Aug 25, 2010

पुनर्जागरण-प्रबोधन की सांस्कृतिक मुनाफाखोरी


कात्यायिनी  और शशि प्रकाश के संगठन के मुताबिक ट्रेड यूनियन करने,पत्रकारिता व लेखन करने,सरकारी नौकरी में होने से हमलोग जनविरोधी हो गये हैं। इससे अधिक जनविरोधी बात और क्या हो सकती है कि आप जन को ही दुश्मन के खेमे में डाल दें और उससे यह भी पूछें कि पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?


विवेक कुमार

 देर आये दुरुस्त आये। अच्छा लगा। आपने कम से कम इतना तो स्वीकार किया कि-
1- संगठन में  किसी  व्यक्ति के नाम से भवन/भूखंड है।
2- आपके यहाँ  सामूहिक उद्यम है।
3-  साथियों की परिसम्पत्ति को ट्रस्ट/सोसायटी में बदलने की प्रक्रिया, कानूनी अड़चनों के बावजूद जारी है।
4-  कुछ के मामले बुर्जुआ कोर्ट में चल रहे हैं। (कात्यायनी के जवाब 'चंदे के हमारे व्यक्तिगत स्रोत है' के  पॉचवें हिस्से को देखें।)
5-  जनज्वार पर ब्लॉग चर्चा में हिस्सेदार लोगों में से अधिकांश आपके संगठन से हैं। जिन्हें या तो निकाला गया या खुद ही निकल गये (उपरोक्त का पहला हिस्सा)।
6- आपके यहाँ हरेक कार्यकर्ता को सामान ढोना, स्टाल लगाना, झाड़ू-पोछा, खाना बनाना और मेहनत-मजदूरी का काम करने और सीखने के साथ- साथ मजदूरों के बीच रहना होता है (उपरोक्त का चौथा हिस्सा)।
7- आपके संगठन ने “सूदखोर” से परिकल्पना प्रकाशन और उसके लिए खरीदे गये वाहन के लिए एक बड़ा आर्थिक सहयोग लिया (उपरोक्त का सातवां हिस्सा)।
8- “गैरजनवादी एशियाई समाज में पार्टियों के भीतर भाई-भतीजावाद और विशेषाधिकार की प्रवृतियां अनुकूल वस्तुगत आधार के कारण तेजी से फल-फूल सकती हैं।” (उपरोक्त का चौथा हिस्सा)।
9- आपका वैचारिक लेखन काफी हद तक सामूहिक उत्पाद है (उपरोक्त का छठा हिस्सा)।

आपके लेखन में एक तरफ बाल्जाक की निर्मम यथार्थवादी पद्धति है,तो वहीं मार्खेज के कथ्य की जादुई शैली भी। यथार्थ की प्रस्तुति में निश्चय ही सामूहिक प्रयास दिख रहा है, लेकिन रूप और शैली तो आपकी ही है। यद्यपि इसमें भी सामूहिकता के स्वर झलक उठे हैं। आक्रामक स्वर और शैली के बीच यथार्थ की कठोर भूमि का वर्णन जितनी शालीनता एवं कोमलता से किया गया है वह सचमुच अदभुत और सराहनीय है। यद्यपि इसमें यथार्थ के ऊबड़-खाबड़पन का अहसास कमतर हो गया है। कहीं-कहीं यथार्थ का पक्ष पृष्ठिभूमि में चला गया है,लेकिन इसके असर को समझा जा सकता है। जादुई यथार्थवाद नतीजों तक तो नहीं, लेकिन असर के रूप में हमें जरूर उस दुनिया तक ले जाता है जहां बाल्जाक का निर्मम यथार्थवाद है और उससे उपजा इंसान का मनोविज्ञान, एक प्रतिसंसार।

कात्यायिनी :  किसके लिए लेखन
युद्धक्षेत्र में लूटमार करने वाले लुटरों के बारे में आपका लिखा लेख हमें एक ऐसी दुनिया की ओर ले जाता है जहॉ संपत्ति, परिवार, मुकदमा, फरेब, षडयंत्र, गठजोड़, भय, आशंका, आरोप तथा घपलेबाजी है। एक ऐसा सांस्कृतिक बोध भी जिसके भीतर बाहर की दुनिया के प्रति घोर असहनशीलता और नफरत है। यह मौत के बोध से बनी काफ्का की दुनिया नहीं है। यह अतीत से पीछा छुड़ा लेने और भविष्य पर काबिज हो जाने की वही असीम ललक की दुनिया है जो ब्राह्मणों के द्विज होने में अभिव्यक्त होती है। जिसे हमेशा छूत का डर बना रहता है।

सार्वजनिक स्थलों पर सिर्फ यही वक्ता व नियन्ता होता है। सिर्फ इसी का विश्लेषण मान्य एवं अंतिम होता है। जो कुछ है उसी का है। शेष तो माध्यम हैं,चराचर हैं। वेदपाठी ब्राहमण का रचा एक प्रतिसंसार,जिसका निर्मम यथार्थ एक ब्राहमणवादी संरचना और उसकी संस्कृति के रूप में अभिव्यक्त होता है। और इतिहास अपराधी मेमने की तरह निरीह एक कोने में खड़ा रहता है।

 इसमें दलित, स्त्री, आदिवासी और समाज के हाशिए पर डाल दिये गये लोग नहीं हैं। कात्यायनी हमें इसी दुनिया के अन्दरखाने में ले जाती हैं। जहॉ अद्वैतवादी दर्शन है और उससे निसृत राष्ट्रवाद। वह रेखांकित करती है :'विवेकानन्द उपनिवेशवाद और उसके द्वारा पोषित सामंतवाद एवं उसके रूढ धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों का विरोध करते हुए नये राष्ट्रवाद की वैचारिक आधारभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभाते हैं।' (कुछ जीवन्त कुछ ज्वल्नत- कात्यायनी, पृष्ठ 30)।

जनचेतना : प्रबोधन की दुकान
विवेकानन्द न केवल वर्णाश्रम के समर्थक थे,साथ ही स्त्री शिक्षा के विरोधी भी थे। नये राष्ट्रवाद के इसी पाठ का पुनर्पाठ कात्यायनी के लेख तथा उनके संगठन से आये पूर्ववर्ती लेखों में किया जा किया जा सकता है। इनके संगठन से आयी पुस्तिकाओं,पत्रिकाओं व लेखों में इसी अवस्थिति की प्रस्थापना है। इसी पाठ को एक लंबी छलांग मारकर उन्होंने सर्वहारा पुनर्जागरण व सांस्कृतिक प्रबोधन का नाम दे रखा है। इसकी सच्चाई को जरूर परखें कि यह कितना प्रबोधन है और कितना आत्मबोधन!

आइए, इस सर्वहारा सांस्कृतिक प्रबोधन को कात्यायनी व उनके संगठन से आये लेखों के सांस्कृतिक पक्ष को देखें और इस पाठ के राजनीतिक पृष्ठिभूमि की तलाश करें। सबसे पहला लेख एक राजनीतिक कार्यकर्ता जयपुष्प का है। वह जनज्वार को नंगई करने के लिए लताड़ते हैं। क्या सचमुच नंगई एक गाली है?श्रम करने वाली जातियों को वस्त्र धारण करने पर तरह-तरह की पाबंदियां थीं। आज भी देश के कई हिस्सों में दलित समुदाय के कपड़ों की लंबाई तय है।

नंगई न केवल जातिसूचक अर्थ लिए हुए है,साथ ही यह परम्परागत विरोध के इतिहास को भी समेटे हुए है। आज भी पूरी दुनिया में इस तरीके के रूप अख्तियार किये जाते हैं। अपने देश में महिलाओं ने इसे सबसे सशक्त तरीके से अपनाया। मणिपुर में बलात्कार व दमन के खिलाफ महिलाओं का प्रदर्शन और अभी हाल ही में देवदासी समुदाय का प्रदर्शन एक गाली है या सरकार के मुंह पर करारा थप्पड़?

आपके तीनों लेख में कुछ साथियों के निकाले जाने व तीन महीने की सजा देने का उल्लेख है। धारा 377 भी इतनी ही सजा देती है जितनी आपके दावे के अनुसार दी गयी। मुझे लगता है कि यह समलैंगिकता का मामला था। आपकी नजर में यह अपराध है और भयानक तौर पर गोपन है। क्योंकि आपने इतनी नफरत के बावजूद सिर्फ संकेत किया है। आप इसे घिनौना कर्म मानती हैं, लेकिन अब सरकार भी इसे अपराध नहीं मानती। सजा नहीं देती। संकेत कर अपमानित नहीं करती। बुर्जुआ कोर्ट में भी उन्हें एक नागरिक माना जाता है।

दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों का अधिकांश हिस्सा समलैंगिक लोगों के अधिकार का समर्थन करता है। मुंबई में 2004के हिस्सेदार सभी संगठनों ने उनके अधिकार का समर्थन किया। आप अभी भी इसे गाली के रूप में प्रयोग करने पर आमादा हैं और सजा देने पर गर्व महसूस कर रहे हैं। आप तो समाजवादी क्रांति के झंडाबरदार हैं फिर  बुर्जुआ जनवादी अधिकार देने में  इतनी कोताही क्यों?

संगठन से निकले लोगों के लिए आपने कुछ विशिष्ट शब्दावलियां भी बचाकर रख ली हैं। मसलन,कुछ लोग 'मउगा' और 'हिजड़ा'हैं। इस मुददे पर नीलाभ और मैंने पिछले पोस्ट में लिखा है। स्त्रीयोचित व्यवहार को आप एक गाली के रूप में बदल देते हैं,लेकिन वहीं जब झांसी की रानी को मर्दानी के रूप में वर्णित किया जाता है तो निश्चय ही आपकी भी बाछें खिल उठती होंगी। स्त्रियों के प्रति यह व्यवहार,सिद्धांत और सोच की तरह आपके लेखों में व्यक्त होता है.ऐसा क्यों है यह बात स्वाभाविक तौर पर आप बखूबी जानते होंगे। शारीरिक भिन्नता के आधार पर भेदभाव की प्रवृत्ति और उसे गाली में बदल देने की प्रक्रिया घोर अमानवीयता और असीम क्रूरता है।

सत्यम, मीनाक्षी और कात्यायिनी :  क्रांति पर कब्ज़ा
कात्यायनी ने नीलाभ को 'राजनीतिक मुल्ला'की पदवी से  नवाजा है और अपने खिलाफ फतवेबाजियों का इतिहास बताया है। भारतीय समाज में सबसे बुरे लोग मुल्ला और उनकी फतवेबाजियाँ ही हैं? शंकराचार्यों, पुजारियों, बाबाओं से ग्रस्त इस देश में गालियों के लिए यदि आप अल्पसंख्यकों के ही गली में चक्कर मार रहे हैं तो सचमुच इस देश के नागरिक समाज को खतरा है। यदि आपका तर्क यह है कि मुल्लाओं व फतवेबाजियों से ही मुसलमान पीछे हैं तो आप सच्चर रिपोर्ट से कोसों दूर पीछे हैं। बहरहाल, इससे आपकी मुसलमानों के प्रति सोच का एक संकेत मिलता है।

मीनाक्षी और आपके लेखों में व्यक्ति के जन्मना संबंध पर काफी जोर दिया गया है। मसलन,मुकुल जी कायस्थ हैं तो उनकी कमी में मुंशीगिरी को जोड़ दिया गया है। सत्येन्द्र कुमार साहू के साथ बनियागीरी, आदेश कुमार सिंह के साथ धमाका करने,अशोक कुमार पाण्डेय के साथ पंजीरी ग्रहण करने जैसे जुमले का प्रयोग किन अर्थों में किया गया है? पारिवारिक पृष्ठिभूमि के आधार पर कम से कम दो लोग आपके दुश्मन खेमे से हैं। उन्हें आपने संगठन की सदस्यता दी। इसी आधार पर आप उन्हें गाली भी दे रहे हैं। इन साथियों को जातिसूचक कर्म के आधार पर गरियाना किस नैतिकता और मूल्य के तहत आता है? दूसरे, यह सवाल भी मौजूं है कि इसमें से कौन है जो अपने परिवार के व्यवसाय को आगे बढ़ा रहा है?

सत्येंद्र साहू का अपराध सूदखोर होना है या सूदखोर का बेटा होना?आपके अनुसार सूदखोर का बेटा होना ही अपराध है। तब तो आदेश सिंह से लेकर अभिनव सिन्हा तक सभी अपराधी हैं। इस आधार पर तो चाउ एन लाई, चू तेह से लेकर बाबूराम भटटाराई, गुजरेल तक सभी अपराधियों की श्रेणी में शुमार किये जायेंगे। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान यह मुददा भी सामने आया था। इस मामले में आपकी पोजीशन माओ के खिलाफ है। जातीय संरचना के चलते भारत की स्थिति और अधिक जटिल है। जन्मना भेदभाव व पैतृक व्यवसाय से व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण घोर ब्राहमणवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

सर्वहारा सांस्कृतिक प्रबोधन के गर्दो गुबार के भीतर जाति,धर्म व व्यक्ति के प्रति इनके नजरिये का खुलासा यह बताता है कि यह संगठन सर्वहारा तो दूर,एक आम जनवादी संस्कृति को भी व्यवहृत नहीं करता। इसका चरित्र सवर्ण हिन्दू है और संरचना पितृसत्तात्मक ब्राहमणवादी। कृपया यहाँ यह तर्क प्रस्तुत न करें कि इनके प्रकाशन की गाड़ी पर भगवाधारियों ने हमला किया इसलिए ये वामपंथी धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के पुरोधा हैं।

अरविन्द सिंह: बेचने की तैयारी
यह इस संगठन के सर्वहारा सांस्कृतिक प्रबोधन के गर्दो गुबार की पड़ताल की संक्षिप्त प्रस्तुति है। उस प्रतिसंसार और उसके मनोविज्ञान की परख है जिसके भीतर व बाहर बैठा कोई भी कार्यकर्ता जैसे ही प्रश्न के पत्थर को उछालता है वहां भूचाल आ जाता है सबकुछ बेतरतीब होने लगता है। भगदड़ मच जाती है। आपात् की स्थिति बन जाती है। भारतीयजन के विविध समुदाय की आकांक्षा को अद्वैतवाद से निस्सृत राष्ट्रवाद व नेहरूवियन राजनीति में निस्तारित कर सीधा सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की लंबी कूद लगाने वाला यह संगठन खुली आलोचना-बाम्बार्ड द बुर्जुआ हेडक्वार्टर की पहली सीढी पर ही जिस तरह के रूदन में लग गया उससे निश्चय ही हृदय विदारक दृश्य बन उठा है।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक जमीन पर घटित हुई। इसने क्रांति की जटिलता व बदलाव को सुलझाने में कुछ आम नियम व दर्शन के नये क्षितिज खोले। यह संगठन सांस्कृतिक क्रांति के संदर्भ में बच्चों के अनुकरण जैसा खेल खेल रहा है जिसमें वे डगरौना चलाते हुए गाड़ी चलाने के अहसास से भर उठते हैं। यहॉ फर्क इतना ही है कि जहाँ इससे बच्चों में कल्पनाशीलता व सृजनशीलता बढ जाती है वहीं इस अनुकरण पद्धति से इस संगठन के कार्यकर्ताओं में ठहराव,कुंठा,निराशा और अवसाद भर उठता हैं। सामूहिकता,कम्यून व व्यक्तित्वांतरण संपत्ति, परिवार एवं उत्तराधिकार में बदलने की प्रक्रिया में बदल जाता है और राजनीति खोखली भाषा के एक ऐसे धुरखेल में बदल जाता है जिसका प्रयोग लोगों को भगाने में किया जाता है।

इस अजब से दृश्य में कात्यायनी के सवाल बार बार घूमकर सामने आ जाते हैं :कीचड़ उछालने वालो तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है? इस सान्द्र समय में एक अदना सवाल भी अपने पीछे के पूरे रेले को लेकर आता है। असंगतता का स्वर मुखर हो उठता है। निषेध की प्रक्रिया तेज हो उठती है। हमारी पोलिटिक्स आपके संगठन की कार्यशैली, उसकी राजनीतिक समझदारी, नेतृत्व के व्यवहार, नेतृत्व समूह की जीवन शैली का निषेध है। इस संगठन से निकले इतने सारे लोग जीवन यापन के लिए जीविका में लगे हुए हैं। इससे निश्चय ही राजनीति तय होती है।

आपके अनुसार ट्रेड यूनियन करना,पत्रकारिता व लेखन करना, सरकारी नौकरी में होने से ही हम सभी जनविरोधी हो गये हैं। आपकी यह अनोखी व मौलिक बात बेचारे मार्क्स के वे दुर्दिन समय की याद दिला गये जब जीविका के लिए वे न्यूयार्क टाइम्स के लिए लेख लिखा करते थे। इससे अधिक जनविरोधी बात और क्या हो सकती है कि आप जन को ही दुश्मन के खेमे में डाल दें और उससे यह भी पूछें कि पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है? आपके हिसाब से दुनिया लेनिन और माओ के युग से आगे निकल चुकी है। तो पार्टनर आप यह जरूर बताएं कि हम किस युग में जी रहे हैं और इस नये युग की नेतृत्वकारी विचारधारा क्या है? मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद में किस इजाफे के साथ आपने दर्शन को एक नई मंजिल तक पहुँचाया है?

