Feb 22, 2011

एक बदचलन की मौत !

एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी...

अजय प्रकाश

परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा,नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है। यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा।

तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी। मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं?

मां जवाब दिये बगैर चलते बनी तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा,‘देहात से आयी हैं,इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी,‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह,मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।'

मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ी, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट  फ्लोर होते हुए हमतक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों...क्यों...क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

अबकी बड़ी जानकारी का विस्तार आया। वह इस प्रकार से कि रोने वाली औरत की मरने के बाद सड़ रही बेटी चार बच्चों की मां है और वह गली की चौथी मकान में बाएं  तरफ किराये पर रहती है। इसी मकान में रहते हुए एक सप्ताह पहले बीमार हुई तो किसी ने ले जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया था और मरने के बाद वहीं पड़ी है।

इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या वह औरत अकेले ही अस्पताल गयी थी। इस सवाल पर जवाब मिला,‘नहीं। बीमारी की हालत में औरत ने किसी को फोन कर बुलाया था और वही उसे अस्पताल ले गया था। मगर ईलाज के दौरान औरत मर गयी तो वह छोड़कर भाग गया। तबसे लाश अस्पताल में ही पड़ी है।

मृत औरत का कोई खोज-खबर रखने वाला नहीं आया तो अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खोजबीन में औरत के पास से मिले कागज पर लिखे मोबाइल नंबर को मिलाया। पता चला मोबाइल नंबर मृत महिला के पति का है और वह बिहार के छपरा जिला के किसी ब्लॉक का रहने वाला है।


अब बालकनी पर खड़े मुझ जैसे दुखितों का इंट्रेस्ट सस्पेंस में था कि चार बच्चों की मां,ऊपर से बीमार और चार दिन से अस्पताल में पड़ी सड़ रही और पति यहां से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर पड़ा। आखिर माजरा क्या है? तो अब माजरे की पुख्ता जानकारी कुछ इस प्रकार से पसरी- दरअसल जो आदमी उसे अस्पताल में भरती कराने ले गया था वह उसका तीसरा और अंतिम पति था। इससे पहले वह करीब तीन साल एक पंजाबी के साथ रही थी,जबकि शादी उसकी छपरा वाले से हुई थी जो अब उसके मरने के बाद उसकी मां को लेकर दिल्ली आया था।


यह विशेष जानकारी नीचे वाली चाची ने दिया। बकौल चाची- थोड़े दिन पहले एक पंजाबी बैग लेकर आया था और उनसे कह रहा था कि वह अपना बच्चा लेने आया है। उसने चाची को यह भी बताया कि चैथे नंबर का बच्चा उसी का है और सिर्फ वह उसी को ले जाने आया है। पंजाबी से ही चाची को पता चला था कि चार बच्चों की मां बीमार है और अस्पताल में भर्ती है।

तभी किसी महिला ने चाची से पूछ लिया,‘यानी उसे जो अस्पताल ले गया था वह न पंजाबी था न बिहारी। फिर वह कौन था।’इसका जवाब एक दूसरी महिला ने दिया जिसके होंठ खूनी आत्माओं की तरह टहटह लाल हो रहे थे, - अरे वह एक मुसलमान था जिसके साथ वह पिछले कुछ महीनों से रह रही थी।

इसके बाद बालकनी दुखितों ने हां-हूं करते हुए उस औरत के अस्पताल में सड़ने को भगवान का जायज फैसला माना और औरत की मौत को एक बदचलन की मौत करार दिया। हालांकि उसे जानने वाली एक औरत ने ऐसा कहने पर ऐतराज जताया। कहा भी अगर वह दूसरी-तीसरी शादी नहीं करती तो उसके चार बच्चों की लाश यहां भूख से पड़ी रहती। वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था। इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के।

बहस थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला बिहारी पहले किसी रबर की फैक्ट्री में काम करता था मगर काम छूट जाने के बाद पिछले तीन वर्षों से उसे काम ही नहीं मिला। सड़ रही लाश के पक्ष में बोलने वाली महिला ने आगे कहा,‘किसी की जवानी नहीं फटती है कि वह बेवजह इस गोद से उस गोद में कूदे। बच्चों का मुंह देख लोग पता नहीं क्या-क्या करते हैं।’

तभी किसी ने फिक्र बिखेरी,‘बेचारे बच्चों को कौन देखेगा।’बच्चों की बात आयी तो पता चला दो बेटियां और दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी करीब 12साल की है और बाकी सभी बच्चे उससे छोटे हैं। सामने वाले की बीबी ने नीचे परचून की दूकान के पास इशारा कर दिखाया,‘वह  बैठी है उसकी बड़ी बेटी। बाकी तीनों भाई-बहनों को चाय मट्ठी खिला रही है।’इस दृश्य को महत्वपूर्ण मान सभी ने बालकनी से सिर झुका-झुका कर चाय-मट्ठी का लाइव देखा।

अब बारी लाश को फूंके जाने के बहस को लेकर थी। सड़ रही लाश की मां ने बेटी को एक बार देखने की इच्छा जाहिर की और कहा उसे घर लाया जाये। इस पर सभी बिपर पड़े। तमाशबीनों ने करीब आदेशात्मक ढंग से कहा, ‘सड़ी हुई लाश मुहल्ले में क्यों लानी है, पहले से क्या बिमारियां कम हैं।’ कुछ ने कहा, उस बदचलन ने ऐसा कौन सा महान काम किया है कि अंतिम दर्शन को लाया जाये। आखिरकार तय हुआ कि लाश को अस्पताल से सीधे ‘मशान ले जाया जायेगा।

