुए जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने बताया कि सूचना अधिकार कानून के तहत जिले के खान अधिकारी से प्राप्त वैध खनन कर्ताओं की सूची के अनुसार जनपद में गिट्टी बोल्डर के मात्र 155,सैण्ड़ स्टोन के मात्र 107, लाल मोरम के मात्र 4 और बालू मोरम के मात्र 25खनन कर्ता  ही वैध पट्टाधारक है। लेकिन इस जिले में हजारों की संख्या में अवैध खनन हो रहा है।

उदाहरण देते हुए उन्होनें बताया कि राकेश गुप्ता का सलखन गांव में क्रशर चल रहा है और पटवध गांव में कैमूर सेंचुरी एरिया में मुरैया पहाड़ी में पत्थर का खनन कार्य हो रहा है। जबकि इन दोनों ही कार्यो की उन्हे अनुमति प्राप्त नहीं है। पर्यावरण विभाग ने उन्हे क्रशर चलाने की अनुमति नहीं दी है और खनन विभाग ने उन्हे खनन हेतु पट्टा नही दिया बावजूद इसके उनका यह गैरकानूनी कार्य खुलेआम चल रहा है।

इसी प्रकार दुद्धी तहसील में कनहर नदी पर बालू खनन हेतु मात्र एक जगह कोरगी में ही खनन की लीज मिली हुई है पर वहां पोलवां और पिपरडीह समेत तमाम गांवों में खुलेआम कनहर नदी से बालू का खनन कराया जाता है। राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट पर रोक के सम्बंध में जन संघर्ष मोर्चा द्वारा बार-बार उत्तर प्रदेश शासन व जिला प्रशासन को पत्रक देने और दो माह से जिला मुख्यालय पर जारी अनिश्चितकालीन धरने अनशन के बाद भी प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की।

दरअसल राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट में सत्ताधारी दल के बड़े पदाधिकारी और नेता सीधे तौर पर शामिल है इसलिए स्थानीय प्रशासन भी इन पर हाथ डालने से कतरा रहा है। खान विभाग से प्राप्त सूची को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस लूट की मलाई खाने में सभी शामिल रहे है चाहे वह वर्तमान विधायकगण हो या सत्ता के विरूद्ध लाठी खाने की बात करने वाले प्रमुख विपक्षी दल के नेतागण।

सूची पर गौर करें तो आप देखेगें कि बसपा के राबर्ट्सगंज विधानसभा से विधायक सत्यनारायण जैसल ने अपनी पत्नी मीरा जैसल के नाम वर्ष 2010 में  2020 तक के लिए सैण्ड स्टोन की 4 एकड़ में लीज करायी है. बसपा के ही राजगढ़ विधानसभा से विधायक अनिल मौर्या ने बिल्ली मारकुण्ड़ी में वर्ष 2003 में दस साल के लिए लीज करायी है। इन्ही अनिल मौर्या द्वारा मिर्जापुर के अहरौरा के सोनपुर गांव में लगाये गये क्रशर प्लान्ट में तो बस्ती के निकट ही ब्लास्टिंग करायी जा रही है।

उससे उड़ रही घूल ने ग्रामवासियों को टी0बी0 का बड़े पैमाने पर शिकार बना लिया है, हमारी टीम ने वहां जाकर देखा कि दलित जाति के एक ही परिवार के दो भाई छैवर व जय सिंह की टी0बी0से मौत हो गयी और बालकिशुन, राधेश्याम, मल्लां, रामधनी, शारदा, जसवन्त, बल्ली जैसे दर्जनों दलित परिवार टी0बी0 के मरीज बन जिन्दगी और मौत से जूझ रहे है, जबकि इस क्रशर प्लान्ट का नाम भी वैध क्रशरों में नहीं है।

बसपा के पूर्व सांसद रहे नरेन्द्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी मालती देवी के नाम पटवध गांव में 2003 में दस साल की पत्थर खनन की लीज करायी हुई है। बसपा के जिला महासचिव दाराशिकोह की तो दो खनन लीज है और कुलडोमरी क्षेत्र से जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके मनोज पाण्डेय, सुभाष पाल, सड़क निर्माण क्षेत्र में पूरे जनपद में एकाधिकार कायम कर रहे उमाशंकर सिंह की दो लीजे है तो लखनऊ के गोमती नगर की आई0वी0आर0सी0एल0 इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड प्रोजेक्ट लिमिटेड ने बालू खनन के सात पट्टे हासिल किए है।

इस पट्टों के बारे में लोगों का कहना है कि यह सीधे बसपा के नेताओं द्वारा संचालित किया जा रहा है। राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट में बसपा के साथ-साथ उसकी विपक्ष बनने का दावा करने वाली सपा के बडे़ नेतागण भी बराबर के साझेदार है। मुलायम सरकार के रहते इटावा निवासी सपा के नेता धर्मवीर सिंह यादव ने राबर्ट्सगंज के बिल्ली मारकुड़ी में 2007 जनवरी में दस साल के लिए पत्थर खनन की लीज प्राप्त कर ली। सपा के जिला महासचिव रमेश वैश्य की तीन लीज है तो बसपा छोड़ सपा में शामिल हुए रमेश दूबे भी खनन पट्टे के मालिक है।

