Sep 19, 2010

अबकी झांसे में नहीं आयेंगे लोग


अयोध्या के मंदिरों में हनुमान चालीसा के पाठ हो रहे हैं। मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजे जा रहे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक सिंघल का कहना है कि अयोध्या स्थित कारसेवकपुरम में मंदिर निर्माण हेतु पत्थर तराशे जा रहे हैं।


संदीप  पाण्डेय  

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अयोध्या विवाद पर 24सितम्बर को सम्भावित फैसले के मद्देनजर हिन्दू  साम्प्रदायिक ताकतों ने पुनः अयोध्या में राम मन्दिर का राग अलापना शुरू कर दिया है। जबकि हम सब जानते हैं कि वर्ष 1992में बाबरी मस्जिद विध्वंस व राम मंदिर निर्माण के मुद्दे ने देश की राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया है।

आम जनता के मुद्दों जैसे गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, संसाधनों की कमी, भ्रष्टचार आदि को काफी पीछे ढकेल दिया। इस भावनात्मक मुद्दे में लोगों को उलझाकर जन विरोधी आर्थिक नीतियां लागू कीं गईं जिसका फायदा पूंजीपति वर्ग व देशी-विदेशी कम्पनियों को हो रहा है,किन्तु आम जनता परेशान है। यह तो गनीमत है कि 2004 में राष्ट्रीय लोतांत्रिक गठबंधन चुनाव हार गया और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, नहीं तो हालत और भी खस्ता होती।

कम से कम सूचना के अधिकार,राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी, वन अधिकार व आने वाले खाद्य सुरक्षा अधिनियमों से ऐसा प्रतीत तो होता है कि सरकार आम जनता के मुद्दों के प्रति भी थोड़ा-बहुत सोचती है। वरना राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार तो शायद हमें राम मंदिर व रामसेतु के अलावा कुछ सोचने ही नहीं देती।

दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही इस देश में श्रंखलाबद्ध बम धमाके व आतंकवादी कार्यवाइयों को अंजाम दिया जाने लगा। इस लिहाज से बाबरी मस्जिद ध्वंस भारत में आतंकवादी घटनाओं की जननी है। वैसे भी संविधान की रक्षा की शपथ खाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने लोकतंत्र की खुलेआम धज्जियां उड़ाईं। हालाँकि  बीच में ऐसा भ्रम फैलाया गया था कि इस्लामिक संगठन भारत में आतंकवादी कार्यवाइयों को अंजाम दे रहे थे, किन्तु अब जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बन्धित अभिनव भारत का नाम मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर व समझौता एक्सप्रेस जैसे बम कांडों में आ रहा है तो ऐसा प्रतीत होता है कि भारत को इस्लामिक से ज्यादा हिन्दू  आतंकवाद ने क्षति पहुंचाई है।

क्या करें उन  नेताओं का जो बाँटते हैं लोग
शक की बुनियाद पर तमाम मुस्लिम नौजवान  जेलों में कैद हैं, किन्तु दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद गिराने वाला एक भी व्यक्ति जेल में नहीं है। यह विभिन्न सरकारों व शासन-प्रशासन के साम्प्रदायिक चरित्र का भी द्योतक है।

असल में साम्प्रदायिक विचारधारा का लोकतंत्र से कोई तालमेल हो ही नहीं सकता, चूंकि यह विचारधारा संकीर्णता की परिचायक है। बल्कि साम्प्रदायिकता की परिणति सिर्फ फासीवादी सोच में ही हो सकती है। यह ख़ुशी की बात है कि जनता ने साम्प्रदायिक विचारधारा को उत्तर प्रदेश में नहीं,बल्कि पूरे देश में नकारा है। हम उम्मीद करते हैं कि जनता दोबारा साम्प्रदायिक शक्तियों के झांसे में नहीं आएगी। राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए धार्मिक भावनाओं का दोहन पूर्णतया अनैतिक है।

देश के नागरिकों को,अयोध्या विवाद पर न्यायालय का जो भी फैसला आए उसका सम्मान करना चाहिए। जो पक्ष फैसले से संतुष्ट न हो, वह सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। किन्तु सड़क पर उतरकर किसी भी किस्म का शक्ति प्रदर्शन या लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश असंवैधानिक कार्यवाही होगी। मंदिर निर्माण को लेकर संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने तमाम किस्म की कवायदें शुरू कर दी हैं।

अयोध्या के मंदिरों में हनुमान चालीसा के पाठ हो रहे हैं। मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजे जा रहे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक  सिंघल का कहना है कि अयोध्या स्थित कारसेवकपुरम में मंदिर निर्माण हेतु पत्थर तराशे जा रहे हैं। कायदे से अभी जबकि न्यायालय का फैसला भी नहीं आया है और यह तय नहीं है कि मंदिर बनेगा भी अथवा नहीं, इस किस्म की कार्यवाइयां व बयान न्यायालय की अवमानना माने जाने चाहिए और न्यायालय को इनका संज्ञान लेना चाहिए।

देश व अयोध्या की आम जनता के लिए बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि कोई मुद्दा ही नहीं है। यह संघ परिवार ने जबरदस्ती देश के ऊपर थोपा है। अयोध्या के आम लोगों से बातचीत कर पता चलता है कि यहां लोग इस मुद्दे से कितने परेशान हैं। अयोध्या का आम जन-जीवन प्रभावित हुआ है। लगातार सुरक्षा बलों की उपस्थिति से यहां तनाव बना रहता है। जब-तब कर्फ्यू लगने की आशंका अलग रहती है।

 विवादित स्थल के रामलला को छोड़ अन्य मंदिरों में दर्शन हेतु आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में गिरावट आई है, जिससे अयोध्या की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। अयोध्या में बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका मंदिरों पर निर्भर है। इनमें चढ़ने वाले फूलों की खेती से लेकर पूजा-पाठ की सामग्री के निर्माण के काम में लगे तमाम लोग शामिल हैं जिनमें कुछ मुसलमान परिवार भी हैं।

हम उत्तर प्रदेश सरकार से उम्मीद करते हैं कि जो भी इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करे, उसके साथ सख्ती से पेश  आएगी। हम यह खतरा नहीं मोल उठा सकते कि संघ परिवार के लोगों को देश में दंगे भड़काने की छूट दी जाए। देश में धर्मनिरपेक्ष लोग और  मुसलमान,जो भी फैसला आएगा उसे मानने को तैयार बैठे हैं। किन्तु संघ परिवार के अचानक सक्रिय होने से ऐसा मालूम पड़ता है कि यदि फैसला इनके अनुकूल न गया तो वे उसे नहीं मानेंगे।

मंदिर निर्माण तैयारी के दो दशक : फैसले पर उम्मीद
 यदि केन्द्र व राज्य सरकार इनके साथ सख्ती से निपटती है और आम हिन्दू इन्हें अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करने देता है तो देश का महौल शांत बना रहेगा एवं साम्प्रदायिक सदभावना सुरक्षित रहेगी। असल में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा संघ परिवार के गले की हड्डी बन गया है। इस मुद्दे का इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को बढ़ाने के लिए ही किया गया।

यदि संघ परिवार का उद्देश्य वाकई मंदिर निर्माण होता तो वह उस किस्म की राजनीतिक दृढ़ता दिखा सकता था जैसी मायावती ने दिखाई है,जिन्होंने राज्य की राजधानी में सरकारी जमीन पर पेड़ काटकर,जनता के धन से कानून बनाकर दलित स्मारकों का निर्माण करा दिया है। परंतु संघ परिवार का उद्देश्य कभी मंदिर निर्माण रहा ही नहीं है। उन्हें तो सिर्फ इस मुद्दे का राजनीतिक दोहन करना है,जो मंदिर बन जाने पर संभव न होगा। यदि संघ परिवार वाकई अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण चाहता है तो वह इसे कारसेवकपुरम की भूमि पर क्यों नहीं बना लेता?