एक सुसंगत लेनिनवादी पार्टी संगठन व उसके मुखपत्र, घोषणापत्र व कार्यक्रम के अभाव में इतनी बड़ी दावेदारियों के पीछे की भी एक राजनीति है। आपके इस नई दावेदारी में 'उत्तर' वाद की नई सरणी वाली प्रवृति साफ दिख रही है। आपके चिंतन की सुई प्रभात पटनायक और विपिन चंद्रा पर टिकी हुई है और दावेदारी दर्शन में एक अनोखे योगदान की है। निश्चय ही आपकी इस दावेदारी की भी राजनीति है। आप पहले यह घोषित करते हैं :'एक नया दौर शुरू हो चुका है,परआर्थिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर इस नये दौर की सभी अभिलाक्षणिकताएं और सभी परिणतियां अभी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने नहीं आयी हैं। यह स्थिति वर्तमान सांस्कृतिक पटल को भी जटिल बना रही है (सृजन परिप्रेक्ष्य पुस्तिका-1, पृष्ठ-55)।'

इसके साथ ही आप अपने को विशिष्ट, मौलिक, सर्वोत्तम घोषित करने के लिए न केवल दार्शनिक का जामा पहन लेते हैं अपितु पार्टी संगठन को भी संक्रमणकालीन घोषित कर प्रयोगों के अंतहीन सिलसिले के राजनीतिक पुरोधा बन जाते हैं। इसका संयोजन करते हुए आप सर्वोत्तम व्यक्तित्व भी बन जाते हैं। आप समकालीनों की रेड़ पीटने का अभियान चलाते हैं। अन्य पार्टी संगठन के नेतृत्व को मनबहकी लाल, बादामखोर से लेकर भाई लोग (गुंडा) तक की संज्ञा से चरित्र हनन की राजनीति कुछ और नहीं,बल्कि अपने नाम के कीर्तन सुनने की असीम ललक है। चारू मजुमदार से लेकर रामनाथ व गैरी के चरित्र हत्या के अभियान की राजनीति, मौलिक होने की गहन कुंठा का ही एक रूप है।

परिवार की भाषा में मजदूरों का अख़बार
जब कात्यायनी हाय हाय करते हुए 'महान नेता' यानी रामनाथ को निकृष्ट घोषित करती हैं तो इसके पीछे अपने को सर्वोत्कृष्ट घोषित कर लेने की राजनीति ही है। पार्टनर, यह तुम्हारी राजनीति की आलोचना हैं, संगठन से निकले व निकाले गये रूप में भी और हम सभी के दिये जा रहे आलोचनात्मक वक्तव्य के तौर पर भी। एक समतामूलक समाज में आस्था व उसकी रचना की आकांक्षा ही हमारी राजनीति है। मार्क्सवाद लेनिनवाद माओवाद की अग्रिम मंजिल की बात करने वाले शशिप्रकाश व कात्यायनी जी आपकी राजनीति के बारे में आपके ही शब्दों में कहना ठीक लग रहा है-'कहा जा सकता है कि 'उत्तर'अवस्था वाले तमाम सिद्धांत आज के पूजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है और ये सिद्धान्तकार नित्शे के वर्णसंकर मानस पुत्र हैं जिनके लिए सांस्कृतिक-साहित्यिक (और राजनीतिक-ले)कर्म भाषा के खेल से अधिक कुछ भी नहीं है(सृजन परिप्रेक्ष्य पुस्तिका-1, पृष्ठ-67)।'

आपके सवालों और बुद्धिजीवियों से लगायी गयी गुहारों के संदर्भ में यह बात जानने की आकांक्षा तीव्र हो उठी कि आप जिस स्वाभिमान की छत से सीढी सहारे उतरकर नीचे आयीं, व्यक्तव्य दिया, उस स्वाभिमान की प्रकृति कैसी है? दुनिया की सारी कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब सार्वजनिक रूप से ही दिया है। अपने पक्ष में जन व बिरादराना संगठनों को खड़ा होने का आह्नान करता रहा है। वह बुद्धिजीवियों को पक्ष में खड़ा होने का तर्क प्रस्तुत करता है।

आप जन व बिरादराना संगठनों को अपनी उम्मीद से बाहर रखते हैं। असीम श्रद्धा के साथ आप बुद्धिजीवियों से पक्ष में खड़े होने की उम्मीद करते हैं। क्या यह इस कारण से है क्योंकि आप यह मानते हैं कि 'पूजीवादी संस्कृति की रुग्णताएँ आज जनसंचार के अधुनातन उपकरणों के सहारे भांति भांति के नये नये रूप धरकर जन समुदाय के दिलोंदिमाग तक पहुँच रही हैं और व्यापक आबादी मानो इसका एक निष्क्रिय उपभोक्ता सी बन कर रह गयी है व  'परिवर्तनकामी शक्तियां' विखराव, ठहराव व विखंडन की स्थिति में हैं।' इसलिए आप जोर देते हैं कि 'लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों की नईं कतारें तैयार की जाएँ। ऐसी भरती मध्यवर्ग के ऐसे युवाओं के बीच से होगी जो पूंजीवाद  के कोप कहर को झेल रहे हैं, जिन्हें एक हद तक की बुर्जुआ शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत हासिल है, जो अग्रिम तत्व हैं, तर्कपरक होने के नाते धार्मिक कटटरपन्थी फासीस्ट प्रचार से प्रभावित नहीं हैं, जो पुरातनपंथी और जातिगत संस्कारों से मुक्त हैं, जिनमें विद्रोह की भावना है।'

 साथ ही आप 'मजदूर वर्ग के बीच से भी भर्ती' का आहवान 'मजदूर बुद्धिजीवी' निर्मित करने के उददेश्य से करते हैं। वहीं आप यह घोषित करते है कि 'महानगरों के खाते पीते जीवन से अलग जो कवि लेखक दूरस्थ गावों कस्बों में रहकर लिख रहे हैं, वे भी या तो अपने आसपास के जीवन से विलग (कस्बे के बुद्धिजीवी), हैं या फिर वैज्ञानिक दृष्टि से रहित ऐसे लेखक हैं जो किसानी जीवन की रागात्मकता टूटने पर छाती पीट रहे हैं,पुरानी चीजों की अनिवार्य मृत्यु की नीयति पर बिसूर रहे हैं। वह सर्वहारा साहित्य की जमीन नहीं है।वहां वसे भविष्य की दिशा नहीं दिखती।' (उपरोक्त सभी उद्धहरण सृजन परिप्रेक्ष्य पुस्तिका-1, पृष्ठ-42 व 43 से उद्धृत)।

इस तरह आप निषेध करते हुए महानगर के मध्यवर्ग के उस हिस्से के पास पहुँचते हैं जो पूँजीवाद की मार से त्रस्त भी है और बुर्जुआ मूल्य से लैस भी। यही है जो आपके सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के कार्यभार का अगुआ दस्ता है। शेष या तो विलगित-विघटित हैं या भेंड़ हैं जिसका नेतृत्व आप व आपका उपरोक्त हिरावल दस्ता है। पाठक समुदाय आप ही इस अवस्थिति का विश्लेषण करे। क्योंकि यहां बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। यहाँ इतना जरूर कहना है कि कात्यायनी जिस क्रांतिकारी शान व स्वाभिमान की बात कर रही हैं वह कुछ और नहीं, बस थोथा अभिमान है, उन्हीं के शब्दों में टटपूंजियों का अहंकार है।

अंत में, साहित्यकारों व साहित्य सृजन के संदर्भ में चंद बातें। आपने बताया कि नीलाभ जी राजनीति के नये मुल्ला हैं। 65साल के इस लेखक व कवि के बारे में यह बात कुछ हजम नहीं हुई। क्या आप नक्सलबाड़ी की धारा को पतित विघटित घोषित कर उसके इतिहास को भी नल एण्ड वायड घोषित कर रही हैं?इसी शर्त पर ही नीलाभ नये मुल्ला साबित होंगे। इसी तरह आपने संजीव को नार्सिसिज्म (आत्ममुग्धता की एक बीमारी)से पीड़ित बताया है। महोदया, यह बीमारी दूसरों के प्रभाव का निषेध करती है और अपने प्रतिबिंबन के अनुकूल एक मोहीनी रचना संसार को निर्मित करती है। वह ऐसे ही कई बीमारियों से ग्रस्त हैं आपने उन्हें एक और बीमारी पकड़ा दीं। एक छोटी सी टिप्पणी की इतनी बड़ी सजा। यह साहित्य की भाषा में निरी कटुता है, जो ठीक नहीं है।

मैं यह मानता हूँ कि आप मौलिक रचनाकार हैं और आप ही के शब्दों में,इसमें सामूहिक प्रयासों के स्वर हैं। बहुत सी जगहों पर आपके संगठन के लेखों का कविता रूपांतरण भी है। विचार व कहीं कहीं भाषा की साम्यता से विभ्रम की स्थिति बन जाती है। आप मूलतः अपने पति के नेतृत्व में राजनीतिक व सांस्कृतिक कर्म कर रही हैं, जो अपनी प्रकृति में मौलिक, अनोखा व सर्वोत्तकृष्ठ है। इस संदर्भ में आप न तो अपने नेतृत्व की छाप को नकार सकती हैं और न ही उसके हस्तक्षेप की बात से मुकर सकती हैं।

आपकी रचना प्रक्रिया के यही मूलतत्व हैं जो आपके रूप व शैली में अभिव्यक्त होते हैं। यहॉ समस्या इस बात की है कि आपका व्यक्तित्व आपके रूप व शैली और विषयवस्तु के चुनाव तक ही सीमित क्यों है?आप बता रही हैं कि आप व शशिप्रकाश की विचारधारा,जीवन और एक हद तक जीने के तरीका एक ही है। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि आपकी विशिष्टता रूप,शैली व विषय वस्तु के चुनाव तक ही सीमित है। यदि यह ऐसा ही है तो सचमुच चिन्ताजनक है। जनज्वार पर उठी बहस के जवाब में आपके संगठन की तरफ से आये जवाब के कथ्य, रूप, शैली की साम्यता सृजन के संदर्भ में एक चिन्ताजनक स्थिति को पेश कर रही है। शायद यही कारण है कि अजय प्रकाश ने जनज्वार पर आप व आपके नेतृत्व के जवाब के रूप में प्रस्तुत किया। शायद यही कारण है कि आप की रचना को शशिप्रकाश द्वारा रचित व किसी और द्वारा लिखे गये लेख को आप द्वारा रचित बता दिया जाता है। मेरी समझ से यह तोहमद है जो ठीक नहीं है। लेकिन निश्चय ही आपको सृजन प्रक्रिया व संदर्भ को दुरूस्त करना होगा। यह सवाल आपके स्त्री होने से नहीं अपितु सृजन प्रक्रिया व संदर्भ से जुड़ा हुआ है।

इस बहस में मेरी ओर से समापन टिप्पणीः धोबीघाट पर कलंक को धुला जाता है कलंक लगाया नहीं जाता। यह हमारा ब्राहमणवादी समाज ही है जिसने खुद को पाक-साफ घोषित कर धोबी समुदाय, जाति को कलंकित घोषित कर दिया। वामपंथ की यह धारा किस लोक में जी रही है और किस लोकस्वराज का नारा दे रही है?सचमुच संकल्प चाहिए, अद्भुत अन्तहीन कि कम से कम बोलने व हस्तक्षेप करने का साहस बना रहे, विरोध करने की ताकत बनी रहे, और जन के पक्ष में एकता बची रहे।

Aug 24, 2010

दलित क्यों नहीं हैं भागीदार


कात्यायिनी के नाम की यह वही संपत्ति है जिसकी जड़ें 1990की सांगठनिक फुट के साथ भी जुड़ी हुई हैं.बहस के विस्तार में गए बिना,मैं बस इतना पूछना चाहता हूँ कि कात्यायिनी के नाम से मकान क्यों ली गयी?

सुनील चौधरी

दोस्तों इस बहस में कुछ मुद्दे ठीक से सामने नहीं आ पाए है उनकी तरफ ध्यान देना काफी जरुरी है. ये ऐसे मुद्दे है जो वामपंथी आन्दोलन में शशि प्रकाश की लाइन को ठीक से समझने में मददगार साबित होंगे.वामपंथी आन्दोलन में दिनदहाड़े जिस झूठ फरेब और लूट को यह ग्रुप अंजाम दे रहा है उस पर एक नज़र -

1 - हिंदी में प्रकाशित होने वाली तीन पत्रिकाएं आह्वान, दायित्वबोध और बिगुल के संपादक प्रकाशक और मुद्रक क्रमशः आदेश सिंह, डॉ विश्वनाथ मिश्र और डॉ दूधनाथ थे जो इस संगठन से अलग हो चुके है. अब आह्वान के नाम में थोडा फेर बदल कर इसका संपादक प्रकाशक और मुद्रक शशि के बेटे अभिनव सिन्हा और उनकी मौसी कविता को बनाया गया है. इसी ग्रुप से निकाली जाने वाली बाल पत्रिका 'अनुराग' के संपादक भी अभिनव सिन्हा ही हैं. अब सवाल ये है तीनों संपादक क्यों अलग हुए उनके क्या सवाल है और उनके अलग होने के बाद आपके सैकड़ों कार्यकर्ताओ में से कोई इसकी जिम्मेदारी उठाने के काबिल क्यों नहीं है ...या सचेत तौर पर नहीं दिया गया है.