इस प्रस्ताव पर अस्पताल जाने को लिए दो-चार लोग तैयार हो गये। तैयार होने वालों में मानद पति के क्षेत्र और जाति के लोग थे। इसके अलावा जो लोग मौके पर पहले से खड़े थे, उन्होनें नौकरी या अन्य जरूरी कामों का वास्ता देकर जा पाने में असमर्थथा जाहिर की। हालांकि चलन में ऐसा नहीं है। गाड़ी का इंतजाम हो जाने पर अंतिम संस्कार में जाने वालों से गाड़ी आमतौर पर भर जाती है।

खैर!अब हमारे बीच से सड़ी लाश को राख हुए दो दिन बीत चुके हैं और राख का मानद पति ‘छपरा वाला’,राख का कर्मकांड करने गांव जा चुका है। इस बीच मुहल्लेवालों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए मानद पति को ‘रखवाला’ का तमगा दे, राख के बाकी दो पतियों को मजावादी करार दे दिया है। मानद के जाते-जाते एक औचक सवाल मुहल्ले वालों ने उसके लिए जरूर छोड़ा था, ‘मानद, क्या कभी चारों बच्चों में से किसी एक पर भी अपनी औलाद होने का फक्र कर सकेगा।’

और इसी सवाल के साथ कहानी का इंड हो गया था। लोग बालकनी से इस सकून के साथ वापस लौटे थे कि एक बदचलन औरत के मरने, सड़ने और अंततः राख होने में मुहल्ला भागीदार नहीं हुआ और सभ्य बना रहा।





Feb 20, 2011

और आंखें पत्थर की लगा दीं



मोतियाबिंद से त्रस्त गरीबों को क्या पता था कि जिन आंखों की रोशनी पाने की उम्मीद में वे डॉक्टरों के यहां जा रहे हैं, वे डॉक्टर उनकी आंखें ही छीन लेंगे और वे अपराधी भी  नहीं माने जायेंगे...


चैतन्य भट्ट

मध्य प्रदेश के मंडला जिले के पच्चीस आदिवासी अपनी आँखें डाक्टरों की लापरवाही के कारण गंवा चुके हैं। आदिवासियों को डाक्टरों की लापरवाही का उस समय शिकार होना पड़ा जब वे ‘योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट’ के निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप में इलाज के लिए आये थे। डॉक्टरों ने आदिवासी मरीजों को भरमाने के लिए मोतियाबिंद ग्रस्त आखों को निकाल पत्थर की आँखे लगा दी थीं।

जबलपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर मंडला में पिछले वर्ष 11सितंबर को योगीराज चैरिटेबल ट्रस्ट ने मोतियाबिंद कैंप लगाया था। दूर-दराज से आपरेशन के लिए आये गरीबों में वह पचीस आदिवासी भी थे जो मोतियाबिंद की वजह से जिंदगी ठीक से नहीं जी पा रहे थे। अपनी आँखों से पहले की तरह दुनिया देख सकें की उम्मीद में डाक्टरों के दर पर आये आदिवासियों को क्या पता था कि जिंदगी में बची बाकी रोशनी भी वे गवां बैठेंगे।



डॉक्टरों की देन   :  पत्थर की आंख दिखाता एक पीड़ित
दूसरी तरफ  रसूखदारों की सरपरस्तरी में चल रहे योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट अस्पताल का बाल बांका भी नहीं हुआ है। घटना के चार महीने बाद भी अस्पताल ने एक धेले का मुआवजा नहीं दिया है। घटना के बाद मंडला के जिला कलेक्टर ने अस्पताल को यह निर्देश दिये थे कि वे हर पीड़ित मरीज को तीस तीस हजार रूपये बतौर मुआवजा दे और पेंशन के रूप में हर महिने पांच-पाचं सौ रूपये भी अस्पताल प्रबंधन अदा करे।

आँखें गँवा चुके आदिवासी और उनके परिजन मुआवजे की आस में हर उस दरवाजे जा रहे है जहां से उन्हें न्याय की उम्मीद है। लेकिन राज्य की भाजपा सरकार, जिला प्रशासन, सीएमओ से लेकर योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट तक के अधिकारियों के कानों में जूं नही रेंग रही है। इतना ही नहीं  जबलपुर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, जिन्हें घटना की जांच का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने भी आपरेशन करने वाले दोषी डाक्टरों को ‘क्लीनचिट’ देकर पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिडका है।

गौरतलब है कि गरीब और आदिवासी इलाका होने के कारण जैसे ही लोगों को पता चला कि निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप लगा है तो धनाभाव के कारण निजी चिकित्सालयों में इलाज न करा पाने वाले मरीजों का तांता लग गया। मामला गरीबों का होने के कारण अस्पताल प्रबंधन ने भी खूब लापरवाही बरती और इतने बड़े कैंप का आयोजन बगैर स्वास्थ्यअधिकारियों के इजाजत के ही कर डाला।

आसपास के गांवों झिरिया,बनिया तारा,मलवा खेहरी से तीस मरीज मुफ्त आपरेशन का प्रलोभन देकर लाये गये। मरीजों में महिलायें और पुरूष दोनों शामिल थे,जिनका आपरेशन अस्पताल के डाक्टरों ने बाहर से आये डाक्टरों के साथ किया। दो दिन बाद मरीजों के आंखों की पट्टियां  खोलकर उनकी जांच के बाद उन्हें अपने अपने घरों को जाने के लिये कह दिया गया. मुफ्त में हुए आपरेशन की खुशी में डूबे इन आदिवासियों को इसके बाद के परिणामों के बारे में कोई कल्पना ही नहीं थी। मरीजों को क्या पता था कि जिन आँखों में वे रोशनी की आस कर रहे है वे बहुत जल्दी पथरा जाने वाली हैं।