इस जनपद में ऐसा लगता है कि नेताओं को राजनीति के तोहफे के रूप में इस क्षेत्र को कानूनी और गैर कानूनी दोनों तरीके से चैतरफा लूटने की अनुमति मिली हुई है। यहां की सोन नदी को बंधक बना लिया गया है और सर्वोच्च  न्यायालय के आदेशों के बाद भी नदी की धार को बांधकर बालू का खनन किया जा रहा है। सेंचुरी  एरिया और वाइल्ड जोन में जहां ताली बजाना भी मना है वहां ब्लास्टिंग की जा रही है।

इसके खिलाफ जन संघर्ष मोर्चा द्वारा विगत 20जनवरी से जिला मुख्यालय पर धरना दिया जा रहा है परन्तु आजतक प्रशासन ने यहां की जनता के जीवन से जुड़े इन महत्वपूर्ण सवालों को हल नही किया। प्रशासन की लोकतांत्रिक आंदोलनों की अवहेलना का यह रूख यहां बडे़ आक्रोश को जन्म दे रहा है। ग्रामीणों ने फैसला लिया है कि यदि प्रशासन राष्ट्रीय सम्पत्ति की इस लूट को नही रोकता तो इसकी रक्षा के लिए ग्रामीण खुद मार्च करेगें और अवैध खनन बंद करायेगें।



 

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का निधन



प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव रहे  कमला प्रसाद ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं।

उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना।

इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमलाप्रसादजी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प. बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुनः सक्रिय किया।

उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएँ भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। ‘वसुधा’ के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक सम्पादन की भी एक मिसाल बनाया।

कमलाप्रसादजी रीवा विश्वविद्यालय  में हिन्दी के विभागाध्यक्षरहे,मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिन्दी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही।

उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को,बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुँचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है।

कमलाप्रसादजी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढाँचा देश में खड़ा किया,वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएगा। और प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमलाप्रसादजी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करती है।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्ताव

Mar 25, 2011

नहीं सुना राजगुरु और सुखदेव का नाम

संजय स्वदेश

भगत सिंह का बलिदान दिवस 23 मार्च अब   बीत चुका   है। हर साल की तरह इस बार भी एकाद संगठन के प्रेस नोट से अखबार के किसी कोने में भगत सिंह के  श्रद्धांजलि की खबर भी छप चुकी  होगी.शहर में कही धूल खाती भगत सिंह की मूर्ति पर माल्यपर्ण भी हो चुका होगा। कहीं संगोष्ठी हुई  होगी तो कहीं भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता बता कर उनसे प्रेरणा लेने की बात कही गयी होगी. फिर सब कुछ पहले जैसे समान्य हो जाएगा और अगले वर्ष फिर बलिदास दिवस पर यही सिलसिला दोहराया जाएगा।

मगर भगत सिंह के विचारों से किसी का कोई लेना देना नहीं होगा. यदि लेना-देना होता तो आज युवा दिलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ धधकने वाली ज्वाला केवल धधकती हुई घुटती नहीं। यह ज्वाला बाहर आती। सड़कों पर आती। सरकार की चूले हिला देती। फिर दिखती कोई मिश्र की तरह क्रांति। भ्रष्टाचारी सत्ता के गलियारे से भाग जाते। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। युवाओं का मन किसी न किसी रूप में पूरी तरह से गतिरोध की स्थिति में जकड़ चुका है।
बाएं से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव : मुल्क के लिए कुर्बानी  

वह भगत सिंह को क्यों याद करें। उस क्या लेना-देना क्रांति से। आजाद भारत में क्रांति की बात करने वाले पागल करार दिये गये हैं। छोटे-मोटे अनेक उदहारण है। एक-दो उदाहरण को छोड़ दे तो अधिकतर कहां खो गये, किसी को पता नहीं।

गुलाम भारत में भगत सिंह ने कहा था-जब गतिरोधी की स्थितियां लोगों को अपने शिकंजे  में जकड़ लेती हैं तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरुरत होती है। अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण  छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाए, ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो

शहीद भगत सिंह के नाम भर से केवल कुछ युवा मन ही रोमांचित होते हैं। करीब तीन साल पहले नागपुर में भगत सिंह के शहीद दिवस पर वहां के युवाओं से बातचीत कर स्टोरी की। केवल इतना ही पूछा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जानते हो, ये कौन थे। अधिकर युवाओं का जवाब था - भगत सिंह का नाम सुना है। उनके बाकी दो साथियों के नाम पता नहीं था। वह भी भगत सिंह को शहीद के रूप में इसलिए जानते थे,क्योंकि उन्होंने भगत सिंह पर अधारित फिल्में देखी थी या उस पर चर्चा की थी।

देश के अन्य शहरों में भी यदि ऐसी स्टोरी करा ली जाए तो भी शत प्रतिशत यही जवाब मिलेंगे। लिहाजा सवाल है कि आजाद भारत में इंसानियत की रूह में हरकत पैदा करने की जहमत कौन उठाये। वह जमाना कुछ और था जो भगत सिंह जैसे ने देश के बारे में सोचा। आज भी हर कोई चाहता है कि समाज में एक और भगत सिंह आए। लेकिन वह पड़ोसी के कोख से पैदा हो। जिससे बलिदान वह दे और राज भोगे कोई और।

भगत सिंह ने अपने समय के लिए कहा था कि गतिरोधी की स्थितियां लोगों को अपने शिकंजा में कसे हुए है। लेकिन आज गतिरोध की स्थितियां वैसी है। बस अंतर इतना भर है कि स्थितियों का रूप बदला हुआ है। मुर्दे इंसानों की भरमार आज भी है और क्रांतिकारी स्पिरिट की बात करने वाले हम जैसे पालग कहलाते हैं।
 
 
दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े संजय स्वदेश देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोटर्ल से लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं.उनसे sanjayinmedia@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



 

लूट के खिलाफ धरना

आदिवासी का दर्जा पायी जातियों के लिए पंचायत चुनाव में सीटें आरक्षित न करने के कारण कई गांव में पंचायतों का गठन नहीं हो पाया,जिससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया है...