2 अब आइये इस ग्रुप के कुछ मुक़दमे पर एक नज़र डालते है

मुकदमा नंबर एक ...
गोरखपुर में कात्यायनी का जाफरा बाज़ार का पैत्रिक निवास जिसे संस्कृति कुटीर के नाम से जाना जाता है उसके सामने गेट के बगल में दो छोटे-छोटे कमरे है.एक में कात्यायनी के घर में काम करने वाली पैत्रिक दलित गरीब दाई रहती है.उसी कमरे को खाली कराने के लिए उसके साथ 1997मारपीट की गयी और उस घर को तोड़ने का प्रयास किया गया. गोरखपुर की अदालत में यह मुक़दमा आज भी लड़ा जा रहा है

मुकदमा नंबर दो...
गोरखपुर के राप्ती नगर का फ्लैट MIG-134जिसका मालिकाना कात्यायनी के नाम है, इसको लेकर गोरखपुर विकास प्राधिकरण से मुकदमा लड़ा जा रहा है क्योंकि GDA ने खराब स्तर का मकान बना कर दिया है.कात्यायिनी के नाम की यह वही संपत्ति है जिसकी जड़ें 1990की सांगठनिक फुट के साथ भी जुड़ी हुई हैं. बहस के विस्तार गए बिना मैं बस इतना पूछना चाहता हूँ कि कात्यायिनी के नाम से मकान क्यों ली गयी.यहाँ यह भी जान लेना जरुरी है क़ि कात्यायिनी अपने राजनीतिक जीवन में कब पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता रहीं और कब नहीं यह भी रहस्य का विषय  है.


रामबाबू और कात्यायिनी: कौन किसका साझीदार 
मुकदमा नंबर तीन ...
लखनऊ में 69बाबा का पुरवा निशातगंज. बिगुल का उप सम्पादकीय कार्यालय.इस बड़े से मकान के मालिक थे बीड़ी सक्सेना जिनकी किरायेदार कात्यायनी थीं लेकिन अब उस मकान पर इस ग्रुप ने कब्ज़ा कर लिया है.अब उसमें रामबाबू ( शशि के साथी ) रहते हैं. जब इस मकान पर रामबाबू ने कात्यायिनी के साथ मिलकर कब्ज़ा कर लिया तो इस संपत्ति के असली मालिक बीडी सक्सेना ने आन्दोलन के कई लोगों से गुहार लगाई.बिगुल के सभी पाठकों को पत्र लिखा क़ि उन्हें उनका मकान दिलाया जाय लेकिन मकान उन्हें नहीं मिला और वे दिवंगत हो गये.जब कात्यायनी से इस बारे में पत्रकारों,साहित्यकारों ने पूछा था तो उनका जबाब था,'ये राम बाबु का मामला है मेरा नहीं.'सच यह है कि इस माकन पर कब्जेदारी बनाये रखने के लिए इस ग्रुप ने सत्ता के अपने सभी संपर्को से पूरी मदद ली.

अब आगे-

दायित्वबोध क़ि पुस्तिका श्रृंखला एक और दो-अनश्वर है सर्वहारा संघर्षो क़ि अग्नि शिखाएं और समाजवाद की समस्याएं और पूंजीवादी पुनर्स्थापना,ये दोनों पुस्तिकाएं इस ग्रुप के शुरूआती समय की पुस्तिकाएं है.इनके लिए दो बड़े कोचिंग संसथाओ से विज्ञापन लिया गया था.लेकिन चालाकी यहाँ भी चालाकी बरती गयी और विज्ञापन देने वालों के लिए कुछ अंक निकाल कर बाकि सबमें विज्ञापन नहीं दिया गया था और यही सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.

मीनाक्षी ने आदेश और सतेन्द्र का वर्ग बांटने में में कोई कोताही नहीं बरती है लेकिन मजदुर वर्ग से आने वाले नन्हें लाल, जनार्दन , घनश्याम, स्वर्गीय रघुवंश मणि और बिगुल संपादक डॉ दूधनाथ के साथ वहां क़ि पूरी इकाई का वर्ग बताना भूल गई हैं.इनमें से लगभग सभी के परिवार वाले और वे खुद भी दिहाड़ी पर जीने वाले गरीब और दलित लोग हैं.दूसरा सच यह उभरकर सामने आता है कि इनके संगठन से सबसे ज्यादा वापस जाने वाले तो मजदुर वर्ग के ही लोग हैं.

सर्वहारा पुनर्जागरण -प्रबोधन की लाइन पर इस ग्रुप के बीस वर्षों के इतिहास में मेरी जानकारी में अपवाद स्वरुप भी दलित समुदाय से आने वाला कोई कार्यकर्ता इनके यहाँ टिका नहीं है, क्या इन्हें अपने लिए नई जनता चुनने का समय आ गया है जो इनके लिए पैसा उगाहती हो.

दुकान में क्रांति के आधार: जनचेतना से जगी कार्यकर्ताओं में चेतना
बहरहाल ऊपर लिखे  सवालों के साथ कुछ अन्य जरुरी सवाल.अगर कात्यायिनी इन प्रश्नों का हमें जवाब देने में तौहिनी मानती हैं तो वह जवाब वामपंथी बुद्धिजीवियों के समूह को भेज सकतीहैं क्योंकि यह सवाल हमारे अकेले का नहीं है...


1. कात्यायिनी, सत्यम वर्मा, शशि प्रकाश, रामबाबू, अभिनव, मीनाक्षी, नमिता, कविता संपत्ति का ब्यौरा दें और बताएं कि यह सभी लोग किस तरह की रिहाइशों में रहते हैं.

2. ऊपर लिखे सभी नामों में से एक एक के बारे में बताएं कि कब और किन वर्षों में किस टीम के साथ दलितों, मजदूरों और किसानों के बीच इन्हें काम करने का अनुभव है.

3. रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग( भारत) के महासचिव शशिप्रकाश यानी आपके पार्टी प्रमुख की मजदूर- किसान- छात्र आंदोलनों में भागीदारी और अनुभवों के वर्ष के बारे में बताएं.हो सकता है आप कहें कि सुरक्षा कारणों से बताना संभव नहीं है.इसलिए हम सिर्फ अनुभव के ब्योरे मांग रहे हैं, जगह बताना आपकी मर्जी.

4. दिल्ली, गोरखपुर, लखनऊ और इलाहाबाद में कौन कौन सी प्रोपर्टी है, सभी को सार्वजानिक करें? कहाँ और कौन से मुकदमें चल रहे हैं उसको भी बताएं.

5. जितने भी आंदोलनों में आप शामिल रहे हैं और आन्दोलन की वजह से राजसत्ता ने कितने मुकदमें किये हैं और सिर्फ संपत्ति के कारण कितने मुकदमों में संगठन के लोग या संगठन आरोपित है.

6 . जितने भी ट्रस्ट, सोसाइटी, प्रकाशन और संस्थान हैं उनमें कौन -कौन है और उसके प्रमुख कौन हैं?

7. बिगुल, आह्वान, दायित्वबोध, सृजन परिप्रेक्ष्य और अनुराग बाल पत्रिका का संपादक और मुद्रक, मालिक प्रकाशक कौन है?

8. राहुल फाउंडेशन , परिकल्पना प्रकाशन, अनुराग बाल ट्रस्ट, अरविन्द सिंह मेमोरियल की कार्यकारिणी और पदाधिकारियों का विस्तृत ब्यौरा दें.

9. बिगुल मजदूर दस्ता, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, नारी सभा, बाल कम्यून की कार्यकारिणी बताएं और उनके पमुखों की जानकारी दें.

10. पिछले दस वर्षों में संगठन ने विभिन्न पत्रिकाओं, स्मारिकाओं और किताबों को छपने के लिए व्यक्तिगत सहयोग के आलावा किन-किन श्रोतों से आर्थिक सहयोग लिया है.ये सभी पत्रिकाएं और किताबें रजिसटर्ड हैं इसलिए आपको लिए गए और प्रकाशित विज्ञापनों को सार्वजानिक करने में दिक्कत नहीं होगी.साथ ही विज्ञापन दाताओं ने जो आपको कीमत अदा की है उसे भी बताएं.

11. जिन कार्यकर्ताओं ने संगठन छोड़ दिया है उनके नाम पर संगठन की कौन सी संपत्ति है, उसकी जानकारी दें.

12. आपके यहाँ कई बड़े प्रकाशन( हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी), किताब की बड़ी दुकानें, ट्रस्ट, सोसाइटी, गाड़ियाँ हैं जिसमें तमाम लोग काम करते हैं उनको दिए जाने वाली तनख्वाह और भत्तों की विस्तृत जानकारी दें.

13 . संगठन  से जुडी संस्थाओं और उनके स्वामियों के नाम से खुले खातों का ब्योरा दें.  करेंट और सेविंग  अकाउंट  की जानकारी अलग-अलग दें.  



Aug 23, 2010

दुकान में क्रांति के दस साल

  

कात्यायनी बैठकों में लगातार कहती रहीं(कुछ बुद्धिजीवियों को भी यह झांसा देती रही हैं)कि मैं मलिन बस्तियों में जाऊंगी, लेकिन वे भूल से भी किसी बस्ती में नहीं गईं.इसकी कभी आलोचना नहीं हुई.ऊपर से बेईमानी यह कि वे अपने सभी भाषणों और लेखों में साहित्यकारों को गाली देते हुए नहीं थकती कि वे मजदूर बस्तियों में नहीं जाते हैं.


जनार्दन कुमार

साथियों मेरा यह लेख ‘जनचेतना’को जवाब नहीं है,बल्कि इस उपक्रम को परिवर्तन की शक्ति मानने वालों से मैं मुखातिब हूँ. मैंने इस संगठन में 2000 -2010 तक काम किया है.वहाँ किस तरह का जीवन जिया है उसी में से कुछ आप सबसे साझा करना चाहता हूँ.

बात की शुरुआत कॉमरेड अरविंद सिंह और अपने बीच की कुछ घटनाओं से करना चाहूँगा.मुझे वर्ष2002में गोरखपुर इकाई से नोएडा भेजा गया था.यहाँ हमारे आर्गनाइजर अरविंद सिंह ही थे.वे मुख्य रूप से दिल्ली और हरियाणा के कामों के साथ लखनऊ और पंजाब के कामों में सहयोग करते थे.कई मामलो में देखने पर लगता था कि अरविन्द सिंह एक साथ दो धरातल पर जी रहे हैं.एक वह जिसे वह अपनी समझ से कम्युनिज्म समझते थे और दूसरा जो संगठन और उसकी लाइन कहती थी.

मेरी यह समझ कैसे बनी इसके मैं कुछ अनुभव बताता हूँ.एक बार नोएडा में उत्तर प्रदेश के मऊ जिला के मर्यादपुर से बिगुल के संपादक,मुद्रक और प्रकाशक डॉक्टर दूधनाथ के नेतृत्व में बिरहा टीम गाना गाने आई थी. उस टीम की महिला साथी समीक्षा से उसी दौरान मेरी करीबी बनी और हम दोनों ने 2005में शादी कर ली.शादी होने से पहले कि प्रक्रिया ये रही कि नोएडा में बिरहा कार्यक्रम हो जाने के बाद समीक्षा गोरखपुर वापस चलीं गईं थी.इधर अरविंद को सबसे करीब पाकर मैंने अपने प्रेम के बारे में उनसे बात की.मुझे वह रात आज भी याद है और उस समय करीब दस बज रहे थे. मेरे प्रेम का इजहारे बयान सुनकर अरविन्द ने कहा था, ' यह सहज-सरल बात सुनकर ख़ुशी हुई.' अरविन्द की जेब में उस समय 30 रूपए थे,उन्होंने मुझे आइसक्रीम खिलायी और बधाई देते हुए गले लगा लिया था.

 उस रात के कुछ दिनों बाद अरविंद के गोरखपुर जाने का कार्यक्रम बना.अरविन्द गोरखपुर जा रहे हैं यह सुनकर मैं खुश हुआ और समीक्षा के नाम लिखा हुआ पत्र मैंने उन्हें सौप दिया.समीक्षा गोरखपुर में मीनाक्षी के नेतृत्व में काम कर रही थी.अरविन्द के वहां पहुंचते ही समीक्षा के सामने ही मीनाक्षी ने कहा 'गई थी बिरहा गाने और लीपपोत कर चली आई.'लेकिन वहाँ अरविंद ने एक शब्द भी नहीं कहा और बचकर मेरा पत्र समीक्षा को दे दिया था.मगर समीक्षा को पत्र देते हुए मीनाक्षी ने भी देख लिया था.

उसके अगले दिन मीनाक्षी ने 'अपने तकनीक'से पत्र को हथिया लिया और पूरा पढ़ने के बाद अरविंद पर यह कहते हुए बरस पड़ी थीं कि 'अच्छा तुम भी इन सब चीजों को बढ़ावा दे रहे हो.'मीनाक्षी ने आगे कहा कि यह सब भी तुम्हारा की किया-धरा है .मीनाक्षी का इशारा लीपापोती की ओर था जो वह पहले कह चुकी थीं.मीनाक्षी की इस प्रतिक्रिया पर अरविंद ने कुछ नहीं कहा सिवाय मुस्कुराने के.बता दें कि मीनाक्षी और अरविन्द सिंह पति -पत्नी रहे हैं और कॉमरेड अरविन्द सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं.
पर जब मेरी चिट्ठी देने के बाद अरविन्द सिंह वापस दिल्ली आए तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारा पत्र पहुँचाने में मुझे थोड़ी दिक्कत हुई.अरविन्द सिंह ने सीधे तो नहीं, मगर हमें इसका एहसास दिला गए कि मुझसे अब पत्र मत भिजवाना.सरसरी तौर पर मैंने यह बात आप सबको इसलिए बताई जिससे कि समझा जा सके कि अरविंद किस दोहरे जीवन को एक साथ जी रहे थे. दूसरा इस समय ताव ठोककर मीनाक्षी सबको जो गालियाँ दे रही हैं.यह कोई नयी बात नहीं हैं,बल्कि उनका और उनके संगठन का प्रेम और महिलाओं के प्रति नजरिया कैसा है उस बर्बरता का नमूनाभर है.

इस संगठन के सर्वाधिक जिम्मेदार साथियों में से एक मीनाक्षी स्टील टेम्परिंग के नाम पर महिला साथियों के साथ नौकरानी की तरह ट्रीट करती थीं.मसलन खाना बनवाना,कपड़े धुलवाना,पैर दबवाना, नाख़ून से मैल निकलवाना और फेशियल करवाना आदि आदि.ये सब अरविंद की अनुपस्थिति में होता था.