क्या जरुरी है कि मंदिर विवादित स्थल पर ही बने? विश्व हिन्दू परिषद् के स्वामित्व वाली जमीन पर राम मंदिर बनाकर इस विवाद को भी हमेशा-हमेशा के लिए विराम दिया जा सकता है।


(लेखक मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनसे  ashaashram@yahoo.com पर संपर्क  किया  जा   सकता  है.)  


Sep 18, 2010

हमें हिंदू नहीं, कट्टर हिंदू चाहिए: राजेश बिडकर


इलाहाबाद हाईकोर्ट 24 सितंबर को अयोध्या के विवादित स्थल के मालिकाना हक को  लेकर फैसला सुनाने वाली है. ऐसे समय में 'भगवा बिग्रेड'मध्य प्रदेश में ‘हिंदू योद्धा भर्ती
अभियान’ चला रही है. इससे भगवाधारियों की नीयत को बड़े आसानी से समझा जा सकता है.वहीं इस मसले पर कांग्रेस नीत केंद्र सरकार और भाजपा की मध्य प्रदेश सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है.'जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसायटी' (जेयूसीएस)  की दिल्ली इकाई के स्वतंत्र पत्रकार विजय प्रतापने 'भगवा बिग्रेड'के नेता राजेश बिडकर से उनके मोबाइल नंबर 09977900001  पर 17 सितंबर को सुबह 9.29 बजे और 9.32 बजे, दो बार बातचीत की. स्वतंत्र पत्रकार शाह आलम ने भी 11.45 बजे राजेश बिडकर से बात की. पेश है बातचीत का पूरा ब्योरा. 


विजय: हैलो !

राजेश बिडकर: वन्दे मातरम !

विजय: भगवा बिग्रेड से बोल रहे हैं क्या?

राजेश बिडकर: हां,

विजय: कौन बोल रहे हैं?

राजेश: राजेश बिडकर।

विजय: अच्छा, राजेश जी, मैं विजय प्रताप बोल रहा हूं।

राजेश: कहां से?

विजय: मैं दिल्ली से बोल रहा हूं...

राजेशः कहां से...

विजय: दिल्ली से बोल रहा हूं। मेरे एक साथी ने आपके बारे में बताया था। वो आप लोगों के संगठन से जुड़ रहा है। आपके संगठन से जुड़ने के लिए क्या करना पड़ेगा।

राजेश: आप कहां से बोल रहे हैं?

विजय: मैं तो दिल्ली में हूं, लेकिन रहने वाला जबलपुर का हूं।

राजेश: हूं हूं..पूरा मामला मैं बताता हूं। ये कट्टरवादी विचारधारा वाले युवाओं का संगठन है।हमको भारत को हिंदू राष्ट् बनाने की मांग का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं। तीसरा की अन्य हिंदूवादी संगठन जो कि चक्का जाम कर दिया, तोड़-फोड़ कर दी, थाने घेर दी, ट्क रोक लिया। हम लोग ये काम नहीं करते हैं।


विजय: आपका क्या काम-काज है?

राजेश: हम लोग एक कट्टर वैचारिक संगठन तैयार कर रहे हैं दस हजार लोगों का और हम समय-समय पर अपने फरमान जारी करेंगे मुस्लिमों को... और उसका पालन कराना होगा दस हजार लोगों को। और कट्टर विचार ऐसे नार्मल विचारधारा वाले लोग नहीं होने चाहिए ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़े नहीं

विजय: आम हिंदू नहीं जो हिन्दुत्व में विश्वास रखते हैं उन्हीं को...

राजेश: आम हिंदू नहीं, जो कट्टर हैं।

विजय: अच्छा कट्टर होने चाहिए...

राजेश: हां।

विजय: आप कह रहे हैं कि फरमान जारी करेंगे, उसकी पालना कैसे कराई जाएगी। क्या हम लोगों को उसकी पालना करानी होगी?

राजेश: कल हमारी बेवसाइट लांच हो रही है, समय-समय पर लोगों को क्या करना है तो वो तो आप तक जानकारी पहुंच जाएगी हाईटेक माध्यम से जानकारी होनी चाहिए। या फिर व्यक्तिगत तौर या फिर पत्र-वत्र... आप तक जानकारी पहुंच जाएगी की क्या करना है।

विजय: ये देश भर में और भी जगहों पर होगा या आप अभी सिर्फ मध्यप्रदेश को टारगेट किए हैं?

राजेश: अभी हमारा टारगेट केवल मध्य प्रदेश है, हमारा सीधा सा मानना है कट्टर हिंदूवादी हैं हम किसी का सर नहीं फुडवाना चाहते न शहर बंद कराना चाहते हैं।

विजय: वहीं मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि हमें करना क्या होगा?

राजेश: करना क्या है, हमारे लोग आप से मिल लेंगे...आप ने अपना नाम बताया, काम बताया हमें लगाता है तो हमारे लोग आप से मिलना चाहिए तो मिलेंगे और बातचीत करेंगे। आप हिंदुस्तान के बारे में क्या सोचते हैं हिंदू समाज के बारे में क्या सोचते हैं हमें लगता है तो हम आपको ले लेंगे। और ये न..ऐसे तो एक हजार हिंदू संगठन चल रहे हैं हिंदुस्तान में...

विजय: हां सही बात सब वोट बैंक की राजनीति करने लगते हैं।

राजेश: आप की आवाज सही नहीं आ रही है...

विजय: अभी ये जो फैसला आने वाला है, उसमें भी कुछ करना है क्या?

राजेश: नहीं ये तो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है ही, पर मुझे जो लगता है कि आने वाले कई वर्षों तक हमें हिंदू समाज के बीच में काम करना है। ये सिर्फ अयोध्या का नहीं है....ये हिंदू समाज का विषय है और कहीं न कहीं हमें कट्टरवादी हिंदू की तैयारी करनी होगी। ऐसे कुछ होने वाला नहीं है।

विजय: इधर भी अपनी कुछ तैयारी है क्या इस फैसले को लेकर?

राजेश:यह जो फैसला आ रहा है इस पर हमारी भूमिका इस लिए नहीं है कुछ...आज दिल्ली में हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।

विजय: दिल्ली में कहां, आप बताते तो मैं चला जाता

राजेश: हां...हैलो.... (खरखराहट)

('नई पीढ़ी' ब्लॉग से साभार)




Sep 17, 2010

हिन्दू योद्धा भरती अभियान


जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS)की मध्य प्रदेश ईकाई ने जबलपुर रेलवे स्टेशन पर ‘भगवा ब्रिगेड का हिंदू योद्धा भर्ती अभियान’का पोस्टर पाया। यह पोस्टर पूरे मध्य प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर लगा है। इस पोस्टर में हिन्दुत्वादियों द्वारा प्रस्तावित अयोध्या में राम मंदिर के ढांचे  का छाया चित्र लगा है। 

पोस्टर में स्पष्ट रुप से लिखा है ‘म0 प्र0 में 10000 हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की शुरुआत की है हम हिंदू युवाओं से इस मिशन से जुड़ने की अपील करते हैं’.भगत सिंह, शिवाजी, चंद्रशेखर आजाद, भीम राव अंबेडकर समेत महान और क्रांतिकारी व्यक्तित्वों के फोटो के साथ सावरकर जैसे व्यक्ति जिसने अग्रेंजों से माफी मांगी थी के फोटो का इस्तेमाल करके भगवा ब्रिगेड युवाओं को अपने सांप्रदायिक एजेंडे पर भड़काना चाहता है। हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की बात करने वाले भगवा ब्रिगेड ने इस तथ्य को प्रमाणित कर दिया है कि हिंदू युवाओं को भड़काकर ऐसे संगठन उनका सैन्यकरण कर सांप्रदायिक और आतंकवादी देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त करते हैं।


फैसले से पहले की तैयारी: कैसे अमन कायम
भगवा ब्रिगेड के मार्ग दर्शक दामोदर सिंह यादव और संयोजक राजेश विड़कर के छाया चित्र लगे हैं और इनका पता 752 जनता क्वाटर्स,नंदानगर इंदौर और मोबाइल नंम्बर 8120002000, 9977900001 है। ऐसे में JUCS भगवा ब्रिगेड के दोनों नेताओं समेत इस संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों पर देश द्रोह के तहत कार्यवायी करने और दिये हुए पते के मकान को तत्तकाल सीज करने की मांग करता है। साथ ही हमतत्काल प्रभाव से भगवा ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाने की और उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हैं . 