राजेश सचान 

जन संघर्ष मोर्चा की तरफ से 20जनवरी से सोनभद्र जिला कचहरी में राष्ट्रीय सम्पत्ति की लूट के खिलाफ पर्यावरण और आम आदमी की जीवन रक्षा के लिए अनिश्चितकालीन धरना दिया जा रहा है।

इस इलाके की हालत यह है कि जिला प्रशासन के हेडक्वार्टर से चंद किलोमीटर ही दूर सोन नदी के बीच में ढेर सारे पुल बनाए गए है। प्रशासन यह भी नहीं बताता कि किस अधिकार के तहत पुल बने है और कौन इनको संचालित कर रहा है। पर्यावरण संकट के साथ किसानों की सिचांई के लिए बनी सोन लिफ्ट परियोजना पर भी संकट आ गया है, इसके पम्प में पानी की कमी से सिल्ट जमा हो रहा है परिणामतः किसानी बरबाद हो रही है।

इसी तरह वन क्षेत्र में जो कानून बने है उनकी अवहेलना करके क्रशर चल रहे है। सेचुंरी एरिया व वाइल्ड जोन में जहां ट्रांजिस्टर भी बजाना मना है, वहां खुलेआम ब्लास्टिंग करायी जा रही है। यहां की पहाडियों को खत्म कर लखनऊ और अन्य जगहों का सुदंरीकरण किया जा रहा है। पानी का कितना गहरा संकट है अभी से लोग इसे महसूस कर रहे है। पानी के इस संकट के चलते रिहन्द बांध का प्रदूषित पानी पीने को लोग मजबूर होते है।

इस प्रदूषित पानी को पीने से पहले भी कमरी ड़ाड, लभरी, गाढ़ा जैसी जगहों पर लोग मर चुके है और अभी भी बेलहत्थी गांव के रजनी टोला में पंद्रह बच्चे मर चुके है। बावजूद इसके जल संकट के हल की और न ही प्रदूषित पानी से लोगों को बचाने की कोई व्यवस्था है। उलटा जेपी समूह पानी के संकट को और बढ़ाने में लगा हुआ है इस समूह द्वारा बिजली बनाने के लिए जमीन से जल को निकाला जा रहा है।

अनपरा,ओबरा तापीय परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर सरकारी सम्पत्ति की लूट हो रही है। इस लूट के कारण यह पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है। यहां 20 -25 वर्षो से एक ही स्थान पर नियमित रूप से मजदूर काम करते है,इन मजदूरों का प्रबंधन इन परियोजनाओं का प्रबंधतंत्र ही करता है लेकिन मात्र कमीशनखोरी लिए इन परियोजनाओं में ठेकादारों के जरिए मजदूरों से काम करवाया जा रहा है। स्थिति इतनी बुरी है कि जिलाधिकारी के निर्देशन में हुए समझौतों का भी अनुपालन औद्योगिक इकाईयां नही करती है।

 खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन  किया जा रहा है। वनाधिकार कानून को जनपद में विफल कर दिया गया है। आदिवासियों तक के दावों को उपजिलाधिकारी स्तर पर खारिज कर दिया गया है और जिन्हें  दिया भी गया है उन्हे चार बीधा की काबिज जमीन पर दस बिस्वा का पट्टा थमा दिया गया है,कोलों को आदिवासी का दर्जा ही नहीं मिला परिणामस्वरूप वह आदिवासी होने के बावजूद इस कानून के लाभ से वंचित हो गए है, रिहन्द विस्थापितों और अन्य वनाश्रित जातियों के दावों को तो रद्दी की टोकरी के ही हवाले कर दिया गया है।

 जनपद में आदिवासी का दर्जा पायी जातियों के लिए पंचायत चुनाव में सीटें आरक्षित न करने के कारण कई गांव में पंचायतों का गठन नहीं हो पाया, जिससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया है। जिला प्रशासन ने कई गांवों में प्रशासनिक समिति के गठन की अवैधानिक कार्यवाही करते हुए चुने हुए प्रधानों के अधिकार तक छीन लिए है।

में यहां चैतरफा लूट हुई है, इस बात को विभिन्न जांच टीमों तक ने स्वीकार किया है। इस योजना में करोड़ों रूपया मजदूरों की मजदूरी बकाया है। जनपद का आदिवासी भुखमरी की स्थिति में जी रहा है और गेठी कंदा जैसे जहरीली जड़ को खाने को मजबूर है। किसानों के सिचांई हेतु बनी परियोजनाएं लम्बित पड़ी है और जो चल भी रही है उनकी दशा दयनीय है। ऐसी स्थिति में जनपद को पर्यावरणीय क्षति और प्राकृतिक व सरकारी सम्पदा की हो रही लूट से बचाने और जनपद के किसानों, मजदूरों व आम आदमी की जिन्दगी से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर यह अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है।