यह लोग संगठन से बाहर जा चुकी लड़कियों को इतनी जल्दी भूल गयीं, आश्चर्य होता है.अभी तो महिला साथियों ने सिर्फ कुछ टिप्पणियां लिखीं हैं,उनके साथ जो इनका व्यहार था उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.गोरखपुर के जाफराबाद के घर में जिसका नाम संस्कृति कुटीर है वहां दो फोन रिसीवर लगे थे.मीनाक्षी की आदत थी कि किसी लड़की कार्यकर्त्ता के पास फोन आता था तो वह सबकी बातें दुसरे रिसीवर से सुना करती थीं. अगर वह कहीं व्यस्त हैं तो समीक्षा से कहती थीं, जरा देखो क्या बात हो रही है. ये सब अपने उन साथियों के साथ होता था जो अपना घर-परिवार, रोजी-रोटी छोड़ समाजवाद के लिए, एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए कुर्बानियों की भावना से यहाँ रह रहे थे या रह रही थीं.

कुनबा ही नेता : जनता को  मौका कब मिलेगा
आज वही भुक्तभोगी लोग जब इनके बारे में सच बता रहे हैं तो कैसा इनका चीत्कार निकल रहा है,लेकिन मेरा विश्वास है कि पाठक सिर्फ इन्हीं के लिखे जवाबों को से असलियत समझ सकते है. साथी आदेश, मीनाक्षी का बेहद आदर करते थे और समझाने के लिए कहें तो बहन की तरह प्यार करते थे.उनके बारे में मीनाक्षी समीक्षा को हिदायत देती थी कि देखो ज्यादा खाता है,लालची है कम परोसा करो,उसे इतना सलाद काटकर क्यों देती हो आदि -आदि. सुनील चौधरी के साथ भी इससे कुछ अलग व्यहार नहीं होता था.

सभी पाठकों को इस संगठन के नेताओं के विवेक की सराहना करनी चाहिए.मीनाक्षी,कात्यायिनी और अन्य लोगों के जनज्वार पर छपे लेखों से जाहिर होता है कि संगठन का अपने संबंधियों के क्रान्तिकारीकरण पर बड़ा जोर है और यह वहां हो भी रहा है,मगर यह किस कीमत पर हो रहा है और कैसे,यह मैं आप सबसे जरूर साझा करना चाहूँगा.

यह इसलिए भी जरूरी है कि आलोचना करने वालों के बारे में यह लगातार कह रहे हैं कि 10-12 साल या 5-6 साल पहले निकले गए लोग हैं.अब देखना है कि मेरे और समीक्षा समेत देहाती किसान मजदूर यूनियन के उन छह साथियों के बारे में क्या कहते हैं जो चंद महीने पहले ही यह कहकर संगठन से अलग हो गए हैं कि कात्यायिनी और शशि प्रकाश का कुनबा चाहे जो करे लेकिन क्रांति नहीं कर सकता.

इनके दोहरे आचरण की एक मिसाल देखिये.एक कांफ्रेंस में बिगुल के संपादक डॉ.दूधनाथ से मेरी भेंट हुई और हालचाल हुआ.मैं बता दूँ कि दूधनाथ रिश्ते में मेरे ससुर लगते हैं.इन क्रांतिकारी महिलाओं ने हमारे मुलाकात की जानकारी शशि प्रकाश तक जा पहुंचाई. उसके बाद शशि प्रकाश ने यह कहते हुए कि ससुर दामाद जैसा कुछ मामला हो गया है, इस पर मेरी घंटे नहर आलोचना करते रहे.
वहीँ 24 जुलाई 2009 की गोष्ठी और एक मई 2010 के प्रदर्शन में लता ( अभिनव की पत्नी यानी कात्यायिनी और शशि प्रकाश की बहु ) बेबी मौसी ( मीनाक्षी का प्यारा नाम ), रूबी मौसी ( सत्यम की पत्नी ),नमिता मौसी, कविता मौसी कहकर इन सभी क्रांतिकारी बहनों को संबोधित करती रही,तब यह रिश्ता इनके भीतर गुदगुदी पैदा कर रहा था.इसकी आलोचना शशि प्रकाश ने कभी नहीं की क्योंकि वह 24कैरेट क्रांतिकारी कुनबे से ताल्लुक रखती थी,शशि प्रकाश कि बहु थी.

 एक दूसरा वाकया मेरी कमाई को लेकर है.मैंने पोलिटेक्निक करने के बाद संगठन में काम करते हुए नोएडा के सेक्टर 11 के बिजली ऑफिस में अपरेंटिस करना शुरू किया जिसके बदले मुझे 14 सौ रुपये मिलते थे. तब संगठन यह कहते हुए मेरी तनख्वाह लेता रहा कि किसी भी तरह की आमदनी पार्टी फुंद में जाता है.वहीँ एक दफा कात्यायिनी का कहीं से पैसा मिला तो उन्होंने बेटा और नेता अभिनव के लिए कंप्यूटर खरीदा.ऐसे तमाम दोहरे मापडंडों को झेलते हुए हमलोग यहाँ तक पहुंचे.
अब आइए जरा पत्र-पत्रिकाओं के घाटे के बहाने अभियान चलाने की बात का जिक्र करें जिसके बारे में दावा किया जाता है कि पांच स्रोतों से सहयोग नहीं लिया जाता है.कात्यायिनी ने अपने लेख में लिखा है कि 'पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं के लिए कोई भी सशर्त सांस्थानिक अनुदान (देशी पूँजीपतियों से,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से,उनके ट्रस्टों से, फण्डिंग एजेंसियों/एन.जी.ओ से,चुनावी पार्टियों से और सरकार से)नहीं लेते,केवल व्यक्तिगत सहयोग लेते हैं --नियमित रूप से मज़दूर बस्तियों में कूपन काटते हैं,कालोनियों-बसों-ट्रेनों में पर्चा अभियान चलाते हैं और नुक्कड़ नाटक-गायन आदि करते हैं.'आखिर कात्यायिनी किसकी आंखों में धूल झोंक रही है.हाथ में कलम पकड़ने के बाद शायद वह भूल गयीं कि इस बार सवाल पूछने वाले बुद्धिजीवी नहीं वह कार्यकर्त्ता हैं जो आपके लिए पैसा उगाह कर लाते थे. 50-50 हजार रुपए के दो विज्ञापन गाजिआबाद विकास प्राधिकरण और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड से देवेंद्र और मैंने खुद लिए थे और 10-20 हजार और सीधे चंदा देने वालों की ती कोई गिनती ही नहीं है.
सिर्फ पैसा जुटाने के लिए आह्वान के अलग से कुछ विशेष अंक प्रकाशित हुए थे और स्मारिका (चौंकिए मत यह आपकी एक अलग प्रकार की छवि है जिससे किसी बड़ी तिजोरी को खोलकर माल निकाल लिया जाए और काम हो जाने पर उसी घर के सामने उसे गाली दिया जाए)का प्रकाशन तीन बार हुआ था.इसमें बिल्डरों और सरकारी विज्ञापनों की भरमार थी.वैसे तो राकेश ने अपनी जानकारी में सभी प्रतियाँ जलवा दी थीं फिर भी कहेंगी तो भरोसे के लिए उसे भी जनज्वार पर प्रकाशित कर दिया जायेगा.

अभिनव सिन्हा: इससे आगे कौन
जनदुर्ग बनाने के लिए मेरी जिम्मेदारी नोएडा कि झुग्गियों में मास्टर बनकर पढ़ाने की थी.अरविंद हमारी पूरी मदद करते थे,लेकिन समय न मिल पाने के कारण कभी रात में झुग्गियों में नहीं रुक पाए.यह बात मैंने अपनी रिपोर्ट में बता दी थी.26 जुलाई 2005को यही आरोप लगा कर अरविन्द के काम को फ्लाप घोषित कर दिया गया और अरविंद को वहाँ से हटा दिया गया और झुग्गी के काम को ठप कर दिया गया.

इसके उलट कात्यायनी बैठकों में लगातार कहती रहीं(कुछ बुद्धिजीवियों को भी यह झांसा देती रही हैं)कि मैं मलिन बस्तियों में जाऊंगी लेकिन वे भूल से भी किसी बस्ती में नहीं गईं.इसकी कभी आलोचना नहीं हुई.ऊपर से बेईमानी यह कि वे अपने सभी भाषणों और लेखों में साहित्यकारों को गाली देते हुए नहीं थकती कि वे मजदूर बस्तियों में नहीं जाते हैं.

कात्यायनी जब गोरखपुर जाती हैं तो अनुराग बाल ट्रस्ट के बच्चों में यह माहौल बनाया जाता था कि बहुत बड़ी नेता आ रही हैं.मीट-मुर्गे का प्रबंध होता था.जब वे चली जाती थीं तो बच्चों से कहा जाता था कि मीट खा लिया अब एक हफ्ते तक खाने-पीने की चीजों में कटौती की जाएगी.क्या ये घटनाएँ किसी मानवीय संवेदना और राजनीतिक चरित्र की पुष्टि नहीं करती हैं.

आइए जरा उनकी नैतिकता और आदर्श को विस्तार से जान लें जिनके लिए पूरा क्रांतिकारी आंदोलन का नैतिक आदर्श पतित और विघटित हो चुका है.अरविंद को नोएडा से हटाने के बाद राकेश को लेकर शशि ने वहाँ के कामों की जिम्मेदारी ली थी. यह बात कांफ्रेंस की रिपोर्ट में भी दर्ज है. जब सचिव के नेतृत्व में सीधे काम शुरू हुआ तबसे वहाँ की रोटी की समस्या हल हो गई है,कुछ हीनभावना से ग्रस्त कार्यकर्ता संगठन की जिम्मेदारी उठाने के लिए आगे आए हैं.

फिर कुछ ही दिनों में पूरे काम का बेड़ा गर्क करने की आलोचना शुरू हुई और इसके लिए खलनायक राकेश और टीम को बनाया गया. निश्चय ही राकेश जिम्मेदार थे भी, लेकिन मेरा सवाल है कि यह काम तो शशि प्रकाश के नेतृत्व में शुरू हुआ था तो उनकी असफलताओं पर कौन बात करेगा,उन्हें कौन शीत निष्क्रियता में डालेगा,सोचने की छुट्टी उन्हें कौन देगा और अंत में शशि प्रकाश को कौन भगौड़ा कहेगा.

ऐतिहासिक रूप शशि और कात्यायनी के सिर पर कभी असफलता का ताज नहीं चढ़ा है.इस दौरान ही एक और घृणित घटना को अंजाम दिया गया.यह इतना अशोभनीय है कि उसका यहाँ जिक्र भी नहीं किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए जिम्मेदार राकेश का शशि ने बखूबी बचाव किया सिर्फ इसलिए कि वह पैसा जुटाने में माहिर थे. राकेश को छुट्टी दिए जाने के बाद भी शशि प्रकाश ने कहा कि वह रुपया जुटाता रहे.

भगत सिंह के  सपने का  जज्बा:  लेकिन दुकान में कैसे हो पूरा  
राकेश को दस हजार रुपए और दो मोबाइल फोन देकर एक अलग जगह रहने के लिए भेज दिया गया था.एक मोबाइल विज्ञापनदाता अधिकारीयों,बि ल्डरों से बतियाने के लिए और दूसरा संगठन के लोगों से बात करने के लिए. कुछ ही दिन बाद राकेश को फिर से कोआप्ट कर लिया गया. राकेश को इस दशा में पहुँचाने में भी संगठन का ही पूरा दोष है,क्योंकि मनोवैज्ञानिक अपराध से पैदा होने वाली ऐसी प्रवृत्तियों के कई उदाहरण हैं जिन पर अभी किसी साथी ने नहीं लिखा है, उसे भी सामने लाया जाना चाहिए.

इसी तरह देवेंद्र को जब गुंडो के अंदाज में पीटने की योजना तहत हमलोगों को भेजा गया तो, संयोग से सेक्टर 24 थाने की पुलिस ने रंगेहाथों पकड़ लिया.पीटने वाले दस्ते में मैं,समीक्षा,जयपुष्प,रुपेश, नन्दलाल और गौरव शामिल थे. पकडे जाने पर कोई उपाय होता न देख राकेश ने समीक्षा से झूठा बयान दिलवाया कि देवेन्द्र छीटाकशी करता है. मैंने जब रोहिणी के सेक्टर 16में शशि प्रकाश के सामने हो रही बैठक में सवाल उठाया और कहा कि यह कैसी नैतिकता है तो बस उन्होंने इतना कहा कि 'हमलोग कार्यवाही करने में असफल रहे,देवेन्द्र को पीटने में असफल रहे.' मैं पूछता हूँ कि क्या  अपनी पत्नी और बहु से शशि प्रकाश यह बात कहलवा पाएँगे?

बकायदा यह कहा जाता है कि ट्रेन अभियानों में अगर टीटी रोके या किसी आफिस में अधिकारी अभियान न चलाने दें तो महिलाओं को आगे कर देना चाहिए. इन बातों से शशि के आदर्शों के निहितार्थ साफ हो जाते हैं. इनके यहां जब भी कोई सवाल उठाता है तो उसे उसके राजनीतिक जीवन की पूरी कमजोरियाँ खोलकर उसका पूरा इतिहास बता दिया जाता है.इस समय इस संगठन का जनवाद देखने लायक होता है.चारों तरफ से हमले शुरू हो जाते हैं. कहा जाता है, तुम तो आउटसाइडर हो, पतित हो, कायर हो.

सवाल उठाने वाले कार्यकर्ता को इस तरह के विशेषणों से नवाज कर पूरे ग्रुप में उसे दुश्मन की तरह पेश किया जाता है. इसके बाद उस चैप्टर को बंद मान लिया जाता है. उसके बाद वे यह प्रचार करने से नहीं चूंकते कि वह तो संगठन के ज्ञान की पंजीरी से सफल हुआ है.

इस लेख से देहाती मजदूर किसान यूनियन के साथियों समेत बिगुल के संपादक,मुद्रक और प्रकाशक डॉक्टर  दूधनाथ की सहमती.


