Dec 25, 2010

फैसला खून की रफ़्तार बढ़ा गया 'माइलॉर्ड'


देश में पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चुकी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्स्थापित करने में लगे विनायक सेन ने कभी नक्सली हिंसा का समर्थन  नहीं किया, पर वो राज्य समर्थित हिंसा के भी हमेशा खिलाफ रहे,चाहे वो सलवा जुडूम हो या फिर छतीसगढ़ के जंगलों में चलाया जा रहा अघोषित युद्ध...

आवेश तिवारी

 
घोटालों,भ्रष्ठाचार,आतंक और राजनैतिक वितंडावाद से जूझ रहे इस देश में अदालतों का चेहरा भी बदल गया है. ये अदालतें अब आम आदमी की अदालत नहीं रही गयी हैं.  न्याय की देवी की आँखों में बन्दे काले पट्टे ने समूची न्यायिक प्रणाली को काला कर दिया है.जज राजा है,वकील दरबारी और हम आप वो फरियादी हैं जिन्हें फैसलों के लिए आसमान की ओर  देखने की आदत पड़ चुकी है.

बिनायक सेन को उम्र कैद की सजा हिंदुस्तान की न्याय प्रक्रिया का वो काला पन्ना है जो ये बताता है कि अब भी देश में न्याय का चरित्र अंग्रेजियत भरा है जो अन्याय,असमानता और राज्य उत्प्रेरित जनविरोधी और मानवताविरोधी परिस्थितियों के साए में लोकतंत्र को जिन्दा रखने की दलीलें दे रहा है. सिर्फ बिनायक सेन ही क्यूँ देश के उन लाखों आदिवासियों को भी इस न्याय प्रक्रिया से सिर्फ निराशा हाँथ लगी हैं जिन्होंने अपने जंगल अपनी जमीन के लिए इन अदालतों में अपनी दुहाई लगाई. खुलेआम देश को गरियाने वाले देश- विदेश घूम घूम कर हिंदुस्तान के खिलाफ विषवमन करते हैं,और संवेदनशील एवं न्याय आधारित व्यवस्था का समर्थन करने वालों को सलाखों में ठूंस दिया जाता है.

बिनायक सेन की सजा के आधार बनने वाले जो सबूत छत्तीसगढ़ पुलिस ने प्रस्तुत किये,वो अपने आप में कम हास्यास्पद नहीं है.पुलिस द्वारा मदन लाल बनर्जी का लिखा एक पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमे बिनायक सेन को कामरेड बिनायक सेन कह कर संबोधित किया गया है.एक और पत्र है जिसका शीर्षक है कि "कैसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में फ्रंट बनाये",इनके अलवा कुछ लेख कुछ पत्र जिन पर बकायदे जेल प्रशासन की मुहर है सबूत के तौर पर प्रस्तुत की गयी.


भगत सिंह और सुभाष चद्र बोस जिंदाबाद के नारे लिखे कुछ पर्चे भी इनमे शामिल हैं.अदालत ने अपने फैसले में सजा का आधार जिन चीजों को माना है वो देश  के किसी भी पत्रकार समाजसेवी के झोले की चीजें हो सकती हैं. बिनायक सेन चिकित्सक हैं अन्यथा  पुलिस एक कट्टा ,कारतूस या फिर एके -४७ दिखाकर और कुछ एक हत्याओं में वांछित दिखाकर उन्हें फांसी पर चढवा देती.देश में माओवाद के नाम पर जिनती भी गिरफ्तारियां या हत्याएं हो रही हैं चाहे वो सीमा आजाद की गिरफ्तारी हो या हेमचंद की हत्या सबमे छल ,कपट और सत्ता की साजिशें मौजूद थी.

साजिशों के बदौलत सत्ता हासिल करने और फिर साजिश करके उस सत्ता को कायम रखने का ये शगल अब नंगा हो चुका है.माओवादियों के द्वारा की जाने वाली हत्याएं जितनी निंदनीय हैं उनसे ज्यादा निंदनीय फर्जी मुठभेड़ें और बेकसूरों की गिरफ्तारियां हैं क्यूंकि इनमे साजिशें और घात भी शामिल हैं.बिनायक सेन एक चिकित्सक हैं वो भी बच्चों के चिकित्सक ,देश में पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चुकी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्स्थापित करने को लेकर उनके जो उन्होंने कभी नक्सली हिंसा का सर्थन नहीं किया पर हाँ,वो राज्य समर्थित हिंसा के भी हमेशा खिलाफ रहे ,चाहे वो सलवा जुडूम हो या फिर छतीसगढ़ के जंगलों में चलाया जा रहा अघोषित युद्ध.

बिनायक खुद कहते हैं "माओवादियों और राज्य ने खुद को अलग अलग कोनों पर खड़ा कर दिया है,बीच में वो लाखों जनता हैं जिसकी जिंदगी दोजख बन चुकी है.ऐसे में एक चिक्तिसक होने के नाते मुझे गुस्सा आता है जब इन दो चक्कियों के बीच फंसा कोई बच्चा कुपोषित होता है या किसी माँ का बेटा उसके गर्भ में ही दम तोड़ देता है ,क्या ऐसे में जरुरी नहीं है कि हिंसा चाहे इधर की हो या उधर की रोक दी जाए,और एक सुन्दर और सबकी दुनिया ,सबका गाँव सबका समाज बनाया जाए".

कम से कम एक मुद्दा ऐसा है जिस पर देश के सभी राजनैतिक दल एकमत हैं वो है नक्सली उन्मूलन के नाम पर वन,वनवासियों और आम आदमी के विरुद्ध छेड़ा गया युद्ध.भाजपा और कांग्रेस जो अब किसी राजनैतिक दल से ज्यादा कार्पोरेट फर्म नजर आती हैं,निस्संदेह इसकी आड़ में बड़े औद्योगिक घरानों के लिए लाबिंग कर रही हैं. वहीँ वामपंथी दलों के लिए उनके हाशिये पर चले जाने का एक दशक पुराना खतरा अब नहीं तब उनके अंतिम संस्कार का रूप लेता नजर आ रहा है.  ये पार्टियाँ भूल जा रही है कि देश में बड़े पैमाने पर एक गृह युद्ध की शुरुआत हो चुकी है, भले ही वो वैचारिक स्तर पर क्यूँ न लड़ा जा रहा हो.


विश्वविद्यालों की कक्षाओं से लेकर ,कपडा लत्ता बेचकर चलाये जाने वाले अख़बारों,पत्रिकाओं और इंटरनेट पर ही नहीं निपढ निरीह आदिवासी गरीब,शोषित जनता के जागते सोते देखे जाने वाले सपनों में भी ये युद्ध लड़ा जा रहा है.हम बार बार गिरते हैं और फिर उठ खड़े होते हैं. हाँ ,ये सच है, विनायक सेन जैसों के साथ लोकतंत्र की अदालतों का इस किस्म का गैर लोकतान्त्रिक फैसला रगों में दौड़ते खून की रफ़्तार को बढ़ा देता हैं,ये युद्ध आजादी के पहले भी जारी थी और आज भी है



 
पत्रकार  आवेश तिवारी  network6.com  वेबसाइट  के  संचालक हैं ,उनसे  awesh29@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।
 
 
 
 
 

Dec 24, 2010

लोग बीमार हैं,चलो डाक्टर को छुड़ा लायें !


