Jul 31, 2010

हंस की गोष्ठी रही हंगामेदार, मंच से भागे वीसी वीएन राय


सवालों से घबराये आलोक मेहता को नहीं सूझा जवाब,अग्निवेश को आजाद की हत्या का दोषी  बताया.

हिंदी की साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘हंस’के पचीसवें वर्ष  में प्रवेश  के मौके पर दिल्ली के ऐवाने गालिब सभागार में आयोजित गोष्ठी वैचारिक स्तर पर काफी हंगामेदार रही।

माओवादियों और सरकार के बीच वार्ता की मध्यस्थता कराने में असफल रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने कहा कि मेरी अभी भी चाहत है कि संघर्ष का अंत हो और समाधान ‘गोली से नहीं,बोली से निकले’। मगर पिछले दो जुलाई को आंध्र प्रदेश  के अदिलाबाद के जंगलों माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय  प्रवक्ता आजाद और उनके साथ पत्रकार हेमचन्द्र पांडे की हत्या के बाद साफ हो गया है कि सरकार वार्ता नहीं चाहती। अग्निवेश ने उन अखबारों की पक्षधरता पर भी सवाल उठाया जिन्होंने हेमचन्द्र पांडे को अपने अखबार में लिखने वाला पत्रकार मानने से इनकार किया था.

गौरतलब है कि हेमचन्द्र पांडे राष्ट्रीय सहारा,नई दुनिया और दैनिक जागरण में लेख लिखते थे। मगर उनकी हत्या के बाद इन तीनों अखबारों ने साफ इनकार कर दिया कि हेमचन्द्र पांडे  उर्फ हेमंत पांडे ने कभी उनके यहां लिखा ही नहीं। अपने वक्तव्य के दौरान जैसे ही अग्निवेश ने 'नई दुनिया' का नाम लिया, श्रोताओं ने कार्यक्रम में बैठे 'नई दुनिया' के संपादक से जवाब  चाहा और ‘आलोक मेहता शर्म करो’ के स्वर उठने लगे।

इन आरोपों से बौखलाए 'नई दुनिया' के संपादक ने अपने ही अखबार के राजनीतिक संपादक विनोद अग्निहोत्री से मंच पर एक चिट भिजवाकर अपना पक्ष रखने की इच्छा जतायी। मौका मिलने पर मंच की तरफ बढ़े आलोक मेहता के कदम मंच तक पहुंचते, उससे पहले ही ‘पद्मश्री अब राज्यसभा’की आवाजें उनतक पहुंची। बौद्धिक समाज में अबतक इज्जत पाते रहे आलोक मेहता को श्रोताओं का यह रवैया नागवार गुजरा और उन्होंने इसका दोषी संयोग से अग्निवेश को मान लिया। फिर क्या था आलोक मेहता ने  न आव देखा न ताव,माओवादी प्रवक्ता आजाद की हत्या के लिए सीधे तौर पर अग्निवेश को ही जिम्मेदार बता दिया। आलोक मेहता ने कहा कि ‘यह भी राजनीति में रहे हैं क्या इनको इतनी भी समझ नहीं थी कि सरकार क्या कर सकती है। क्या जरूरत थी पत्र लेने-देने की। एक निर्दोष  आदमी को मरवा दिया।’

आलोक मेहता का इतना कहना था कि पत्रकारों-साहित्यकारों और छात्रों से भरा ऐवाने गालिब सभागार उबल पड़ा और लोग पूछ बैठे कि अदिलाबाद की हत्याओं के लिए आप अग्निवेश को जिम्मेदार मानते हैं? दूसरी बात यह जब आपको पता चल गया कि हेमचन्द्र पांडे ही हेमंत पांडे है तो,क्या आपने अखबार में इस बाबत कोई सफाई छापी?
हे भगवान! गिर गया है स्तरइन दोनों सवालों पर जवाब न बनता देख पहले तो आलोक मेहता ने डपटने के अंदाज में लोगों को चुप कराने की कोशिश  की।असफल रहे तो  बड़ी तेजी में श्रोताओं को भला-बुरा कहते हुए कार्यक्रम से निकल लिये। जवाब दिये बगैर उनको सभा से जाते देख श्रोता उनके पीछे हो लिये। मगर जब उन्होंने जवाब देने से इनकार कर दिया तो ‘आलोक मेहता सत्ता की दलाली बंद करो','आलोक मेहता मुर्दाबाद'और 'शर्म करो-शर्म करो’से उनकी अप्रत्याशित  विदाई हुई। इस  सबके बीच उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि ‘पत्रकारिता का स्तर बहुत गिर चुका है।’