आपरेशन का एक सप्ताह ही बीता था और मरीजों की आखों में पानी और मवाद आना शुरू हो गया। पीडितों ने अस्पताल से सम्पर्क किया तो उन्हें अस्पताल बुलवाया गया। डाक्टरों ने दुबारा आपरेशन किया, लेकिन डॉक्टरी लापरवाही के कारण इन्फेक्शन इतना ज्यादा हो गया था कि उसका इलाज कर पाना डाक्टरों के बस का नहीं रह गया।

ऐसे में उन शातिर डाक्टरों ने अपना गुनाह छुपाने के लिए गरीब और अप़ढ़ आदिवासियों की संक्रमित आंखें  निकाल पत्थर की आंखें लगा दीं.अस्पताल की ओर से डाक्टर परवेज खान ने भी स्वीकार किया कि ‘संक्रमण ज्यादा था इसलिए आंख निकालने के अलावा कोई दूसर उपाय नहीं था। अगर ऐसा नहीं होता तो स्वस्थ आंख भी खराब हो सकती थी।’


एक असली आखों की जगह पत्थर की आंखे लगा देने की बात सामने आई तो जिला कलेक्टर केके खरे ने अस्पताल प्रबंधन को आदेश दिया कि वह पीड़ितों को तीस हजार रूपये मुआवजा और पांच सौ रूपये मासिक पेंशन दे। इसके साथ जिला प्रशासन ने जबलपुर मेडिकल  कालेज के एसोसिऐट प्रोफेसर डॉ. परवेज सिददीकी, डॉ. पवन अग्रवाल, नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हितेश अग्रवाल के अलावा जिला चिकित्सालय मंडला के नेत्र विशेषज्ञ डॉ. तरूण अहिरवार की जांच के लिएक उच्चस्तरीय टीम बनाई गयी।


आंख की जगह पत्थर लगाकर भरमाया
 विशेषज्ञ टीम ने अपनी रिपोर्ट कहा कि घटना के डेढ़ महीने बाद हुई की जांच में इन्फेक्शन का कोई ठोस कारण बता पाना संभव नहीं है। जाहिर है इस रिपोर्ट के बाद दोषी डॉक्टरों को क्लीनचिट मिलनी ही थी  और वह मिल भी गयी। उसके बाद योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट  अस्पताल के हौसले बुलंद हो गये और उसने कलेक्टर के मुआवजे वाले आदेश को धता बताते हुये मुआवजे के आदेश को अनसुना कर दिया।

अपनी आंख गंवा चुकी ग्राम झिरिया की रहने वाली रेवती बाई मोंगरे अपनी व्यथा सुनाते कहती हैं,‘मैं अपनी आखों का आपरेशन ही नहीं करवाना चाहती थीं,पर अस्पताल के लोगों की बातों में आकर मैंने आपरेशन करवा लिया.मुझे उन्हें नहीं मालूम था कि आँखें ठीक होना तो दूर रोशनी और दोनों आँखें ही चली जायेंगी.

कहीं से न्याय मिलता न देख आदिवासियों ने न्यायालय में गुहार लगायी है। आदिवासियों की ओर से मंडला के स्थानीय अधिवक्ता हमीद खान, विजय जंघेल और उनके सहयोगियों की मदद से एक परिवाद दायर किया है, जिसमें उन्होंने पीड़ितों के लिए तीन लाख रूपये मुआवजे की मांग की है।



 राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।




Feb 19, 2011

भाषा - भूगोल का अधिनायक और लेखक

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल,जंगल,ज़मीन और जीवन हुआ करती  है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा आदिवासियों को विस्थापित करती आयी हैं...


उदय प्रकाश

‘मोहन दास’ को दिये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को स्वीकार करते हुए, इस संदर्भ में अपनी ओर से कुछ कहना है। यह एक परंपरा रही है। मेरे असमंजस और दुविधा की शुरूआत ही यहीं से होती है, मैं क्या कहूं ?

मुझे लिखते-पढ़ते हुए कई दशक हो चुके हैं। लिखने की शुरूआत बचपन से ही कर दी  थी, जब खड़ी हिंदी बोली ठीक से आती भी नहीं थी। तब कभी यह सोचा नहीं था कि इसी भाषा  में एक दिन लेखक बनना है। ऐसा लेखक,जिसकी सामाजिक अस्मिता और जीवन का आधार किसी एक भाषा में लिखने तक ही सीमित होकर रहता है।

रोलां बाथ जिसे ‘पेपर बीइंग’कहते थे। तरह-तरह के कागजों पर स्याही में लिखे या छपे अक्षरों-शब्दों में किसी तरह अपना अस्तित्व बनाता हुआ प्राणी। आज के समय में वे होते तो कहते आधिभौतिक  आभासी व्योम में द्युतिमान अक्षर या शब्द के द्वारा अपने होने को प्रमाणित करता कोई अस्तित्व। यानी कहीं नहीं में, कहीं होता कोई प्राणी। ‘ए वर्चुअल नॉनबीइंग।’यानी ‘ए सोशल नथिंग।’  किसी अप्रकाशित को महाशून्य में प्रकाशित करने की माया रचता भासमान अनागरिक। आकाशचारी ‘नेटजन’।

बचपन जैसा असुरक्षित और भटकावों से भरा रहा, उसे देखते हुए, आकांक्षा यही थी कि आगे चलकर एक सुरक्षित और अपेक्षाकृत स्थिर वास्तविक जीवन मिले। इसके लिए वास्तविक कोशिश भी की। परिश्रम किया। परीक्षाओं में अंक अच्छे लाए। यह सारा प्रयत्न उसी भाषा में किया, जिसमें लेखक के रूप में उपस्थित और जीवित रहता था।