विनायक सेन की पहली गिरफ्तारी पर  बगरुमनाला स्वास्थ्य   केंद्र पर मिली   शांति  बाई ने रोते हुए कहा था 'डॉक्टर साहब की गिरफ्तारी के बाद न जाने कितने सौ मरीज लौटकर चले गये। मेरा दिल कहता है अगर हम लोग डॉक्टर को नहीं बचा सके तो अपने बच्चों को भी नहीं बचा पायेंगे।'

अजय प्रकाश

डॉक्टर विनायक सेन, शिशुरोग विशेषज्ञ अब  छत्तीसगढ़ में अपने अस्पताल बगरूमवाला में नहीं रायपुर केंद्रीय कारागार में मिलते हैं। जहां मरीज नहीं,बल्कि डॉक्टर सेन को जेल से मुक्त कराने में प्रयासरत वकील,बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्त्ता  और दो बेटियां एवं पत्नी इलिना  सेन पहुंचती हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार की निगाह में विनायक सेन देशद्रोही हैं और अब कोर्ट ने भी कह दिया है.यह सजा उन्हें  इसलिए दी गयी है कि उन्होंने डॉक्टरी के साथ-साथ एक जागरूक नागरिक के बतौर सामाजिक कार्यकर्त्ता  की भी भूमिका निभायी है। विनायक सेन को राजद्रोह,छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा कानून 2005 और गैरकानूनी गतिविधि (निवारक) कानून जैसी संगीन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है और अब अदालत ने भी आजीवन कारावास की सजा मुकर्रर कर दी है.
 

बगरुमनाला स्वास्थ्य केंद्र पर डॉ  विनायक

डॉक्टर विनायक पीयूसीएल के छत्तीसगढ़ इकाई के महासचिव और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से नक्सलियों के मास्टरमाइंड  उस समय हो गये जब रायपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार पीयूष गुहा ने यह बताया कि उनसे जब्त तीनों चिट्ठियां (दो अंग्रेजी, एक बंग्ला) नक्सली कमाण्डर को सुपुर्द  करने के लिये थीं. मगर उसमें यह तथ्य नहीं है कि चिट्ठियां विनायक सेन से प्राप्त हुयीं। दूसरी बात जिसे कई बार कोर्ट में  पीयूष गुहा ने कहा भी है कि उसे एक मई को गिरफ्तार किया गया,जबकि एफआईआऱ छह मई को दर्ज  हुयी।

मतलब साफ है कि पुलिस ने पीयूष गुहा  को छह दिन अवैध हिरासत में रखा। पुलिस को पीयूष गुहा के बयान के अलावा और कोई भी पुख्ता सुबूत विनायक सेन के खिलाफ नहीं मिल सका। विनायक सेन कि गिरफ्तारी का आधार पुलिस ने बुजुर्ग  नक्सली नेता नारायण सन्याल से तैंतीस बार मिलने  तथा उन चिट्ठियों को ही बनाया जो नारायण ने जेल में मुलाकात के दौरान विनायक को सौंपी थी। हालांकि विनायक सेन के घर से प्राप्त हुईं इन सभी चिट्ठियों पर जेल प्रशासन  की मुहर थी और जेलर ने पत्र को अग्रसारित किया था।

पहली बार गिरफ्तारी के समय विनायक सेन के पदार्फाश  की कुछ उम्मीद पुलिस को उनके घर से जब्त सीडी से बंधी थी, लेकिन वह भी मददगार साबित न हो सकी। यही नहीं, सनसनीखेज सुबूत का दावा तब किया गया जब सेन के कम्प्यूटर को पुलिस उठा लायी। इसके अलावा नक्सली सहयोगी होने के प्रमाण के तौर पर उनके घर से जो सामग्री और स्टेशनरी जो जब्त की गयी थी, उस आधार पर देश के लाखों बुद्धिजीवियों और करोंड़ों नागरिकों को सरकार गिरफ्तार कर सकती है।

विनायक सेन की गिरफ्तारी को जायज ठहराने में लगा पुलिस बल सुबूतों को जुटाने के मामलों में मूर्खताओं की हदें पार कर गया था। पीपुल्स मार्च (अब प्रतिबंधित) पत्रिका की  एक प्रति, एक अन्य वामपंथी पत्रिका, अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ अंग्रेजी में लिखा गया हस्तलिखित पर्चा, साम्यवादी नेता लेनिन की पत्नी क्रुप्स्काया  द्वारा लिखित पुस्तक 'लेनिन',रायपुर जेन में सजायाफ्ता माओवादी मदनलाल का पत्र जिसमें उसने जेल को अराजकताओं-अनियमितताओं को उजागर किया तथा कल्पना कन्नावीरम का इपीडब्ल्यू (इकॉनोमिकल एण्ड पोलिटिकल वीकली) में छपे लेखों  को भी पुलिस ने जब्त किया था। जाहिर है इन सबूतों कि बिना पर कोई सजा नहीं बनती, मगर सत्र न्यायाधीश पी. बी. वर्मा ने विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. इससे आहत हो विनायक सेन की पत्नी इलिना सेन ने शुक्रवार 24 दिसम्बर 2010 को हुए फैसले को लोकतंत्र का काला दिन  कहा है.
 

विनायक सेन : देश के लिए देशद्रोही


बहरहाल, पहली गिरफ्तारी१६ मई २००७ के समय विनायक सेन के खिलाफ ढीले पड़ते सुबूतों के मद्देनजर पुलिस ने कुछ नये तथ्य भी कोर्ट  को बताये थे, जिसमें राजनादगांव और दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षकों ने नक्सलियों से ऐसा साहित्य बरामद किया  जिसमें विनायक सेन  की चर्चा थी. यानी कल   को माओवादियों के साहित्य या राजनीतिक   पुस्तकों में किसी साहित्यकार,इतिहासकार या सामाजिक  आन्दोलनों से जुड़े लोगों की चर्चा हो तो वे आतंकवाद निरोधक कानूनों के तहत गिरफ्तार किये जा सकते हैं।

विनायक देश के पहले ऐसे नागरिक हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा चलाये जा रहे दमनकारी अभियान सलवा जुडूम का विरोध किया था। इतना ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर फैक्ट फाइडिंग टीम गठित कर दुनियाभर को इत्तला किया कि यह नक्सलवादियों के खिलाफ आदिवासियों  का स्वतः स्फूर्त  आंदोलन नहीं बल्कि टाटा, एस्सार, टेक्सास आदि  के लिये जल, जंगल, जमीनों को खाली कराना है, जिसपर कि माओवादियों के कारण साम्राज्यवादियों का कब्जा नहीं हो सका है।


माओवादी हथियारबंद हो जनता को गोलबंद किये हुये हैं इसलिये सरकार के लिये संभव ही नहीं है कि उनके आधार इलाकों मे कत्लेआम मचाये बिना कब्जा कर ले। खासकर, तब जब जनता भी अपने संसाधनो को देने से पहले अंतिम दम तक लड़ने के लिये तैयार है। दमनकारी हुजूम यानी 'सलवा जुडूम'की नंगी सच्चाई के सामने आने से राज्य सरकार तिलमिला गयी। जिसके ठीक बाद बस्तर क्षेत्र के तत्कालीन डीजीपी सवर्गीय  राठौर ने कहा था कि 'मैं विनायक सेन और पीयूसीएल  दोनों को देख लूंगा।''

यहां तक कि इलिना (विनायक सेन की पत्नी) पर भी पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्होंने अनिता श्रीवास्तव नामक फरार नक्सली महिला की मदद की। यह सब चल ही रहा था कि इसी बीच विनायक सेन पर छत्तीसगढ़ के विलासपुर इलाके में काम कर रहे धर्मसेना  नाम के एक हिन्दू संगठन ने  धर्मान्तरण  का आरोप मढ़ना शुरू कर दिया। धर्मसेना के इस कुत्सा प्रचार का वहां  के दर्जनों गांवों के हजारों नागरिकों ने विरोध किया।

छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के अनुभवों और अपनी वर्गीय  दृष्टि की ऊर्जा को झोंककर जो संस्थाएं  विनायक सेन ने खड़ी की, वह उदाहरणीय हैं। कहना गलत न होगा कि विनायक सेन नेता नहीं हैं, मगर जनता के आदमी हैं। वह इसलिए कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 150किलोमीटर दूर धमतरी जिले के बगरुमनाला और कुछ अन्य गांवों में विनायक आदिवासियों की सेवा में निस्वर्ट भाव से लगे रहे.

