Aug 7, 2010

कालकोठरी के पांच दिन


उत्तराखंड  में महिलाओं  को माहवारी होने पर किन परेशानिओं  से से जूझना होता है, मां बनने पर समाज परम्पराओं और देवताओं के नाम पर  उनसे कैसा अमानवीय बर्ताव करता है, "जहाँ मां बनना पाप है," लेख में हमने देखा. अब इस मुद्दे पर और तफशील में जाते हुए देश के पूर्वी राज्य  बिहार में माहवारी के दिनों में महिलाओं से कैसा व्यवहार होता है, इसको जानने के लिए  पढ़ें पत्रकार मृणाल वल्लरी को.

मृणाल वल्लरी

प्रेमा नेगी की पोस्ट ने विचलित कर दिया। ऐसा सच जानने, देखने, भोगने के बाद भी प्रेमा के लिखे ने दिमाग में एक हलचल सी मचा दी। कुदरत ने स्त्री की जिस देह को नेमतों से नवाजा उसे समाज ने विडंबनाओं का भंडार बना दिया।

दुनिया की सारी सभ्यताओं ने मातृत्व को आला दर्जा दिया। लेकिन मातृत्व के लिए सबसे जरूरी प्रक्रिया से जब वही स्त्री देह गुजर रही होती है तो उस दौरान वह एक ऐसी गंदगी का ढेर बन जाती है जिसे छूकर इंसान अपवित्र हो जाए। प्रेमा जी ने पहाड़ के एक गांव की कुरीतियों का जिक्र किया। लेकिन स्त्री देह की इस नैसर्गिक प्रक्रिया को हिकारत बनाने में पहाड़ और मैदान की संस्कृति हैरतअंगेज तरीके से कदमताल करती नजर आती है।

सामाजिक जड़ता के खिलाफ एक नयी दुनिया की उम्मीद
बिहार के गांवों में भी उन पांच दिनों से गुजरने की प्रक्रिया के दौरान  किशोरी से लेकर महिलाएं तक, एक नर्क की जिंदगी जीती हैं. बिहार के बिहटा के एक गांव की लड़की जो पटना में पढ़ रही थी उसने बताया कि जब से वह अपने परिवार से दूर हॉस्टल में रहने के लिए पटना आई है उसकी जिंदगी में हर महीने के पांच दिनों का और इजाफा हो गया है। गांव में उन पांच दिनों के दौरान उसे एक अलग कमरे में रहना पड़ता था। और मौसम चाहे जो भी हो पांच दिन नहाना मना है।
उस समय में जब शरीर को सफाई की सबसे ज्यादा जरूरत होती है,नहाने की मनाही कितने तरह के रोगों को बुलावा देती है यह अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन गांव तो गांव पटना जैसा शहर भी इस मसले पर कूपमंडूक बना हुआ है। मेरी पड़ोस की एक महिला जिसे हम भाभी कहते,वह कई  पुरुषों के परिवार में अकेली महिला थी। उनके घर के एक पुरुष सदस्य की मौत हुई। मौत के बाद घर में हो रहे कर्म-कांड के दौरान उनके लिए शारीरिक रूप से अपवित्र होना वर्जित था। क्योंकि उस दौरान वो खाना बनातीं तो उसे कोई नहीं खाता।

उन्होंने मुझे पुर्जे पर एक दवा लिख के लाने को दी। मैंने पूछा कि यह किस चीज की दवा है। उन्होंने बताया कि इस दवा को खा लेने से उनका मासिक चक्र आगे बढ़ जाएगा, वो आराम से घर के काम कर सकेंगी। मैंने पूछा कि उन्हें इस दवा के विषय में कैसे पता चला। उन्होंने हंसते हुए कहा कि गांवों में तो छठ और अन्य पूजा-त्योहारों के समय महिलाएं धड़ल्ले से इस दवा का इस्तेमाल करती हैं। मैंने अचरज से पूछा कि गांवों में भी यह दवा आसानी से मिल जाती है,  तो उन्होंने कहा कि जरूरत है तो मिलेगी ही। मैं आवश्यकता और पूर्ति के इस रिश्ते से हैरान हो गई। भाभी ने बताया कि घर में अकेली महिला होने के कारण वो अक्सर इस दवा का इस्तेमाल करती हैं। मैंने पूछा कि इस दवा का कोई साईड इफेक्ट नहीं है।

 शिक्षा का अधिकार  : अब सामाजिक बराबरी की तैयारी
उन्होंने कहा कि इस वजह से उनका पूरा मासिक चक्र अनियमित होने के साथ कुछ और भी शारीरिक समस्याएं होती हैं। लेकिन उन्हें इस बात की अब चिंता नहीं है क्योंकि वे दो बच्चों की मां बन चुकी हैं। यानी उनका शरीर एक मां बनने की मशीन है और मां बनने के बाद उनके शरीर के कल-पुर्जों की उपयोगिता उनके लिए खत्म हो गई और वे अंधविश्वास और कुरीतियों की रक्षा के लिए उन कल-पुर्जों के साथ मनमानी कर रही हैं। अंधविश्वास के नाम पर अपने शरीर के साथ इतना बड़ा खिलवाड़। अगर गांव के अनपढ़ लोग कुरीतियों को ढो रहे हैं तो उनके बारे में थोड़ा समझा जा सकता है। लेकिन शहरी  महिलाएं भी इन परंपराओं को ढोती हैं, तो दुख होता है।

सस्ता सैनिटरी नैपकिन :   बंदिशों से मुक्ति की एक सार्थक पहल
आज भी गांवों और कस्बों में इन परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई आगे नहीं आता। सरकार भी परिवार नियोजन और जच्चा-बच्चा की रक्षा को लेकर प्रचार-प्रसार तक ही सीमित रहती  है। इन कुरीतियों के खिलाफ कोई पहल नहीं दिखती। शहरों में तो सेनेटरी नैपकिन ने लड़कियों की आजादी के थोड़े रास्ते खोले हैं लेकिन गांवों की किशोरियों को तो उन पांच दिनों के लिए कालकोठरी में बंद होने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है। घरेलू उपायों पर निर्भरता के कारण स्कूल-कॉलेज जाना बंद हो जाता है।

अगर उन दिनों इम्तिहान और किसी तरह की प्रतियोगिता में भाग लेना हो तो फिर शरीर की मजबूरी आधा मनोबल पहले ही तोड़ देती है। गांवों में घर की बेटियों की शादी के लिए सोने के गहने और रेशमी साड़ियां तो जमा की जाती हैं लेकिन स्कूल जाती लड़कियों के लिए सेनेटरी नैपकिन पर खर्च करना उन्हें बेमानी लगता है।जो परिवार यह खर्च उठा सकते हैं वे तो नहीं उठाते लेकिन बहुत परिवार ऐसे भी हैं जो घर में चार-पांच बेटियों के लिए महीने में इतना खर्च नहीं कर सकते।