मध्य प्रदेश से लगातार हिन्दुत्ववादियों के आतंकवादी घटनाओं में लिप्त होने के मामले पिछले दिनों आए हैं। ऐसे दौर में जब अयोध्या मसले पर फैसला आने वाला है तब ऐसे पोस्टरों का मध्य प्रदेश में जारी होना भाजपा सरकार की मंशा को बताता है कि वो हर हाल में देश का अमन-चैन बिगाड़ने पर उतारु है।
ऐसे में सवाल उठता है कि  मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जो संघ गिरोह के आतंक पर यूपी में आकर राजनीति करते हैं वो इस मसले पर क्यों चुप हैं। jucsका साफ मानना है कि  मध्य प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कांग्रेस हिंदू वोट बैंक के खातिर इस गंभीर मसले पर चुप  है। जाहिरा तौर पर  सांप्रदयिक तनाव में वह अपना भविष्य खोज रही है।



Sep 16, 2010

कहां जायेंगे राष्ट्रमंडल के निर्माता

राष्ट्रमंडल खेल अथ भ्रष्टमंडल  कथा भाग- 1

 

राहुल लल्ला आये भी,बोले भी पर हम उनसे मिल न सके कि उनकी पार्टी के लोगों ने कहा था कपड़ा पहन कर आओ और हम गमछी में थे। सोचा था अपना दुख कहेंगे,गांव की भूख कहेंगे पर कमर में अटकी गमछी ने सब चौपट  कर दिया।

अजय प्रकाश

रामकुमार अहिरवार जब बांदा रेलवे स्टेशन पर छह महीने पहले उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में दिल्ली आने के लिए बैठे थे  तो राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए हो रहे निर्माण में काम मिलना जिंदगी को साकार करने जैसा लगा था। दिल्ली में कई साल निर्माण मजदूर का काम कर गांव लौटे मजदूर ने काम की जिन बुरी स्थितियों का जिक्र किया,उसे रामकुमार ने मजाक में उड़ा दिया था। गांव के मजदूर ने यह भी बताया था कि कई मजदूरों की जवान बीबियां या बेटियां वहां से वापस नहीं लौट रहीं,तो रामकुमार ने मर्दानगी का वास्ता दे कसे बाजुओं की मछलियों को लहराया था कि ‘कौन बुरी निगाह मेरी बेटी-बीबी पर डाल सकता है।’


खेल ख़त्म होने के बाद कहाँ जायेंगे मजदूर                फोटो-आरबी यादव

दिल्ली के निजामुद्दिन रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद की कहानी अब रामकुमार की जुबानी सुनिये,-‘तीन बेटियां,एक बेटा,मैं और मेरी बीबी,बुंदेलखंड के उस गांव से चले थे जहां भूख से हुई मौतों के बाद कांग्रेस पार्टी के राहुल लल्ला एक बार गये थे। लल्ला आ रहे हैं,इसके लिए मैदान से घास छिली गयी, मिट्टी बराबर हुई और स्टेज सजा। लल्ला आये भी,बोले भी पर हम उनसे मिल न सके कि उनकी पार्टी के लोगों ने कहा था कपड़ा पहन कर आओ और हम गमछी में थे। सोचा था अपना दुख कहेंगे,गांव की भूख कहेंगे पर कमर में अटकी गमछी ने सब चैपट कर दिया। निराश हो हम फिर एक बार कुदाल लेकर उन सूखे खेतों में अनाज उगाने में लगे रहे, जहां इतना नहीं उपजा कि हम छोटे बेटे को बचा सकें और बाकी परिवार कुपोषित न हो।’

इतना बताने के साथ रामकुमार ने दिल्ली में काम की साइट और गांव का नाम न छापने का आग्रह किया। उनकी राय में गांव का नाम छपेगा तो बदनामी होगी और साइट का पता चलेगा तो रोटी जायेगी। अब रामकुमार गमछी में नहीं हैं। राष्ट्रमंडल खेलों ने उन्हें पैंट-बूशर्ट दे दी है और वे गमछी से पसीना पोंछते हैं,कभी जमीन पर बिछा रोटी रख खा लेते हैं।

रामकुमार गमछी से आंसू पोंछते हुए कहते हैं,‘गांव में हम एक भूखे परिवार थे और शहर में हम खाने पर काम करने वाले बंधुआ हो गये हैं। 12 घंटे काम के बदले मुझे 110, बीबी को 90 और दो बेटियों को अस्सी-अस्सी रूपये मिलते हैं जो कुल मिलाकर 360रूपये होते हैं। हालांकि ठेकेदार ने कहा था रोज आठ घंटे काम के बदले 600 दिलवायेगा, मजदूरी रोजाना शाम को मिलेगी और रहने के लिए आवास होगा।

राष्ट्रमंडल खेलों में काम करने वाले दूसरे मजदूरों के क्या हालात हैं के बारे में रामकुमार कहते हैं,‘कभी मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म देखी है। जिस तरह उसकी फिल्मों में एक मजदूर का दर्द दिखाकर जिंदगी बयां होती है वैसे ही जिन बातों के बारे में मैंने बताया है, यहां सबकी वही गति है।’

खेल गांव से मात्र किलोमीटर की दूरी पर सराय काले खां सड़क के किनारे फुटपाथ पर टाइल्स चिपका रहे मजूदर से बात करने पर पता चलता है कि उसकी बीबी, किसी लड़के साथ चली गयी है। उसे जब यह आभास हो जाता है कि पूछने वाला पत्रकार है तो वह कह पड़ता है, -‘अब आप पूछेंगे कि काहे तो सुन लीजिए, - मेरी बीबी को यहां काम करना और सात फुट उंचे टीन में रहना,वह बिना पंखा के रास नहीं आ रहा था। वह मुझसे कई बार बोली की कमरा ले लो,तो हमने कह दिया था कि फिर बचत नहीं हो पायेगी। उसके बाद दो-तीन दिन रूठी रही और एक दिन आगरा पहुंच कर फोन करती है कि वह किसी मैकेनिक के साथ रह रही है। बस इतनी कहानी है, अब आपका काम हो गया, मुझे अपना काम करने दीजिए।’

यह कुछ नजीरें और चंद मामले उन लोगों के हैं जिनकी बदौलत 3अक्टूबर से होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेल का बेहतर आयोजन दुनियाभर में देश की शान -ओ शौकत  में इजाफा करेगा। दिल्ली और केंद्र की कांग्रेस सरकार खेल के सफल आयोजन में इतने मतांध हो गये हैं कि लाखों की संख्या में काम पर लगे मजदूरों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के हर इकरारनामें पर सवाल पूछने से उन्हें देशद्रोह की बू आने लगती है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट्स नाम के मानवाधिकार संगठन ने हाल में जारी एक रिपार्ट में कहा है कि निर्माण स्थलों पर श्रम कानूनों के लगातार उल्लंघन हो रहे हैं लेकिन सरकारी एजेंसियां इन मामलों पर बिल्कुल भी गौर करना नहीं चाह रही हैं। तय न्यूनतम मजदूरी न देना, ओवरटाइम के बदले कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं, कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं, मजदूरी अनियमित दिया जाना, प्रमाण के तौर पर मजदूरी की रसीद या प्रमाण पत्र तक न देना, कानून के अंतर्गत अनिवार्य माने जाने वाले ‘मस्टर रोल’ या दूसरे रिकॉर्ड न रखना,सुरक्षा के सामान मुफ्त में न देना,प्रवासी मजदूरों को यात्रा भत्ता न देना, महिला मजदूरों का कम वेतन और आवासिय सुविधाओं का अभाव जैसे मामले साबित करने के लिए काफी हैं कि बेगारी कराकर राष्ट्रमंडल खेलों के नींव में कितना खून-पसीना राष्ट्रमंडल खेलों में मजदूरों का जज्ब हुआ है। पीयूडीआर के सचिव और पत्रकार आशीष गुप्ता ने कहा कि सिर्फ सरकार ने जिन 40 हजार मजदूरों के राष्ट्रमंडल खेलों में काम करने की बात स्वीकारी है,अगर उसी में हो रही लूट को जोड लिया जाये तो ठेकेदार हर महीने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और ओवरटाइम न देकर 30 करोड़ और सलाना 360 करोड़ रूपये हड़प रहे हैं।’