डॉ. सेन देश के दूसरे नम्बर के बड़े आयुविर्ज्ञान संस्थान सीएमसी वेल्लुर से एमडी, डीसीएच हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में दिये जाने वाले विश्व स्तर के पुरस्कार पॉल हैरिसन पुरस्कार और जोनाथन मैन अवार्ड  से वे नवाजे जा चुके हैं। वर्ष 1992से धमतरी जिले के बागरूमवाला गांव में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र संचालित करने वाले विनायक सेन ने सामान्तर सामुदायिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की। डॉक्टर को यह साहस और अनुभव छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के संस्थापक स्वर्गीय शंकर गुहा नियोगी से मिला। गौरतलब है कि डॉक्टर सेन इस क्षेत्र में १९७८ से कम कर रहे हैं.

सवाल उठता है कि क्या यह सब करते हुये विनायक सेन अपने डॉक्टरी कर्तव्य को भी बखूबी निभा पाये। बगरुमनाला के स्वस्थ्य  केंद्र की  पिछले बारह वर्षों से देखरेख कर रहीं शांतिबाई ने कहती हैं कि 'डॉक्टर साहब को चौदह साल से जानती हूं। उन्होंने हमलोगों के लिए अपनी जिंदगी लगा दी.हम अकेली नहीं हूं जो डॉक्टर साहब के बारे में ऐसा मानती हूं। यहां से तीन दिन पैदल चलकर जिन गांव-घरों में आप पहुंच सकते हैं उनसे पूछिये डॉक्टर साहब कैसा आदमी है,बगरूमनाला के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कैसा इलाज होता है.'

विनायक सेन की पहली गिरफ़्तारी के बाद हुई मुलाकात में शांतिबाई ने रोते हुए कहा था 'डॉक्टर साहब की गिरफ्तारी के बाद न जाने कितने सौ मरीज लौटकर चले गये। मेरा दिल कहता है अगर हम लोग डॉक्टर को नहीं बचा सके तो अपने बच्चों को भी नहीं बचा पायेंगे।'


देश के लिए देशद्रोही


माओवादी नेता नारायण सान्याल से मुलाकातों को लेकर वह हमेशा कहते रहे हैं कि मैं इसे गुनाह नहीं मानता। एक डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मेरा फर्ज है कि मैं कानून की सहायता चाहने वालों और अस्वस्थ्य लोगों से मिलूं...


जनज्वार टीमसामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर विनायक सेन को छत्तीसगढ़ की एक कोर्ट ने देशद्रोह का अपराधी बताते हुए शुक्रवार को आजीवन कारावास की सजा सुनायी है। विनायक सेन के साथ सीपीआइ(माओवादी)के बुजूर्ग नेता नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को भी उम्रकैद की सजा हुई है। इन सभी पर आइपीसी की धारा 124ए,124बी और छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज है।

विनायक सेन को यह सजा जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्याल की चिट्ठयां जेल से बाहर ले जाने, चिट्ठियां भूमिगत माओवादियों तक पहुंचाने और इन चिट्ठियों के जरिये माओवादी आधार क्षेत्रों का विस्तार किये जाने के अपराध में दी गयी है। नारायन सान्याल माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं और उनकी उम्र करीब 80 वर्ष है।
विनायक सेन : हार की जीत                          फोटो -शैलेन्द्र

मुकदमें की सुनवाई करते हुए जिला और सत्र न्यायधीश बीपी वर्मा ने इन सभी को षड़यंत्र और देशद्रोह का अभियुक्त माना है। अदालत ने नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को माओवादी होने के नाते आजीवन कारावास की सजा मुकर्रर की है। विनायक सेन अदालत में नारायण सान्याल और पीयूष गुहा के साथ ही उपस्थित हुए थे।

डॉक्टर विनायक सेन गिरफ्तारी 14 मई 2007 को बिलासपुर में हुई थी। जेल में दो वर्ष की सजा काटने के बाद 58 वर्षीय विनायक सेन को सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद मई 2009 में स्वास्थ्य कारणों से छोड़ दिया गया था जिन्हें फिर एक बार छत्तीसगढ़ पुलिस ने हिरासत में ले लिया है।

विनायक सेन सरकार के आरोपों अब सजा मुकर्रर होने की प्रक्रिया को मनगढंत और मानवाधिकार के खिलाफ साजिश मानते हैं। पेशे से डॉक्टर विनायक सेन छत्तीसगढ़ में उस समय चर्चा में आये थे जब उन्होंने माओवादियों से निपटने के बहाने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को सलवा जुडूम अभियान के बहाने तबाह-बर्बाद किया जा रहा था।

विनायक देश के पहले शख्सियत थे जिन्होंने सलवा-जुडूम के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान चलाया था। उसी अभियान का असर रहा कि उसे सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को बंद करने का आदेश दिया था। विनायक सेन का कहना है कि ‘यह सजा सरकार के अत्याचारों के खिलाफ मुखर होने का प्रतिफल है।’माओवादी नेता नारायण सान्याल से मुलाकातों को लेकर वह हमेशा कहते रहे हैं कि ‘मैं इसे गुनाह नहीं मानता। एक डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मेरा फर्ज है कि मैं कानून की सहायता चाहने वालों और अस्वस्थ्य लोगों से मिलूं। नारायण सान्याल से हुई मेरी मुलाकातें भी इन्हीं संदर्भों में हुई थीं।’

 
विनायक सेन के साथ नारायण सान्याल

जहां तक चिट्ठयों को जेल से बाहर ले जाने का सवाल है तो इस बारे में विनायक सेन कहते रहे हैं कि ‘मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल का पदाधिकारी होने के नाते मैं यह क्यों नहीं कर सकता था?जेल से नारायण सान्याल के लिखे जो भी पत्र मैं ले गया हूं उन सब पर जेल प्रशासन की मूहर है।’

प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक इलीना सेन ने इसे लोकतंत्र का काला दिन कहा। इलीना सेन विनायक सेन की पत्नी हैं और गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में डीन हैं। उन्होंने पति की गिरफ्तारी पर कहा कि ‘देश में गुंडे खुलेआम घूमते हैं और आदिवासियों और गरीबों के बीच जीवन गुजार देने वाले विनायक सेन को देशद्रोही करार दिया जाता है।’इलीना ने कहा कि जिला और सत्र न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगी।

विनायक सेन की स्वास्थ्य के क्षेत्र में की गयी सेवाओं की दुनिया भर में बेहद कद्र है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार क्षेत्र में काम के लिए उन्हें जोनाथन मैन सम्मान और पॉल हैरिसन पुरस्कार से नवाजा गया है। छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता शंकर   गुहानी योगी के साथ सामाजिक कामों की शुरूआत करने वाले विनायक सेन दल्ली राजहरा स्थित अस्पताल के प्रमुख डाक्टरों में रहे हैं और वे बाद में मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने. गौरतलब है कि जब वे गिरफ्तार किये गए तो वह उपाध्यक्ष थे.  

छत्तीसगढ़  सरकार की निगाह में देशद्रोही और माओवादियों के शुभचिन्तक करार दिए गए विनायक सेन जब जेल से बाहर थे तब राज्य सरकार की सलाहकार समिति के सदस्य थे.सलाहकार रहने के दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ में गरीबों की बेहतर स्वस्थ सेवा के लिए जो सुझाव दिए थे बाद में उसी आधार पर सरकार ने वहां बहुचर्चित और सफल स्वस्थ सेवा 'मितानिन ' शुरू किया था. 

विनायक सेन डॉक्टरों की उस परंपरा से आते हैं जो सिर्फ दवा देना ही अपना कर्तव्य नहीं मानते बल्कि सामाजिक-आर्थिक हालात बदलने पर भी जोर देते हैं। यही वजह रही कि छत्तीसगढ़ में जब सलवा जुडूम के बहाने आदिवासियों के खिलाफ कॉरपोरेट और सरकारी साजिश शुरू हुई तो उन्होंने मुकम्मिल विरोध को सर्वाधिक बुलंदी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर उठाया, जिसका खामियाजा उन्हें आज भूगतना पड़ रहा है।

राजा आज सीबीआइ से क्या कहेंगे !