Aug 22, 2010

क्रांतिकारी संगठन न हुआ ब्यूटीपार्लर की दुकान हो गयी


कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में यह एकमात्र संगठन होगा जिसका सर्वेसर्वा एक व्यक्ति है जो संगठन का सबसे बड़ा राजनीतिकार और सिद्धांतकार है। उसकी पत्नी संगठन की सबसे बड़ी लेखिका, कवयित्री और सिद्धांतकार है। उसका बेटा संगठन का सबसे बड़ा लेखक, बुद्धिजीवी है और संगठन को डेलीगेट करता है।

रामप्रकाश अनंत 

आजकल जनज्वार पर रिवॉल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत) नाम के वामपंथी संगठन के बारे में बहस चल रही है। यह बहस इसी संगठन से अलग हुए लोगों ने आरंभ की है और इन लोगों ने इस संगठन पर परिवारवाद, नैतिक पतन और ठगी के आरोप लगाये हैं। इन आरोपों के जवाब में रिवॉल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग की केंद्रीय सदस्य मीनाक्षी और जयपुष्प ने इसी ब्लॉग पर अपने लेख लिखे हैं। 

मीनाक्षी ने अपने लेख ‘छिछोरों की मुंशीगिरी में लगे हैं साहित्यकार’ में लिखा है-‘जनज्वार पर हमारे खिलाफ इतना छपने के बाद चुप्पी को देखकर वाकई कहा जा सकता है कि भारत के बुद्धिजीवी समाज के अंतर्विवेक को लकवा मार गया है।’

समझ में नहीं आता कि इस संगठन के लोगों में इतना अहंकार क्यों है? अगर इस तरह के आरोप किसी संगठन पर लगते हैं तो उसका यह दायित्व है कि वह उनका जवाब दे। संगठन खुद तो इन आरोपों को जवाब देने के लायक नहीं समझता है और लेखक और बुद्धिजीवियों  से उम्मीद करता है कि उसकी मुंशीगिरी करें। अगर वे चुप हैं तो वह उन्हें गाली देता है।

कात्यायिनी : दुकान में क्रांति 
संगठन के लोगों का यह कहना ठीक हो सकता है कि कम्युनिस्ट आंदोलन पर बात करने के लिए ब्लॉग उपयुक्त माध्यम नहीं है, लेकिन उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि वे अपने सार्वजनिक पत्र-पत्रिकाओं में दूसरे संगठनों के बारे में नितांत घटिया भाषा में घटिया आरोप सार्वजनिक रूप से क्यों लगाते हैं? माओवादियों की राजनीतिक लाइन पर उपयुक्त मंच पर बहस हो सकती है, परंतु जब राज्य सत्ता तक उन्हें आतंकवादी नहीं कह रही है और आप लंबे समय से सार्वजनिक रूप से उन्हें आतंकवादी कह रहे हैं। 20 अगस्त का अपने संगठन के ही पूर्व साथी अरुण यादव का लेख देखें। उन्होंने ही लिखा है कि जून 2005 के खटीमा आंदोलन में 140 में से आपके संगठन के चार लोग जेल में थे और दूसरे आंदोलनकर्ता क्रांतिकारी संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन (क्रालोस) के बारे में आपने निम्न बुर्जुआ अर्थवादी, अराजकतावादी, संघधिपत्ववादी कहा था। 

संगठन के जिन भूतपूर्व साथियों ने संगठन पर गंभीर आरोप लगाये हैं उन्हें मीनाक्षी ने छिछोरे, निखट्टू, फिसड्डी या भ्रष्ट बताया है। हो सकता हे उनकी बात सही हो और इसका जवाब तो उन्हीं लोगों को देना है जैसे अरुण यादव ने दिया है। जहां पूरी व्यवस्था ही घटिया पूंजीवादी व्यवस्था में जी रही हो वहां दस-बीस लोगों के बारे में ऐसी बातें जान लेने से आम पाठक पर क्या प्रभाव पड़ता है? लेकिन इससे उन लोगों द्वारा लगाये गये आरोपों का महत्व तिल भर भी कम नहीं हो जाता। अगर कोई लेखक, बुद्धिजीवी या पाठक इन आरोपों को संदेह की नजर से देखता है तो संजीव की तरह उन्हें गरियाकर आप अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो पायेंगे। 

आपको ठंडे दिमाग से इन आरोपों का स्पष्टीकरण देना ही होगा। इन आरोपों से तिलमिलाई मीनाक्षी ने गाली-गलौज की भाषा में जो तर्क पेश किये हैं उन पर कौन विश्वास करेगा? परिवारवाद पर ऐसे जवाब तो मुलायम सिंह भी दे देते हैं। आपने तर्क दिया है कि आप दूसरे लोगों की तरह परिवार के सदस्यों को क्रांतिकारिता की आग से बचाते नहीं हैं, बल्कि परिवार को भी क्रांतिकारिता से जोड़ते हैं। दूसरे संगठनों में भी ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परिवार के लोगों को संगठन से जोड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन लोगों के परिवार के सदस्य समर्पित कार्यकर्ता की तरह संगठन में कार्य करते हैं, जबकि आपने क्रांतिकारिता से जो परिवार जोड़ा है उसके सभी सदस्य संगठन के नेतृत्व के शीर्ष  पर हैं। 

कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में यह एकमात्र संगठन होगा जिसका सर्वेसर्वा एक व्यक्ति है जो संगठन का सबसे बड़ा राजनीतिकार और सिद्धांतकार है। उसकी पत्नी संगठन की सबसे बड़ी लेखिका, कवयित्री और सिद्धांतकार है। उसका बेटा संगठन का सबसे बड़ा लेखक, बुद्धिजीवी है और संगठन को डेलीगेट करता है। बिना किसी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के उसके करीबी रिश्तेदार पोलित ब्यूरो एवं विभिन्न मोर्चों पर शीर्ष  नेतृत्व पर काबिज हैं। संगठन को सीधे-सीधे इन प्रश्नों का जवाब देना चाहिए। 

सत्येंद्र कुमार के बारे में मीनाक्षी ने जो बातें लिखी हैं, वो काफी हास्यास्पद हैं। उन्होंने लिखा है-‘इस व्यक्ति के साथ तो संगठन प्रयोग कर रहा था कि वर्ग शत्रु  को संगठन में रगड़कर काम कराकर कम्युनिस्ट बनाया जा सकता है या नहीं।’ यानी संगठन ने अभिनव प्रयोग किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि 'वर्ग शत्रु  को कम्युनिस्ट नहीं बनाया जा सकता। जबकि यह एक स्थापित तथ्य है कि उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने वर्गीय चरित्र का सर्वहाराकरण कर ले तो कम्युनिस्ट हो सकता है। चाओ-एन-लाई उच्च वर्ग से थे, फिर भी अंत तक ईमानदार कम्युनिस्ट बने रहे। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है. 

सत्येंद्र कुमार के बारे में ही लिखा है कि वह तो अपनी बेटियों को आधुनिक बनाने के लिए संगठन में आया था और उसका एजेंडा पूरा हो गया तो संगठन छोड़कर चला गया। कोई व्यक्ति अपनी बेटियों को आधुनिक बनाने के लिए एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठन में 10-12 साल तक काम करता रहे, ऐसी सोच ही अपने आपमें हास्यास्पद है। गोया क्रांतिकारी संगठन न हुआ ब्यूटीपार्लर की दुकान हो गयी, जो लोग अपनी बेटियों की साज-सज्जा कराकर आधुनिक बनाने के लिए संगठन में आते हैं। 

संगठन को चाहिए कि उस पर जो आरोप लगे हैं उन्हें स्पष्ट करे। अपने पक्ष में न लिखने के कारण लेखकों और बुद्धिजीवियों को गरियाने से कोई फायदा नहीं होगा।


वह मनु स्मृति का गुणगान करती रही


कैसे कार्यकर्ताओं को पढ़ाई छोड़ने पर मज़बूर किया जाता रहा है और कात्यायिनी आपका पुत्र उच्च शिक्षा की डिग्रियां जुटाते हुए उसी संगठन का राष्ट्रीय संयोजक बन जाता है? कैसे यह ग्रुप आज तक देश भर में शशि-कात्यायनी ग्रुप के नाम से जाना जाता है?

अशोक पाण्डेय 

लुटेरे तो लुटेरे ही होते हैं -- विजय की स्थिति में उनका काम होता है सबसे अधिक जोश दिखाना और पराजय की दशा में वे अपने हताहत हुए साथियों की जेबें टटोलते हैं।''

यह पंक्ति कात्यायनी के जनज्वार पर हमारे द्वारा उठाये गये प्रश्नों के जवाब में लिखे गये लेखों के उत्तर वाले आलेख के आरंभ में ही है। इसका अर्थ हम जब उन्हें केन्द्र में रखकर लगाते हैं तो लगता है कि वह अब पराजय को स्वीकार करने लगी हैं। 

तभी तो राजनैतिक बहस का अलाप करते-करते वह हम सब के ख़ानदानों का आकलन करने पर लगी हैं कि कौन धनी किसान का बेटा है, कौन सूदखोर का बेटा है वगैरह-वगैरह्। यही नहीं हमारे रोज़गार का भी उन्होंने बड़ी तफ़्सील से ब्यौरा दिया है, उन कामों का जिनसे मिली तनख़्वाह से हमारी जेबों में अपना ख़र्च चलाने भर की रक़म आती है। वह न भी बतातीं तो भी यह सब जानते थे कि हमारे जीवनस्तर और हमारी आय का संबंध कोई रहस्य नहीं है…आयकर विभाग में हमारे आय-व्यय के खाते हैं…लेकिन अब जेब टटोलने की उनकी आदत ठहरी…वैसे क्या यही बात वह अपने संदर्भ में कह सकती हैं?

क्या वह बतायेंगी कि जिस उच्चमध्यवर्गीय जीवन स्तर में वह जीवन-यापन कर रही हैं उसका ख़र्च कहां से आता है? उनकी जेबें कौन भरता है? सत्यम की आय के स्रोत तो विश्व बैंक से यूनिसेफ़ और निजी कारपोरेट्स तक हैं, वह अनुवादों में अपना पसीना गिराते हैं…लेकिन आप की आय का स्रोत क्या है? आप कौन सी नौकरी करती हैं? क्या लिखने से मिली रायल्टी इतनी है जिससे यह जीवन स्तर निबाह किया जा सके?

अगर नहीं तो क्या जनता से, मज़दूर बस्ती से मिला चंदा इसके लिये उपयोग किया जाता है? क्या यह भी आपके क्रांति कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है? अब आपके और शशि के आनुवांशिक विश्लेषण और क्रांतिकारिता के अंतर्संबंध के बारे में हम नहीं पूछेंगे…हम यह नहीं मानते कि यह किसी व्यक्ति के आंकलन का प्रगतिशील तरीका है। कवितायें चूंकि आपके नाम से छपती हैं इसलिये मैं स्पष्ट रूप से मानता हूं कि वे आपकी हैं। मेरा प्रश्न उनके कंटेंट से है…ख़ैर उस पर बात कभी किसी और मंच से।

अभिनव सिन्हा : नेता का बेटा हुआ नेता  
 जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। ‘ जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। 

ये आपके ही आप्त वचन हैं…मैं पूछना चाहता हूं कि आपके ब्लाग पर शालिनी और मीनाक्षी के नाम से लगी पोस्टों में आलोचकों के लिये जिन सामंती और स्त्रीविरोधी गालियों का उपयोग किया गया है, उसे क्या समझा जाये? आपने ख़ुद व्यक्तिगत प्रहारों से कभी परहेज नहीं किया है। यह कैसी क्रांतिकारिता है जिसमें पत्नी से डरना जैसे फ्रेज़ का उपयोग गाली की तरह किया जाता है। क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं हुआ कि पत्नी को काबू में रखा जाना चाहिये? हम कैसे न मान लें कि आपका संगठन इन पितृसत्तात्मक मूल्यों का वाहक है…ख़ासकर तब जब यह मुहावरा आपकी पारिवारिक सदस्य तथा संगठन की अब वरिष्ठ हो चली सदस्य मीनाक्षी के पत्र में उपयोग किया गया है?

आपने हमसे हमारी राजनीति पूछी है…तो मैं बता दूं कि हम कहीं से उठकर आ गये लोग ज़रूर हैं क्योंकि हमारे पीछे आपकी तरह पहचान देने वाला मठ नहीं है लेकिन इस एक ख़ूबी को छोड़ दें तो उसी साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत के निवासी हम भी हैं जहां की आप हैं। इस जगत के लोग हमें भी जानते हैं, भले आप से कम।

हमारा लिखा भी पब्लिक डोमेन में प्रिंट और नेट दोनों पर उपलब्ध है और वह हमारी राजनीति को जानना चाहने वाला कोई भी व्यक्ति जान सकता है। यह अलग बात है कि आप हमें सरकारी मुलाज़िम और ट्रेडयूनियन कर्मी से ज़्यादा कुछ मानने को तैयार न हों, मीनाक्षी हमें छोटा-मोटा बुद्धिजीवी मानें और इस बात पर सीना पीटें कि हाय वह संगठन में रहकर ज्ञान की पंजीरी ले गया… समय की क़ैद में रहने वाले आत्ममुग्ध कभी नहीं देख पाते की चौदह वर्षों में वक़्त की नदी में कितना पानी बह चुका होता है। 

हमें न छोटा-मोटा होने में कोई शर्म है, न मठ न बना पाने का अफसोस…हमने बड़ा बनने और मठ बनाने के सपने नहीं पाले थे…हम तो दुनिया बदलने और एक बेहतर दुनिया के सपने आंखों में लिये आपके जाल में फंस गये थे। आपने हम सबके घर बैठने का उपहास किया है। आप जिस आइलैण्ड में रहती हैं उसके बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया है…और हम वहां अपने-अपने तरीके से सक्रिय हैं…उसके लिये हमें आपका सर्टिफिकेट नहीं चाहिये। विलासिता का जीवन जीने वाले होलटाइमर्स से मेहनत की कमाई खाने वाले हम सर्वहारा ख़ुद को बेहतर मानते हैं।

सच्चे कम्यूनिस्ट की ख़ूब कही आपने…वह सब मैने भी अपने जीवन में कभी नहीं अपनाया…हमारा सवाल आपके धार्मिक आचरण से है भी नहीं, विभाजन में कौन से भाई-भाई अलग हुए और क्यूं ये हम ख़ूब जानते हैं…पिता से राजनैतिक तौर पर लग हुआ पुत्र संपत्ति में हिस्सा मांगने कैसे पहुंच जाता है यह भी हम बहस में नहीं लाना चाहते। 

 कात्यायिनी : गालियों की परम्परा 
हमारा बस यह पूछना है कि कैसे नेतृत्वकारी निकाय पर एक ही परिवार का कब्ज़ा हो जाता है? कैसे इस लंबे दौर में परिवार के किसी सदस्य पर कोई सवाल नहीं उठता? कैसे एक कुनबा धीरे-धीरे विशिष्ट सुविधाभोगी वर्ग में तब्दील हो जाता है? कैसे आपकी , शशि प्रकाश की, सत्यम की और अभिनव की तो एक पब्लिक पह्चान दिखाई देती है लेकिन इसके अलावा इस लंबे दौर में किसी और के नाम से छपा कुछ नहीं दिखाई देता ( दिवंगत का अरविंद का नाम हम जानबूझकर नहीं ले रहे, जो जवाब देने के लिये उपस्थित नहीं उसे इस बहस में हम नहीं खींचना चाहते)। 

कैसे कार्यकर्ताओं को पढ़ाई छोड़ने पर मज़बूर किया जाता है और आपका पुत्र उच्च शिक्षा की डिग्रियां जुटाते हुए उसी संगठन का राष्ट्रीय संयोजक बन जाता है? कैसे यह ग्रुप आज तक देश भर में शशि-कात्यायनी ग्रुप के नाम से जाना जाता है? आपके क्रोध का प्रमुख कारण यह लगता है कि क्यों नहीं हिन्दी का बौद्धिक जगत आपके समर्थन में आंदोलन छेड़ देता। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जिस आंदोलन को आपने विघटित और पतित घोषित कर दिया है उससे समर्थन की ऐसी उत्कंठा क्यूं? 