कुछ स्वंय सेवी संगठनों का दावा है कि दिल्ली में खेलों के हो रहे काम में करीब चार लाख मजदूर लगे हैं। मजदूर चूंकि परिवार समेत रह रहे हैं इसलिए उनके बच्चों की संख्या भी अस्सी हजार के करीब है। जब जबकि राष्ट्रमंडल खेलों में पखवाड़े भर का समय बचा हुआ है वैसे में यह सवाल सबसे प्रमुखता से उभर कर आ रहा है कि लाखों की संख्या में काम पर लगे मजदूर और उनके परिवार निर्माण काम खत्म होने के बाद कहां जायेंगे। जेपी गु्रप के कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले कारीगर दीनानाथ गौड़ कहते हैं कि, ‘मैं वहां पिछले छह वर्षों से काम कर रहा हूं लेकिन यहां ज्यादा पैसा मिलने की वजह से चला आया हूं, अब कहां काम मिलेगा।’

दीनानाथ तो फिर भी कुशल मजदूर हैं लेकिन सवाल है कि जो अकुशल मजदूर फैक्ट्रियों और दूसरी जगहों से काम छोड़ लौटे हैं आखिर उनकी भरपायी कहां होगी। ऐसे में प्रश्न यह राष्ट्रमंडल निर्माण काम पूरा होने के बाद एकाएक इतनी बड़ी संख्या में जो मजदूर और उनके परिवार बेरोजगगार होंगे उनको काम कहां मिलेगा और काम से बड़ी समस्या क्या आवास की उभरकर सामने नहीं आयेगी। पीयूडीआर की शशि  सक्सेना कहती हैं कि ,‘इस मामले में सरकार की कोई योजना नहीं है। सरकार को कामगारों की बेकारी पर कोई ठोस योजना बनानी चाहिए जिससे वह दूसरे काम की जगहों पर शिफ्ट किये जा सकें।’



Sep 14, 2010

बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री क्यों नहीं?


बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद 'मुख्यमंत्री मुस्लिम हो' को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा, जिसके पीछे लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे।

पंकज कुमार

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात,सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं।

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो। इसका सीधा मतलब हुआ कि अगर विधानसभा चुनाव के बाद लालू-पासवान के गठजोड़ वाली सरकार बनी तो राज्य में मुख्यमंत्री के साथ दो उपमुख्यमंत्री भी होंगे। लेकिन लालू-पासवान की इस मंशा पर शक और सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे अहम सवाल कि सत्ता में आने पर मुस्लिम उपमुख्यमंत्री ही क्यों, मुख्यमंत्री क्यों नहीं? दूसरा सवाल क्या यह मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति नहीं है? तीसरा सवाल क्या यह जनभावना है? चौथा सवाल जब संयुक्त तौर पर सीट और कुर्सी का बंटवारा हुआ उस वक्त यह घोषणा क्यों नहीं की गई? पांचवा सवाल सामाजिक ध्रुवीकरण के बदले विकास के मुद्दे चुनावी एजेंडा क्यों नहीं?


लालू-पासवान: चुनाव की यारी
ऐसे कई सवाल हैं जो लालू-पासवान की टीम द्वारा मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की वकालत को कटघरे में खड़ा करते हैं। सवाल यह भी है कि किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री पद पर आसीन करने के मुद्दे पर फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू प्रसाद और रामविलास पासवान आपस में भिड़ गए। इस प्रकरण के बाद पासवान ने समर्थन देने से मना कर दिया। आखिर 2010 विधानसभा चुनाव आते-आते पासवान का मुस्लिम प्रेम पीछे क्यों छूट गया? यह लालू-पासवान की राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या है? फरवरी 2005 में लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे,जबकि रामविलास पासवान किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े थे।

नाक की इस लड़ाई की वजह से बिहार को राष्ट्रपति शासन और साल के भीतर दूसरी बार चुनाव का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि पांच साल पहले पासवान ने ही मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा दिया, लेकिन इस बार जब भावी मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी का मौका आया तो लालू के नाम पर सहमति दे दी। इतना ही नहीं उपमुख्यमंत्री पद पर अपने छोटे भाई पशुपति पारस की दावेदारी करने में जरा भी देरी नहीं की। इस ऐलान पर जब खलबली मची तब जाकर पासवान ने गठबंधन सरकार बनने पर मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया।

बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद मुख्यमंत्री किसी मुस्लिम को बनाने को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा,उसके पीछे भी लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे। उनकी मंशा बिहार में लालू प्रसाद यादव से बड़े जनाधार वाला नेता के तौर पर उभरने की थी। इतना ही नहीं वह अपनी छवि दलित नेता तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे। 2005 में  लोजपा प्रमुख का गुप्त एजेंडा यह था कि मुस्लिम-दलित समीकरण के जरिए राज्य के करीब 32फीसदी वोट पर सेंध लगा सके। लेकिन लालू यादव ने रामविलास पासवान के इस राजनीतिक दांव को कामयाब नहीं होने दिया। उन्होंने एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को बनाए रखने के लिए सरकार नहीं बनाना ही बेहतर समझा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।

दोनों दलों के प्रमुखों का यह ऐलान उनके आत्मविश्वास में कमी, कमजोर पड़ती सियासत और चुनाव पूर्व हार के डर को भी दिखाता है। वर्ष 1990 में लालू यादव ने जब बिहार की सत्ता संभाली तो उस वक्त मुस्लिमों ने भागलपुर दंगों की वजह से कांग्रेस से दूरी बनाई और जनता दल को वोट दिया। वर्ष 1997में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का गठन किया और अल्पसंख्यकों को बीजेपी के साम्प्रदायिक चेहरे का डर दिखाकर वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे। लेकिन 2005 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने जेडीयू नेता नीतीश कुमार का सेक्युलर चेहरा पेश किया,तो आरजेडी का एमवाई (मुस्लिम-यादव) तिलिस्म टूट गया।

लालू से मोहभंग हो चुके अल्पसंख्यकों ने न सिर्फ आरजेडी से बल्कि एलजेपी से भी किनारा कर लिया। पिछले पांच साल में नीतीश सरकार की कार्यशैली से अल्पसंख्यक समाज में रोजगारोन्मुख,भयमुक्त और गैर संप्रदायवाद का संदेश गया है। मुस्लिम वोटरों के इस रुख से लालू-पासवान की परेशानी बढ़ना लाजिमी है। यही वजह है कि दोनों नेता एमवाईडी (मुस्लिम-यादव-दलित)समीकरण का हथकंडा अपना रहे हैं।


किसकी लाज बचाएं मुसलमान : किसके साथ जाएँ मुसलमान
 राजनीति के माहिर दोनों नेता जातीय समीकरण की बदौलत करीब 11फीसदी यादव, 16 फीसदी दलित और राज्य की आबादी के करीब 16फीसदी मुस्लिम वोटरों को गोलबंद कर सत्ता का सुख भोगना चाहते हैं। इस पूरी आबादी को जोड़ा जाए तो यह कुल आबादी का 43फीसदी है। मुस्लिम उपमुख्यमंत्री का शिगूफा इसी कड़ी का एक हिस्सा भर है। आरजेडी-एलजेपी का कहना है कि राज्य में दो-दो उपमुख्यमंत्रियों  का होना कोई नई बात नहीं है। अगर दोनों नेताओं को लगता है कि इस समीकरण से मुस्लिम-यादव-दलित मतदाता एक हो जाएंगे और उनका गठबंधन जीत जाएगा, तो वह इस तरह के दर्जनों उपमुख्यमंत्रियों की घोषणा कर सकते हैं।