विकास के नाम पर कॉरपोरेट को मुनाफा पहुंचा कर   मंत्रालय की उपलब्धि बताने के अलावे कोई दूसरा रास्ता मनमोहन इकनॉमिक्‍स में नहीं है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी


सीबीआई के दरबार में ए.राजा आज (शुक्रवार)पेश होंगे। पूछताछ में ईडी और इन्कम टैक्स के अधिकारी समेत गृह मंत्रालय और आईबी के अधिकारी भी मौजूद होंगे। चूंकि छापों के बाद नौकरशाहों और कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया से पूछताछ में यह सवाल खुल कर सामने आया है कि 2जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस जिन्हें बांटे गये उनके जरिये अफ्रीका, नार्वें, रुस, मलेशिया और यूएई के कंपनियों से तार जुडे। और हवाला रैकेट के जरिये ही करोड़ों के वारे-न्यारे महज छह महीने से एक साल के भीतर कर दिये गये।

जाहिर है ऐसे में सीबीआई उस सिरे को ही पकड़ना चाहेगी कि कहीं पूर्व टेलीकॉम मंत्री की भूमिका लाईसेंस के जरिये हवाला रैकेट में तो कुछ नहीं थी। क्योंकि यही सिरा राजा की गिरफ्तारी करवा सकता है और सीबीआई 90दिनों में ऐसी चार्जशीट दाखिल कर सकती है जिसमें 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला प्रधानमंत्री के हद से बाहर निकल कर सीधे हवाला रैकेट से जुड़ता दिखायी दे। और समूची जांच की दिशा ही देशी-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उस खेल को पकड़ने में लग जाये जो देश में आर्थिक सुधार के साथ मनमोहन इकनॉमिक्‍स के जरिये विदेशी पूंजी की आवाजाही से शुरू हुआ।

लेकिन ए.राजा अगर स्पेक्ट्रम घोटाले के तार कॉरपोरेट संघर्ष की मुनाफाखोरी से जोड़कर उसमें राजनीति का तडका लगा देते हैं,तब क्या होगा। क्या तब यह सवाल खड़ा होगा कि टाटा या मुकेश अंबानी के लिये जो रास्ता नीरा राडिया मंत्रालयो में घूम-घूम कर बना रही थी उसके सामानांतर सुनील मित्तल या अनिल अंबानी के लिये कोई रास्ता बन नहीं पा रहा था।


इसलिये स्पेक्ट्रम का खेल बिगड़ा। और अगर स्पेक्ट्रम लाइसेंस के जरिये किसी कॉरपोरेट घराने को लाभ हुआ तो, जिसे घाटा हुआ उसने अदालत का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया। या फिर किसी भी कंपनी ने 2007-2009के दौर में अदालत जाकर यह सवाल क्यों खड़ा नहीं किया कि जिन कंपनियों ने कभी टेलीकॉम के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया उन्‍हें स्‍पेक्‍ट्रम का आबंटन क्‍यों किया गया। फिर कैसे लाख टके में कंपनी बना कर एक झटके में करोड़ों का वारे-न्यारे स्पेक्ट्रम लाइसेंस पाते ही कर लिया। असल में अर्थव्यवस्था के सामने सरकार कैसे नतमस्तक होती चली गयी है। और कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे में ही देश की चकाचौंध या देश की बदहाली सिमटती जा रही है। यह भी सरकार की आर्थिक नीतियों से ही समझा जा सकता है जिसके दायरे में राजा या राडिया महज प्यादे नजर आते हैं।

अगर राडिया देश के लिये खतरनाक है जैसा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने बताया है ,तो इसका जबाब कौन देगा कि जिन कंपनियों के लिये राडिया काम कर रही थी उनके मुनाफे के आधारों को क्या ईडी टोटलने की स्थिति में है। मुश्किल है। यह मुश्किल क्यों है इसे समझने से पहले जरा सरकार और कॉरपोरेट के संबंधों को समझना भी जरुरी है।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी खुद कहते है कि वह अंबानी बंधुओं को आज से नहीं बचपन से जानते हैं। यानी राजीव गांधी के दौर में जब धीरुभाई अंबानी मुश्किल में थे तब प्रणव मुखर्जी की कितनी करीबी धीरुभाई अंबानी से थी यह कांग्रेस की राजनीति का खुला पन्ना है। लेकिन नयी परिस्थिति में देश के तेल-गैस मंत्री मुरली देवडा मुकेश अंबानी के कितने करीबी हैं और देश के गृहमंत्री पी. चिदबरंम अनिल अंबानी से कितने करीबी हैं यह भी राजनीतिक गलियारे में किसी से छुपा नहीं है।

दस  जनपथ से अनिल अंबानी की दूरी भी किसी से छुपी नहीं है और अनिल अंबानी के मुनाफे के लिये मुलायम सिंह ने समाजवादी राजनीति को कैसे हाशिये पर ढकेल दिया यह भी किसी से छुपा नहीं है। लेकिन मनमोहन की इकनॉमी में जब संसदीय राजनीति ही हाशिये पर है तो फिर सरकार से ऊपर कॉरपोरेट हो इससे इंकार कैसे किया जा सकता है।

हो सकता है ए.राजा सीबीआई को खुल्लम-खुल्ला यही कह दें कि सुनील मित्तल और अनिल आंबानी की लॉबी स्पेक्ट्रम लाईसेंस में नहीं चली इसलिये उन्हें बली का बकरा बनाया जा रहा है। या फिर सरकार में जब कामकाज का तरीका ही जब यही बना दिया गया है कि लॉबिस्टों के जरिये कॉरपोरेट काम करें और लॉबिस्टों को कॉरपोरेट का नुमाइंदा मानकर सरकार नीतियों को अमल में लाये,क्योंकि हर कॉरपोरेट से मंत्रियों के तार जुड़े हैं तो सीबीआई क्या करेगी। 

मनमोहन इकनॉमिक्‍स में तो नीरा राडिया सरीखे लॉबिस्टो को भी बकायदा मंत्रालयों में काम करने का लाइसेंस दिया जाता है। और 2008 में जब पहली बार नीरा राडिया को ब्लैकलिस्ट में डाला गया तो उस वक्त कुल 74 लॉबिस्ट काम कर रहे थे जिसमें ब्लैक लिस्ट के नाम में सिर्फ नीरा राडिया नहीं बल्कि 28 दूसरे लॉबिस्टो के भी नाम थे।

यह भी हो सकता है राजा सरकार के अलग अलग मंत्रालयों की उस पूरी भूमिका को लेकर चर्चा छेड़ दें कि कैसे मुंबई एयरपोर्ट के लिये अनिल अंबानी का नाम भी शॉर्टलिस्ट किया गया था,लेकिन आखिरी प्रक्रिया में इसे सुब्बीरामी रेड्डे के बेटे जीवीके रेड्डी को दे दिया गया। हो सकता है ए.राजा ऊर्जा मंत्रालय के जरिये बांटे जा रहे थर्मल पावर प्रोजेक्ट का कच्चा-चिट्टा देकर सवाल खडा करें कि लाइसेंस देने के लिये घूसखोरी तो एक कानूनी प्रक्रिया है। जैसे एनटीपीसी ने बीएचईएल को छत्तीसगढ़ में कितनी रकम लेकर पावर प्रोजेक्ट लगाने की इजाजत दी। और जो सवाल सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर उठाये हैं कि आखिर राष्ट्रीयकृत बैंकों ने भी कैसे स्पेक्ट्रम लाईसेंस के नाम पर टटपूंजिया कंपनियों को 10-10हजार करोड़ रुपये लोन दे दिये।

हो सकता है ए.राजा सीबीआई को वह पूरी प्रक्रिया ही समझाने लगें कि कैसे विकास के नाम पर देश में अब कॉरपोरेट घराने ऐसे-ऐसे प्रोजेक्ट पर सरकार से हरी झंडी ले चुके हैं जिनका कोई बेंच मार्क ही किसी को पता नहीं है। जैसे दस साल पहले पावर प्रोजेक्ट लगाने के नाम पर सरकार से लाईसेंस लेकर बैकों से कितनी भी उधारी ले ली जाती थी और पावर प्रोजेक्ट का लाईसेंस पाने वाली कंपनी का अपना टर्नओवर चंद लाख का होता था।