टाटा ने सस्ती कार और वाटरप्यूरिफायर तो ला दिया लेकिन कोई कंपनी क्या इन लड़कियों की मुसीबतों को कम करने के लिए आगे आएगी। आखिर अभी तक इसे लड़कियों की बुनियादी जरूरत की तरह क्यों नहीं देखा जा रहा। क्या गांवों में सरकारी मदद से लड़कियों के लिए सस्ते सेनेटरी नैपकिन का इंतजाम नहीं किया जा सकता। आज के दौर में स्कूल  और कॅरियर बनाने की चाह रखनेवाली लड़कियों के लिए यह रोटी,कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरत है।



Aug 6, 2010

जहां मां बनना पाप है

प्रेमा नेगी

मैदानी जिसे धरती का स्वर्ग कहते हैं,संयोग से मैं उस धरती के स्वर्ग पर जन्मी। मैं उन्हीं पहाड़ों में पढ़ी-लिखी और बड़ी हुई। बहुतेरी मान्यताओं और अंधविश्वासों  को  मुझे भी झेलना पड़ा और कुछ को मानने के लिए परिवार वालों ने मजबूर भी किया। मगर बच्चे को जन्म देने वाली माओं को अमानवीयता की इस स्थिति से गुजरना पड़ता होगा,यह मेरी जानकारी में भी नहीं था।

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड की चोटियों को देख सैलानियों को लगता है कि यहां धरती का स्वर्ग बसता होगा। लेकिन पहाड़ की महिलाओं का जीवन पहाड़ से भी ज्यादा कठिन होता है,इसे हम उत्तराखंडी बखूबी जानते हैं। बच्चे को जन्म देने के दौरान एक महिला को नया जीवन मिला होता है और वह अपने शरीर को हिलाने में सक्षम नहीं होती। उस अवस्था में उत्तराखण्ड के ग्रामीण इलाकों में उस महिला को नवजात बच्चे के साथ पेट से निकली गंदगी और उसके सफाई में लगे कपड़े-बिछावन को खुद उठाकर घर से दूर फेंकने जाना पड़ता है।
परंपरा के नाम पर जच्चा को दी जाने वाली इस शारीरिक और मानसिक सजा के बाद वह कैसा महसूस करती होगी, इसे समझना संवेदनशील  समाज के लिए बहुत मुश्किल नहीं है। वहां की महिलाओं से यह पूछने पर कि उस गंदगी को दाई क्यों नहीं फेंकती तो कई ने लगभग एक जैसा ही जवाब दिया कि किसी के पेट की गंदगी को कोई क्यों हाथ लगायेगा?जिसकी गंदगी है, उसे वही दूर फेंककर आये तो अच्छा होता है। यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, पर ये सच है।

बच्चे को जन्म देना किसी भी महिला के लिए जीवन की सबसे कठिन घड़ी होती है। बाकियों को भले ही इसका आभास न हो, मगर सच है कि बच्चे को जन्मने के दौरान वो जीवन और मौत के बीच से गुजरती है। और मौत की दहलीज से वापस लौटने के बाद उसे जो करना पड़ता है,वह वाकई चौंकाने वाला है। मगर यहां के समाज में इस अमानवीयता को परंपरा कहते हैं और मां बनने के बाद सजायाफ्ता हुई औरत जितनी ज्यादा इस नवटंकी को निभाती है,वह उतनी कद्रदां होती है। हमने अपनी ताई, भोजी (भाभी) और मां से पूछा, कहा भी कि वह कुल देवता कितना पापी होगा जो एक मां को यह सजा मुकर्रर करता होगा। लेकिन सभी इस अंतहीन तकलीफ पर हंस पड़े मानो कि इस दुनियादारी को समझने की मेरी उम्र ही न हुई।

उत्तराखण्ड के आर्थिकी की रीढ़ कही जाने वाली महिलायें पुरानी रुढ़ियों की शिकार हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में महिलायें माहवारी की तरह ही बच्चा जनने के दौरान भी घर से अलग-थलग रहती हैं। मासिक धर्म के दौरान जैसे उस महिला को तीन दिन तक कोई छू नहीं सकता वैसे ही जच्चा को नामकरण संस्कार से पहले तक कोई छू नहीं सकता। अगर जच्चा से बच्चे को कोई अपने पास लेता है तो वह गोमूत्र छिड़ककर शुद्धीकरण करने के पश्चात् बच्चे को छूता है।


हालांकि नामकरण के बाद भी एक विषेश समयावधि (जन्म से बाईस दिन) तक जच्चा घर की रसोई और मंदिर वाले कमरे में प्रवेश नहीं कर सकती है। सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं के मुताबिक अगर कोई भी जच्चा को छूने के बाद बिना गोमूत्र छिड़के घर के अंदर प्रवेश करता है तो छूत लग जाती है। इसके पीछे वहां के लोग तर्क देते हैं कि अगर किसी ने इसे नहीं माना तो कुलदेवता नाराज हो जाते हैं जिससे किसी की तबीयत तक खराब हो सकती है। यानी कि आधुनिकता का लिबास पहने तथाकथित सभ्य समाज की कई ऐसी सच्चाइयां हैं जिन पर आज सहज विश्वास करना मुश्किल है।

सामाजिक रूतबे के हिसाब से तो उत्तराखण्ड की महिलाएं वहां की आर्थिकी की रीढ़ हैं बावजूद इसके पुरुष  वर्चस्ववादी मानसिकता और पुरानी रूढ़ियां यहां के समाज में कूट-कूटकर भरी हैं। मासिक धर्म के दौरान भी जो मासिक चक्र उस महिला विषेश तक ही सीमित होना चाहिए उसको वहां हौवा बना दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे कि कोई अपषकुन हो गया हो। इस बात का पता घर के सदस्यों से लेकर आस-पड़ोस के लोगों को तक चल जाता है। ऐसा महसूस होता है जैसे स्त्रियों का अपना कोई निजत्व ही नहीं है।
उन दिनों में जबकि वह औरत शारीरिक कष्ट  झेल रही होती है उसे अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक आराम की जरूरत होती है वह ओढ़ने-बिछाने के लिए तक पर्याप्त बिस्तर नहीं ले सकती है। उसे एक कंबल या गुदड़ी के सहारे ठंडी रातें गुजारनी पड़ती हैं। ठंड के दिनों में तो महिलाएं अतिरिक्त कष्ट सहती हैं। ऐसा नहीं है कि माहवारी के दौरान वह महिला कोई काम नहीं करती है। खेतीबाड़ी से लेकर जंगल से घास-लकड़ी लाने का काम रोजाना की तरह करती है। शुरुवाती दो-तीन दिनों तक तो उस महिला को दूध या दूध से बनी चाय तक नहीं दी जाती है। इसके पीछे भी सारगर्भित तर्क पेश किया जाता है। समाज के ठेकेदार दावा ठोककर कहते हैं कि जिस दुधारू के दूध से चाय बनेगी, वह बीमार पड़ जायेगी नहीं तो उसे छूत लग जायेगी और वह दूध देना बंद कर देगी।