सोचा कोई नौकरी  मिल जाएगी तो वास्तविक जीवन गुज़र जाएगा। समाज-परिवार की जिम्मेदारी निभ जाएगी। किसी मध्यवर्गीय नागरिक की तरह। फिर एक समय, जब युवा होने की दहलीज़ पर ही था, यह लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं। इतना आत्मकेंद्रित क्या होना। जो किताबें पढ़ता था, उनसे भी यही प्रेरणा मिलती थी कि अपने समय को अधिक न्यायपूर्ण,सुंदर,मानवीय और उत्तरदायी बनाना चाहिए।

इतिहास ऐसे प्रयत्नों के बारे में, उन प्रयत्नों की सफलताओं-असफलताओं के बारे में बताता था। उपन्यास, कविताएं, दर्शन, विज्ञान और मानविकी की तमाम पुस्तकों में ऐसे संकेत और विवरण थे। कलाएं भी इसका उदाहरण बनती थीं। नितांत अकेलेपन और एकांतिक पलों में उपजने वाली भाषिक क-वाचिक अभिव्यक्तियों या अन्य कलाओं में भी यह प्रयत्न दिखाई देता था।

लेकिन इन सबमें सबसे प्रगट और शायद अधिक ठोस,साफ और आसान-सा उपक्रम जहां दिखता था, उसे राजनीति या सामाजिक कर्म कहते हैं। तो मैं उधर भी गया। इस सबके पीछे ऐसा लगता है कि कोई महान मानवीय-सामाजिक कार्य करने,बड़ा परिवर्तन लाने का कोई आत्मबलिदानी आदर्श या क्रांतिकारी लक्ष्य किसी समय रहा होगा। जिस पीढ़ी का मैं था, वह पीढ़ी ही कुछ-कुछ ऐसी थी।

आज इस उम्र में,इतनी दूर आकर कह सकता हूं कि शायद वह सारा प्रयत्न भी मेरी अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व की चिंता से जुड़ा हुआ था। एक स्तर पर वह कहीं गहराई से व्यक्तिगत भी था। शायद हम किसी भी परिवर्तन की कोशिश में तभी सम्मिलित होते हैं,जब हम उसमें स्वयं अपनी मुक्ति और अपनी स्थितियों में बदलाव देखते-पाते हैं।

मेरे पास भाषा और अपने शरीर के अलावा कोई दूसरा साधन और ऐसा माध्यम नहीं था, जिससे मैं दूसरों,और इस तरह अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ऐसा सामाजिक प्रयत्न कर सकता। तो एक दीर्घ समय तक,बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े हिस्से को,मैंने वहीं खर्च किया। यही सोचते हुए कि एक ऐसे समाज और समय में,जिसमें मेरे जैसे अन्य सभी सुरक्षित और स्वतंत्र होंगे, उसमें मैं भी स्वतंत्रता और नागरिक वैयक्तिक गरिमा के साथ रह सकूंगा।

आज इतने वर्षो के बाद भी मुझे लगता है कि मैं इस भाषा, जो कि हिंदी है, के भीतर, रहते-लिखते हुए,वही काम अब भी निरंतर कर रहा हूं,जबकि जिन्हें इस काम को भाषेत्तर  या व्यावहारिक सामाजिक धरातल पर संगठित और सामूहिक तरीके से करना था,उसे उन्होंने तज दिया है। इसके लिए दोषी किसी को ठहराना सही नहीं होगा। वह समूची सभ्यता का बदलाव था। मनुष्यता के प्रति प्रतिज्ञाओं से विचलन की यह परिघटना संभवतः पूंजी और तकनीक की ताकत से अनुचर बना डाली गई सभ्यता का छल था।

मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास में कई-कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे आखिर  में,जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है,तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वागत  में बोलता रहता है। या कागज़ पर लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट,कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती। इसे ‘सॉलीलाक्वीस’ कहते हैं।

मैं ज़रा-सा भाग्यशाली इसलिए हूं कि इस स्वगत को सुनने वाले बहुत से लोग मुझे अपनी ही नहीं, दूसरी अन्य भाषाओं में भी मिल गये हैं। इसमें हमारे अपने देश की भी भाषाएं हैं और दूसरे कुछ देशों  की भी।

एक प्रश्न हमेशा हमारे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिकरूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं?

और ठीक इसी से जुड़ा हुआ,इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है।

भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र,उसका देश,उसका घर और उसका अंतरिक्ष होता है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल,या शब्द और राज्य,दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है। कई तरह के प्रतिपक्षी और प्रतिभिन्न पाठों में प्रकट होते शब्दाडंबरों या डेमॉगागी के आर-पार वर्चस्व की वही संरचनाएं रहती हैं, जो किसी धरती के नागरिक या किसी भाषा के लेखक की स्वतंत्रता को नियंत्रित, अनुकूलित या अधीन करती हैं।

हर तरह की ऐसी सत्ता,मुझे अनिवार्य रूप से लगता है कि अपने मूल चरित्र में सर्वसत्तावादी होती है। इतिहास ने और मेरे अपने ही जीवन की स्मृतियों और अनुभवों ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है। यह सत्ता राज्य-व्यवस्था ही नहीं, किसी भी भाषा में विनिर्मित उन विचार-सरणियों को भी अधिगृहीत कर लेती हैं,जिनमें सबकी मुक्ति की कोई संभावना होती है। पिछले दो-ढाई दशकों के मेरे अनुभवों और संज्ञान ने यह बोध मुझे दिया है।

इसीलिए,जिस भाषा में मैं लिखता और रहता हूं, वह मेरे लिए, सिर्फ ‘हिंदी’ नहीं रह जाती। वह जीवन और यथार्थ का एक ऐसा जटिल प्रश्न बन कर उपस्थित होती है,जिसे किसी कथा या कविता या अपने किसी बयान में कहता हुआ मैं सत्ताओं के संदेह के घेरे में अक्सर आता रहता हूं। इसके बाद इस जगह मैं चुप रहूंगा।