लेकिन देश में बिजली चाहिये और बिना उसके विकास अधूरा है तो ऊर्जा मंत्री की उपलब्धि भी जब यह होती कि उसके जरिये कितने पावर प्रोजेक्ट आ सकते है तो फिर लेन-देन कितने का हो रहा है। बैंक कितना लोन किस एवज में दे रहा है,इसकी ठौर तो आज भी नहीं ली जाती है। अब सरकार की तरफ से सिर्फ इतना ही किया गया है कि पावर प्रोजेक्ट लगाने वाली कंपनी से पूछा जा रहा है कि वह प्रति यूनिट बिजली बेचेगी कितने में। जिसका आश्वासन आज भी कोई पावर प्रोजेक्ट कंपनी नहीं दे रही है।

हो सकता है राजा स्पेक्ट्रम लाइसेंस के बंटवारे के दौर में एसईजेड के लाइसेंस के बंदर बांट का किस्सा भी छेड़ दें और बताने लगें कि कैसे राडिया एसईजेड को लेकर भी किस-किस कॉरपोरट के लिये किस-किस मंत्रालय में घूम-घूम कर लॉबिग कर रही थी। और कैसे निखिल गांधी जब सबसे पहले एसईजेड के प्रपोजल के साथ सरकार के दरवाजे पर पहुंचे थे,तो मुकेश अंबानी ने उस प्रपोजल को ही रुकवा कर सात सौ करोड़ में निखिल गांधी से एसईजेड का ब्लू-प्रिंट ही खरीद लिया था।

यानी कब,कैसे किस-किस कॉरपोरेट घराने की तूती सरकार और मंत्री से गठजोड कर चलती रही है और विकास के नाम पर कॉरपोरेट को मुनाफा पहुंचा कर मंत्रालय की उपलब्धि बताने के अलावे कोई दूसरा रास्ता भी मनमोहन इकनॉमिक्‍स में नहीं है। क्योंकि नार्थ-साउथ ब्‍लॉक के बीच दुनिया की सबसे खूबसूरत रायसीना हिल्स पर अगर रेड कारपेट किसी के लिये बिछी है तो वह कॉरपोरेट के लिये।

तो आज ए.राजा सीबीआई से पूछताछ में क्या कहेंगे जानना सभी यही चाहेगें। लेकिन हो सकता है कि सरकार ना चाहे कि राजा बहकें और फिर  सीबीआई राजा को पूछताछ के साथ गिरफ्तार कर फिलहाल 90दिनो के लिये स्पेक्ट्रम घोटाले का केस लाक कर दें। तो इंतजार कीजिये।


पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं,जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष २००५ का ‘इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस’और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला। उनसे punyaprasun@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.यह लेख उनके ब्लॉग http://prasunbajpai.itzmyblog.com  से साभार लिया जा रहा है.

Dec 22, 2010

कवि निकानोर पार्रा सान्दोवाल


कवि और अनुवादक नीलाभ ने अपने ब्लॉग 'नीलाभ का मोर्चा '  पर जानकारी दी है कि वे देश-विदेश के जाने-माने कवियों की रचनाओं के लगातार अनुवाद पेश करेंगे.इसी कड़ी में पढ़िए चीले के कवि  निकानोर पार्रा सान्दोवाल की कविता...


युवा कवि

चाहे जैसा लिखो,
जो भी शैली तुम्हें पसन्द हो, अपना लो
बहुत ज़्यादा ख़ून बह चुका है
पुल के नीचे से
यह मानते रहने के लिए
कि सिर्फ़ एक ही रास्ता सही है
कविता में हर बात की इजाज़त है
शर्त बस यही है
तुम्हें बेहतर बनाना है कोरे पन्ने को

नामों का परिवर्तन

साहित्य-प्रेमियों को
मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
मैं कुछ चीज़ों के नाम बदलने जा रहा हूँ।
मेरी मान्यता यह है :
कवि अपने क़ौल का सच्चा नहीं
अगर वह चीज़ों के नाम नहीं बदलता।

क्या कारण है कि सूरज को
हमेशा सूरज ही कहा जाता रहा है ?
मैं कहता हूँ कि उसे
एक डग में चालीस कोस नापते जूतों वाली
बिल्ली कहा जाय।

मेरे जूते ताबूतों जैसे लगते हैं ?
तो जान लीजिए कि आज के बाद
जूतों को ताबूत कहा जायेगा।

बता दीजिए, सूचित कर दीजिए,
प्रकाशित कर दीजिए इसे -
कि जूतों का नाम बदल दिया गया है :
अब से उन्हें ताबूत कहा जायेगा।

ख़ैर, रात तो ख़ासी लम्बी है।
अपना सम्मान करने वाले हर मूर्ख के पास
उसका एक अपना शब्द-कोश तो होना ही चाहिए

और इससे पहले कि मैं भूल जाऊँ
ईश्वर को भी तो अपना नाम बदलवाना पड़ेगा
हर कोई उसे जो नाम देना चाहे दे दे
यह एक निजी समस्या है।

रोलर कोस्टर

आधी सदी तक
कविता
गम्भीर मूर्खों का स्वर्ग थी
जब तक कि मैंने आ कर
अपना रोलर कोस्टर नहीं बनाया
सवार हो जाओ अगर तुम्हारा जी चाहे
लेकिन अगर तुम नाक और मुंह
फोड़वा कर उतरो
तो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है

मेरा प्रस्ताव है कि बैठक स्थगित कर दी जाय

देवियो और सज्जनो
मेरे पास सिर्फ़ एक सवाल है:
क्या हम सूर्य की सन्तान हैं या धरती की ?
क्योंकि अगर हम केवल धरती हैं
तो मुझे इस फ़िल्म की शूटिंग
जारी रखने में कोई तुक नहीं नज़र आता।
मेरा प्रस्ताव है कि बैठक स्थगित कर दी जाय।

रस्में

हर बार
जब मैं लौटता हूँ अपने देश
लम्बी यात्राओं के बाद
सबसे पहले मैं
उन लोगों के बारे में पूछता हूँ
जो दिवंगत हो गये हैं:
महज़ मौत की सरल-सी क्रिया से
सभी लोग नायक हैं
और नायक ही हमारे शिक्षक हैं
फिर मैं पूछता हूँ
घायलों के बारे में।
इसके बाद ही,
जब यह छोटी-सी रस्म पूरी हो जाती है
मैं माँग करता हूँ जीवन के अपने अधिकार की :
खाता हूँ, पीता हूँ, आराम करता हूँ
आँखें मूँदता हूँ ताकि और भी साफ़ देख सकूं
और गाता हूँ मैं विद्वेष-भरे स्वर में
इस सदी के आरम्भिक दिनों का कोई गीत

अधूरा प्रेमी

एक नव विवाहित जोड़ा
आ कर रुकता है एक क़ब्र के पास
वधू मातमी सफ़ेद लिबास में लिपटी है
उनके देखे बिना उन पर नज़र रखने के लिए
मैं एक खम्भे के पीछे छिप जाता हूँ
गहरी उदासी में डूब कर जब वधू
अपने पिता की कब्र से घास साफ़ करती है
उसका अधूरा प्रेमी बड़ी तन्मयता से
पत्रिका पढ़ता रहता है

घड़ियाँ

सान्तियागो, चिली में
दिन बेहद लम्बे होते हैं :
एक दिन में अनेक सदियाँ
खच्चरों पर सवार
सागर-सिवार के फेरी वालों की तरह
तुम उबासी लेते हो -
फिर-फिर उबासी लेते हो

लेकिन हफ़्ते बहुत छोटे होते हैं
महीने सरपट गुज़रते हैं
और वर्षों ने तो जैसे पंख उगा लिये हैं

कविता मेरे साथ ख़त्म होती है

मैं किसी चीज़ को ख़त्म नहीं कर रहा
मुझे इस बारे में कोई भ्रम नहीं है
मैं कविताएँ रचते रहना चाहता था
लेकिन प्रेरणा ही चुक गयी।