मेरे गांव में एक एक बच्चे के जन्म होने के ग्यारहवें दिन यानी नामकरण के दिन उसकी मौत हो गयी। इसके लिए वहां के लोगों ने उस बच्चे की माँ को ही जिम्मेदार ठहराना शुरू  कर दिया। कहा गया कि इसने बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ही नमक-मिर्च और मसाले वाला खाना खाना शुरू कर दिया था, जिसका असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ा और बच्चा जिंदा नहीं रह सका। लोग मानते हैं नमक तो बच्चे के लिए जहर का काम करता है।

गौरतलब है कि बच्चे के जन्म के बाद कई दिनों तक जच्चा को बिना नमक या न के बराबर नमक दिया जाता है। जब उसे बहुत अच्छे यानी स्वास्थ्यवर्धक भोजन की जरूरत होती है तब लगभग ग्यारह दिनों तक अधिकांश  महिलाओं को दूध भी नहीं दिया जाता। कहा जाता है कि जिस भैंस या गाय का दूध उस जच्चा को दिया जायेगा वह बिगड़ जायेगी, मतलब दूध देना बंद कर देगी या उसे कोई और दिक्कत होगी। लोग बाकायदा उदाहरणों के माध्यम से इन बातों को समझाते हैं। हालांकि अब कुछ समझदार यानी पढ़े-लिखे लोग डेयरी से खरीदकर जच्चा को दूध देने लगे हैं,पर अधिकांश जगह यह संभव नहीं है।

जिन औरतों के पति रोजी-रोटी के चलते पहाड़ से पलायन कर चुके हैं और बच्चे बहुत छोटे हैं,घर में बड़ा-बुजुर्ग कोई नहीं है या किसी कारणवश महिला संयुक्त परिवार में नहीं रहती है तो उसको माहवारी या फिर बच्चे के जन्म के दौरान और भी ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बच्चों और खुद के भोजन के लिए आसपास के लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। चूंकि पुरानी मूल्य-मान्यताओं और अंधविष्वास के चलते वह तय मानदंडों का पूरी तरह निर्वहन करती है इसलिए घर में प्रवेश नहीं करती है।

आखिर माहवारी और बच्चे के जन्म के दौरान महिला में ऐसे कौन से परिवर्तन आ जाते हैं जो इसे लेकर इस तरह की रूढ़ियां हैं। क्यों हैं इसे लेकर इतनी भ्रांतियां? मजेदार बात तो ये है कि यह मासिक धर्म को लेकर जो सामाजिक मान्यताएं हैं वह सिर्फ विवाहितों पर लागू होती हैं। कुंवारी लड़कियों पर कोई नियम लागू नहीं होता।

मन में ख्याल आता है क्या विवाहित स्त्रियों की माहवारी के दौरान या बच्चा जन्मने के बाद विश स्रावित होने लगता है!ऐसी महिलाओं के षरीर से स्पर्ष के बाद उसका अपना बच्चा भी अगर बिना गोमूत्र छिड़के घर के अंदर प्रवेष कर जाता है और यह बात बड़े-बुजुर्गों को पता चल जाती है तो उस घर में बखेड़ा खड़ा हो जाता है। उनमें छुआछूत को लेकर तमाम तरह के विकार दिखने शुरू हो जाते हैं। उनके मुताबिक देवताओं के नाम की बभूति लगाने के बाद ही उसकी छूत उतरती है।

देखा जाये तो ऐसे अंधविश्वासों  को बढ़ावा देने में औरतें खुद भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि ये कहें कि उन्हीं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तो यह गलत नहीं होगा। जो सास इन सड़ी-गली मूल्य-मान्यताओं को ढोती चली आ रही है वह चाहती है कि उसकी बहू भी उन रूढ़ियों को निभायें। इसी तरह इसने एक परंपरा का रूप लिया होगा जो आज भी जारी है। पढ़ी-लिखी और जागरूक महिलाएं भी इसकी गिरफ्त से पूरी तरह नहीं छूटी हैं। वे एक तरह से इन्हें निभाकर बढ़ावा ही देती हैं। हालांकि नई पीढ़ी ने इन रूढ़ियों का कुछ हद तक विरोध करना शुरू किया है, मगर विरोध करने वालों में अभी भी खासकर स्त्रियों की उपस्थिति नाममात्र की ही है।

 
 

Aug 4, 2010

सरकार अत्याचार करै, तो रखावै कौन


जिस जमीन पर फसलें उगाते हुए किसानों की पीढ़ियां गुजर चुकी हों,जिन खेतों में उगी फसलों का नाता इन परिवारों की समृद्धि से रहा हो, उन खेतों का मालिकाना हक, कागज की एक चिट्ठी छीन ले तो किसान क्या करें?
अजय प्रकाश की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश  के अलीगढ़ जिले के टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों में जेपी ग्रुप के मॉल और मकान बनाने के लिए सरकार ने जो जमीन निर्धारित की है,वह किसानों की खेती योग्य जमीन है। मगर उत्तर प्रदेश सरकार जेपी ग्रुप  के मकान-दूकान बनाने को देश  का विकास ठहराने पर आमादा है और हर कीमत पर जमीन कब्जाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। 510 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इन सभी गांवों में पुलिस,प्रशासन और जेपी ग्रुप के लठैत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं,जिसके खिलाफ किसान  भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं और हर रोज जोरदार प्रदर्शन  कर रहे हैं.
पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में सरकार और जनता के बीच पिछले कई वर्षों  से सबसे बड़ी टकराहट मुआवजे और कब्जे को लेकर ही है। सरकार के पास बहाना विकास का है और किसान ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के संघर्ष  पर उतारू है। ग्रामीण हुकुम सिंह कहते हैं,हम पर जुल्म होता है तो न्याय की उम्मीद में प्रशासन,प्रतिनिधि या अदालत में जाते हैं। मगर हम लोगों के सामने यही संकट है कि सरकार ही अत्याचार करै, तो रखावै कौन।’