आरजेडी प्रमुख लालू यादव की पार्टी ने बिहार में लगातार 15 साल तक एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के भरोसे शासन किया, पिछड़े समुदाय के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय ने भी लालू यादव का पूरा साथ दिया। जातीय-धार्मिक भावना उभारकर आरजेडी लगातार तीन बार सत्ता में बनी रही और इस बार भी रोजी-रोटी, सामाजिक बराबरी के बदले जज्बाती सवालों पर गोलबंदी की जा रही है। अच्छा तो यह होता कि लालू-पासवान जनभावनाओं को ख्याल में रख कर रोजी-रोटी, गरीबी, बिजली, सड़क, पानी, भ्रष्टाचार, सूखा, लालफीताशाही को मुद्दा बनाते और बिहार की जनता के सामने बेहतर विकल्प पेश करते। इसमें कोई शक नहीं कि विधानसभा चुनाव में जाति का प्रभाव रहेगा ही।

दोनों नेता भले ही अक्टूबर 2005विधानसभा चुनाव की हार को आरजेडी-एलजेपी गठबंधन का टूटना और लोगों में भ्रम की स्थिति को कारण बता रहे हों, लेकिन सच यह है कि बिहार की जनता तुच्छ राजनीति से तंग आ चुकी थी  और उन्हें जनता से जुड़े सरोकार वाली सरकार चाहिए थी। यही वजह है कि अक्टूबर में विधानसभा चुनाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव में आरजेडी चार सीटों पर सिमट गई,जबकि रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा का सूपड़ा साफ हो गया। राज्य में इसके बाद हुए उपचुनाव में भी एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत मिली। इस बीच यह जरूर हुआ कि सितंबर 2009 में बिहार विधानसभा के 18 क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में एनडीए गठबंधन 13 सीटों पर हार गया। बटाईदारी विवाद से उत्पन्न विशेष उन्मादपूर्ण परिस्थिति में वे उपचुनाव हुए थे। तब से अब तक राज्य की राजनीतिक परिस्थिति व मनःस्थिति बदल गई लगती है।

लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने राजनीति के गुर समाजवादी जननेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया जी से भले ही सीखे हों, लेकिन सत्तासुख के लालच ने दोनों नेताओं को अपने सिद्धांतों से भटका दिया है। मौजूदा राजनीति को देखकर लगता है कि आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान सामाजिक सरोकारों के मुद्दों से दूर होते जा रहे है। लालू-पासवान की जोड़ी जब से राज्य और केंद्र की सत्ता से दूर हुई है तब से दोनों कदमताल मिलाते चल रहे है। उन्हें पता है कि जब तक उनके पास संख्या बल नहीं होगा, तब तक दिल्ली और पटना में उन्हें पूछनेवाला कोई नहीं।


लेखक दूरदर्शन में 'जागो ग्राहक जागो' कार्यक्रम में बतौर सहायक प्रोडूसर 
काम कर चुके हैं, फिलहाल एक पाक्षिक अख़बार में सहायक संपादक हैं इनसे  kumar2pankaj@gmail.com पर  संपर्क किया जा सकता है.

Sep 12, 2010

क्यों न हो उच्च नैतिकता की मांग !


महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा?


राजू रंजन प्रसाद

मृणाल वल्लरी का लेख मैंने दो बार पढ़ा। पहले आपके ब्लॉग  पर और पुनः इसे जनसत्ता में। कहना होगा कि इस लेख में मुझे ऐसा कुछ लगा जिससे कह सकता हूं कि दो बार पढ़ने में लगा मेरा श्रम बेकार नहीं गया। किन्हीं को अगर ‘नवोदित’ पत्रकार की ‘बाल-सुलभ’ टिप्पणी लगी हो, तो मात्र इस कारण से मैं इस लेख को ‘खारिज’ नहीं कर सकता।

इस लेख में मुझे लगा कि पत्रकार (संयोग कहिए कि वह महिला पत्रकार हैं,यद्यपि  मैं इस तरह के विभाजन में दिलचस्पी नहीं रखता।) की एक पीढ़ी तैयार हो रही है जो किसी भी मुद्दे को एक ‘संवेदनात्मक जुड़ाव’ के साथ, जिसे आप प्रतिबद्धता कह ले सकते हैं, उठाने के खतरे झेलने को तैयार है।

कुछ लोग इसे ‘नाम कमाने की भूख’और ‘नारीवादी उच्छ्वास’ से भी जोड़कर देख सकते हैं। जिनके अंदर प्रतिबद्धता और ईमानदारी की आग नहीं होती, वे ऐसी बातें बड़ी ही सहजता से कह सकते हैं। बगैर किसी दुविधा और अपराध-बोध के। यहां तो लोग महात्मा गांधी तक की ईमानदारी और वचनबद्धता को ‘मजबूरी का नाम गांधी’साबित कर डालते हैं। मृणाल तो फिर भी ‘नवोदित’ हैं।

इस लेख से अगर माओवाद विरोधी अथवा कुछ अवांछित कहे जा सकनेवाले संदेश गये हैं तो इसके कुछ कारण भी हैं। कुछ कारणों को लेख में अंतर्निहित माना जा सकता है तो कुछ को मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर महोदय द्वारा सृजित साजिश के रूप में। साजिश  का यह खेल खेला गया लेख की प्रस्तुति के स्तर पर। याद करें कि अखबार में इस लेख का शीर्षक ‘लाल क्रांति के सपने की कालिमा’था। मॉडरेटर महोदय ने इसका शीर्षक लगाया ‘क्या माओवादी दरअसल बलात्कारी होते हैं?’

एक नक्सल मिजाज का आदमी ऐसे शीर्षक से भरसक बचेगा। यह लेखिका का पहले से दिया हुआ शीर्षक नहीं था, बल्कि मॉडरेटर द्वारा सनसनी फैलाने के लिए गढ़ा गया। तिसपर मॉडरेटर की माओवाद की पक्षधरता! मुझे यह आसानी से हजम होनवाली बात नहीं लगती। अफसोस की बात तो यह है कि कुछ क्रांतिवीर ऐसी गलतियों की तरफ ध्यान न दिलाकर, उल्टे लोगों को अविनाश  जी का ‘पॉलिटिकल स्टैण्ड’ बताने लगते हैं।

स्त्री-अस्मिता’ की लड़ाई लड़नेवाले अरविन्द शेष  को बताना चाहिए था कि खुद मॉडरेटर महोदय स्त्रियों के यौन-शोषण के आरोपी रहे हैं। ईमानदार पाठकों-पत्रकारों से हमारी अपेक्षा है कि ऐसे दोहरे चरित्रवाले टिप्पणीकारों की हरकत पर वे नजर रखेंगे।

मृणाल की इस बात से कि माओवादी शिविरों  में महिलाओं का यौन शोषण होता है,मुझे इनकार नहीं है। शायद किसी को न होगा। अलबत्ता इसे ‘आम बात’ कहने पर असहमति बनती है। लेखिका को यह ‘आम बात’ बाहर की दुनिया में नजर आनी चाहिए थी। कहना चाहिए था कि हमारे समाज में महिलाओं का यौन शोषण ‘आम बात’ है, ऐसी कुछ घटनाएं माओवादी शिविरों तक में देखी जा सकती हैं।

वल्लरी का मानना सही है कि माओवादी शिविरों में भर्ती किये जानेवाले कामरेडों को मार्क्सवाद  की कड़ी शिक्षा  से गुजरना पड़ा होगा। यह भी कि उनके पास एक आदर्श  समाज स्थापित करने का सपना है। और सारा त्याग,सारी कुर्बानी भी उसी के लिए है। तो कम-से-कम वहां तो एक उच्च नैतिकता का मॉडल प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। बेशक  ऐसी मांग की जानी चाहिए।

चौकी-चौके में अंतर नहीं                    फोटो: अजय प्रकाश
लेकिन हमें मानना पड़ेगा कि इसमें सिर्फ माओवादी ही विफल नहीं रहे हैं। भारत की अन्य जो दूसरी मार्क्सवादी  पार्टियां हैं उनकी पोलित ब्यूरो में भी क्या कम्युनिस्ट समाज की नैतिकता वाला मानदंड स्थापित हो सका है?शायद नहीं। आज भी इन मार्क्सवादी  पार्टी कार्यालयों में चाय बनाने और झाड़ू लगानेवाले क्या उससे ऊपर उठ सके हैं? जाहिर है, उत्तर नकारात्मक होगा। हम-आप सब जानते हैं कि इन वामपंथी पार्टियों में भी खून देनेवालों की अलग श्रेणी है तो फोटो खिंचानेवालों की अलग ही प्रजाति है।

हम यह भी जानते हैं कि महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय  के प्रतिष्ठित  मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा ?