इस धरने का समर्थन समाजवादी जनता पार्टी,सोशलिस्ट पार्टी (लोहियावादी)जैसे तमाम दलों ने किया,अधिवक्ताओं ने भी बडे पैमाने पर इस आंदोलन का समर्थन किया है। इस धरने में औद्योगिक इकाईयों में काम करने वाले मजदूर,किसान और आदिवासी पहली बार एक मंच पर आकर अपनी लड़ाई को लड़ रहे है।

धरने के इतने दिन बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन का रवैया गैरजबाबदेह और संवेदनहीन बना हुआ है। पूरा प्रशासन लोकतांत्रिक आंदोलन को विफल करने में लगा है। बहरहाल आंदोलन जारी है प्रशासन की अवहेलना के खिलाफ पूरे जिलें में पुतले जलाए जा रहे है। आने वाले समय में क्रमिक अनशन, आमरण अनशन और जेल भरों की तैयारी की जा रही है।          



             

Mar 24, 2011

जापान के जरिये प्रकृति का कड़ा संदेश


पहले सुनामी फिर जापान में परमाणु विकीरण के समाचार ने जापान सहित पूरी दुनिया को दहला कर रख दिया। परमाणु विकीरण के खतरे को भी प्रकृति द्वारा उत्पन्न भूकंप के खतरे से कम खतरनाक नहीं कहा जा सकता...

तनवीर जाफरी

पृथ्वी पर बसने वाली मानव जाति को समय-समय पर अपने रौद्र एवं प्रचंड रूप से आगाह कराती रहने वाली प्रकृति ने गत 11 मार्च को  जापान पर एक बार फिर अपना कहर बरपा किया। पहले तो रिएक्टर पैमाने पर 8.9 मैग्रीच्यूड तीव्रता वाले ज़बरदस्त भूकंप ने देश को झकझोर कर रख दिया।


मौसम वैज्ञानिक अब 8.9 की तीव्रता को 9 मैग्रीच्यूड की तीव्रता वाला भूकंप दर्ज किए जाने की बात कह रहे हैं। यदि इसे 9मैग्रीच्यूड की तीव्रता वाला भूकंप मान लिया गया तो यह पृथ्वी पर आए अब तक के सभी भूकंपों में पांचवें नंबर का सबसे बड़ा भूकंप होगा। अभी जापान भूकंप के इस विनाशकारी झटके को झेल ही रहा था कि कुछ ही घंटों के बाद इसी भूकंप के कारण प्रशांत महासागर के नीछे  स्थित पैसेफिक प्लेट अपनी जगह से खिसक गई जिससे भारी मात्रा में समुद्री पानी ने सुनामी लहरों का रौद्र रूप धारण कर लिया।


जापान प्रशांत महासागर क्षेत्र में ऐसी सतह पर स्थित है जहां ज्वालामुखी फटना तथा भूकंप का आना एक सामान्य सी घटना है। इन्हीं भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जापान के लोग मानसिक तथा भौतिक रूप से ऐसी प्राकृतिक विपदाओं का  सामना करने के लिए सामान्तया हर समय तैयार रहते हैं। जापान के लोगों की जागरूकता तथा वहां की सरकार व प्रशासनिक व्यवस्था की इसी चौकसी व सावधानी का ही परिणाम था कि भूकंप तथा प्रलयकारी सुनामी आने के बावजूद आम लोगों के जान व माल की उतनी क्षति नहीं हुई जितनी कि भूकंप व सुनामी के प्रकोप की तीव्रता,भयावहता तथा आक्रामकता थी।

जहां इस  भूकंप ने जान व माल का भारी नुकसान किया वहीं मानव निर्मित विपदाओं ने भी प्राकृतिक विपदा से हाथ मिलाने का काम किया। नतीजतन चालीस वर्ष पुराना फुकुशिमा डायची परमाणु संयंत्र भूकंप के चलते कांप उठा। इस अप्रत्याशित कंपन ने फुकुशिमा परमाणु रिएक्टर की कूलिंग प्रणाली को अव्यवस्थित कर दिया जिसके कारण टोक्यो से मात्र 240 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस संयंत्र के चार रिएक्टरों में एक के बाद एक कर धमाके हुए।

इसके बाद परमाणु विकीरण के समाचार ने जापान सहित पूरी दुनिया को दहला कर रख दिया। इस समय जहां इस संयंत्र के 20 किलोमीटर क्षेत्र को विकीरण के संभावित खतरे के परिणामस्वरूप खाली करा लिया गया है वहीं दुनिया के तमाम देश जापान से आयातित होने वाली खाद्य पदार्थों की रेडिएशन के चलते गहन जांच-पड़ताल भी कर रहे हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि परमाणु विकीरण के खतरे को भी प्रकृति द्वारा उत्पन्न भूकंप के खतरे से कम बड़ा खतरा मापा नहीं जा सकता। स्वयं जापान के ही हीरोशिमा व नागासाकी जैसे शहर परमाणु विकीरण के नुकसान झेलने वाले शहरों के रूप में प्रमुख गवाह हैं।