सरकारी-निजी मिलीभगत  से इन छह गांवों में खेती के जमीनों पर कब्जेदारी की कानूनी प्रक्रिया जेपी ग्रुप ने 2001 में ताज एक्सप्रेस-वे के बनने के दौरान ही पूरी कर ली थी। मगर यह जानकारी किसानों के बीच सरकार की ओर से पिछले वर्ष सार्वजनिक की गयी। गौरतलब है कि उस समय सरकार बसपा की ही थी और मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ही सत्ता पर काबिज थीं। सन् 2001 में किसानों ने बड़ी आसानी से ताज एक्सप्रेस वे के लिए जमीन दे दी कि इससे राज्य का विकास होगा। उस समय किसानों ने जमीन सवा तीन लाख रूपये बीघे के हिसाब से दी थी। लेकिन पिछले वर्श जब विकास प्राधिकरण ने किसानों को नोटिस भेजा कि अलीगढ़ जिले के छह गांवों टप्पल, उदयपुर, जहानगढ़, कृपालपुर, जीकरपुर और कंसेरा गांव के जमीन मालिक कोई नया निर्माण न करें, तो किसान हतप्रभ रह गये।

इसकी शुरुआअत उस समय हो गयी थी जब कॉमनवेल्थ खेलों के लिए दिल्ली से आगरा के बीच चौड़ी,सुंदर और चकमदार सड़क बनाने की योजना की मंजूरी ताज एक्सप्रेस-वे हाइवे प्राधिकरण को सरकार ने दी थी। जिसका नाम बाद में यमुना एक्सप्रेस-वे विकास प्राधिकरण हो गया। इसके लिए नोएडा,अलीगढ़ और आगरा के किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया और ठेका देने के लिए कई कंपनियां आमंत्रित की गयीं।

जेपी ग्रुप ने सरकार से कहा कि वह नोएडा से आगरा तक अपने खर्चे से सड़क बना देगा। शर्त  बस इतनी है कि सरकार कंपनी को अच्छे बाजार की संभावना वाली जगहों पर प्रदेश  में पांच जगह करीब 50 हजार हेक्टेयर जमीन उसे दे, जिसका भुगतान कंपनी कर देगी। मगर कंपनी ने दूसरी शर्त  यह रखी कि सड़कों के बनने के बाद, तीस वर्षों तक टोल टैक्स जेपी ग्रुप वसूल करेगा। जनता की सरकार मायावती ने इसे जनहित में मानते हुए जेपी ग्रुप  की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं।

गौरतलब है कि यह सारी जानकारी किसानों से छिपायी गयी। जहानगढ़ गाँव के हुकुम सिंह इसे एक साजिश मानते हैं। हुकुम सिंह ने बताया कि ‘जिलाधिकारी ने सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालकर,तबादले की धमकी देकर कुछ ग्रामीणों से जमीन कब्जा वाले कागजों पर तो दस्तखत करा लिया है, मगर ज्यादातर लोगों को सरकार की यह षर्त मंजूर नहीं है।’यानी प्रशासन घोषित  कब्जेदारी के तरीकों के मुकाबले अभी तक अघोषित  ढंग ही बात मनवाने में सफल रहा है। ऐसा सरकार इसलिए कर रही है कि 2001में नोएडा एक्सप्रेस वे के लिए जिस कीमत (सवा तीन लाख रूपया बीघा) पर अधिग्रहण हुआ था, नौ साल बाद भी किसान उसी दर को स्वीकार कर लें।

किसानों के आंदोलन में शामिल राजू शर्मा  बताते हैं कि ‘सरकार की शर्त हमें मंजूर नहीं थी। इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों ने अदालत के समक्ष अपनी मांगों को रखा। जैसे,किसानों की जमीन को सरकार साढे़ सैंतालीस सौ वर्गमीटर के हिसाब से बेच रही है तो उन्हें इन जमीनों का भुगतान बेची जा रही कीमत से बीस प्रतिशत  कम करके अदा करे। दूसरी मांग यह है कि कुल जमीन का दस प्रतिषत हिस्सा विकसित कर सरकार किसानों को दे जिससे कि वे देश  के विकास में अपनी भागीदारी कर सकें। मिले हुए मुआवजे से गर किसान प्रदेश में कहीं जमीन खरीदता है तो उसे स्टांप शुल्क न देना पड़े और हर प्रभावित परिवार के सदस्य को रोजगार मिले।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन सभी मामलों के पक्ष-विपक्ष पर साल भर सुनवाई चली। किसानों को उम्मीद थी कि अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी। मगर अदालत ने 2 जुलाई को जो फैसला दिया, उससे बीस हजार आबादी वाले इन छह गांवों के लोग सकते में आ गये। राजू शर्मा बताते हैं कि ‘सरकार और जेपीग्रुप  की तरफ से पेश हो रहे वकीलों ने उच्च न्यायालय में जो बातें रखीं वे सभी हवाई साबित हुईं। जैसे किसानों की खेती योग्य जमीनों को जेपी के वकील ने बंजर बताया तो किसान उसे उपजाउ साबित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं किसानों अदालत में धारा -5ए का हवाला देते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ग्रामीणों की सहमति की सरकार ने कोई जरूरत ही नहीं समझी।

सारी सुनवाइयों के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश  सुनील अंबानी और धीरेंद्र सिंह ने तीन जिलों आगरा, नोएडा और अलीगढ़ में किसानों के विरोध के औसत के आधार पर टप्पल क्षेत्र के प्रभावितों का मुकदमा खारिज कर दिया। किसानों के वकील आषीश पांडेय ने बताया कि ‘एक ही प्रोजेक्ट के उपयोग के लिए कब्जाई गयी जमीन को आधार बनाकर अदालत ने कहा कि जब अस्सी फीसदी किसानों को कोई ऐतराज नहीं है तो बीस प्रतिशत  का क्या मतलब?’दरअसल जजों ने इन तीनों जिलों में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे विरोध और जमीन का औसत निकाला तो पाया कि टप्पल के किसानों की भागीदारी 20 प्रतिशत  है। इसी आधार पर दोनों जजों ने संयुक्त रूप से सुनवाई के दौरान मुकदमे को खारिज कर जेपी ग्रुप के पक्ष में फैसला दे दिया।

सरकार,प्रशासन और अंत में अदालती आदेश से हताश ग्रामीणों ने जीरकपुर गांव में किसान सभा के बैनर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। मगर पुलिस लोकतान्त्रिक  विरोध के इस तरीके को लगातार असफल करने में लगी हुई है। कब्जेदारी से प्रभावित होने वाले सभी गांवों में धारा 144 लगा दी गयी है जिससे कि किसान इकट्ठे होकर आंदोलन को मजबूत न बना सकें। किसान सभा के धरने में सक्रिय भूमिका निभा रहे किशन  बघेल ने बताया कि ‘इन सभी गांवों के सर्वाधिक सक्रिय और जुझारू लोगों का पुलिस ने पहले से ही मुचलका कर रखा है ताकि संगठित आवाज उठाने वालों पर कानूनी कार्रवाई कर, कानून-व्यवस्था बनाये रखने के बहाने जेलों में डाला जा सके।’ किसान सभा नेता कल्लू बघेल को पुलिस ने 29 जुलाई को देर रात में घर से उठाकर जेल में डाल दिया था।