वल्लरी पूछती हैं कि ‘क्या मुकम्मल राजनीतिक शिक्षण  के बिना पार्टी में कॉमरेडों की भर्ती हो जाती है?’ जिसके अंदर मार्क्सवाद के लिए थोड़ी भी सदास्था बची है,ऐसे सवाल उठेंगे। कुछ दिनों पहले केरल के पूर्व सीपीएम सांसद कुरिसिंकल एस मनोज को व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था प्रकट और अभिव्यक्त करने के लिए पार्टी की सदस्यता से जब हाथ धोना पड़ा था, तो मैंने भी अपने लेख में यही सवाल उठाया था कि ऐसे लोगों को जिनकी दृष्टि प्रगतिविरोधी एवं अवैज्ञानिक समझ पर आधारित हो,क्या कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया जाना चाहिए ?

क्या कारण है कि लगभग पचास वर्षों तक सीपीएम (बिहार) के नेता रह चुके चुनाव की घोषणा होने से ठीक पहले जदयू का दामन थाम लेते हैं। हमें इन तमाम सवालों को (यौन शोषण  समेत) सिर्फ माओवाद के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि एक व्यापक संदर्भ में उठाना चाहिए।

Sep 11, 2010

दुष्प्रचार और भीतरघात साथ-साथ


सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है.


नीलाभ



मेरे खयाल में अंजनी ने मृणाल वल्लरी के दुष्प्रचार का बहुत सही जवाब दिया है, हालांकि जनसत्ता, उसके गुर्गे, आम मीडिया, और कुछ स्वघोषित ब्लौगिये समाज सेवी और "सच्चाई के ठेकेदार" अपना शोर जारी रखे हुए हैं. यहां कुछ बातों को समझ लेना बहुत ज़रूरी है.

पहली बात तो यह है कि हमारी जनता जिन मुद्दों पर अपनी लड़ाई लड़ रही है,वे पहले की तरह सिर्फ़ ज़मीन या श्रम पर अधिकार की लड़ाई नहीं रह गयी है,न यह किसी एक फ़िरन्गी ताक़त और उसके पिट्ठुओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा संघर्ष है.यह लड़ाई विश्व पूंजी और उनके दलालों के ख़िलाफ़ है जो एक नये उपनिवेशवादी ढांचे को लागू करके हमारे देश पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं.वेदान्त हो या पॉस्को  या एनरौना  या टाटा या जिन्दल -- इनका सूत्र संचालन अब amrika  , जापान, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश और आवारा पूंजी के हाथ में है.

दूसरी बात यह है कि सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है. इसलिए नरसिंह राव हों या मनमोहन सिंह, पी. चिदम्बरम हों या मोनटेक सिंह आहलूवालिया -- ये सब उनके प्राक्रितिक सहयोगी हैं.

तीसरी बात,नव उपनिवेश्वादियों और उनके स्वाभाविक सहयोगियों के मनसूबे तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक "बांटो और लूटो"की पुरानी आज़मूदा नीति पर अमल न किया जाये,चुनांचे देशवासियों के एक अच्छे-ख़ासे तबक़े को इस लूट का चूरा देना अनिवार्य होता है.परम्परागत रूप से मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा इसका लाभार्थी बनता है.यही वजह है कि पत्रकारिता और शिक्षक दिवसों पर पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के गुण गानेवाले और त्याग और बलिदान और संयम का राग अलापने वाले आज अश्लील तनख़्वाहों का मज़ा लेते हुए सच्चाई के अलमबरदार बने हुए हैं.दिलचस्प बात यह है कि परम्परागत रूप से यही तबका परिवर्तन का विरोधी भी होता है और परिवर्तन का पक्षधर भी इसलिए सत्ताधारी और उसके गुर्गे इसके परिवर्तन विरोधी हिस्से को अपने आक्रमण के हाथ और हथियार बनाते हैं.

पढाई करतीं महिला गुरिल्ला                  फोटो: अजय प्रकाश
स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी इसी परिवर्तन विरोधी,सत्ता समर्थक तबक़े के सबल प्रतिनिधि हैं और इन्हें पूंजीवादियों के पिट्ठुओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए.एक अगर बाहर से दुष्प्रचार करते हुए जनद्रोह कर रहा है तो दूसरा भीतरघात करके.

खैर,ये बातें बहुत प्राथमिक स्तर की बातें हैं और आप सब इन्हें जानते ही हैं.इस पृष्ठभूमि को पेश करने के पीछे मेरा आशय दोहरा है.

पहले तो यह कि अगर हम स्वामी अग्निवेश के वर्गीय चरित्र और भीतर्घत के उनके इतिहास से परिचित थे तो हमने उन्हें छत्तीसगढ़,झारखण्ड और अन्य इलाक़ों में आदिवासियों से कन्धा मिला कर लड़ रहे साथियों और हमारी दमनकारी,जनविरोधी सरकार के बीच इतने संवेदनशील मामले पर स्वयंभू मध्यस्थ बनने का अवसर ही क्यों प्रदान किया ?आज़ाद और उनके साथियों ने भी उन्हें अपनी ओर से मध्यस्थता करने की ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी ?शान्ति-वार्ता को विफल करने का इरादा गृहमन्त्री पी.चिदम्बरम का ही नहीं था,कहीं-न-कहीं इस में स्वामी अग्निवेश का भी बहुत योगदान है.और जिस तरह से आज़ाद और हेम चन्द्र पाण्डेय की निर्मम हत्या की गयी और फिर उसके बाद गिरफ़्तारियों और सनसनीखेज़ और सरासर झूठे रहस्योद~घाटनों का सिलसिला शुरू हो गया है,उससे यह साफ़ है कि स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी एक ही विराट थैली के चट्टे-बट्टे हैं.झूठी ख़बरों और दुष्प्रचार का जो तूमार मृणाल वल्लरी ने बांधा है वह गृहमन्त्री और सरकार की धोखेधड़ी का ही एक शाख़साना है.

ऐसे में इस भूल-ग़लती के लिए कौन ज़िम्मेदार है जो कवि मुक्तिबोध के शब्दों में "आज बैठी है जिरह-बख़्तर पहन कर तख़्त पर दिल के" ? कितनी prophetic, भविष्यसूचक हैं आगे की पंक्तियां --

छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुल्तानी जिरह-बख़्तर बना है सिर्फ़ मिट्टी का,
वो -- रेत का-सा ढेर -- शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ़ सन्नाटा !!
( लेकिन, ना ज़माना सांप का काटा )
भूल ( आलमगीर )
मेरी आपकी कमज़ोरियों के स्याह
लोहे का जिरह-बख़्तर पहन, ख़ूंख़ार
हां ख़ूंख़ार आलीजाह;

वो आंखें सचाई की निकाले डालता,
करता, हमें वह घेर ,
बेबुनियाद, बेसिर-पैर...

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते ताम-झाम में,
शाही मुक़ाम में ! !