बताया जा रहा है कि इस भयानक भूकंप के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर जापान में भू विस्थापन भी हुआ है। इस असामान्य कंपन के परिणामस्वरूप जापान की तट रेखा अपने निर्धारित स्थान से 13 फुट नीचे  की ओर खिसक गई है। इस प्रलयकारी भूकंप तथा इसके पश्चात आई सुनामी ने जापान की अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। जबकि सारे विश्व की अर्थव्यवस्था भी जापान की त्रासदी से अछूती नहीं रह सकी है। इस त्रासदी के बाद एशियाई शेयर बाज़ार नीचे गिर गए थे।

जापान के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति  प्राप्त उद्योग सोनी, टोयटा, निसान तथा होंडा में उत्पादन बंद कर दिया गया है। सुनामी के परिणामस्वरूप उठीं 30फीट ऊंची प्रलयकारी लहरों ने सेंदई शहर को पूरी तरह तबाह कर दिया। पूरा शहर या तो समुद्री लहरों के साथ बह गया या फिर शेष कूड़े-करकट व कबाड़ के ढेर में परिवर्तित हो गया। प्रकृति के इस शक्तिशाली प्रकोप ने मकान,गगनचुंबी इमारतें,जहाज़, विमान,ट्रेनें,पुल,बाज़ार फ्लाईओवर आदि सबकुछ अपनी आगोश में समा लिया। कारों तथा अन्य वाहनों की तो सुनामी की रौद्र लहरों में माचिस की डिबिया से अधिक हैसियत ही प्रतीत नहीं हो रही थी।

प्रकृति के इसी विनाशकारी प्रकोप को झेलते हुए आज जीवित बचे लगभग 5 लाख लोग स्कूलों तथा अन्य सुरक्षित इमारतों में शरण लेने पर मजबूर हैं। इन खुशहाल जापानवासियों को वहां भोजन की कमी, बढ़ती हुई ठंड तथा पीने के पानी की कि़ल्लत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। देश के कई बंदरगाह,तमाम बिजली संयंत्र तथा तेल रि$फाईंनरी बंद कर दिए गए हैं।

एक तेल रिफाईंनरी में तो भीषण आग भी लग गई थी। ऐसे दु:खद व संकटकालीन समय में पूरी दुनिया के देश जापान की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। इनमें हमेशा की तरह अमेरिका सहायता कार्यों में सबसे आगे-आगे चलकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका व जि़ मेदारी निभा रहा है। आशा की जा रही है कि जापान के लोग अपनी सूझ-बूझ,अपनी बुद्धिमानी तथा आधुनिक तकनीक व विज्ञान का सहारा लेते हुए यथाशीघ्र इस प्रलयकारी त्रासदी से उबर पाने में सफल होंगे तथा वहां की अर्थव्यवस्था एक बार फिर सुधर जाएगी।


 जापान के  हिरोशिमा शहर में नरमुंड गिनते स्वास्थयकर्मी  

परंतु प्रकृति के इस या इस जैसे अन्य भूकंप व सुनामी जैसे प्रलयकारी तेवर को कई बार देखने,झेलने व इसे महसूस करने के बाद भी आखिर हम इन प्राकृतिक घटनाओं से अब तक क्या कोई सबक ले सके हैं? क्या भविष्य में हम इन घटनाओं से कोई सबक लेना भी चाहते हैं? आज के वैज्ञानिक युग की हमारी ज़रूरतें क्या हमें इस बात की इजाज़त देती हैं कि हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हुए अपनी सभी ज़रूरतों को यूं ही पूरा करते रहें?

 परमाणु शक्ति पर आधारित बिजली संयंत्र ही क्या हमारी विद्युत आपूर्ति के एक मात्र सबसे सुलभ एवं सस्ते साधन रह गए हैं? क्या परमाणु संयंत्रों की स्थापना मनुष्यों की जान की कीमत के बदले में किया जाना उचित है? या फिर इतना बड़ा खतरा मोल लेने के बजाए हमारे वैज्ञानिकों को परमाणु के अतिरिक्त किसी ऐसे साधन की भी तलाश कर लेनी चाहिए जो आम लोगों के लिए खतरे का कारण न बन सकें। या फिर परमाणु उर्जा की ही तरह किसी ऐसी उर्जा शक्ति का भी विकास किया जाना चाहिए जो परमाणु विकीरण के फैलते ही उस विकीरण को निष्प्रभावी कर दे तथा वातावरण को विकीरण मुक्त कर डाले।

जापान की भौगोलिक स्थिति पर भी पूरे विश्व को चिंता करने की ज़रूरत है। भू वैज्ञानिक इस बात को भली भांति समझ चुके हैं कि जापान पृथ्वी के भीतर मौजूद दो प्लेटों की सतह पर स्थित देश है। बताया जा रहा है कि जापान में प्रत्येक घंटे छोटे-छोटे ाूकंप आते ही रहते हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे स्थानों से विस्थापित होने के बजाए जापान के लोग उन्हीं जगहों पर आबाद रहने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लेते हैं।

भूकंप रोधी मकान तथा भूकंप रोधी गगन चुंबी इमारतें बनाने के नए-नए तरी$के अपनाए जाते हैं। परंतु प्रकृति का प्रकोप है कि अपनी अथाह व असीम शक्ति के आगे मानव निर्मित किन्हीं सुरक्षा मापदंडों या उपायों को कुछ भी समझने को तैयार नहीं। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि भविष्य में जापान के इन भूकंप प्रभावित इलाक़ों में पुन: ऐसी या इससे अधिक तीव्रता का भूकंप नहीं आएगा या इससे भयानक सुनामी की लहरें नहीं उठेंगी।