मैं स्मरण दिलाना चाहूंगा कि पिछली सदी के ठीक बीतते ही, जब सब नयी सहस्राब्दी के स्वागत की मुद्रा में थे, मैंने एक लंबी प्रेमकथा लिखी थी -‘पीली छतरी वाली लड़की’। आप अगर ध्यान दें, तो लोकरंजक सरलता के उस सहज पाठ में भाषा और महुष्य का गहरा अनुचिंतन और विखंडन एक साथ विन्यस्त था। अपने नये कविता संग्रह-‘एक भाषा हुआ करती है’का भी ध्यान मैं दिलाना चाहूंगा।

मुझे लगता है कि लेखक हो जाने की अस्मिता हासिल होने के बाद उसकी स्वतंत्रता किसी भी जातीय, सांप्रदायिक, धार्मिक, लैंगिक या राजनीतिक या डेमॉगागिक वर्चस्व से नियंत्रित होती ही है। हर लेखक को,अगर उसने अन्य अस्मिताओं के सारे आवरण और कवच उतार दिये हैं और उसके पास अपने जीवन और अपने आत्म की रक्षा के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई दूसरा उपकरण नहीं बचा है, तो उसे हमेशा अपनी इस पराधीनता या औपनिवेशीकरण से मुक्ति का प्रयत्न करना ही पड़ता है।

मेरा यह भी मानना है और इसे मैं पिछले लंबे अर्से से कहता आ रहा हूं कि लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किसी आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं।

यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है,बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है,जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मसार कर सकती है।

आज जब मैं यहां आपके सामने अपना यह वक्तव्य पढ़ रहा हूं, उस समय आप सब देख रहे हैं कि पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है।

एक ऐसा मनोरोग जो किसी खास जगह नहीं, बल्कि संसार के सभी वंचित, वध्य, सत्ताहीन और शांत मूलनिवासियों के जीवन में ‘होलोकास्ट’पैदा कर रहा है। कई साल पहले मिशेल फूको की किताब ‘सभ्यता और उन्माद’ पढ़ी थी, उसे इस डरावने ढंग से प्रमाणित होते अपने सामने देख रहे हैं

भाषा भी पूंजी और तकनीक के साथ जुड़ी लोभी सत्ता-संरचनाओं की चपेट में है। इसके विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। उतना समय भी नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि भाषा भी अब एक जिंस और एक उत्पाद भर मान ली गई है और इससे जुड़े जितने भी अकादेमिक,व्यापारिक और राजकीय उद्यम हैं,उस लेखक की उसमें कहीं कोई जगह नहीं है। वह विस्थापन के ठीक उसी बिंदु पर है, जिसमें हमारे समय की वंचित मूलनिवासी मनुश्यता है।

मैं साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देता हूं और उस निर्णायक मंडल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं,जिसने मेरी लंबी कहानी या आख्यान ‘मोहन दास’को यह सम्मान दिया। जाहिर है,कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता,लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं अपनी खुशी यहां प्रकट करता हूं।

यह खुशी इसलिए अर्थ रखती है कि इस राज्य के एक नागरिक के रूप में मैं कुछ अपेक्षाकृत सुरक्षित-सा अनुभव कर रहा हूं। आप सबका हृदय से आभार।

(लेखक उदय प्रकाश ने यह वक्तव्य 16 फरवरी को अपनी कृति 'मोहन दास' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के अवसर पर दिया था. )


बजट में न्याय के लिए कितना पैसा


सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है, लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है...

संजय स्वदेश

केंद्रीय बजट आने वाला है। मीडिया अपेक्षित बजट पर चर्चा करा रही है। पर इन चर्चाओं में अन्य कई मुद्दों की तरह न्यायापालिका पर खर्च की जाने वाली राशि पर कोई हो-हल्ला नहीं है।

एक अकेले न्यायापालिका ही है जिसने कई मौके पर सरकार की जन अनदेखी कदम पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल की। न्यायपालिका के दामन पर कई बार भ्रष्टाचार के दाग लगे। इसके बाद भी आम आदमी उच्च और उच्चतम न्यायालय के प्रति विश्वसनीयता बनी हुई है। पर किसी सरकार ने न्यायपालिका को मजबूत करने के लिए कभी अच्छी खासी बजट की व्यवस्था नहीं की। इसका दर्द भी पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय के एक खंडपीठ के बयान में उभरा।

खंडपीठ    ने साफ कहा कि कोई भी सरकार नहीं चाहती कि न्यायपालिका मजबूत हो। यह सही भी है। देश महंगाई और भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है। भ्रष्टारियों के मामले में अदालत में लंबित पड़ रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा माइली ने भी बयान दिया था कि केंद्र ने न्यायिक सुधार की दिशा में पहल कर दिया है, जिससे मामलों का जल्द निपटारा होगा। कोई भी केस कोर्ट में तीन साल से ज्यादा नहीं चलेगा और  भ्रष्टाचार के मामले में एक साल के अंदर न्याय मिलेगा।

कानून मंत्री के कहे मुताबिक  ऐसा हो जाए तो  निश्चय ही भ्रष्टाचारियों में खौफ बढ़ेगा। वर्तमान कानून में भ्रष्टाचारियों को कठोर सजा का प्रावधान नहीं है। त्वरित न्याय की दिशा में फास्ट ट्रैक्क अदालतों के गठन हुए थे। इन पर भी धीरे-धीरे मामलों का बोझ बढ़ता गया। न्याय में देरी की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। मामलों के लंबे खिंचने से उनके हौसले बुलंद है।

सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है। लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है। जिसको लेकर कभी देश में गंभीर बहस नहीं हुई। स्वतंत्र कृषि बजट,दलित बजट आदि की तो खूब मांग उठती है,पर अदालत की मजबूती के लिए गंभीर चर्चा नहीं होती है। इस ओर ध्यान उच्चतम न्यायालय के खंडपीठ के दर्द भरे बयान के बाद ही गया।