कविता पूरी तरह खरी उतरी
मेरा ही चाल-चलन बहुत ख़राब रहा
यह कहने से मुझे क्या फ़ायदा है
कि मैं खरा उतरा
और कविता ने बुरा आचरण किया
जब सभी जानते हैं दोष मेरा है ?
मूर्ख बस इसी लायक होता है
कविता पूरी तरह खरी उतरी है
मैंने ही बहुत बुरा आचरण किया
कविता मेरे साथ ख़त्म होती है।

अनजान औरत को लिखे गये पत्र

जब बरसों बीत जायें, जब कई साल
बीत जायें और हवा
तुम्हारी और मेरी आत्मा के बीच
खाई खोद चुकी हो, जब कई बरस
गुज़र जायें और मैं
महज़ वह आदमी रह जाऊँ
जिसने प्यार किया,
जो केवल एक क्षण के लिए
तुम्हारे होंटों पर टिका,

वह बेचारा आदमी
जो बाग़ों में टहलते-टहलते
थक गया हो
जब तुम कहाँ होगी?
कहाँ होगी तुम
ओ मेरे चुम्बनों की बेटी।
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निकानोर पार्रा सान्दोवाल का जन्म 5सितम्बर 1914को चीले (दक्षिण अमेरिका ) के शहर चिलैन के पास सान फ़ैबिअन दे अलीचो नामक स्थान में हुआ. वे कवि के साथ-साथ गणितज्ञ भी हैं.लातीनी अमेरिका में वे बहुत प्रसिद्ध हैं और जाने-माने काव्य आन्दोलन "ऐण्टी पोएट्री"के जनक हैं जिसका आधुनिक लातीनी अमेरिकी  ही नहीं,अमेरिकी  और यूरोपीय कविता पर गहरा असर पड़ा है.उनकी कविता का सारा उद्देश्य व्यर्थ के अलन्करणों से कविता को मुक्त करके पाठक को सम्बोधित करना है,जिसका मतलब है कि उनकी कविता अधिक देसी प्रभावों से युक्त है.उनका पहला ही कविता संग्रह "पोएमास ई ऐण्टीपोएमास" अब लातीनी अमेरिकी साहित्य का एक गौरव ग्रन्थ बन चुका है.

दलितों पर अत्याचार


पिछड़े-दलितों के साथ हो रही सामाजिक गैरबराबरी उत्तराखंड में कभी मुकम्मिल सवाल के तौर पर सामने नहीं आ सकी। न ही वहां होने वाली ज्यादतियां दूसरे राज्यों की तरह मुद्दा बन पाती हैं। इसे आंकड़ों में नहीं, घटनाओं के जरिये बता रहे हैं...

राजा राम विद्यार्थी

आदमी को अपने ढंग से जीने का अधिकार है और यह अधिकार वहां तक है,जब तक वह दूसरों के जीने के ढंग में दखल नहीं करता। अगर वह दखल करता है,तो उसके लिए कानून-व्यवस्था है परन्तु कानून-व्यवस्था भी आज या तो कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली है,या औने-पौने दामों में बिकने वाली वस्तु हो गयी है। खासकर उत्तर-भारत में तो कानून-व्यवस्था दबंगो की रखैल बनकर रह गयी है। वर्ष 1985से लेकर 2005तक घटी कुछ ऐसी घटनाओं का ब्योरा मैं उत्तराखंड से दे रहा हूं जिसमें मैं खुद किसी न किसी तरह से शामिल रहा।

पहली घटना नैनीताल जिले के कोस्याकुटोली तहसील,विकासखण्ड बेतालघाट,पट्टी मल्ला कोस्यां का एक गांव है चड्यूला। चड्यूला गांव में एक परिवार ब्राह्मण तथा एक परिवार शिल्पकार रहता है। शेष पूरा का पूरा गांव ठाकुरों का है। ब्राह्मण और शिल्पकार परिवार यहां के लोगों ने अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बसाया है,ताकि ब्राह्मण विशेष आयोजनों में पूजा-पाठ आदि करेगा और, एक परिवार शिल्पकार जो की ठाकुरों का सारा काम लुहार, बढ़ई, दर्जी आदि जितने भी शिल्प हैं उन सबको करेगा। इस कारण यहां निवास करने वाला शिल्पकार परिवार सारे शिल्पों में पारंगत रहता है।

चड्यूला गांव एक दुर्गम पहाड़ी पर बसा है। कोसी नदी के किनारे होते हुए भी इस गांव से कोसी दो किलोमीटर गहराई में है। चड्यूला से कोसी तक जाना सहज आसान नहीं है। गांव में मात्र प्राइमरी स्कूल है। इण्टर कालेज यहां से 10किमी की दूरी पर बेतालघाट में है, जो कि पहले नहीं था। इसलिए यहां शिक्षा का स्तर काफी गिरा हुआ है। पूरे गांव में हाईस्कूल या इण्टर पास शायद खोजने पर ही मिलेगा।


चड्यूला में जो शिल्पकार परिवार है कभी इस परिवार में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई गंगाराम और छोटा भाई दयाल राम। गंगाराम गांव के लोगों का सभी काम करता था और दयाल राम भी मेहनत-मजदूरी करता था। गंगाराम जहां अपना मेहनताना मांगने में झिझकता था वहीं दयालराम अपने मेहनताना मांगने के लिए लड़-मरने को तैयार रहता था। प्रकृति ने दयालराम को स्वस्थ और मजबूत देह प्रदान की थी। चार आदमी मिलकर भी उसका बालबांका नहीं कर सकते थे।

इस कारण सवर्णों को एक दलित के हाथ से पिटना नागवार गुजरता था। अगर कोई भी सवर्ण उससे या उसके भाई से अन्याय करने की सोचता तो वह उससे भिड़ जाता और ठाकुरों को मुंह की खानी पड़ती। उसके शरीर की बलिष्ठता एवं सुन्दरता से कई सवर्ण स्त्रियां उसकी आशक्त हो गयी थी। जिस कारण चड्यूला के ठाकुरों ने उसकी हत्या की योजना बना ली। लेकिन परेशानी इस बात की थी कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?क्योंकि कोई भी सवर्ण ठाकुर या ब्राह्मण उसके बाहुबल के आगे नहीं टिकता था।

इसलिए सभी सवर्णों ने मिलकर उसके घर को चारों और से घेर लिया। दो तगड़े सवर्ण लड़कों ने उसे बाहर से ललकारा कई सारे सवर्ण उसके मकान की छत,जो कि पाथरों (पत्थरों से ढंकी)गयी थी,के ऊपर चढ़ गये। दयालराम की दो पत्नियां थी। एक गोठ (ग्राउण्ड फ्लोर)में रहती थी,दूसरी अन्दर (फर्स्ट फ्लोर)में रहती थी। दयालराम उनकी ललकार सुनकर बाहर जाने को तत्पर होने लगा तो पत्नियों ने उसे रोका भी,लेकिन बार-बार के ललकारने पर वह बाहर आकर उनसे भिड़ गया।

सारे ठाकुर उसे पत्थरों से कुचल-कुचल कर मार डालते हैं। यह घटना शाम के समय घटती है। दयालराम मर जाता है और हत्यारे वहां से फरार हो जाते हैं। रात के नौ बजे करीब उसकी पत्नी जो कि गोठ में रहती थी,अपने दो बच्चों को लेकर चड्यूला से लगभग 25कि0मी0दूर मामले ही जानकारी देने पटवारी चौकी जो कि गरमपानी में थी, वहां को निकल पड़ती है। रात के 12 बजे वह गरमपानी पहुंच कर पटवारी चौकी में  अपने पति की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराती है।