लिहाज़ा, अगर हमें आगे स्वामी अग्निवेशों के भीतरघात से बचना है तो हमें और भी सावधान रहना होगा और यहां "हम"से मेरा आशय उन सभी से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस संघर्ष में जुटे हुए हैं. रही बात मृणाल वल्लरी जैसी पत्रकारों की, तो वे दुष्प्रचार के बल पर ही पनपते हैं. बैक्टीरिया की तरह. उनके पास कुछ पिटे-पिटाये वाक्य होते हैं, कुछ परम्परागत गालियां, बिना पढ़े कुछ भी उध्रृत करने की ग़ैर-ईमानदारी --चाहे वह मार्क्स का कोई वाक्य हो या एंगेल्स का या मौक़ा-मुहाल पडने पर वेदों का.

जनसत्ता के  सम्पादक को अपनी बिक्री से ग़रज़ है सच-झूठ से नहीं.कवि शमशेर के हवाले से कहूं तो "जो नहीं है जैसे कि ईमानदारी उसका ग़म क्य,वो नहीं है."और इसलिए क्या अब समय नहीं आ गया कि एक वैकल्पिक मीडिया,एक सबल सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा किया जाये और छिट्पुट ढंग से काम करने की बजाय एकाग्र ढंग से लोगों को गोलबन्द किया जाये.




जनसत्ता की कालिमा में, राजसत्ता की चमक


जनसत्ता के सम्पादकीय पेज पर छपे लेख ' लाल क्रांति के सपने की कालिमा'में मृणाल वल्लरी  ने 'हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका में,सिरमौर बनी अंग्रेजी की उतरन'  को पत्रकारिता के न्यूनतम मानदंडों का मखौल  उड़ाते हुए जिस अधिकारिता से पेश किया है उसपर अंजनी कुमार का आलेख.
अंजनी  कुमार

एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी भी इन सारे मोर्चों पर न तो एक साथ लड़ सकती है और न ही लड़ते हुए गलतियों से बच सकती है। लेकिन गलतियों के खौफ से न तो सपने छोड़े जा सकते हैं और न ही उन्हें मारा जा सकता है। सपने देखना जरूरी है,लेकिन वह दिवास्वप्न न हो। सवाल उठाना जरूरी है,लेकिन वह खारिज करने वाला न हो। उनका जमीनी रिश्ता हो तो वह परिवेश से संवाद और खुद के भीतर एक सर्जक को जन्म देता है। अन्यथा सपने मारने की परम्परा तो चलती ही आ रही है। आप भी इसमें शामिल हैं तो यह कोई नई बात नहीं होगी। आज जरूरत सनसनीखेज खबर की नहीं,वस्तुगत सच्चाई से रू-ब-रू कराने वाली ख़बरों और इसे पेश करने वाले साहसी पत्रकारों की है।

उमा मांडी यानी सोमा मांडी के आत्मसमर्पण एवं सीपीआई (माओवादी)के नेताओं पर बलात्कार के आरोप की कहानी 24अगस्त को टाइम्स ऑफ  इंडिया ने सनसनीखेज तरीके से पेश  की। एक स्त्री की गरिमा और आम परम्परा तथा विशाखा निर्देशों (महिला हितों की रक्षा के लिए बना कानून)की धज्जी उड़ाते हुए इस अखबार ने उमा मांडी के फोटो और मूल नाम को भी छापा। इस घटना के लगभग दो हफ्ते बाद जनसत्ता में उसी कहानी को सच मानते हुए न केवल माओवादियों पर बल्कि लाल क्रांति पर कीचड़ उछालने वाला मृणाल वल्लरी का लेख छपा।

बीच के दो हफ़्तों में इस संदर्भ में तथ्य संबधी लेख,खबर और प्रेस रिपोर्ट भी छपकर सामने आये,लेकिन न तो लेखिका को पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों की चिंता थी और न ही 'जनसत्ता'को सच को प्रतिष्ठा प्रदान करने की। लगता है कि उनकी चिंता 'कालिमा'को सनसनीखेज तरीके से पेश  करने की थी और इसके लिए माओवादी आसान पात्र थे। ठीक वैसे ही जैसे किसी भी जनपक्षधर नेतृत्व को माओवादी घोषित कर पूरे जनांदोलन को सनसनीखेज बनाकर कुचल देने के लिए पूर्व कहानी गढ़ लेना। आइए, दो हफ्ते में गुजरे कुछ तथ्यों पर नजर डालें।

द टेलीग्राफ में 29अगस्त को प्रणब मंडल के हवाले  से सोमा यानी उमा मांडी के कथित आत्मसमर्पण की कहानी पर खबर छपी। इस रिपोर्ट के अनुसार उमा मांडी 20अप्रैल को कमल महतो के साथ मिदनापुर से 15किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-6पर पोरादीही में गिरफ्तार हुई थीं। कमल महतो को पुलिस ने 17अगस्त को कोर्ट में पेश कियालेकिन  सोमा की गिरफ्तारी नहीं दिखाई गयी। इस रिपोर्टर के अनुसार इस बात की पुष्टि  न केवल उनके रिश्तेदार, बल्कि पुलिस के एक हिस्से ने भी की।

 इसी तारिख को  'यौन उत्पीड़न और राजकीय हिंसा के खिलाफ महिला मंच'ने एक प्रेस रिपोर्ट जारी कर टाइम्स ऑफ़  इंडिया के खबर की तीखी आलोचना करते हुए कुछ सवाल उठाये। एक सवाल का तर्जुमा देखिये :-आत्मसमर्पण के समय उमा द्वारा दिये गये बयान को ही आधार बनाकर खबर दे दी गयी। इसे अन्य स्रोतों से परखा नहीं गया। इस खबर को बाद में भी अन्य स्रोतों के बरक्स नहीं रखा गया। ज्ञात हो कि उपरोक्त मंच में एपवा से लेकर स्त्री अधिकार संगठन और एनबीए जैसे 60संगठन और सौ से ऊपर व्यक्तिगत सदस्य हैं। 11सितम्बर  के तहलका (अंग्रेजी) में बोधिसत्व मेइती की खबर के अनुसार ज्ञानेश्वरी रेल त्रासदी के आरोप में 26मई को हीरालाल महतो को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने हीरालाल को एक दूसरी पुलिस जीप में हथकड़ी के साथ बांधी गयी उमा मांडी के सामने पेश करते हुए कहा- यह तुम्हें जानती है कि तुम माओवादी सहयोगी हो। उमा मांडी को पुलिस की जीप में और साथ में पुलिस को  वर्दी में देखने वाले ग्रामीणों के बयान को भी इस रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है।

 मानिक मंडल ने 31अगस्त को प्रेस क्लब, दिल्ली में बताया कि उमा मांडी की कहानी पुलिस द्वारा गढ़ी गयी है। उन्होंने अपने जेल अनुभव सुनाते हुए जेल में बंद पीसीपीए के कार्यकर्ताओं के उन पत्रों का हवाला दिया जिसमें उमा मांडी के पुलिस इन्फोर्मर होने की बात कही गयी है। इस पत्र के कुछ अंश तहलका ने जारी किये हैं। पूरा पत्र संहति ब्लॉग पर कुछ दिनों बाद अंग्रेजी में देखा जा सकेगा।

उपरोक्त तथ्यों के अलावा यदि हम प.मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा के उमा मांडी के आत्मसमर्पण के समय के और बाद के बयानों को देखें तब भी इस मुद्दे के ढीले पेंच नजर आयेंगे। एक संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दे पर इन तथ्यों को नजरअंदाज कर लेख लिख मारने और छाप देने के पीछे न तो जल्दीबाजी का मामला दिख रहा है और न ही लापरवाही का। क्योंकि यहाँ हम इस तथ्य से भी वाकिफ हैं कि मृणाल वल्लरी लंबे समय से पत्रकारिता कर रही हैं, 'जनसत्ता' से जुड़ी हुई हैं और उन्हें युवा संभावनाशील पत्रकारों में शुमार किया जाता है। इसी तरह संपादक ओम थानवी के नेतृत्व वाली जनसत्ता की संपादकीय टीम भी ऊँचे दर्जे की पत्रकारिता के लिए स्थापित है।