भारी भरकम बजट देकर यदि सरकार न्यायपालिका को मजबूत कर दे तो देश में कई समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाएगा। देशभर के अदालतों के लाखों मामलों में तारिख पर तारिख  मिलती जाती है। जनसंख्या और मामलों के अनुपात में देश में अदालतों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती रही है। दरअसल मामलों की बढ़ती संख्या और सरकार की उदासिनता के कारण ही न्यायपालिका का आधारभूत ढांचा ही चरमराने लगा है।


अदालतों की कम संख्या न्यायापालिका की वर्तमान व्यवस्था में निर्धारित अविध में सरकार त्वरित न्याय की गारंटी नहीं दे सकती है। जिन प्रकरणों से मीडिया ने जोरशोर से उठाया वे भी वर्षों तक सुनवाई में झूलती रही है। दूर-दराज में होने वाले अनेक सनसनीखेज प्रकरणों में पीड़ित दशकों से न्याय की आशा लगाये हैं। प्रकरणों के लंबित होने से तो लोगों के जेहन से यह बात ही निकल जाती है कि कभी कोई वैसा प्रकरण भी हुआ था। अनेक लोग तो न्याय की आश लगाये दुनिया से चल बसे। मामला बंद हो गया। कई लोगों को जवानी में लगाई गई गुहार का न्याय बुढ़ापे तक नहीं मिला। लिहाजा, त्वरित न्याय की मांग हमेशा होती रही है।

पिछले दिनों सरकार ने भी त्वरित न्याय आश्वासन तब दिया जब जब देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन की सुगबुगाहट हुई। प्रमुख शहरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैली निकली, सीबीसी थॉमस को लेकर सरकार कटघरे में आई। आदर्श सोसायटी घोटाले को लेकर हो हल्ला हुआ। काले धन को स्वदेश वापसी को लेकर सरकार की फजीहत हुई। फिलहाल देश की नजरे वर्ल्ड कप क्रिकेट और आने वाले बजट पर टिकी है।
 
बहुत कम लोगों के जेहन में बजट में न्यायपालिका की उपेक्षा को लेकर टिस उभर रही होगी। यदि सरकार ने बजट में न्यायपालिका के लिए खजाना खोला तो निश्चय ही न्यायपालिका को मजबूती मिलेगी। लेकिन पिछली सरकार की परंपरा को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि सरकार न्यायापालिका पर मेहरबान होगी। जाहिर है  न्यायपालिका की मजबूती सरकार की मनमानी का अंकुश साबित होगा।
 
 

 दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े संजय स्वदेश देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोटर्ल से लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं . उनसे sanjayinmedia@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 
 
 
 
 

Feb 18, 2011

मैं गंवार हूं...



अशोक विश्वास

चम्मच से मुझे खाने की आदत नहीं

छूरी की मुझे जरूरत नहीं

मैं खाता हूं ज़मीन काटकर

मैं खाता हूं सबको बांटकर

इसलिए कि मैं गंवार हूं



मेरे बच्चे स्कूल में पढ नहीं पाते

बेरहम दुनिया से लड नहीं पाते

तभी तो वो सफलता की सीढी चढ नहीं पाते

इसलिए कि मैं गंवार हूं



जीवन भर मैं औरों के लिए बनाता हूं महल

हर काम की मुझसे ही होती है पहल

फिर भी मैं रहता हूं झोपडी में

दुख और गरीबी ही है मेरी टोकरी में

इसलिए कि मैं गंवार हूं



गरीबी ही है मेरी हमजोली

बीमारी मेरी दीवाली

और मौत ही मेरी होली

ये सब इसलिए क्योंकि मैं गंवार हूं



(अशोक, सरगुजा में सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनकी यह कविता सीजीनेट स्वर  से साभार ली जा रही है.)   



लीपापोती की महान भारतीय परम्परा


नेता हो या अधिकारी अथवा समाज के किसी और तबके का कोई भी व्यक्ति, सभी की मनोवृति ऐसी बन चुकी देखी कि वह सब कुछ बुरा ठीक-ठाक दर्शाना चाहता है...

निर्मल  रानी   

आजकल  भ्रष्टाचार का मुद्दा चर्चा का मुख्य   विषय बना हुआ है। ऐसा लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में 'भ्रष्टाचार' ही चुनाव का केंद्र बिंदु होगा। परंतु यदि हम भ्रष्टाचार के इन कारणों की तह में जाने की कोशिश करें तो हम यह पाएंगे कि हमारे देश में लीपापोती करने की  आदत सी बन चुकी है.

नेता हो या अधिकारी अथवा समाज के किसी और तबके का कोई भी व्यक्ति लगभग सभी की मनोवृति ऐसी बन चुकी है   कि वह सब कुछ ठीक-ठाक दर्शाना चाहता है. इसी तथाकथित 'ठीक-ठाक' के थोथे प्रदर्शन के पीछे छुपा होता है छोटे से लेकर बड़े से बड़ा भ्रष्टाचार, घोटाला, लापरवाही, अकर्मण्यता, हरामखोरी, रिश्वतखोरी तथा ढेर सारी गैजिम्मेदारियां आदि।

आज के तथाकथित वीआईपी गण कहीं न कहीं आते-जाते रहते हैं। इनका भी कोई न कोई मार्ग होता है और कभी कभी शहरों के व्यस्त बाज़ारों या रास्तों से भी इन्हें गुज़रते हुए जलसे-जुलूस में आना जाना पड़ता है।  वीआईपी के गुज़रने वाले रास्ते में गड्ढे हैं तो भले ही वह विगत कई महीनों व कई वर्षों से क्यों न हों तथा जनता उन गड्ढों में कितनी बार गिर कर अपना नुकसान क्यों न कर चुकी हो,परंतु जब विशिष्ट व्यक्ति अर्थात हमारे 'सेवक'को उस रास्ते से गुज़रना है तो उन गड्ढों को  तत्काल भर दिया जाता है। कूड़े करकट के ढेर हटा इन रास्तों के किनारे चूने का छिड़काव भी कर दिया जाता है तथा रंगीन झंडियां आदि लगाकर उनका स्वागत किया जाता है।