याद रहे कि 2004 में इंडोनेशिया में आए सुनामी की तीव्रता इससे कहीं अधिक थी। जापान में जहां 30 फीट ऊंची लहरें सुनामी द्वारा पैदा हुई थी वहीं इंडोनेशिया में 80फीट ऊंची लहरों ने कई समुद्री द्वीप पूरी तरह तबाह कर दिए थे। भारत भी उस सुनामी से का$फी प्रभावित हुआ था। चीन भी विश्व के सबसे प्रलयकारी भूकंप का सामना कर चुका है।

लिहाज़ा भू वैज्ञानिकों को विश्व के सभी देशों के साथ मिलकर भूकंप व सुनामी जैसी विनाशकारी प्राकृतिक विपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों का संपूर्ण अध्ययन करना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को उसी क्षेत्र में रहकर जीने व रहने के उपाय सिखाना शायद टिकाऊ,कारगर या विश्वसनीय उपाय हरगिज़ नहीं है। यह तो ऐसी प्राकृतिक विपदाओं का सामना सीना तान कर करने जैसी इंसानी हिमाक़त मात्र है।

लिहाज़ा स्थाई उपाय के तौर पर ऐसे क्षेत्रों में बसने वाले लोगों को अन्यत्र सुरक्षित स्थानों पर बसाए जाने के उपाय करने चाहिए। हमारे वैज्ञानिकों तथा दुनिया के सभी शासकों को यह बात ब$खूबी समझनी चाहिए कि पृथ्वी के गर्भ में स्थित पृथ्वी को नियंत्रित रखने वाली प्लेटें तो अपनी जगह से हटने से रहीं। लिहाज़ा क्यों न मनुष्य स्वयं ऐसे $खतरनाक क्षेत्रों से स्वयं दूर हट जाए ताकि मानव की जान व माल को कम से कम क्षति पहुंचे। ऐसी प्राकृतिक विपदाएं मानव जाति में परस्पर पे्रम,सहयोग,सौहाद्र्र तथा एक-दूसरे के दु:ख-दर्द को समझने व महसूस करने का भी मार्ग दर्शाती हैं।

आशा की जानी चाहिए कि इस विनाशकारी भूकंप तथा सुनामी के बाद जापान के परमाणु रिएक्टर में उत्पन्न खतरे के बाद जिस प्रकार दुनिया के सभी देशों ने अपनी-अपनी परमाणु नीतियों के संबंध में पुनर्विचार करना शुरु किया है तथा जर्मनी जैसे देश ने परमाणु उर्जा उत्पादन के दो रिएक्टर प्लांट ही इस घटना के बाद बंद कर दिए हैं। उम्मीद की जा सकती है कि यह त्रासदी परमाणु रूपी मानव निर्मित त्रासदी से मनुष्य को मुक्ति दिलाने में भी बुनियाद का पत्थर साबित होगी।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.






Mar 22, 2011

'गर्म हवा जैसी फ़िल्में रोज नहीं बना करतीं'


 
यूं   तो सआदत हसन मंटो, इसमत चुगताई, भीष्म साहनी और राही मसूम रज़ा जैसे कई लेखकों ने विभाजन की त्रासदपूर्ण पीड़ा का बयान अपने दस्तावेजों में किया और इस विषय पर बहुत सी फिल्में भी बनीं। मगर ’गर्म हवा’ और ’तमस’ का अपना अलग महत्व है। ’गर्म हवा’ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली फिल्म थी जिसने बंटवारे के ध्वंस के बाद छायी कथित शान्ति की पड़ताल की। एक चीखती चुप्पी जिसमें घुटता हुआ आदमी समाज ही नहीं खुद से भी बिलग हो कर अपनी पहचान तलाशता है। अपने सकारात्मक अंत के अलावा इस फिल्म का एक ऐतिहासिक महत्व यह भी है कि यह बलराज साहनी द्वारा अभिनीत अन्तिम फिल्म थी। साहनी जी का अभिनय और एमएस सथ्यू के सधे हुए निर्देशन का कमाल है ’गर्म हवा’। यह फिल्म न सिर्फ कान फेस्टिबल में दिखायी गयी बल्कि आस्कर के लिए भी नामांकित हुई थी...


'गर्म हवा’ के निर्देशक  एमएस सथ्यू से पवन मेराज की बातचीत

सत्तर के दशक में रिलीज हुई फिल्म गर्म हवा कि आज के दौर क्या प्रासंगिकता है ?


कभी-कभी ऐसी फिल्में बन जाती हैं जो अपने मायने कभी नहीं खोतीं। वैसे भी आजकल हम धर्म, जाति और क्षेत्रीयता को लेकर अधिक संकीर्ण होकर सोचने लगे हैं। इन सब सच्चाईयों को देखते हुए गर्म हवा की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

ऐसे समय में कला की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है?
समाज के यथार्थ को सामने लाना ही कला की मुख्य जिम्मेदारी है। मैं इस बात का हामी नहीं कि कला सिर्फ कला के लिए होती है। कला के सामाजिक सरोकार होते हैं।
लेकिन व्यवसायिक सिनेमा भी तो यथार्थ को सामने लाता है,फिर समानान्तर सिनेमा इससे अलग कैसे ?