राजेन्द्र यादव के शब्दों में ले-देकर यही एक अखबार है। यह अखबार भी सीपीआई माओवादी के बारे में अपनी ही पत्रकार के लेख को छापते समय पत्रकारिता की न्यूनतम नैतिकता को तक नजरअंदाज कर जाता है कि उमा मांडी उस पार्टी की सदस्य है भी या नहीं और इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध है भी है या नहीं। यह अखबार पीसीपीए और सीपीआई माओवादी के बीच के फर्क को भी नजरअंदाज कर जाता है। ठीक वैसे ही जैसे गॉधीवादी हिमांशु को माओवादी घोषित कर दिया जाता है। इसी अंदाज में मृणाल वल्लरी सीपीआई माओवादी पार्टी, माओवादी और मार्क्सवादी होने का फर्क मिटाकर मनमाना लिखने की खुली छूट हासिल कर लेती हैं। गोया पत्रकारिता न होकर सब धान बाइस पसेरी वाली दुकान हो।

ऐसा ही मनमानापन कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दिखा। पुलिस के बयान पर एक आदिवासी युवा लिंगाराम जोकि दिल्ली में पत्रकारिता कि पढाई कर रहा है, को सीपीआई माओवादी को प्रवक्ता घोषित करते हुए यह बताया गया कि वह दिल्ली में माओवादी समर्थक के यहाँ छिपा हुआ है। यदि यह अपढ़ होने तथा  अधकचरेपन का परिणाम होता तो इसे दुरूस्त किया जा सकता है, लेकिन यह सचेत और सतर्कता का परिणाम है। इस मनमानेपन के पीछे पुलिस व शासन तंत्र की डोर कसकर बंधी हुई है। अन्यथा सिर्फ सरकारी बयान के संस्करण के आधार पर लाल क्रांति की चिंता का मनोजगत इस तरह खड़ा नहीं होता और न ही इस तरह की पत्रकारिता से हम रू-ब-रू होते।

मसलन,किसी आंदोलन का मूल्यांकन पार्टी संगठन,विचारधारा और कार्य अनुभव तथा हासिल के मद्देनजर करते हैं। सीपीआई माओवादी पार्टी के संगठन, विचारधारा,कार्य और हासिल के बारे में लेखों, रिपोर्टों आदि की लंबी फेहरिस्त है। ये आमतौर पर उपलब्ध हैं। ठीक इसी तरह अन्य पार्टियों,संगठनों तथा सरकारी तंत्र के कार्यों के बारे में भी तथ्य उपलब्ध हैं। मृणाल वल्लरी यह जरूर बताएं कि किस सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट में माओवादी बलात्कारी के रूप में चित्रित हैं। इसी तरह आप सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टों में सीपीएम व हरमाद वाहिनी,भाजपा,कांग्रेस तथा उनके सलवा जुडुम इत्यादि के चेहरे को भी देखें। ऑपरेशन ग्रीन हंट के कारनामों को देखें।

 नक्सलबाडी उभार के समय 1967में सिद्धार्थ शंकर  रे ने एक तकनीक अपना रखी थी। इसमें पुलिस या आम छोटे दुकानदार को गोली मारने का काम खुफिया के आदमी किया करते थे,लेकिन परचे नक्सलियों के छोड़े जाते थे। आज छत्तीसगढ़ से लेकर मिदनापुर तक में यही कहानी चल रही है। इसमें नये तत्व शामिल हो गये हैं और नये खिलाड़ी भी शामिल हुए हैं। आपने 'लापता' महिलाओं का जिक्र करते हुए पीसीपीए के मिलिशिया पर बलात्कारी और अपहरणकर्ता होने का आरोप मढ़ा है। जिस दिन आपका लेख छपा है उसी दिन के 'जनसत्ता' में यह भी खबर है कि सीपीएम ने नंदीग्राम में 2500लोगों के बेघर होने की सूची सौपी है। आप बंगाल के प्रति चिंतित हैं और इससे निष्कर्ष निकालना चाहती हैं तो वहॉ के गैर माक्र्सवादियों से लेकर आईबी की सरकारी रिपोर्ट पर भी नजर डालें।

अब तक सीपीएम के नेतृत्व में पूरे जंगलमहल में हरमद वाहिनी ने 86 कैंप लगा रखे हैं, एकदम सलवा जुडुम की तर्ज पर। हत्या के बाद शव पर माओवादी साहित्य का जल चढ़ाने वाले हरमद वाहिनी के बलात्कार,हत्या और  गायब करने के कारनामों के बारे में 'नारी इज्जत बचाओ कमेटी'के पत्र और प्रेस रिपोर्ट देखिये। पीसीपीए के डुप्लीकेट पर्चे और पोस्टर जिनका रंग मूल पीसीपीए से अलग है, के बारे में जानने के लिए एपीडीआर की रिपोर्ट को देखिए। किसी भी आन्दोलन में भटकाव हो सकता है। इन पर बात करते समय ठोस सच्चाइयों का जिक्र जरूरी है। स्रोत के बारे में न्यूनतम जॉच-पड़ताल जरूरी है।

हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका  
इन संदर्भों को भूलकर आन्दोलन,नक्सलवाद व माओवाद पर पत्रकारिता करना भोलापन नहीं है। यह एक ऐसा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार है जिसके चलते आंदोलनों के प्रति संवेदनहीनता और उदासीनता का माहौल बनता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी तरह की पत्रकारिता ने हर विस्फोट को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाया जिसका फायदा फासिस्ट हिन्दूत्ववादी ताकतों ने उठाया। इसने बहुसंख्यक आबादी को मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रही और उनकी तकलीफों के प्रति संवेदनहीन बनाने में एक कारक की भूमिका अदा की।

मृणाल वल्लरी महिला आंदोलन की चुनौतियों को जिस संदर्भ में रखकर चिंता जाहिर कर रही हैं और निष्कर्ष निकाल रही हैं उसमें पुलिसिया संस्करण छोड़ कोई संदर्भ नहीं है। उनकी चिंता और तर्क महिला के प्रति उनके सरोकार के प्रकटीकरण हो सकते हैं,लेकिन महिला मुक्ति का सवाल पुलिसिया संस्करण से हल करने का उनका प्रयास उस संस्करण की व्याख्या होकर ही रह गया है।

मृणाल वल्लरी पूछती हैं कि ”मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?“जाहिरा तौर पर उनका जोर कॉमरेडों की बंदूक एवं खौफ पर है और उत्तर नकारात्मक है। वह मानकर चल रही हैं कि बंदूकें सिर्फ कॉमरेडों यानी पुरुषों के पास हैं। जो भी आन्दोलन के बारे कखग जानता होगा वह इस अज्ञानता पर हंस ही सकता है। खौफ से सपने टूटते भी हैं और खौफ पैदाकर सपने देखे भी जाते हैं। यह अपने देश में विभिन्न पार्टियॉ व उनकी सरकारें खूब करती आ रही हैं। आप जहाँ रह रही हैं वहॉ अनुभव से इसी तर्क तक ही पहुंचा जा सकता है और उसे ही आप आजमाने की कोशिश कर रही हैं।

खौफ के खिलाफ खड़े होने की भी एक तर्क प्रणाली है और उससे उपजा हुआ सपना एक तर्क और लोकरंजकता से लबरेज भी होता है। यह एक ऐसी आम सच्चाई है जिसे गीत में भी ढाला जा सकता है और विचार व सिद्धांत में बदला भी जा सकता है। इस पूरी प्रकिया में गलतियाँ भी हो सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग की लूट में कुछ अच्छाईंयां दिखती रह सकती हैं। लेकिन मूल मसला सपने का है। सामंती व्यवस्था वाले हमारे समाज में दलित, स्त्री,अल्पसंख्यक,आदिवासी और राष्ट्रियताएँ जिस उत्पीडन की शिकार हैं उससे मुक्ति का रास्ता बहुस्तरीय संघर्षों से होकर जाता है।