दिल्ली  में राष्ट्रमंडल खेलों से ऐन   पहले गिरा था पुल  
पिछले दिनों अम्बाला के बराड़ा कस्बे में एक फ्लाईओवर का उद्घाटन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया। वैसे भी इस  निर्माण की गति शुरु से ही बहुत धीमी थी। किसी प्रकार यह तैयार हुआ। इस फ्लाईओवर के दोनों ओर स्ट्रीट लाईट का प्रबंध किया गया है,चूना-सफेदी की गई तथा उसपर लगे बिजली के खंभों को सिल्वर पेंट द्वारा चमकाया गया। आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिस स्थान पर उद्घाटन का पत्थर लगा था उसी स्थान तक लगे बिजली के खंभों को पेंट किया गया, वह भी आधा-अधूरा।

ऐसी ही एक घटना अंबाला छावनी के मुख्य  बस स्टैंड के उद्घाटन के समय की याद आती है. स्वर्गीय बंसी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सत्ता के अंतिम दिन गुज़ार रहे थे। जाते-जाते वह अपने नाम की अधिक से अधिक उद्घाटन शिलाएं तमाम सरकारी इमारतों में लगाकर जाना चाह रहे थे। उन्हीं इमारतों में से एक भवन अंबाला छावनी बस अड्डे का भी था। उस नवनिर्मित हुए बस अड्डे का काम अभी भी पूरी नहीं हुआ था कि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा बस अड्डे के भवन के उद्घाटन करने की तिथि घोषित हो गई।

दिन-रात तेज़ी से काम कर सरकार को यह बता दिया गया कि बस अड्डा पूरी तरह से ठीक-ठाक है तथा उद्घाटन के लिए तैयार है। वह तिथि व निर्धारित समय आ गया। मुख्यमंत्री आए उद्घाटन समारोह बस स्टैंड के मुख्य  विशाल शेड में संपन्न हुआ। अभी मुख्यमंत्री महोदय का भाषण चल ही रहा था कि काफी तेज़ बारिश शुरु हो गई। इस भारी बारिश के चलते पूरे सभा स्थल की छत टपकने लगी। चारों ओर पानी ही पानी हो गया। गोया जिस प्रकार की लीपापोती प्रशासन ने करनी चाही उसकी पोल प्रकृति ने खोलकर रख दी।

लीपापोती तथा सब ठीकठाक दिखाई देने जैसी कमज़ोर व खोखली परंपरा कोई गांव,शहर या राज्यस्तर तक ही सीमित नहीं है। बल्कि दुर्भाग्यवश शायद यह प्रवृति हमारी परंपराओं में ही शामिल हो चुकी है और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में भी हम अपनी इसी प्रवृति या परंपरा के शिकार होते देखे जाते हैं।

पिछले  वर्ष भारत में पहली बार राष्ट्रमंडल खेल आयोजित हुए। यह तो भला हो हमारे देश के खिलाडिय़ों का जिन्होंने अप्रत्याशित रूप से सौ से अधिक पदक जीतकर देश की इज़्ज़त बचा ली। क्योंकि शासन व प्रशासन के लोगों की तरह खेल जैसी प्रतिस्पर्धाओं में लीपापोती या जबरन सब ठीक-ठाक है कहने से पदक कतई हासिल नहीं हो सकता। अन्यथा इस आयोजक मंडल के सदस्यों ने तो देश की नाक कटवाने में अपनी ओर से तो कोई कसर ही बाकी नहीं रखी थी।

 ज़रा कल्पना कीजिए कि उन विदेशी मेहमानों को या विदेशी खिलाडिय़ों को आज जब यह पता लग रहा होगा कि भारत में हुए राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति की अमुक-अमुक हस्तियां जो कल तक अहंकार तथा सत्ता का प्रतीक बनी हुई दिखाई दे रहीं थीं,वही हस्तियां आज जांच एजेंसियों द्वारा की जाने वाली पूछताछ,संदेह व फज़ीहत की शिकार हैं तो उनके दिलो-दिमाग पर हमारे देश की क्या छवि बन रही होगी?

यह ऐसे निठल्ले,हरामखोर तथा घोटालेबाज़ शासनिक व प्रशासनिक अधिकारियों व जिम्मेदार लोगों की ही देन थी कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के दौरान कभी कोई पुल गिर गया तो तमाम जगहों पर गड्ढे नहीं भरे जा सके। कई भवनों को आधा-अधूरा रखकर ही उन पर लीपापोती कर दी गई और आख़िरकार  ऐसे तमाम गड्ढों को व गंदगी,कूड़ा-करकट आदि को छुपाने के लिए उन बेशकीमती होर्डिंग्स  का सहारा लिया गया जिन्हें किन्हीं अन्य स्थानों पर लगाने के लिए बनवाया गया था। कहीं गमले रखकर अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश की गई तो कहीं रातोंरात घास व पौधे लगाकर लीपापोती की गई।

इन्हीं सब लापरवाहियों के परिणामस्वरूप ही निकल कर आया है देश का सबसे बड़ा राष्ट्रमंडल खेल घोटाला। लीपापोती करने व सब कुछ ठीक-ठाक है जैसा थोथा प्रदर्शन करने से हमें बाज़ आना चाहिए तथा जहां भी इस प्रकार की कोशिशें की जा रही हों,उसका न सिर्फ पर्दाफाश करना चाहिए बल्कि सामाजिक स्तर पर इनका विरोध भी किया जाना चाहिए। ऐसी परंपराओं का प्रबल विरोध निश्चित रूप से देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सहायक साबित होगा।




लेखिका सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लिखती हैं, उनसे mailto:nirmalrani@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.