चड्यूला से गरमपानी तक का रास्ता बीहड़,जंगल से होकर जाता है और पहाड़ में भूत-प्रेत का अंधविश्वास भी चरम पर होता है। जंगली हिंसक जानवर भी होते हैं, उन सब से निडर होकर या यूं कहें पति के हत्यारों को सजा दिलाने का जज्बा उसे इतनी रात में चड्यूला से गरम पानी तक ले आया। किन्तु पुलिस-प्रशासन तथा न्याय-विभाग ने दयालराम के हत्यारों को सजा देने की बजाय चन्द रुपियों में ही छोड़ दिया। आज भी दयालराम के हत्यारे बेखौफ घूम रहे है तथा बेतालघाट क्षेत्र के दलित शिल्पकार आज भी उस गांव में जाने से डरते हैं।

बेतालघाट क्षेत्र में जातिवाद चरम पर है। सवर्णों की दबंगई से यहां के दलित शिल्पकार परेशान रहते हैं। बेतालघाट के ही नजदीकी ग्राम अमेल में 1991में हुई हीरालाल सुनार के लड़के की शादी में प्याऊ से पानी खुद पी लेने के कारण पूरी बारात को लाठी-डण्डों से सवर्णों द्वारा पीटा गया था जिसमें अधिकांश बाराती लहूलुहान हो गये थे। उसकी कोई भी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी। जिस कारण सवर्ण दबंगों के हौसले हमेशा ही बुलंद रहने लगे हैं। 1993में अमेल के ही मोतीराम की लड़की माधवी की शादी में भी बारातियों की खूब जमकर पिटाई की गयी थी। जिसमें से एक बाराती का सिर फोड़ दिया गया था। उसके सिर पर 10टांके लगे थे। इसमें भी भयाक्रान्त शिल्पकारों के द्वारा कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी थी।


उत्तराखण्ड के रहने वाले राजाराम विद्यार्थी दलित चिंतक और साहित्यकार है। लेखों,कहानियों और कविताओं के माध्यम से दलितों-पिछड़ों से जुड़े विषयों को उठाते है।





Dec 21, 2010

'तुम्हारे घर में घुसकर मारा जायेगा'


मां दंतेश्वरी आदिवासी स्वाभिमानी मंच,दंतेवाड़ा की ओर से एक पर्चा प्रसारित हुआ है। इसके प्रसारित किये जाने का मकसद माओवादियों के एजेंट एनजीओ और उन पत्रकारों की असलियत बताना है जो बस्तर में मानवाधिकार का ढोंग रचते हैं। अपनी मूल भावना के साथ, प्रस्तुत है बगैर संपादित पर्चा...

प्रिय जनता

बस्तर के भाकपा(माओवादी)की दरभा डिविजन कमेटी शाखा दंतेवाड़ा की निर्दोष जनता को डरा धमकाकर उनका आर्थिक, शारीरिक, मानसिक शोषण कर रही है। रात के अंधेरों में मासूम जनता के घरों में घुस कर उन्हें बंदूकों की नोक पर गलत काम करवाकर अपना उल्लू सीधा कर रही है।

आंध्र प्रदेश से आकर तथाकथित कामरेडों का चोला ओढ़कर ये नक्सली बस्तर की जनता को गुमराह कर उन्हें विकास से कोसों दूर ले जा रहे हैं। आज बस्तर की जनता इन आतंकी रूपी नक्सलियों के कारण 17वीं शताब्दी में जीने को मजबूर हैं।

ये नक्सली स्कूल तोड़कर बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीन रहे हैं। निर्दोष लोगों को मारकर आतंक के साए में जीने का मजबूर कर रहे हैं,रात को जब जनता चैन की नींद सोना चाहती है तो ये कुत्तों की तरह सारी रात जागकर क्षेत्र में आतंक और अशांति फैलाकर ये राक्षस रूपी माओवादी क्या साबित करना चाहते हैं यह तो समझ से परे है। ये भ्रष्ट शोषक  लोग जनता को लूट कर अपना घर भर रहे हैं और अपने बच्चों को बड़ी-बड़ी शिक्षा के लिए दिल्ली, हैदराबाद, बैंगलोर जैसे शहरों में भेज रहे हैं।

मगर बस्तर के के भोले-भाले आदिवासी अपने बच्चों को स्कूल की शिक्षा तक अपने गांव में इन नक्सलियों के कारण नहीं ले पाते हैं। एनएमडीसी,एस्सार और बड़े-बड़े ठेकेदारों से पैसों की मांग कर उनके कामों को बंद करने की धमकी,रात को गाड़ियों की आवाजाही बंद कर लूटपाट का ठेका इन्हीं माओवादियों ने ले रखा है। कथित माओवादियों ने बस्तर की निर्दोष जनता से जीने का हक छीन लिया है।

पर्चे की मूल प्रति: सरकार का गैर सरकारी संगठन


एक कहावत है कि एक अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता मगर जब से डीआईजी कल्लूरी साहब पदस्थ हुए हैं तब से इन नक्सलियों का दिन में चैन और रात को नींद उड़ चुकी है। कल्लुरी जैसे जांबाज अधिकारी जिन्हें आज नहीं तो कल दंतेवाड़ा से जाना है फिर भी वे जनता के हित में इन नक्सलियों से मोर्चा ले रहे हैं।

ये दलाल माओवादी जिनकी रोजी-रोटी दलाली से,लोगों को लूटकर, आतंक फैलाकर, बसों में लूटपाट कर चल रही है। इन माओवादियों को समझ लेना चाहिए कि अब से बस्तर के अमन पर ज्यादा दिनों तक डाका डाल नहीं पाएंगे। आज कोई भी नेता या अफसर क्षेत्र के विकास के बारे में सोचकर जनता की सेवा करना चाहता है तो उन्हें गांवों में ना जाने का फरमान जारी कर जनता से दूर रख ये
माओवादी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।


किसी भी नेता-अफसर को मारने का फरमान जारी कर ये ज्यादा दिनों तक डरा धमका नहीं सकते। अगर तुममें दम है तो अपना नाम, अपने मांबाप का नाम-पता अगर है तो बताओ, तुम्हें तुम्हारे घर में घुसकर मारा जायेगा। ये क्षेत्र की जनता का दावा है।

तथाकथित पत्रकारों एनजीओ के पिटठू नक्सलियों तुम चाहे हिमांशु कुमार हो या अधुरती राय(अरूंधती राय),चाहे एनआर पिल्लई हो चाहे अनिल यादव या यशवंत मिश्रा सबका एक ना एक दिन हिसाब कर दिया जायेगा। मानव अधिकारी कार्यकर्ता की आड़ में तुम ज्यादा दिन तक खैर नहीं मना सकते, तुम्हें जल्द ही बस्तर छोड़ना होगा। नहीं तो कुत्ते की मौत मारे जाओगे।

 
मां दंतेश्वरी
आदिवासी स्वाभिमानी मंच
दंतेवाड़ा

सुरक्षा बलों के शुक्रगुजार हों नक्सली!

दंतेवाड़ा में NEREGAके पैसे से पुलिस के आदेश पर सड़क किनारे का सैंकड़ों किलोमीटर जंगल साफ़ कर दिया गया था.लाखों सागौन के कीमती पेड़ काट डाले गए.उन पेड़ों की लकड़ी से सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने फर्नीचर बनवा कर ट्रकों में कर अपने घर यूपी,राजस्थान,हरियाणा भिजवा दिया.


हिमांशु कुमार

केंद्र  सरकार   और प्रधानमंत्री की ओर से चिदंबरम साहब ने घोषणा की है,' नक्सल प्रभावित जिलों में विकास को बढ़ा कर नक्सलवाद को समाप्त किया जायेगा.जिसके लिए नक्सल प्रभावित,प्रत्येक जिले को पहले साल में पच्चीस करोड़ रुपिया दिया जाएगा.'इन जिलों में दंतेवाड़ा भी शामिल है. अभी हम इस बात की बिलकुल चर्चा नहीं करेंगे की इसके साथ ही साथ उन्होंने छत्तीसगढ़ में कितने सौ करोड़ रुपये हथियार खरीदने के लिए भी बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप दे दिए जबकि पच्चीस करोड़ का व्यापक प्रचार किया गया.