सरकार और जेपी के मिलीभगत में फंसे ग्रामीणों ने फिर एक बार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सर्वोच्च न्यायालय के वकील रामनिवास ने किसानों की ओर से उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अर्जी डाली है। मगर अब प्रष्न यह है कि देष की आर्थिकी में बड़ी भूमिका निभाने वाले किसानों के खिलाफ सरकार मुकदमा लड़ रही है, पूंजी बटोरने में लगी कंपनियों के लिए सुविधा मुहैया कराना ही जिम्मेदारी मान चुकी है।

(द पब्लिक एजेंडा में छपी रिपोर्ट का संपादित अंश)
टिप्पणी- ग्रेटर नोएडा  से छह किलोमीटर दूर  अलीगढ  जिला  के खैर रेलवे स्टेशन की ओर पड़ने वाले इन गांवों  में  तीखा आन्दोलन चल रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि मीडिया को पुलिस ओर जेपी कंपनी  के लोग जाने नहीं दे रहे हैं. जनपक्षधर पत्रकार और मीडिया संस्थान इस मसले को जानने के लिए इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं.
 
रमेश शर्मा -  09456668041
राजू  शर्मा - 09758659590
हुकुम सिंह - 09250111634

Aug 3, 2010

अपने को अकिला फुआ न समझो चचा विभूति

अजय प्रकाश

महिला लेखिकाओं पर की गयी अपमानजनक टिप्पणी के बाद जब महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय को कहीं राहत न मिली तो उन्होंने भोजपुरी का सहारा लिया और शब्द का नया अर्थ गढ़ डाला।

बीबीसी संवाददाता दिव्या शर्मा से हुई बातचीत में विभूति नारायण राय ने कहा कि ‘मुझे अपने शब्दों का चयन गलत नहीं लगता, बल्कि महिला विमर्श  में वृहत्तर संदर्भ जुड़े हुए हैं, तो सिर्फ शरीर की बात करना सही नहीं।' उसके बाद वो बताते हैं कि ‘उनकी भाषा भोजपुरी में ‘छिनाल’ का मतलब ऐसी महिला से होता है जिसका विश्वास  न किया जा सके, न कि वो वेश्यावृति करती हो। उनके मुताबिक यह अर्थ निकालना गलत है।’

एक दूसरे मीडिया माध्यम में विभूति राय ने इस ब्द का एक अलग अर्थ बताया कि ‘छिनाल शब्द छिन्नाल से बना है। छिन्नाल का मतलब हुआ कि जिसका अपनी मिट्टी से कोई लगाव न हो।’

महिला लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहने के बाद विभूति राय ने अर्थ गढ़ने  की जो प्रक्रिया शुरू की है, उस बारे में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी में भाषा विज्ञान की पढ़ाई कर रहे छात्रों से चर्चा हुई तो उनमें से एक ने कहा- ‘कहि दो चचा विभूति को, अपने को अकिला फुआ न समझें।’

भोजपुरी क्षेत्र में बगैर सही जानकारी के, आसपास का सहारा लेकर मानद वक्तव्य की तरह फोटलचरी देने वालों को अक्सर लोग 'अकिला फुआ' कहा करते हैं.

अकिला फुआ का किस्सा कुछ यूं है कि एक धनवान युवक को गरीब घर की एक लड़की भा गयी। इस मुतल्लिक लड़के ने बात की तो मां-बाप और गांववाले सहज तैयार हो गये। लड़की गरीब थी इसलिए गहना और पहनने-ओढ़ने के साजो-सामान शादी के दिन लड़के के घर से आये, लेकिन वह पूरा गांव ही इतना दरिद्र था कि आये सामानों का क्या उपयोग होगा, कौन सा जेवर कहां पहनाया जायेगा, किसी को पता नहीं। बड़ी मशक्कत के बाद लोगों को 'अकिला फुआ' याद आयीं जो हर बात पर अपनी राय मानक की तरह रखा करती थीं और पहल दावे की तरह।

उन्होंने यहां भी दुल्हन सजाने की समस्या को दावे के साथ दूर करने की बात कही और लड़की को सजाने के लिए बुलवा भेजा। फिर क्या था, नाक का कान में, गले का पैर में, पैर का गले में, जूतिया हाथ में और पता नहीं कहां क्या-क्या पहना दिया।

अकिला फुआ की सजाई दुल्हन जब बारातियों के सामने पहुंची तो पूरे गांव की जगहंसाई हुयी और अकिला फुआ की अक्ल का अंदाजा लोगों को हुआ। इसलिए अब विभूति राय को बचने-बचाने का कोई और उपाय सोचना चाहिए।

अकिला फुआ के इकलौते ज्ञान का दौर खत्म हो चुका है और छिनाल का नया अर्थ समझाने से भोजपुरी उन्हें बचा लेगी, यह मुगालता छोड़ देना चाहिए।

गोरखपुर विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान के प्राध्यापक और पत्रकारिता विभाग के निदेशक रामदरश राय ने बताया कि ‘छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जिन्हें सामंती समाज कुल्टा, स्त्रियोचित मर्यादा भंग कर विद्रोह करने वाली या  पथभ्रष्टा कहता है। और ठीक से कहें तो वह स्त्री जो किसी की अंकशायिनी बनने के लिए तत्पर होती है उसे ‘छिनाल’ कहा जाता है। इस शब्द का दूसरा कोई अर्थ नहीं है। सामाजिक स्तर पर कभी इस शब्द का प्रयोग नहीं होता।’

देवरिया जिले के भाटपार रानी तहसील में शादियों में नाच पार्टी ले जाने वाले हैदर मियां ‘मेसर्स हैदर एंड कंपनी नाच पार्टी’ के नाम नाच कंपनी चलाते हैं। भोजपुरी  क्षेत्र की शादियों में नाच का बड़ा प्रकोप रहा है जो कि अब कम हो गया है। नहीं तो जिसके पास जितना पैसा होता है उसके यहां उतनी महंगी नाच पार्टी  आती है और ठुमकों पर गोलियां दगती हैं। हैदर मियां बताते हैं कि बबुआनों (राजपूतों) के एक गांव में शादी के बाद विदाई मांगने गये लवंडे (नाचने वाला) ने जब किसी बात पर विदाई देने वाले की बहन को हंसी-हंसी में ‘छिनार’ कह दिया तो उसने बंदूक की नाल लवंडे की सीने पर तान दिया। तो बस इसका का मतलब होता है, आप समझ जाइये।’