 वे फिल्मों के जरिये बुनियादी तौर पर पैसा बनाते हैं। उनके लिए समस्याएं भी बिकाऊं माल है। गरीबी से लेकर विधवा के आंसू तक को बेचते हैं। समस्याओं को देखने का नजरिया, समाज के प्रति सरोकार और समानान्तर सिनेमा को बनाने का तरीका ही इसे व्यवसायिक सिनेमा से अलग करता है।

अपने तरीके (ट्रीटमेन्ट) में ’गर्म हवा’ कैसे अलग है ?

पहली बात तो यह कि हम एक विचारधारा से जुड़े हुए लोग थे इसीलिए यह फिल्म बन पायी। पूरी फिल्म इसमत चुगताई की एक कहानी से प्रभावित है। एक पत्र राजेन्द्र बेदी की कहानी से भी प्रेरित था। आपको हैरानी होगी पूरी फिल्म आगरा और फतेपुर सीकरी में शूट की गयी और इसमें बनावटी चीज कुछ भी नहीं है।
आज इस तरह सोचना भी मुश्किल है क्योंकि आज की फिल्मों में बहुत बनावटीपन है। कहानी हिन्दुस्तान की होती है शुटिंग विदेश में...(हंसते हैं।) शादियां तो ऐसे दिखाई जाती हैं गोया सारी शादियां पंजाबी शादियों की तरह ही होती हैं। इस फिल्म में दृश्यों की अर्थवत्ता और स्वाभाविकता को बनाये रखने के लिए कम से कम सोलह ऐसे सीन हैं जिसमें एक भी कट नहीं है। कैमरे के कलात्मक मूवमेन्ट द्वारा ही यह संभव हो सका। आज के निर्देशक ऐसा नहीं करते।

बिना कट किये पूरा सीन फिल्माना तो कलाकारों के लिए भी चुनौती रही होगी ?

 वे सब थियेटर के मजे हुए कलाकार थे, जिन्हें डायलाग से लेकर हर छोटी से छोटी बात याद रहती थी। यहाँ तक यह भी कि कितने कदम चलना है और कब घूमना है .रंगमंच का अनुभव कलाकारों को परिपक्व बना देता है इसलिए कभी कोई दिक्कत पेश नहीं आयी।

’इस फिल्म में जब नायिका मर जाती है तो पिता के रोल में बलराज साहनी की आंखों से कोई आंसू नहीं गिरता, यह अस्वाभाविक नहीं था ?

असल में बलराज जी की जिन्दगी में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी और बलराज उस समय शूटिंग से लौट कर आये थे और उन्होंने कुछ इसी तरह सीढ़ियां चढ़ीं थी जैसा फिल्म में था। बलराज उस समय इतने अवसन्न हो गये थे कि रो भी नहीं पाये। उस वक्त उनसे पारिवारिक रिश्तों के चलते मैं वहीं था। फिल्म बनाते समय मेरे जेहन में वही घटना थी पर मैं बलराज जी से सीधे-सीधे नहीं कह सकता था इसलिए मैंने सिर्फ इतना कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है। बलराज समझ गये थे और उन्होंने जो किया वो आपके सामने है।
लेकिन इस फिल्म का अन्त बहुत सकारात्मक था ?

दरअसल यह भी बलराज जी का ही योगदान था और उन्होंने ही इस तरह के अन्त को सुझाया। दो बीघा जमीन,गर्म हवा और दूसरी कई फिल्मों में अपने शानदार अभिनय के बावजूद उन्हें कभी नेशनल अवार्ड नहीं मिला तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे कम्यूनिस्ट पार्टी के मेम्बर थे।

फिल्म रिलीज होने के बाद खुद बलराज जी की क्या प्रतिक्रिया थी ?

दुर्भाग्य से फिल्म रिलीज होने तक जिन्दा नहीं रहे। फिल्म के अन्त में वे कहते कि मैं इस तरह अब अकेला नहीं जी सकता और संघर्ष करती जनता के लाल झण्डे वाले जुलूस में शामिल हो जाते हैं,वही उनके अभिनय जीवन का भी अन्तिम शाट था।

आपने अभी बताया कि बलराज साहनी कम्यूनिस्ट पार्टी के मेंबर थे। क्या आप मानते हैं कि एक कलाकार की राजनैतिक भूमिका होना जरूरी है?

जी हां बिलकुल !कोई भी चीज राजनीति से अलग नहीं है। कलाकार का भी एक राजनीतिक सरोकार होता है जो उसकी कला में दिखता भी है। अगर कोई यह कहता है कि उसका राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है तो वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है।

कला समाज को प्रभावित करती है, समाज कला को किस तरह प्रभावित करता है ?