क्यूं अपने ऊपर संकट आने पर आप बार-बार भाग कर उसी साहित्यिक बिरादरी के पास जाती हैं जिसकी भर्त्सना आपके लेखन का अनिवार्य हिस्सा है? और कब इस समाज की किसी सामूहिक लड़ाई का आप हिस्सा बनीं? चलते-चलते आपने विभूति प्रकरण कहकर जिस ओर इशारा किया है उस मुद्दे पर विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया की बर्खास्तगी के लिये चली किस मुहिम का हिस्सा थीं आप? या कहां आपने अलग से उस पर कोई आपत्ति दर्ज़ करवायी? इसके पहले विश्वरंजन प्रकरण पर आपने कहां और क्या कहा? जब उदयप्रकाश आपके पुराने घर गोरखपुर में आदित्यनाथ से पुरस्कृत हो आये थे तो आप या आपके संगठन ने वहां के किस विरोध कार्यक्रम में हिस्सा लिया या फिर स्वतंत्र रूप से कौन सा विरोध किया? 

कब आप जनता के पक्ष में किसी संस्थान से टकराईं? कब आप किसी सामूहिक प्रतिरोध का हिस्सा बनीं? वैसे आलोक धन्वा को कुछ कहने का नैतिक अधिकार आपने तभी खो दिया था जब ग्वालियर में महिला दिवस पर आप वैश्य समाज के महिला मिलन समारोह का हिस्सा बनीं थीं। इस मासूम जवाब के बावज़ूद कि आप को भारतेंदु समाज के नाम से भ्रम हो गया था, या आने के पहले कार्ड नहीं देखा था…आप आने के बाद भी बहिष्कार कर सकती थीं…लेकिन वह कौन सा मोह था कि संचालिका मनु स्मृति का गुणगान करती रही और आप चुपचाप मंच पर बैठ एसी का आनन्द लेतीं रहीं?

और अंत में आपके ब्लाग विमर्श पर…अब जब आप ख़ुद ब्लाग पर आकर जवाब दे चुकी हैं तो इस माध्यम को गरियाने से कोई फायदा नहीं…मैं भी ब्लाग को कोई क्रांतिकारी माध्यम नहीं मानता…समयांतर के ताज़ा अंक में मैने यह साफ़ लिखा भी है, लेकिन संवाद के एक सहज माध्यम के रूप में इसका अपना महत्व है…और यह अकारण तो नहीं कि आपका संगठन और उससे जुड़े लोग तमाम ब्लाग चला रहे हैं। 

यह अलग बात है कि जहां हिन्दी के तमाम बुद्धिजीवियों में इस माध्यम से आत्मप्रचार से बचने का कल्चर रहा है वहीं आपके ब्लाग सिर्फ़ यही कर रहे हैं…जनज्वार ने आपके आरोप को भी छापने की हिम्मत दिखाई है अगर आप में वह नैतिक बल हो तो वे सवाल छापें जिनके जवाब में आप तलवारे भांज रही हैं। रही बात धमकियों की तो कात्यायनी वे दिन हवा हुए जब मियां साहब फ़ाख़्ते उड़ाया करते थे…आपके पास अकूत धनबल है, मुक़दमें लड़ने का लंबा अनुभव है तो हमारे पास सच का साहस!



चंदे के हमारे व्यक्तिगत स्रोत है




हमलोगों का यह पुराना और बार-बार दुहराया गया संकल्प है कि हम अपने प्रकाशन, अपने पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं के लिए कोई भी सशर्त सांस्थानिक अनुदान (देशी पूँजीपतियों से, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से, उनके ट्रस्टों से, फण्डिंग एजेंसियों/एन.जी.ओ से, चुनावी पार्टियों से और सरकार से) नहीं लेते, केवल व्यक्तिगत सहयोग लेते हैं -- नियमित रूप से मज़दूर बस्तियों में कूपन काटते हैं, कालोनियों-बसों-ट्रेनों में पर्चा अभियान चलाते हैं, और नुक्कड़ नाटक-गायन आदि करते हैं।
रही हमारी बात, तो कुत्तों के भौंकने से हाथी की चाल पर कोई असर नहीं पड़ता। तमाम ''महामहिमों'' की भविष्यवाणियों को झुठलाकर हमने दो दशक की अपनी पथान्वेषी यात्रा पूरी की है, आगे भी हमारी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी। जिन्हें पक्ष चुनना है, वे पक्ष चुनेंगे। जो ‘फे़न्स-सिटर’ हैं, वे किनारे बैठकर जग का मुजरा लेते रहेंगे.
वैसे यहाँ यह भी बता दें कि इन भगोड़ों के पाप का घड़ा अब भरने के क़रीब है। ब्लॉग पर नाम लेकर जिस तरह इन्होंने कीचड़ उछाला है, अब यदि हम मानहानि की क़ानूनी कार्रवाई करते हैं तो किसी साथी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि राजनीतिक विवाद को हम बुर्जुआ अदालत में क्यों लेकर गये। 

कात्यायिनी 

''रणभूमि को अपने आँचल से ढँककर निशा जब योद्धाओं को एक-दूसरे से अलग कर देती है तो दिन भर के परिणाम निकालने की घड़ी आ जाती है। तब क्षति और सफलताओं का हिसाब लगाया जाता है। पराजित प्रतिद्वन्द्वी अँधेरे की आड़ में पीछे हटने को उत्सुक होता है और अन्धकार में उसका पीछा करने की जोखिम को टालकर विजेता अपनी जीत के उत्सव व आनन्द में मग्न हो जाते हैं। रणभूमि में केवल शव एवं घायल ही बचे रहते हैं, और तब इनके बीच उन लुटेरों की काली-काली आकृतियाँ दिखने लगती हैं जो सबकी जेबें टटोलते हैं, हाथों से अँगूठियाँ उतारते हैं या फिर छातियों से क्रॉस। लड़ाई के बाद की रात पर तो केवल लुटेरों का ही अधिकार होता है।

''कल तक वे लड़ाई के ख़तरों के डर से खाइयों और नालों में छिपे पड़े थे, अभी कल ही उनमें से बहुत सारे आज की हारी हुई सेना में भर्ती थे या यूँ कहिये कि उनके नाम भर दर्ज थे। पर रात के अँधेरे ने उन्हें इतना साहसी बना डाला है कि अब वे उन्हीं लोगों के ढाल-कवच व हीरे-जवाहरात नोचने की जल्दी में हैं जिनकी कल तक वे गला फाड़-फाड़कर जय-जयकार कर रहे थे। लुटेरे तो लुटेरे ही होते हैं -- विजय की स्थिति में उनका काम होता है सबसे अधिक जोश दिखाना और पराजय की दशा में वे अपने हताहत हुए साथियों की जेबें टटोलते हैं।''

उपरोक्त पंक्तियाँ रूस के सुविख्यात कम्युनिस्ट राजनीतिक कर्मी और साहित्यालोचक वात्स्लाव वोरोव्स्की (1871-1923) के लेख ‘लड़ाई के बाद की रात’ (साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र: बीसवीं शताब्दी का साहित्य, खण्ड-1, पृ. 68, साहित्य अकादमी और रादुगा प्रकाशन, 1989) से ली गयी हैं। सन्दर्भ है 1905-07 की रूसी क्रान्ति की पराजय के बाद का राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य। वोरोव्स्की के अनुसार, क्रान्ति की पराजय के बाद रूसी बुद्धिजीवी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा रात के अँधेरे में युद्धक्षेत्र में लूटमार करने वाले लुटेरों की भूमिका निभा रहा था।
1905-07 की क्रान्ति की पराजय के बाद की स्थिति के बारे में क्रुप्सकाया ने भी एक जगह लिखा है कि बहुतेरे पराजित मानस कम्युनिस्ट उस समय सन्देहवाह-सर्वनिषेधवाद-अराजकतावाद के शिकार हो गये थे और कुछ ऐसे भी थे जो ‘डिप्रेशन’, ‘अल्कोहलिज़्म', ‘व्यक्तिगत पतन’ और ‘रथलेस सेक्सुअलिज़्म’ की चपेट में आ गये थे।

आज कम्युनिस्ट आन्दोलन विश्‍वस्तर पर जिस विपर्यय और गतिरोध का सामना कर रहा है, वह अभूतपूर्व है। ऐसे में अकुण्ठ जड़सूत्रवाद और निर्द्वन्द्व ''मुक्त चिन्तन'' के साथ-साथ हमें यदि सीमाहीन और निर्लज्ज किस्म की राजनीतिक-सांस्कृतिक पतनशीलता के विकट उदाहरण देखने को मिल रहे हैं और कुत्सा-प्रचार के लम्बे अभियानों का साक्षी होना पड़ रहा है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
विगत लगभग चार-पाँच वर्षों से लगातार हमलोगों को, विशेष तौर पर व्यक्तिगत स्तर पर, घिनौने कुत्सा-प्रचारों, तोहमतों और गालियों का शिकार बनाया जाता रहा है। यूँ तो, गतिरोध तोड़कर नयी राह निकालने के प्रयासों-प्रयोगों के क्रम में, विगत तीन दशकों से हमलोगों पर तरह-तरह के लेबल लगाये जाते रहे हैं और फ़तवेबाज़ियाँ की जाती रही हैं। कभी ‘प्रच्छन्न त्रात्स्कीपंथी’ कहा गया, कभी ‘कुर्सीतोड़ बुद्धिजीवी’, कभी कहा गया कि ‘वर्ग संघर्ष की आँच से बचकर साहित्य-संस्कृति में रमने वाले लोग हैं’, तो कभी यह भविष्यवाणी की गयी कि ‘साहित्य व मीडिया में कैरियर बनाने के बाद जल्दी ही घर बैठ जायेंगे।’ फिर कुत्सा अभियान का अलग चरण शुरू हुआ जब यह बात ज़ोर-शोर से फैलायी गयी कि यह एक परिवार-विशेष और निकटवर्तियों की मण्डली है, जिसका काम बस किताबें छापकर मार्क्‍सवाद का व्यापार करना और सम्पत्ति एकत्र करना है। इसी दौरान मुँहामुँही बुद्धिजीवी और राजनीतिक मण्डलियों में यह बात फैलायी गयी कि कात्यायनी का सारा लेखन तो वस्तुतः उनके पति करते हैं। इसकी शुरुआत पहले राजनीतिक हलकों में एक ''महान नेता'' की शह पर हुई जो एक दशक तक (साथ काम करते हुए) मेरे असुविधाजनक प्रश्‍नों-आपत्तियों से आजिज आ चुके थे और जिन्हें मैंने पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त बताकर खुद ही आफ़त मोल ले ली थी। बहरहाल, यह अफ़वाह जब साहित्यिक मण्डलियों तक पहुँची (या पहुँचायी गयी) तो फिर क्या था! जंगल की आग की तरह फैली। विडम्बना तो यह थी कि कुछ ही वर्षों बाद मेरे तलाक़ की अफ़वाह भी फैला दी गयी!

विगत करीब पाँच वर्षों से जो कुत्सा-प्रचार किया जा रहा है, वह तीसरा चरण है जो घृणित और घनघोर निजी है। तमाम पोथों-पुलिन्दों का सारतत्व यह है कि (1) हम कोई राजनीतिक समूह नहीं बल्कि अपराधी गिरोह हैं जो सम्पत्तियाँ हड़पते हैं, किताबों का व्यापार करते हैं, (2) राजनीतिक ग्रुप के नाम पर महज़ एक परिवार है (और कुछ चेले-चपाटे हैं) और नेतृत्व के नाम पर बस एक व्यक्ति है जो तानाशाह और अति सुविधाजीवी है, (3) कात्यायनी की सभी रचनाएँ वास्तव में उसके पति की हैं। और उसके बेटे को भी ‘प्रोमोट’ किया जाता है। इसी आशय के बहुतेरे आरोप हैं, पर केन्द्रीय बिन्दु यही हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह की बातों का जवाब नहीं दिया जा सकता। यह मार्क्‍सवाद की राजनीतिक संस्कृति भी नहीं है। लेनिन व्यक्तिगत कुत्सा-प्रचारों का जवाब देने के क़तई हामी नहीं थे और बार-बार इस बात पर बल देते थे कि कुत्सा-प्रचार की अपनी एक राजनीति होती है। उनका कहना था कि बात राजनीतिक लाइन और उसके अमल पर की जा सकती है। मार्क्‍सवादी नज़रिया बिल्कुल साफ़ है। यदि कोई या कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर ग़लत हैं तो उनकी राजनीति भी ग़लत होगी या तार्किक परिणति के तौर पर कालान्तर में ग़लत हो जायेगी। इसका विपरीत भी सही है। यदि कुछ कर्तव्यनिष्ठ-सत्यनिष्ठ व्यक्ति भी लगातार ग़लत राजनीति को मानें और लागू करें तो कालान्तर में उनका व्यक्तिगत जीवन भी आदर्शच्युति और पतन का शिकार हो जायेगा। अतः विचार और विवाद का मसला किसी राजनीति लाइन का सैद्धान्तिक-व्यावहारिक पक्ष ही हो सकता है। यदि कतिपय व्यक्तियों के व्यक्तिगत चरित्र और आचरण को लेकर लेख-पत्र-दस्तावेज़ लिखे जायें तो सच्चाई की जाँच कैसे होगी? क्या सभी वाम क्रान्तिकारी ग्रुपों के प्रतिनिधियों को लेकर कोई जाँच कमेटी ('क्रान्तिकारी सी.बी.आई.') बनायी जायेगी? और यह काम यदि कुछ लोग करते हैं और वे संगठन-विशेष से निकाले गये कुछ पतित और भगोड़े हों जो अपना निजी हिसाब चुका रहे हों, या फिर यदि वे कुछ ऐसे पतित लोग हों जो ‘स्टेट एजेण्ट’ या घुसपैठिये की भूमिका निभाते हुए वाम की पाँतों में शंका-सन्देह फैलाने का काम कर रहे हों, तो इस सच्चाई का पता कैसे लगाया जा सकेगा? इसीलिए लेनिनवादी पद्धति इस बात पर बल देती है कि राजनीतिक लाइन और उसके अमल को ही आलोचना और वाद-विवाद का विषय बनाया जा सकता है। जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। यदि उनकी बातों पर वाम दायरे का कोई व्यक्ति ग़ौर करता है और उन्हें सन्देह और सवालों के कटघरे में नहीं खड़ा करता तो यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है।

यहाँ यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या सिर्फ़ किसी राजनीतिक संगठन की राजनीतिक लाइन और उसके व्यवहार पर ही बात की जा सकती है, उसके नेताओं-कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत जीवन और आचरण पर नहीं? तो हमारा उत्तर होगा कि अवश्य की जा सकती है और अनिवार्यतः की जाती है। हर राजनीतिक समूह का एक-एक घटक व्यक्ति अपने आचरण-व्यवहार के लिए अपने समूह के साथियों के समक्ष जवाबदेह होता है और लेनिनवादी सांगठनिक सिद्धान्त इसके लिए सामूहिक चौकसी, जवाबदेही व आलोचना की एक समूची प्रणाली तजवीज करता है। समूह के भीतर के अतिरिक्त, समूह/संगठन का हर व्यक्ति जनता के जिस हिस्से के बीच काम करता है, वहाँ भी अपने निजी आचरण-व्यवहार के लिए जवाबदेह होता है। लेकिन कहीं से उठकर कोई भी व्यक्ति, कोई निष्कासित व्यक्ति या कोई अन्य संगठन यदि किसी संगठन या उसके किसी व्यक्ति पर कोई निजी तोहमत लगा दे तो सच का निर्णय आख़िर किस प्रकार होगा? इसीलिए लेनिनवादी पद्धति एकमात्र राजनीतिक लाइन और उसके अमल के आधार पर ही चीज़ों को तय करने की बात करती है। हाँ, कोई दो संगठन जब पूर्ण राजनीतिक एकता हासिल कर लेते हैं तो सांगठनिक एकता से पहले वे एक-दूसरे की कार्यकर्ता नीति, वित्तीय नीति, सांगठनिक ढाँचे और आन्तरिक जीवन के हर पहलू की सूक्ष्म जाँच-पड़ताल अवश्य करते हैं।