हैदर मियां ने जो उच्चारण किया है ‘छिनार’, वही शब्द भोजपुरी का है, छिनाल तो हिंदी का परिष्कृत है। छिनार उन बहुत कम गालियों में से एक है जिसका प्रयोग सिर्फ महिलाएं ही करती हैं। पुतकाटी, भतरकाटी, साढ़ीन, बाघिन आदि गालियों का तो स्त्रियां प्रयोग आमतौर पर करती हैं, मगर विभूती राय के शब्द का प्रयोग बहुत कम होता  है।

छिनार शब्द का परंपरागत शादी-ब्याह के आयोजनों में प्रयोग होता है, लेकिन सिर्फ स्त्रियों के बीच। शादी से ठीक पहले मटकोर के आयोजन में भाभियां अपने पति की बहनों को ये गाली देती हैं या बहनें भाभियों को। इसी तरह शादी में जब लड़के वाले खाने जाते हैं तो एक ‘गाली गीत’ होता है, ‘तोहार माई छिनार, तोहरे बहिना छिनार, दुल्हा के फुआ छिनार.....।’ यही गीत उस वक्त भी होता है जब लड़के का बड़ा भाई उसकी होने वाली पत्नी को साड़ी का चढ़ावा देने जाता है।

इसके अलावा नाच वाले जब लड़की के दरवाजे शादी की विदाई लेने जाते हैं तो लड़की के बाप को सुनाकर कुछ इस तरह से गाते हैं, ‘समधी के बीबी छिनरिया हो रामा, घुमती बदरिया। ओही बदरिया में हमरे भईया का डेरा, मारे ली तिरछी नजरिया हो रामा।’

जाहिर है छिनार या छिनाल का वही मतलब है जो संवेदनशील  समाज समझ रहा है और उसी को आधार बनाकर महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय पर कार्रवाई की मांग कर रहा है।

Aug 2, 2010

लेखक की यह भाषा नहीं !


‘जसम’ की मांग, लेखिकाओं से माफी मांगे कुलपति और संपादक

संस्कृति में प्रगतिशील  मुल्यों के वाहक संगठनों में से एक ‘जन संस्कृति मंच'ने वर्धा स्थित महात्मा गांधी हिंदी विष्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की उस टिप्पणी की सख्त आलोचना की है,जिसमें विभूति ने महिला लेखकों को ‘छिनाल’कहा है। मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण  ने मीडिया को भेजे बयान में कहा है कि स्त्री लेखन और लेखिकाओं के बारे में दिए गए असम्मानजनक वक्तव्य की ‘जसम’ घोर निंदा करता है।

जसम का मुखपत्र
यह निंदनीय बयान विभूति ने हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’के एक साक्षात्कार में दिया है। हमारी समझ से यह बयान न केवल हिंदी लेखिकाओं की गरिमा के खिलाफ है,बल्कि उसमें प्रयुक्त शब्द स्त्री के लिए भी अपमानजनक है। इतना ही नहीं बल्कि यह वक्तव्य हिंदी के स्त्री लेखन की एक सतही समझ को भी प्रदर्शित करता है। आश्चर्य यह है कि पूरे साक्षात्कार में यह वक्तव्य पैबंद की तरह अलग से दिखता है, क्योंकि बाकी कही गई बातों से उसका कोई संबंध नहीं है। अच्छा हो कि विभूति अपने वक्तव्य पर सफाई देने के बजाय उसे वापस लें और लेखिकाओं से माफी मांगे।

‘जसम’ मानता है कि ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रवींद्र कालिया अगर चाहते तो इस वक्तव्य को अपने संपादकीय अधिकार का प्रयोग कर छपने से रोक सकते थे,लेकिन उन्होंने तो इसे पत्रिका के प्रमोशन और चर्चा के लिए उपयोगी समझा। आज के बाजारवादी,उपभोक्तावादी दौर में साहित्य के हलकों में भी सनसनी की तलाश में कई संपादक,लेखक बेचैन हैं। सनसनी ग्रस्त साहित्यिक पत्रकारिता का मुख्य निशाना स्त्री लेखिकाएं हैं। रवींद्र कालिया को भी इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।

माफ़ी मांगे संपादक

मंच के मुताबिक जिन्हें स्त्री लेखन के व्यापक सरोकारों और स्त्री मुक्ति की चिंता है वे इस भाषा में बात नहीं करते। साठोत्तरी पीढ़ी के कुछ कहानीकारों ने जो स्त्री विरोधी अराजक भाषा ईजाद की,उस भाषा में न कोई मूल्यांकन संभव है और न विमर्श। जसम हिंदी की उन तमाम लेखिकाओं व प्रबुद्धजनों के साथ है जिन्होंने इस बयान पर अपना रोष व्यक्त किया है।

 

हँगामा क्यों है बरपा, गाली ही तो दी है

महिला लेखिकाओं के बारे में कुलपति वीएन राय ने अभद्रता से लबलबाती जो टिप्पणी  की थी उस पर मैत्रयी पुष्पा की प्रतिक्रिया 'वीएन राय से बड़ा लफंगा नहीं देखा'   आने के बाद अब युवा लेखिका विपिन चौधरी की टिप्पणी

विपिन चौधरी

इतना शोर क्यों है? एक पुरूष ने माहिलाओं को गाली ही तो दी है.यह तो लगभग हर झल्लाये पुरूष के मुंह से सुना जा सकता है.किसी भी महिला के चरित्र पर ऊँगली उठाना पुरूष के लिये सबसे सरल काम है। तो ऐसा क्या कह दिया विभूती नारायण राय ने। उन्होंने बस इतना किया है कि अपना नकाब खुद ही उतार दिया और अपने ही पैरों से चल कर उस पंक्ति में जा खडे हुए,जहाँ समाज के जड़ और पुरातनपंथी पुरूष खडे हैं.