Feb 17, 2011

महाशिवरात्रि का आनंद लेने बराड़ा आयें

अम्बाला.सबसे ऊंचा रावण बनाए जाने का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के बाद अब हरियाणा के अंबाला जिले के  बराड़ा कस्बे में महाशिवरात्रि का विशाल एवं भव्य आयोजन दो मार्च को होने  जा रहा है। बराड़ा के श्रीरामलीला क्लब एवं ओंकार कलामंच के संयुक्त प्रयास से  आगामी दो मार्च को निकाली जाने वाली महाशिवरात्रि की विशाल शोभायात्रा की तैयारियां इन दिनों चरम पर हैं।

आयोजक  संस्था के संस्थापक अध्यक्ष राणा तेजिंद्र सिंह चौहान ने महाशिवरात्रि की तैयारियों के बारे में बताया कि अपने निरंतर आयोजन के दो दशक पूरे कर चुकने के बाद इस वर्ष भी शोभा यात्रा में तमाम प्रमुख विशालकाय प्रतिमाएं एवं आकर्षक झांकियां जनता एवं भक्तजनों के दर्शनार्थ प्रस्तुत की जाएंगी।



इन विशालकाय प्रतिमाओं एवं झांकियों में शिव  परिवार,शेर सहित दुर्गा माता,पंचमुखी हनुमानजी,जल प्रवाह करती गंगा मैया,शिव जटाओं से निकलती शिवगंगा,शिरडी वाले साईं बाबा,मूषक पर सवार गणेश जी,कृष्ण-बकासुर,विष्णु-गरुड,शिवलिंग,कमल में विराजमान ब्रह महाकाल,बाल्मीकि जी,राधा-कृष्ण,गऊ माता आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त शंकर जी बारात की झांकी भी प्रस्तुत की जाएगी। विशेषरूप से इस बार आगरा के शंकर जादूगर शोभायात्रा में अपने जादू के शानदार करतब भी दिखलाएंगे।

तेजिंद्र चौहान ने बताया कि इस वर्ष महाशिवरात्रि में शोभायात्रा की रौनक बढाऩे हेतु देश की जिन सुप्रसिद्ध बैंड पार्टियों को आमंत्रित किया गया है वे हैं,रवि बैंड मेरठ,अशोक बैंड सहारनपुर,पंजाब बैंड सहारनपुर,हीरा बैंड शामली,पंजाब बैंड ज्वालापुर,सुंदर बैंड मुजफ्फरनगर ,सोनू बैंड रुड़की,लक्ष्मी बैंड करनाल,हीरा बैंड यमुना नगर,रवि बैंड अंबाला,न्यू हीरा बैंड पंचकुला,लक्ष्मी बैंड कुरुक्षेत्र,हीरा बैंड सरसावा आदि।

इसके अतिरिक्त मेरठ के प्रसिद्ध शहनाई वादक रूपाशंकर और साथी शोभायात्रा में जहां अपनी शहनाई पेश करेंगे,वहीं मेरठ के रविशंकर शहनाई वादक,रविशंकर ताशा पार्टी मेरठ तथा शमशाद एंड पार्टी,पंजाबी ढोल चंडीगढ़ भी महाशिवरात्रि के अवसर पर अपने हुनर व कला का शानदार प्रदर्शन करेंगे।

राणा तेजिंद्र चौहान के अनुसार महाशिवरात्रि की यह विशाल शोभा यात्रा बराड़ा स्थित नई अनाज मंडी से दो मार्च को प्रात:10बजे आरंभ होकर अपने निर्धारित मार्गों से होते हुए लगभग तीन किलोमीटर का मार्ग तय कर बराड़ा गांव में पहुंचेगी जहां इस कार्यक्रम का समापन होगा।

चंद्रकांत देवताले को कविता समय सम्मान


''पहला कविता समय सम्मान हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में एक चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मान  युवा कवि कुमार अनुपम को दिया जायेगा.“दखल विचार मंच”और “प्रतिलिपि” के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए की गयी पहल कविता समय के अंतर्गत दो वार्षिक कविता सम्मान स्थापित करने का निर्णय संयोजन समिति द्वारा लिया गया.

समिति के चारों सदस्यों –बोधिसत्व,पवन करण,गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय –ने सर्वसहमति से वर्ष २०११ के सम्मान चंद्रकांत देवताले और कुमार अनुपम को देने का फैसला लिया. कविता समय सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और पाँच हजार रुपये की राशि तथा कविता समय युवा सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और ढाई हजार रुपये की राशि प्रदान की जाएगी.
कविता समय सम्मान हर वर्ष ६० वर्ष से अधिक आयु के एक वरिष्ठ कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता ने निरंतर मुख्यधारा कविता और उसके कैनन को प्रतिरोध देते हुए अपने ढंग से,अपनी शर्तों पर एक भिन्न काव्य-संसार निर्मित किया हो और हमारे-जैसे कविता-विरोधी समय में निरन्तर सक्रिय रहते हुए अपनी कविता को विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुकूलित नहीं होने दिया हो.

कविता समय युवा सम्मान ४५ वर्ष से कम आयु के एक पूर्व में अपुरस्कृत ऐसे कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता की ओर, उत्कृष्ट संभावनाओं के बावजूद, अपेक्षित ध्यानाकर्षण न हुआ हो. इस वर्ष के सम्मान ग्वालियर में २५-२६ फरवरी को हो रहे पहले कविता समय आयोजन में प्रदान किये जायेंगे.''