स्तालिन ने एक जगह बहुत मार्के की बात कही है। उनका कहना है कि सामरिक युद्ध में हम दुश्मन के सबसे कमज़ोर पक्ष पर वार करते हैं, लेकिन राजनीतिक युद्ध में हम उसके सबसे मज़बूत पक्ष पर हमला करते हैं। यही कम्युनिस्ट नीति है। कुत्सा-प्रचारक हमारे बारे में जो बातें करते हैं, यदि वे सही भी होतीं तो एक सच्चा कम्युनिस्ट उन्हें नहीं बल्कि हमारी राजनीति को निशाना बनाता। देश के जो भी संजीदा कम्युनिस्ट ग्रुप रहे हैं, उन्होंने हमारे साथ तमाम तीखे मतभेदों के बावजूद हमारे ख़िलाफ़ जारी व्यक्तिगत गाली-गलौज और आरोपों पर कान नहीं दिया। जिन कुछ लोगों के दिमाग में शंका पैदा हुई, उन्हें सफ़ाई देना हम इंक़लाबी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। उनसे तो हम बस यही कहेंगे कि मार्क्‍सवाद की राजनीतिक संस्कृति और तौर-तरीक़े का अध्ययन करें। चन्द लोगों के (उनकी पृष्ठभूमि और राजनीति जाने बगैर) कुत्सा-प्रचार से प्रभावित होकर शंकालु हो जाने वाले राजनीतिक ग्रुपों को सफ़ाई देना तो दूर उनसे बातचीत करना भी हम अपनी तौहीन समझते हैं।

तब हमसे आप पूछ सकते हैं कि ब्लॉग पर इतनी चर्चा करना क्या अपने आप में सफ़ाई देना नहीं है? वाजिब सवाल है। कुत्सा-प्रचार मुहिम यदि राजनीतिक हलकों तक ही रहती तो हम इस पर कोई सफ़ाई नहीं देते। ज़्यादा से ज़्यादा, हमारे समय में कुत्सा-प्रचार की राजनीति और संस्कृति पर कभी एक निबन्ध लिख देते। पर जिन कुछ भगोड़ों ने हमारे विरुद्ध कुत्सा-प्रचार को अपना जीवन-लक्ष्य बना रखा है, उन्होंने देश भर के (हिन्दी के अतिरिक्त बंगला, तेलुगू, मराठी, पंजाबी आदि भाषाओं के भी) लेखकों को हमारे ख़िलाफ़ बाक़ायदा पुस्तिकाएँ छपाकर भेजीं, पत्र और ई-मेल और अब ब्लॉग (‘जनज्वार’ ब्लॉग) पर भी कचरा उड़ेलना शुरू कर दिया है। तब से हमें बहुत से बुद्धिजीवियों के फोन आ चुके हैं कि हमलोगों को ख़ामोशी तोड़कर कुछ बोलना चाहिए (ज़ाहिर है कि इनमें से भी कुछ आदतन मज़े लेने वाले ग़ैरपक्षधर क़िस्म के लोग हैं और कुछ हमारे या क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन के जेनुइन शुभचिन्तक हैं)। राजनीतिक दायरे के भीतर जो तौर-तरीक़े लागू होते है, वे हूबहू बुद्धिजीवी हलकों में लागू नहीं होते। जब आम बुद्धिजीवियों के बीच सारे मसले उठा दिये गये और कम्युनिस्टों की खिल्ली उड़ाने वालों और नफ़रत करने वालों के बीच भी उन्हें आम चर्चा का विषय बना दिया गया है, तब हमने चुप्पी तोड़ने का फै़सला किया है। फिर भी हम सारे मसलों पर सफ़ाई देने के बजाय (जो हमारे स्वाभिमान के विरुद्ध है) मुख्यतः सोचने और फै़सले लेने के ‘अप्रोच’ और पद्धति पर कुछ सवाल उठायेंगे और महज़ कुछ बुनियादी, अकाट्य तथ्यों का उल्लेख करेंगे, जिनसे कुत्सा-प्रचार की सारी अट्टालिका एकबारगी भरभराकर गिर जायेगी। (वैसे यहाँ यह भी बता दें कि इन भगोड़ों के पाप का घड़ा अब भरने के क़रीब है। ब्लॉग पर नाम लेकर जिस तरह इन्होंने कीचड़ उछाला है, अब यदि हम मानहानि की क़ानूनी कार्रवाई करते हैं तो किसी साथी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि राजनीतिक विवाद को हम बुर्जुआ अदालत में क्यों लेकर गये। अब यह मसला नागरिक सम्मान का है और जैसा हमारे कई लेखक मित्रों ने पहले ही सुझाया था, हम यथा समय क़ानूनी कार्रवाई भी करेंगे।)

(1) पहला सवाल हमारा यह है कि जो कुत्सा-प्रचारकों का गिरोह है, उसकी अपनी राजनीति क्या है? ये कौन लोग हैं? ऐसा कत्तई नहीं था कि ये लोग एक साथ (या अलग-अलग) इन सवालों को उठाते हुए कभी हमारा साथ छोड़कर चले गये हों। ये लोग पन्‍द्रह वर्षों के दौरान अलग-अलग समयों पर अलग हुए लोग हैं। कुछ बार-बार अनुशासनहीनता या नैतिक कदाचार के कारण निकाले गये, कुछ निलम्बित किये गये और फिर वापस नहीं आये, कुछ भय, डिप्रेशन या अराजनीतिक पारिवारिक जीवन की चाहत के कारण या अन्य किसी निजी कमज़ोरी के कारण पीछे हटे या क्रमशः निष्क्रिय होते गये और फिर अचानक वर्तमान कुत्सा-प्रचार मुहिम के दौरान आश्चर्यजनक रूप से सक्रिय होकर सामने आये। इन सभी के बीच कभी कोई साझा बिन्दु नहीं था और अब जो एकमात्र ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ है, वह है हमारे ऊपर तरह-तरह की तोहमतों की झड़ी लगाना। हम चुनौतीपूर्वक कहना चाहते हैं कि अजय, प्रदीप, घनश्याम आदि किस कारण से निलम्बित किये गये, अरुण यादव को किस आरोप में निष्कासित किया गया, आदेश किस कारण से घर गया, यदि रत्ती भर भी साहस और नैतिकता है तो ब्लॉग पर इन सच्चाइयों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए! यह जानना भी ज़रूरी है कि ये सभी लोग वर्तमान समय में करते क्या हैं? इनमें से ज़्यादातर टुटपुँजिया बुर्जुआ अखबारों में कलमघसीटी करते हैं, कुछ एन.जी.ओ. के मुलाज़िम हैं, एक ठेका-पट्टी का काम करता है, एक ख़ानदानी सूदख़ोरी की जमापूँजी पर जीने वाला निठल्ला है, एक सरकारी मुलाज़िम व खाँटी ट्रेडयूनियनिस्ट है, एक टुटपुँजिया दलाल वक़ील है और एक है जो तराई के मज़दूरों में अर्थवादी राजनीति करता है। तराई में अर्थवादी राजनीति करने वाले के ख़िलाफ़ राजनीतिक संघर्ष पहले से था। उसने अचानक अलग होने की घोषणा की पर अलग होने के बाद उसने व्यक्तिगत तोहमतों के साथ ही हमारे ऊपर कई राजनीतिक सवाल भी उठाये। लेकिन अन्य जितने भी हैं वे सभी व्यक्तिगत कारणों से निष्कासित, निलम्बित या रिटायर होकर अपने धंधों में लग जाने वाले लोग हैं जिनके सिर पर निम्न बुर्जुआ प्रतिशोध का भूत सवार है। क्या वे नहीं समझते कि ब्लॉग जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करके और गैर-वामपंथी बुद्धिजीवियों तक को पोथे-पुलिन्दे भेजकर वे किसी एक व्यक्ति या संगठन या समूह को नहीं बल्कि कम्युनिज़्म और पूरे वाम आन्दोलन को लांछित कर रहे हैं?

(2) फलां संगठन में फलां व्यक्ति को ''भाई साहब'' या ''चचा'' या ''दादा'' या ''मोल्हूप्रसाद'' कहते हैं, फलां व्यक्ति फलां व्यक्ति का यह या वह लगता है, फलां संगठन ने अपना सम्मेलन या प्लेनम सरकारी गेस्ट हाउस-रेस्ट हाउस-हॉस्टल में किया, फलां प्रतिष्ठान फलां राजनीतिक संगठन से जुड़ा है... ब्लॉग व वेबसाइट पर इस क़िस्म की बातें करने वाले को क्या ग़द्दार और सरकारी एजेण्ट नहीं माना जाना चाहिए? क्या ये राजनीतिक सवाल हैं या यह ऐसे सांगठनिक-तकनीकी मसले हैं, जिनपर अपने घनघोर राजनीतिक विरोधी के सन्दर्भ में भी चर्चा नहीं की जानी चाहिए? हम ऐसी बातों के सही-ग़लत होने के सवाल पर जाते ही नहीं। हमारा सवाल यह है कि ऐसी बातों की राजनीतिक प्रासंगिकता क्या है? ऐसे ''तथ्य'' किस उद्देश्य से प्रस्तुत किये जा रहे हैं? फिर भी यदि कोई ऐसे लोगों का ''चाल-चेहरा-चरित्र'' नहीं पहचान पाता तो उसकी आँखों का इलाज हक़ीम लुक़मान भी नहीं कर सकते।

(3) क्या कारण है कि भगोड़ों का यह गिरोह हमलोगों के पुस्तक प्रतिष्ठानों, प्रकाशन-संस्थाओं, ट्रस्टों आदि (वैसे राजनीति के नये मुल्ला, जनाब नीलाभ जी ने फ़तवा जारी कर ही दिया है कि ट्रस्ट आदि बनाना राजनीतिक संगठनों का काम नहीं होता और हम अपना इतना भी अवमूल्यन नहीं कर सकते कि ऐसे राजनीतिक मसलों पर उनसे बहस करें और तर्क एवं तथ्य से उन्हें ग़लत सिद्ध करने में अपना समय ज़ाया करें) की चर्चा तो करता है लेकिन मज़दूर वर्ग के बीच हमारे कामों की - गोरखपुर में छह माह लम्बे चले मज़दूर आन्दोलन की, दिल्ली के 25 हज़ार बादाम मज़दूरों की हड़ताल की, मेट्रो के असंगठित मज़दूरों के बीच हमारे काम और उनके शानदार संघर्ष की या लुधियाना के फैक्ट्री मज़दूरों के बीच हमारे काम की चर्चा तक नहीं करता? क्या कारण है कि गोरखपुर में युवाओं के जुझारू सामाजिक आन्दोलन तथा दिल्ली और पंजाब में छात्रों-युवाओं के बीच हमारे काम की ये लोग चर्चा तक नहीं करते? क्या कारण है कि गोरखपुर में और अन्य जगहों पर हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्टों के विरुद्ध हमारी निर्भीक मुहिम का (तीन बार तो जनचेतना की प्रदर्शनी वैन भगवा गिरोह के गुण्डे तोड़ चुके हैं) ये लोग नाम तक नहीं लेते? इसलिए कि इनका मकसद यह बताना है कि हम लोग सिर्फ़ किताबें छापते-बेचते और सम्पत्ति जोड़ते हैं? क्यों इनसे वाम हलके का कोई भी बुद्धिजीवी उठकर यह सवाल नहीं पूछता कि ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ ये लोग किन ताक़तों के साथ खड़े हैं, क्या यह बात एकदम साफ़ नहीं है?

(4) क्या सैकड़ों कार्यकर्ता, ऐक्टिविस्ट और हमदर्द इस क़दर ग़ुलाम और विवेकहीन हो सकते हैं कि व्यक्ति-विशेष और परिवार-विशेष के बँधुआ हो जायें? हम सबसे अधिक दुहराये जाने वाले, परिवार के प्रश्‍न पर पहली बार अपनी अवस्थिति स्पष्ट करना चाहते हैं। हम समझते हैं कि सच्चा कम्युनिस्ट वही है जो दूसरों के बच्चों से भगतसिंह की राह पर चलने का आह्वान करने से पहले अपने बच्चे को उस राह पर डाले, जो अपने जीवनसाथी, माँ-बाप, भाई-बहन सबको क्रान्ति की राह पर लाने को प्रेरित करे (यह बात अलग है कि वे आयें या न आयें)। सच्चा कम्युनिस्ट वह है जो यदि पूरावक़्ती कार्यकर्ता हो तो सम्पत्ति-सम्बन्धों से निर्णायक विच्छेद करे। सच्चा कम्युनिस्ट वह है जो निजी जीवन में शादी-ब्याह से लेकर अन्तिम संस्कार तक धार्मिक रीति-रिवाज़ों को नहीं माने और जात-पाँत को नहीं माने। भगोड़े जानते हैं कि हम सभी ने शुरू से इन उसूलों को जीवन में उतारा है और साथियों के परिवार के परिवार आन्दोलन में आये हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है। आखिरकार, भगोड़े इस बात की चर्चा क्यों नहीं करते कि राजनीति में यदि पूरे के पूरे परिवार आये हैं तो उसूली मतभेद होने पर भाई-भाई, भाई-बहन और बाप-बेटा तक अलग राजनीतिक राह के राही बने हैं। यह भी हमारे लिए गर्व की बात है। यह भी हमलोगों का घोषित आदर्श और व्यवहार है कि सीधे सैद्धान्तिक कार्य और नेतृत्वकारी ज़िम्मेदारी किसी को भी नहीं दी जाती। हर व्यक्ति शुरुआत छात्रों-युवाओं और बुनियादी स्तर पर मेहनतकश वर्गों को संगठित करने से ही करता है। हर व्यक्ति को सामान ढोने, स्टॉल लगाने, झाड़ू-पोछा, खाना-बनाने और मेहनत-मजूरी का काम सीखना-करना होता है, मज़दूरों के बीच रहना होता है, चाहे वह कई भाषाओं का ज्ञाता और पीएच.डी. ही क्यों न हो! हम सभी इसी प्रक्रिया से आये हैं। यदि कोई नेतृत्व के किसी व्यक्ति का बेटा/बेटी हो तो उसे और सख़्ती से स्वयं इस प्रक्रिया से गुज़रना होता है और स्वयं पैरों के नीचे अपनी ज़मीन बनानी होती है। इसका अबतक कोई अपवाद नहीं हुआ है, क्योंकि हमारा मानना है कि, गैर-जनवादी एशियाई समाज में पार्टियों के भीतर भाई-भतीजावाद और विशेषाधिकार की प्रवृत्तियाँ अनुकूल वस्तुगत आधार के कारण तेज़ी से फल-फूल सकती हैं। परिवारों को क्रान्ति की आग में झोंका जाना चाहिए पर इससे जुड़ी हुई ज़िम्मेदारियों का भी निर्वाह किया जाना चाहिए -- यह हम भली-भाँति समझते हैं। पर हम यह भी समझते हैं कि यह भारत है और यहाँ महज़ परिवारों के होने से ही परिवारवाद का आरोप लगाया जा सकता है और उसपर सहज विश्‍वास भी किया जा सकता है। हमारे बीच बहुतेरे स्‍त्री-पुरुष साथी ऐसे हैं जो साथ-साथ राजनीतिक-सांस्कृतिक काम करते हुए एक-दूसरे के जीवन सहचर बने। अब यदि रिश्तेदारी जोड़ते हुए कोई उन्हें परिवार घोषित कर दे, तो यह कितनी ओछी घटिया बात है -- इस पर भी सोचा जाना चाहिए। जहाँ तक किसी को भी ‘प्रोमोट’ किये जाने का सवाल है, हमारे यहाँ सभी संगठनकर्ता स्वतंत्र जिम्मेदारियाँ उठाते हैं, रोज़-रोज़ बौद्धिक-व्यावहारिक गतिविधियाँ करते हुए वे लोगों के बीच हैं। वहाँ चीज़ें एकदम साफ़ हैं। हमने तो कई बुद्धिजीवी मित्रों से कहा भी (और हमारा यह खुला प्रस्ताव है) कि आप ऐसे आरोपों पर सवाल पूछकर हमें अपमानित करने के बजाय छुट्टी लेकर आइये, हमारे पुस्तक प्रतिष्ठान व प्रकाशनों के कार्यालयों पर कुछ दिन बिताइये और कुछ दिन दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश के हर कार्यक्षेत्र में कार्यकर्ताओं के बीच बिताइये। इसतरह आप स्वयं सच्चाई से परिचित हो जायेंगे।