विभूति  पूर्व पुलिस  अधिकारी हैं,एक विश्वविधालय के कुलपति हैं और सबसे बडी बात की वह तीन उपन्यास लिख कर साहित्यकारों की जमात में भी शामिल किये जा चुके है.इतना ही नहीं कई नामचीन पुरस्कारों के तमगे भी अपने सीने पर लगा चुके है. यानी दोहरी नहीं बल्कि उनकी समाज के प्रति तीन तरह से जिम्मेदारी बनती है।

बचपन में पढा था,विद्या विनय देती है और फल वाले वृक्ष व्  शालीन इन्सान विनम्र होकर झुक जाते हैं। पर घोर दुनियादारी में उतरते ही पता चाला कि बचपन में पढे-पढाये सारे वाक्यों पर काफी पहले से पानी पड़ा  हुआ है.विभूती नारायण सत्ता के नशे में है और पिछले काफी दिनों से यह नशा उनके सर चढ कर बोल रहा है और अब उसके मद में वे हिंदी लेखिकाओं को छिनाल कहने पर उतर आते है।

राह चलते किसी आदमी के मुँह से किसी महिला के प्रति अपमानजनक टिप्पणी सुनकर लोग जुते-चप्पल उतार लेते हैं. फिर  एक कुलपति जब महिला के लिये अपशब्द कहता है तो उसे क्योंकर बख्श दिया जाऐ? क्या सिर्फ इसीलिये की वे ऊँची कुर्सी पर हैं  या फिर उनकी पहुँच ऊपर तक है। इसी तरह से ऊँचे पायदान पर आसीन व्यक्तियों  के प्रति हमारी सरकारें और न्यायालय  तक नरम रहते हैं,जिसका फ़ायदा यह लोग उठाते हैं.ज़रा पिछले मामलों पर गौर करे तो पाएंगे की इन तथाकथित शालीन अपराधियों की सजा भी शालीन होती है.

महिलाएं जब अपने बारे में लिखती हैं तब वह इतनी जागरूक हो चुकी होती हैं कि वे जीवन के सच को समाज के सामने रख सकें.इसलिए वे साहस के साथ लिखती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुषों   की करतूतों को सरेआम करती हैं,जिससे पुरूष तिलमिला उठता है। यदि कोई औरत इस तरह के वाकये  लिखती है तो वह उसे शौकिया या सनसनी फैलाने के लिये नहीं लिखती। कहीं न कहीं वह आने वाले पीढी को जीवन के प्रति आगाह भी करती है। यहाँ मैं उन महिलाओं का जिक्र  नहीं कर रही जो पुरूष को अपने आगे बढने के लिये इस्तेमाल करती हैं.सच तो यह है कि बिना प्रतिभा के  कोई भी ज्यादा देर नहीं टिक सकता है, सबको अपनी बनाई राह पर ही चलना पड़ता है.
विभूति इस शब्द का इस्तेमाल कर समूची नारी जाति पर आरोप मढ़ते हैं.उन्होंने स्त्री पुरुष  के संबंधो के संदर्भ में महिलाओं को छिनाल कहा.तो कोई उनसे पूछे की उनके साथ वाले पुरूषों के लिये वे  शब्दकोश में से कौन सा शब्द चुनेंगें,आखिर बिस्तर पर महिला के साथ कोई न कोई तो होगा ही।

लेखिकाओं के हाथ में कलम रूपी औज़ार है जिस का इस्तेमाल करना वह  सीख गयी हैं.सदियों पुरानी पुरूष सत्ता  तले दबी हुई नारी जब लिखती है तो परत दर परत अपने को तराशती,तलाशती है.मगर  जब बेवफाई की बात आती है तो ऊँगली महिला पर उठती है.

भारी अफ़सोस है की विभूति नारायण राय को ना विद्या  विनय दे सकी,ना पुलिस का  अनुशासन ही वे ढंग से सीख सके और ना ही कुलपति जैसी शालीन कुर्सी की गरिमा को वे अपने भीतर समाहित कर सके। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति,हिंदी में लिखने वाली लेखिकाओं का पूरी दुनिया में महिमामंडन कर रहे हैं, यह संदेश देते हुए कि हमारे हिंदी में लेखिकाओं का एक तबका ऐसा है जो बेवफाई करता है  और उसे उजागर भी करती है.अपनी पहचान की कई महिलाओं के बारे में वे भीतरी तौर पर सब जानते होगें पर वे छिनाल नहीं है, छिनाल तो केवल हिंदी की लेखिकाऐं हैं  मतलब ढका छुपा  सब ठीक और सचाई प्रकट होने पर सब कुछ गलत।

कृष्णा  सोबती जब अपने उपन्यास मित्रो -मरजानी में जब अपनी शारीरिक इच्छाओं को उजागर करने वाली लड़की  की बात करती है तो उससे कोइ छिनाल नहीं कह सकता । साहित्य की एक गरिमा है उसी को ध्यान में रख कर लिखा-पढ़ा जाता है,उसी तरह साहित्य को समझने की भी एक व्यापक सोच है.पर जब सामंतवादी पुरुष नजरीये से विभूती नारायाण सोचते है तो पता लगता है की उनकी सोच का दायरा काफी तंग है.

जब हंस में कई पुरूषों ने अपनी बेवफाई उजागर की तो विभूती जी मौन क्यों रहे, तब क्यों नहीं पुरूषों की वफादरी पर उन्होनें ऊँगली ऊँठाई । अब तो उनके पुरे कार्यकाल पर संदेह होने लगा है। जिस तरह का माहौल उन्होनें अपने कुलपति बनने पर बनाया वह तो सबके सामने है ही और अब तो लगता है कि उनके ग्रहों की दशा  ही गडबडा गयी है.

Aug 1, 2010

वीएन राय से बड़ा लफंगा नहीं देखा


मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है, जो लेखन में दखल देती है।

मैत्रयी पुष्पा

महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय लेखिकाओं को ‘छिनाल’कहकर अपनी कुंठा मिटा रहे हैं और उन्हें लगता है कि लेखन से न मिली प्रसिद्धि की भरपाई वह इसी से कर लेंगे। मैं इस बारे में कुछ आगे कहूं उससे पहले ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और कुलपति वीएन राय को याद दिलाना चाहुंगी कि दोनों की बीबियां ममता कालिया और पदमा राय लेखिकाएं है,आखिर उनके ‘छिनाल’होने के बारे में महानुभावों का क्या ख्याल है।

लेखन के क्षेत्र में आने के बाद से ही लंपट छवि के धनी रहे वीएन राय ने ‘छिनाल’ शब्द का प्रयोग हिंदी लेखिकाओं के आत्मकथा लेखन के संदर्भ में की है। हिंदी में मन्नु भंडारी,प्रभा खेतान और मेरी आत्मकथा आयी है। जाहिरा तौर यह टिप्पणी हममें से ही किसी एक के बारे में की गयी, ऐसा कौन है वह तो विभूति ही जानें। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कल ऐवाने गालिब सभागार (ऐवाने गालिब) में उनसे मुलाकात के दौरान मैंने पूछा कि ‘नाम लिखने की हिम्मत क्यों न दिखा सके, तो वह करीब इस सवाल पर उसी तरह भागते नजर आये जैसे श्रोताओं के सवाल पर ऐवाने गालिब में।

मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है और लेखन में दखल देती है। यह एहसास विभूति नारायण जैसे लेखक को कभी नहीं हो सकता क्योंकि वह बुनियादी तौर पर लफंगे हैं।

मैं विभूति नारायण के गांव में होने वाले किसी कार्यक्रम में कभी नहीं गयी। उनके समकालिनों और लड़कियों से सुनती आयी हूं कि वह लफंगई में सारी नैतिकताएं ताक पर रख देता है। यहां तक कि कई दफा वर्धा भी मुझे बुलाया,लेकिन सिर्फ एक बार गयी। वह भी दो शर्तों के साथ। एक तो मैं बहुत समय नहीं लगा सकती इसलिए हवाई जहाज से आउंगी और दूसरा मैं विकास नारायण राय के साथ आउंगी जो कि विभूति का भाई और चरित्र में उससे बिल्कुल उलट है। विकास के साथ ही दिल्ली लौट आने पर विभूति ने कहा कि ‘वह आपको कबतक बचायेगा।’ सच बताउं मेरी इतनी उम्र हो गयी है फिर भी कभी विभूति पर भरोसा नहीं हुआ कि वह किसी चीज का लिहाज करता होंगे।

रही बात ‘छिनाल’ होने या न होने की तो, जब हम लेखिकाएं सामाजिक पाबंदियों और हदों को तोड़ बाहर निकले तभी से यह तोहमतें हमारे पीछे लगी हैं। अगर हमलोग इस तरह के लांछनों से डर गये होते तो आज उन दरवाजों के भीतर ही पैबस्त रहते,जहां विभूति जैसे लोग देखना चाहते हैं। छिनाल,वेश्या जैसे शब्द मर्दों के बनाये हुए हैं और हम इनकों ठेंगे पर रखते हैं।

हमें तरस आता है वर्धा विश्वविद्यालय पर जिसका वीसी एक लफंगा है और तरस आता है 'नया ज्ञानोदय' पर जो लफंगयी को प्रचारित करता है। मैंने ज्ञानपीठ के मालिक अशोक जैन को फोन कर पूछा तो उसने शर्मींदा होने की बात कही। मगर मेरा मानना है कि बात जब लिखित आ गयी हो तो कार्रवाई भी उससे कम पर हमें नहीं मंजूर है। दरअसल ज्ञोनादय के संपादक रवींद्र कालिया ने विभूति की बकवास को इसलिए नहीं संपादित किया क्योंकि ममता कालिया को विभूति ने अपने विश्वविद्यालय में नौकरी दे रखी है।

मैं साहित्य समाज और संवेदनशील लोगों से मांग करती हूं कि इस पर व्यापक स्तर पर चर्चा हो और विभूति और रवींद्र बतायें कि कौन सी लेखिकाएं ‘छिनाल’हैं। मेरा साफ मानना है कि ये लोग शिकारी हैं और शिकार हाथ न लग पाने की कुंठा मिटा रहे हैं। मेरा अनुभव है कि तमाम जोड़-जुगाड़ से भी विभूति की किताबें जब चर्चा में नहीं आ पातीं तो वह काफी गुस्से में आ जाते हैं। औरतों के बारे में उनकी यह टिप्पणी उसी का नतीजा है।
(अजय प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित)

Jul 31, 2010

कुलपति वी एन राय ने लेखिकाओं को कहा 'छिनाल'


आशुतोष भारद्वाज

नई दिल्ली, 31 जुलाई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी वीएन राय ने हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा है कि हिंदी लेखिकाओं में एक वर्ग ऐसा है जो अपने आप को बड़ा ‘छिनाल’साबित करने में लगा हुआ है। उनके इस बयान की हिंदी की कई प्रमुख लेखिकाओं ने आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है।

भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘नारीवाद का विमर्श अब बेवफाई के बड़े महोत्सव में बदल गया है।’भारतीय पुलिस सेवा 1975बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी वीएन राय को 2008 में हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। इस केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना केंद्र सरकार ने हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए की थी।

हिंदी की कुछ प्रमुख लेखिकाओं ने वीएन राय को सत्ता के मद में चूर बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। मशहूर लेखक कृण्णा सोबती ने कहा,‘अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो,यह न केवल महिलाओं का अपमान है बल्कि हमारे संविधान का उल्लंघन भी है। सरकार को उन्हें तत्काल बर्खास्त करना चाहिए।’

‘नया ज्ञानोदय’ को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘लेखिकाओं में यह साबित करने की होड़ लगी है कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है...यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है।’ एक लेखिका की आत्मकथा,जिसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं,का अपमानजनक संदर्भ देते हुए राय कहते हैं,‘मुझे लगता है इधर प्रकाशित एक बहु प्रचारित-प्रसारित लेखिका की आत्मकथात्मक पुस्तक का शीर्षक हो सकता था ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’।’

वीएन राय से जब यह पूछा गया कि उनका इशारा किस लेखिका की ओर है तो उन्होंने हंसते हुए अपनी पूरी बात दोहराई और कहा,‘यहां किसी का नाम लेना उचित नहीं है लेकिन आप सबसे बड़ी छिनाल साबित करने की प्रवृत्ति को देख सकते हैं। यह प्रवृत्ति लेखिकाओं में तेजी से बढ़ रही है। ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’का संदर्भ आप उनके काम में देख सकते हैं।’

वीएन राय के इस बयान पर हिंदी की मशहूर लेखिका और कई पुरस्कारों से सम्मानित मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं,‘राय का बयान पुरुषों की उस मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो पहले नई लेखिकाओं का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और नाकाम रहने पर उन्हें बदनाम करते हैं।’ वे कहती हैं, ‘ये वे लोग हैं जो अपनी पवित्रता की दुहाई देते हुए नहीं थकते हैं।’पुष्पा कहती हैं,‘क्या वे अपनी छात्रा के लिए इसी विशेषण का इस्तेमाल कर सकते हैं?राय की पत्नी खुद एक लेखिका हैं। क्या वह उनके बारे में भी ऐसा ही कहेंगे।’पुष्पा,वीएन राय जैसे लोगों को लाइलाज बताते हुए कहती हैं कि सरकार को उनपर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाना चाहिए।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति के इस बयान को ‘घोर आपराधिक’करार देते हुए ‘शलाका सम्मान’ से सम्मानित मन्नू भंडारी कहती हैं,‘वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी एक सिपाही की तरह व्यवहार कर रहा है।’वे कहती हैं कि वे एक कुलपति से वे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं कर सकती हैं। भंडारी कहती हैं,‘हम महिला लेखकों को नारायण जैसे लोगों से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है.'
(जनसत्ता से साभार)