पच्चीस करोड़ की इस घोषणा को सुनते समय मेरे मन में दंतेवाडा घूमने लगा ओर इस पैसे का वहां कैसे इस्तेमाल किया जाएगा इस की तस्वीर मेरे सामने बनने लगी.दंतेवाडा इस समय पुलिस और सुरक्षा बलों की छावनी बना हुआ है.वहां क्या काम हो सकता है,कहाँ काम किया जायेगा ,कौन करेगा आदि बातें ये बंदूकधारी एजेंसियां तय करती हैं . अब जो गाँव नक्सल प्रभावित है, यानी जहां के लोग सलवा जुडूम कैम्पों में नहीं आये या जो पुलिस के पास जाकर नक्सलियों की मुखबिरी नहीं करते वो सब नक्सल गाँव मान लिए गए हैं.

इन गावों को ये सरकारी सुरक्षा बंदूकधारी एजेंसियां बदमाश गाँव कहती हैं और वहां कोई भी काम जो लोगों को राहत देने वाला हो वो नहीं होने देतीं, जैसे स्कूल, राशन दूकान,स्वास्थ्य सुविधाएं आदि. इसके पीछे वो ये तर्क भी देती हैं की ये राहत गाँव वालों के मार्फ़त नक्सलियों तक पहुँच जायेगी. तो अब पहले तो ये पच्चीस करोड़ की राशि नक्सल प्रभावित गावों में खर्च ही नहीं होगी और गैर नक्सल प्रभावित गावों में इस मद का प्रयोग दिखाया जायेगा. खर्च दिखाई जायेगी. यानी सरकार के मंसूबे पहले कदम पर ही ओंधे मुंह गिर जायेंगे.और नक्सलियों का इससे कोई नुकसान नहीं होगा, (नक्सलियों को इसके लिए सरकारी बलों का शुक्रगुजार होना चाहिए).

दूसरा ये नक्सल उन्मूलन का पैसा खर्च कौन करेगा?ये फैसला भी सुरक्षा बल ही करेंगी.और इन सुरक्षा बलों के कुछ अपने कुछ ख़ास लोग होते हैं. ये वो लोग होते हैं जिनका काम सलवा जुडूम में ना जुड़े गाँव वालों, सलवा जुडूम को पसंद ना करने वाले आदिवासी जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध सुरक्षा बलों के कान भरते रहते हैं. कान भरने वाले यही चुगलखोर सरकार के मित्र माने जाते हैं.

ये लोग मुख्यतः गैर आदिवासी हैं और बस्तर में बाहर से आये हैं. ये लोग सलवा जुडूम के नेता हैं, कुछ कांग्रेस में जुड़े हैं, कुछ भाजपा में. इनमें से कई उद्योगपतियों के लिए दलाली का भी काम करते हैं और मुख्यतः ठेकेदारी करते हैं.यही लोग साइड बिजनेस के रूप मैं पत्रकारिता का भी काम करते हैं और सरकार का गुणगान करते हैं और जनता की तकलीफों से जुडी खबरों को छिपाने का काम करते हैं.

नक्सल उन्मूलन का ये पच्चीस करोड़ रुपिया इन्ही लोगों के मार्फ़त खर्च किया जाएगा और वास्तविकता में विकास के लिए तरसते लोग तरसते ही रह जायेंगे.ये जनता के दुश्मन लोग और पैसे वाले हो जायेंगे.लोगों का गुस्सा सरकार के प्रति और बढेगा,आदिवासी और अधिक नक्सलियों की तरफ चले जायेंगे.तो सोचा तो ये गया था की इन पच्चीस करोड़ से नक्सलवाद कम होगा, लेकिन इन पच्चीस करोड़ के खर्च का परिणाम उल्टा आएगा.

अन्य आदिवासी इलाकों की तरह दंतेवाड़ा में भी सरकारी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाले गैर सरकारी संगठन योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिए गए हैं और जो भी सरकारी गड़बड़ियों के बारे मैं प्रश्न करता है उसे नक्सली कह कर जेलों में डाल दिया जाता है. कोपा कुंजाम,करतम जोगा और बहुत सारे जन नेता जेलों में बंद कर दिए गए हैं. तो इस पच्चीस करोड़ रुपयों की बंदरबांट पर अब बोलने वाला कोई नहीं बचा. सारा पैसा पुलिस, अधिकारी और सलवा जुडूम के नेता मिल कर डकार जायेंगे और नक्सलवाद पहले ही की तरह चलता रहेगा.

मुझे याद है दंतेवाड़ा में NEREGAके पैसे से पुलिस के आदेश पर सड़क किनारे का सैंकड़ों किलोमीटर जंगल साफ़ कर दिया गया था. लाखों सागौन के कीमती पेड़ काट डाले गए. उन पेड़ों की लकड़ी से सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने फर्नीचर बनवा कर ट्रकों में कर अपने घर यु पी, राजस्थान, हरियाणा भिजवा दिया और कागजों में वृक्षारोपण का काम दिखा दिया गया.तो इस पच्चीस करोड़ से मुझे पूरा विश्वास है पुलिस के फायदे का काम ही किया जाएगा जनता के फायदे का तो बिलकुल नहीं. इसलिए श्रीमान चिदंबरम साहब जनता की आँखों मैं धूल मत झोंकिये और जनता को ये पता चलने दीजिये की जिन्हें वो अपना रक्षक मानती है,वही उसकी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.

अभी तो विकास का पैसा डकारने का एक नया तरीका दंतेवाडा में इजाद किया गया है.अब वहां विकास के काम क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी पुलिस का एसपी खुद ही ले लेता है और आदिवासी विकास का पैसा एसपी को दे दिया जाता है.जो निश्चित न्यूनतम मजदूरी एक सौ के बजाय बीस रूपये रोज में सलवा जुडूम कैम्प में रहने वाले आदिवासियों से काम करवा कर देता है.

उदाहरण के लिए बीजापुर से गंगलूर की सीसी रोड बनाने की एजेंसी बीजापुर का एसपी था.ये वही लायक एसपी थे जिनके संरक्षण में 12महूआ बीनते हुए लोगों को कुल्हाड़ी से काट दिया गया था.संतसपुर-पोंजेर कांड के नाम से जो नरसंहार मशहूर हुआ था,पहले तो इन एसपी साहब ने सरकार की पालतू मीडिया के मार्फ़त प्रचार किया था की पुलिस ने 12नक्सलियों को मार दिया है मगर लाशें नक्सली उठा कर ले गए.

हमारी संस्था के कार्यकर्ताओं ने जाकर जाँच की और एक मित्र पत्रकार को भी ले गए जिसके वीडियो में सलवा जुडूम से जुड़ा सरपंच जो इस हत्याकांड में शामिल था,वह सच बयान करते हुए कैमरे पर दिख रहा है.बाद में जब और ज्यादा शोर हुआ तो कांग्रेस ने अपना जाँच दल वहां भेजा था,अंत में राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर इन्ही एसपी साहब को गाँव में जाकर वही लाशें खोदनी पडीं जिसे वो नक्सलियों द्वारा ले जाया गया बता चुके थे. उस समय गाँव वालों ने साफ़ साफ़ बयान दिया था कि उनके रिश्तेदारों को पुलिस ने मारा है.जबकि इन्ही एसपी साहब ने एफ़आईआर में लिख दिया था कि गाँव वालों का कहना है कि अज्ञात वर्दीधारियों द्वारा हमारे रिश्तेदारों की हत्या की गयी है.

वो मामला आज तक दबा ही हुआ है,और पुरस्कार स्वरुप इन एसपी साहब को राज्य मानवाधिकार आयोग का सचिव बना दिया गया था.इन्ही एसपी साहब ने सलवा जुडूम के एक नेता मधुकर राव को आदिवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता कोपा कुंजाम को मारने की सुपारी दी थी और कोपा ने इस पर इन्ही एसपी साहब के खिलाफ एक एफआईआर भी दर्ज कराई थी और जिसके परिणाम स्वरुप कोपा जेल में है. ऐसे राज्य में विकास का पचीस करोड़ किसके हाथों में जायेगा, यह जरूरतमंद पहले से ही बखूबी जानते हैं हैं.


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.