(5) यहीं पर सम्पत्ति खड़ा करने के सवाल पर कुछ बातें। पहली बात, तकनीकी-क़ानूनी कारणों के कुछ अपवादों को छोड़कर, हमारे बीच जो भी पूरावक़्ती कार्यकर्ता हैं उनकी कोई निजी सम्पत्ति नहीं है और हर स्तर पर हर व्यक्ति की सुविधाओं और खर्चे आदि की पाई-पाई की पूर्ण पारदर्शी जवाबदेही होती है। तकनीकी-क़ानूनी कारणों से (जैसे किसी पहले से चल रहे मुक़दमे के कारण या ट्रस्ट/सोसाइटी को हस्तांतरण में किसी क़ानूनी पेंच के चलते विलम्ब होने के कारण) यदि कोई भवन/भूखण्ड किसी व्यक्ति के नाम से है भी तो हमारे बीच के हर व्यक्ति की जानकारी में और इस समझदारी के आधार पर है कि वह व्यक्तिगत सम्पत्ति कत्तई नहीं है। यदि कोई व्यक्ति क़ानूनी स्थिति का लाभ उठाकर कल को अपना दावा ठोंक भी दे तो उसे सभी साथी एक सेकण्ड की देर किये बिना संगठन से बाहर का रास्ता दिखा देंगे। दूसरी बात, प्रकाशन और पुस्तक-प्रतिष्ठान सामूहिक स्तर पर कमेटियाँ चलाती हैं। व्यक्तिगत लाभ की गुंजाइश ही नहीं है। इनमें पूरा समय लगाने वालों को भरण-पोषण भत्ता मिलता है। पाई-पाई का पारदर्शी हिसाब होता है। वैसे भी हमारे प्रकाशन घाटे में ही चलते हैं। जनता से विविध माध्यमों से नियमित सहयोग (कूपन काटना, पर्चा अभियान चलाना, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर व कार्ड आदि कला-सामग्री बनाकर बेचना) जुटाकर ही हम इन्हें चलाते हैं और नयी किताबें छापते हैं। ''सम्पत्ति खड़ा करने'' जैसी बातें करने वाले लोग वे लोग हैं जो ऐसे हर सामूहिक उद्यम के प्रति सन्देह पैदा करके उन्हें ‘डैमेज’ करना चाहते हैं, और परिवर्तनकामी राजनीति को लांछित-कलंकित करना चाहते हैं।

(6) कुछ कवि मित्रों ने फोन करके पुरज़ोर आग्रह किया है कि चुप रहने के बजाय मुझे इस अपमानजनक आरोप पर भी बोलना चाहिए कि मेरा लेखन मेरा है ही नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि इसपर क्या कहा जा सकता है। साहित्य की औसत समझ वाला व्यक्ति भी यह नहीं कह सकता, एक ईडियट या गधा ही कह सकता है। मेरी और शशिप्रकाश की विचारधारा एक है, जीवन का रास्ता एक है, जीने के तरीके में भी काफ़ी कुछ एकता है (जो अर्जित एकता है) लेकिन हम लोग शैली व रूप की दृष्टि से और काफ़ी हद तक विषयवस्तु के दायरे की दृष्टि से, दो स्कूलों के कवि हैं। शशिप्रकाश की कविता मूलतः ‘सब्जेक्टिव पोयट्री’ और ‘पोलिटिकल पोयट्री’ है। मेरी कविताओं का मिज़ाज अलग है। मुझे बीस वर्षों से बिरादर कवि-लेखक जानते है, गोष्ठियों-सेमिनारों में संवाद होते रहे हैं, फिर भी ऐसी ओछी बातें होती हैं तो इसका कारण एक है कि एक स्वतंत्र स्‍त्री को अपमानित करने की सबसे कारगर कोशिश यह होती है कि उसे व्यक्तित्वहीन घोषित कर दिया जाये।

जहाँ तक वैचारिक लेखन का सवाल है, उसके बारे में लगे हाथों कुछ बातें स्पष्ट कर दूँ। मेरा जो भी वैचारिक लेखन है (स्‍फुट टिप्पणियों, डायरियों व छिटफुट लेखों को छोड़कर) उसका अधिकांश हिस्सा सामूहिक विचार-विमर्शों (लिखने के पहले और लिखने के बाद) सुझावों, आलोचनाओं से इस क़दर प्रभावित होता है कि काफ़ी हद तक सामूहिक उत्पाद होता है -- यह बात मैं अकुण्ठ भाव से स्वीकार करती हूँ। जब किसी मंच से अपने समूह का प्रतिनिधित्व करते हुए मैं कोई पर्चा या आलेख पढ़ती हूँ तो वह पूरी तरह से हमारे पूरे समूह का विचार होता है। जिस बुद्धिजीवी ने भी किसी जन संगठन में काम किया है, वह इस बात को भली-भाँति जानता समझता है।

(7) कुत्सा-प्रचारकों के चरित्र को स्पष्ट करने के लिए एक और तथ्य पर दृष्टि डालें। इनके बीच का एक पतित तत्व जो सूदख़ोरी के ख़ानदानी धन पर जीने वाला एक अकर्मण्य सामाजिक परजीवी है, वह अपने गाली पुराण में स्वयं को परिकल्पना प्रकाशन का तथा जनचेतना प्रदर्शनी वाहन का ''मालिक'' बताता है तथा लिखता है कि हमलोग कार्यकर्ताओं से ''बेगारी'' करवाते हैं और ''भीख'' मँगवाते हैं। यह कहकर इस व्यक्ति ने स्वयं को ही नंगा कर लिया है। परिकल्पना प्रकाशन का ''मालिक'' वह या कोई भी व्यक्ति कभी नहीं था। एक कमेटी थी जिसमें वह भी था और उसने शुरू करते समय आर्थिक सहयोग किया था। इसी तरह प्रदर्शनी वाहन में भी उसने बड़ा हिस्सा सहयोग दिया था और वाहन उसी के नाम पर लिया गया था। अब बाहर जाने के बाद भी वह अपने को प्रकाशन व वैन का ''मालिक'' बता रहा है। यदि उसमें रत्ती भर भी कम्युनिस्ट संस्कार होते तो (यदि पूरा सहयोग उसी का होता तो भी) वह अपने को ''मालिक'' कदापि नहीं कहता और जहाँ तक कार्यकर्ताओं को भिखमंगा कहना है तो यह तो उसकी हिमाक़त के साथ ही इन लोगों की वर्गदृष्टि का ही एक जीता-जागता प्रमाण है। हमलोगों का यह पुराना और बार-बार दुहराया गया संकल्प है कि हम अपने प्रकाशन, अपने पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं के लिए कोई भी सशर्त सांस्थानिक अनुदान (देशी पूँजीपतियों से, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से, उनके ट्रस्टों से, फण्डिंग एजेंसियों/एन.जी.ओ से, चुनावी पार्टियों से और सरकार से) नहीं लेते, केवल व्यक्तिगत सहयोग लेते हैं -- नियमित रूप से मज़दूर बस्तियों में कूपन काटते हैं, कालोनियों-बसों-ट्रेनों में पर्चा अभियान चलाते हैं, और नुक्कड़ नाटक-गायन आदि करते हैं। एक पूरी तरह से अनुत्पादक निठल्ला यदि इन कार्रवाइयों के ज़रिए जनता के बूते राजनीतिक-सांस्कृतिक काम खड़ा करने के गौरवपूर्ण सामूहिक उपक्रम को ''भीख माँगना'' और ''बेगारी करना'' कहता है तो वह हर सामाजिक कार्यकर्ता के ऊपर आसमान में सिर उठाकर थूकने की कोशिश कर रहा है। इस बारे में हमें और कुछ नहीं कहना है।

(8) एक और तथ्य ग़ौरतलब है। ये सभी पतित तत्व का. अरविन्द के निधन के बाद से लेकर अबतक लगातार यह प्रचार करते रहे हैं कि नेतृत्व ने का. अरविन्द की कोई सुध नहीं ली और उन्हें मरने के लिए अकेला छोड़ दिया, कि वे गोरखपुर निर्वासन के तौर पर भेजे गये थे... आदि-आदि। हद तो यह थी कि का. अरविन्द के माता-पिता तक को यह कहकर पूर्वाग्रहित करने की घृणित कोशिश की गयी। का. अरविन्द का निधन कितना आकस्मिक (मल्टिपल ऑर्गन फे़ल्योर के कारण) था, इसके डाक्टरी प्रमाण तो हैं ही, उनकी अंतिम साँस तक जुझारू-समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम उनके पास खड़ी थी। देर रात नर्सिंग होम में भरती कराये जाने के अगले दिन रोग की गम्भीरता का पता चला तब पी.जी.आई. लखनऊ में भरती की तैयारी हो चुकी थी। दिल्ली, लखनऊ, पंजाब से साथी रवाना हो चुके थे। पर का. अरविन्द को लखनऊ या दिल्ली ला पाने की स्थिति ही नहीं थी, डॉक्टर यह परामर्श देने को क़तई तैयार नहीं थे। यह एकमात्र ऐसी बात है जिसकी चर्चा करते हुए हमें अपार क्षोभ और दुःख होता है। क्या कोई इस हद तक भी कमीनगी पर आमादा हो सकता है कि ऐसे मसले को भी दुष्प्रचार का विषय बनाये?

दिलचस्प बात यह है कि का. अरविन्द के जीवन काल में ये सभी तत्व उन्हें घृणिततम हमलों का निशाना बनाते रहे और अब वे उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण शब्दों की बारिश कर रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि इनमें से चन्द एक अपवादों को छोड़कर सभी को का. अरविन्द ने ही अलग-अलग समयों पर निष्कासित या निलम्बित किया था। पिछले दिनों किसी के पूछने पर एक भगोड़े ने कहा कि का. अरविन्द शरीफ़ दब्बू थे और उनसे यह सब करवाया जाता था। इस देश का क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन का. अरविन्द के व्यक्तित्व से दो दशकों से परिचित था। हिन्दी प्रदेश के अधिकांश लेखक-पत्रकार भी उन्हें जानते थे। अब यह उनके तय करने की बात है कि क्या का. अरविन्द ऐसे दब्बू व्यक्ति थे कि जो चाहे उनसे जो करा ले? दूसरी बात यह कि वे स्वयं नेतृत्व के अग्रणी व्यक्ति थे। यह भला कौन नहीं जानता?

विगत पाँच वर्षों से दर्जन भर पतित तत्वों के एक गिरोह ने राजनीति से लेकर संस्कृति की दुनिया तक, देशव्यापी पुस्तिका-वितरण से लेकर ब्लॉग तक घनघोर कुत्सा-प्रचार का जो उत्पात मचा रखा है, वह हमारे लिए ज़रा भी आश्चर्य की बात नहीं है। पाश से शब्द उधार लेकर कह सकते हैं कि यह भी हमारे वक़्तों में ही होना था। हम ऐतिहासिक विपर्यय से पैदा हुए वैचारिक स्खलनों, नैतिक पतनों और निजी प्रतिबद्धताओं के विघटन के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में हम चाहे जितना अलग रहने की कोशिश करें, टुच्ची घटिया चर्चाओं के कीचड़ में पैर फँसने का जोखिम बना ही रहता है। आज क्रान्तिकारी वाम राजनीति के एक दौर का विघटन हो रहा है और नया दौर अभी गति नहीं पकड़ सका है। डी.जी.पी. विश्‍वरंजन के आयोजन में ‘गोली दागो पोस्टर’ के कवि आलोकधन्वा जैसे लोगों की शिरकत तथा विभूति नारायण राय प्रकरण जैसी घटनाओं से वाम सांस्कृतिक आन्दोलन का निकृष्ट-पतित अवसरवादी परिदृश्य भी सामने है। छोटे-छोटे बौने ब्लॉगों की दुकान खोलकर चपड़-चर्चा कर रहे हैं और मठाधीश होने का मुग़ालता पाले बैठे हैं। ऐसे में यदि बुर्जुआ मीडिया और एन.जी.ओ. के कुछ पतित तत्व एक तरफ़ लाल कलगी लगाकर क्रान्तिकारी स्वाँग रचायें और दूसरी ओर बुद्धिजीवी समुदाय को कुत्सा-प्रचार की मसालेदार सामग्री परोसकर किसी ‘जेनुइन’ साहसिक सामाजिक प्रयोग को कलंकित-लांछित करने की कोशिश करें तो इसमें भला आश्चर्य की क्या बात?

रही हमारी बात। तो कुत्तों के भौंकने से हाथी की चाल पर कोई असर नहीं पड़ता। तमाम ''महामहिमों'' की भविष्यवाणियों को झुठलाकर हमने दो दशक की अपनी पथान्वेषी यात्रा पूरी की है, आगे भी हमारी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी। जिन्हें पक्ष चुनना है, वे पक्ष चुनेंगे। जो ‘फे़न्स-सिटर’ हैं, वे किनारे बैठकर जग का मुजरा लेते 
रहेंगे। यही जीवन की गति है.