मैं दोनों को अलग करके नहीं देखता। समाज के तात्कालिक प्रश्न ही कलाकृति का आधार बनते हैं। वे बुराईयां जिन्हें हम लम्बे समय से स्वीकार करते आ रहे हैं,एक कलाकार उन्हें अपनी कला के जरिए समाज के सामने दुबारा खोलकर रखता है और अपने प्रेक्षक को उन पर सोचने पर मजबूर कर देता है।

सत्तर के दशक में वामपंथी राजनीति के उभार से कला, साहित्य और फिल्म प्रभावित रही, इप्टा जैसा सांस्कृतिक आंदोलन भी चला। लेकिन अब वह उतार पर नज़र आता है,ऐसा क्यों ?
जहां तक आंदोलन का सवाल है तो इसने हमें एक बेहतर दुनिया का सपना दिया। हम सब इससे प्रभावित थे। मैंने पहले भी कहा आन्दोलन से जुड़े होने के कारण ही हम लोग ’गर्म हवा’ बना सके। लेकिन यह ग्लोबलाईजेशन का दौर है और हम बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को नया नहीं बना सके, इसीलिए ऐसा हुआ। माक्र्स ने भी कहा था कि यह परिवर्तन का दर्शन है। हमें इस तरफ भी सोचना होगा।

लेकिन आज आन्दोलन की हर धारा इस पर विचार कर रही है और नेपाल में माओवादियों का प्रयोग आपके सामने है ?

हां,वहां कुछ बातें अच्छी हैं। आजकल के जमाने में कई लोग माओवादियों को वामपंथ विरोधी मानते हैं। ऐसा करने वालों में वामपंथी भी शामिल हैं। हालांकि नेपाल में मोओवादियों ने अच्छा उदाहरण पेश किया है।

आपको नहीं लगता कि ’गर्म हवा’ जैसी फिल्में एक विशेष वर्ग में सिमट कर रह जाती हैं?

जैसे साहित्य में घटिया साहित्य ज्यादा छपता और पढ़ा जाता है,उसी तरह फिल्मों में भी है। मल्टीप्लेक्स में वेलकम जैसी फिल्म देखने वाले ऐसी फिल्में नहीं देख सकते। फिल्म देखना भी एक कला है जिसके लिए आंखें होनी चाहिए। इसकी ट्रेनिंग  शुरू से ही लोगों को दी जानी चाहिए।

समानान्तर सिनेमा के सामने आज कौन सी चुनौतियां हैं ?

फिल्म बनाना एक महंगा काम है और इसके लिए प्रायोजक कीजरूरत होती है। जैसे लगान की चर्चा आस्कर नामांकन में जाने की वजह से भी बहुत हुई लेकिन इसकी टीम ने फिल्म को वहां प्रदर्शित करने में करोड़ों रूपये फूंक दिये जिसमें नई फिल्म बन सकती थी।

मजे की बात यह है कि लगान के पास आस्कर में नामांकन का वही सर्टिफिकेट है जो ’गर्म हवा’ को आज से 30-35 साल पहले मिला था। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिबल में भी दिखाई गयी और तब आस्कर के चयनकर्ताओं ने इसे आस्कर समारोह में दिखाने को कहा। मैं सिर्फ पैसे की तंगी के चलते वहाँ नहीं जा सका। हां फिल्म मैंने जरूर भेज दी थी जिसका प्रमाण पत्र मेरे पास आज भी पड़ा है।

क्या पैसे की तंगी ने फिल्म बनने की प्रक्रिया में भी बाधा डाली ?

फिल्में सिर्फ पैसे से नहीं पैशन से भी बनती हैं, लेकिन पैसा भी चाहिए। उस जमाने में 2.50 लाख निगेटिव बनने में लगा। हमारे पास साउण्ड रिकार्डिंग के भी पैसे नहीं थे। हम लोग आगरा और सीकरी में शूटिंग कर रहे थे। साउण्ड रिकार्डिंग का सामान बम्बई से आता था और उसके साथ एक आदमी थी।

इसका 150 रू0 प्रतिदिन का खर्च था और हमारे पास इतने भी नहीं थे अन्नतः सारी शूटिंग बिना साउण्ड रिकार्डिंग के ही हुई। फिल्म बाद में बम्बई जा कर डब की गयी। तकरीबन 9 लाख कुल खर्चा आया पूरी फिल्म तैयार होने में। कई कलाकारों को मैं उनका मेहनताना भी नहीं दे सका। मेरे ऊपर बहुत सा कर्जा हो गया और नौ साल लगे इससे उबरने में।

इसके अलावा और क्या-क्या समस्याएं आयीं ?

रिलीज के लिए सेंसर सर्टीफिकेट नहीं मिला एक साल की जद्दोजहद के बाद इन्दिरा जी ने खुद पूरी फिल्म देखीं और कहा रिलीज कर दो,लेकिन यूपी में नहीं (मुस्कुराते हैं)। वहां चुनाव होने वाले थे। इस तरह की तैयार फिल्म 74 में सबसे पहले बंगलौर में रिलीज हो सकी।

आज रंगमंच में भी काफी सक्रिय रहे फिल्म और रंगमंच में आप मुख्यतः क्या अन्तर पाते हैं ?
अपनी बात कहने की दो अलग-अलग विधाएं हैं। कैमरे की वजह से काफी सहूलियत हो जाती है लेकिन रंगमंच एक संस्कार है। यहां कलाकार और दर्शक का तादात्म्य स्थापित होता है। यह विधा बहुत पुरानी है और कभी नहीं मरेगी।

आपकी दूसरी फिल्मों को ’गर्म हवा’ जितनी चर्चा नहीं मिली ?

’गर्म हवा’ जैसी फिल्में कोई रोज नहीं बना सकता। ऐसी फिल्में बस बन जाती हैं कभी-कभी। पाथेर पांचाली, सुवर्ण रेखा जैसी फिल्में हमेशा नहीं बन सकतीं।