फिर भी अभी लोग हॉल में थे। संचालक आनंद प्रधान ने जैसे ही श्रोताओं को सवाल पूछने के लिए आमंत्रित किया वैसे ही मंच और कुर्सियों के बीच से कुलपति विभूति नारायण राय सरकते हुए नजर आये। सवालों और हंगामे के बीच जबतक लोगों की निगाह विभूति पर पड़ती वह आगे निकल चुके थे और भारत भारद्वाज उनको सुरक्षित निकालने के प्रयास में लगे हुए थे।
भारत भारद्वाज की वफादारी
ऐवाने गालिब के लॉन में विभूति नारायण से पत्रकारों ने कहा कि जो बातें आपने कहीं हैं,उनको लेकर हमारे भी कुछ सवाल हैं,जिसके जवाब आपको देने चाहिए। पत्रकारों ने उनसे आग्रह भी किया कि हमने आपको सुना अब आप हमारी सुनें और जवाब दें।

इसी बीच संयोग से विभूति नारायण पुलिसिया रोब में आ गये और जवाब देने से मना कर दिया. फिर क्या था, उनकी जो फजीहत हुई कि वीसी साहब को बकायदा भागना पड़ा। 'विभूति कुछ तो शर्म करो,सत्ता की दलाली बंद करो' नारे के साथ श्रोता उनको दसियों मिनट तक लॉन में रोके रहे और वे लगातार यहां से निकलने के प्रयास में लगे रहे। इतना ही नहीं उस समय वीसी के सुरक्षा गार्ड की भूमिका में आ चुके और कुछ ज्यादे ही आगे पीछे हो रहे भारत भारद्वाज को डांट भी खानी पड़ी ‘सटअप योर माउथ,हु इज यू।’दरअसल भारत भारद्वाज काफी तेजी से पत्रकारों पर बड़बड़ा रहे थे।

विचार की हिंसा "मार्क्सवाद"
पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने गोष्ठी का विषय ‘वैदिकी हिंसा,हिंसा न भवति’को स्पष्ट  करते हुए कार्यक्रम की शुरूआत में बताया कि आज हमलोग राजसत्ता,धर्म और विचार की हिंसा पर बातचीत करेंगे। राजेंद्र यादव ने कहा कि राजसत्ता वर्तमान को बरकरार रखने के लिए,धर्म अतीत के लिए और विचार भविष्य  की सत्ता के लिए हिंसा को जायज ठहराता है। जाहिरा तौर पर विचार की हिंसा मार्क्सवाद ही है। आज हमलोग इन मसलों पर गहन और जोरदार बातचीत करेंगे।

नक्सली आदिवासियों के
गोष्ठी में दूसरी वक्ता के तौर पर बोलने आयीं छत्तीसगढ़ में पत्रकार रह चुकीं इरा झा ने कहा कि बस्तर में नक्सलवाद से बड़ा सवाल इंसानियत और बुनियादी अधिकारों की रक्षा का रहा है। मैने वहां पत्रकारिता के दौरान देखा है कि किस तरह पुलिस वहां के आदिवासियों पर अत्याचार किया करती थी। इरा झा ने ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार पर भरोसा या कहें कि शहरी मानुशों पर ऐतबार तो आदिवासियों ने 1962के बाद ही छोड़ दिया था जब पुलिस ने तेईस  आदिवासियों की नृशंशता  से हत्या कर दी थी। उसके बाद उस क्षेत्र के राजा प्रवीर  सिंह भजदेव  ने सरकार की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया तो1966में उनकी भी हत्या कर दी गयी। सन् 1966के बाद अब ऐसा पहली बार हो पाया है कि आदिवासी नक्सलियों के माध्यम से यह जान पाये हैं कि उनका भी कोई अधिकार है।

मंच संचालन कर रहे पत्रकार आनंद प्रधान ने तीसरे वक्ता के तौर पर जब विभूति नारायण को बुलाया तो उन्होंने आते ही कहा कि ‘मेरा नाम वक्ताओं में नहीं था,मगर विश्वरंजन  के नहीं आने पर राजेंद्र यादव ने मेरा इस्तेमाल स्टेपनी के तौर पर किया है। मैं पूरे तौर पर विश्वरंजन का पक्ष नहीं रखूंगा,लेकिन उनसे विरोध का भी मामला नहीं है।’यह बात विभूति को इसलिए कहनी पड़ी क्योंकि छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन को राजेंद्र यादव बुलाने वाले थे। मगर पत्रकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के व्यापक विरोध की वजह से बुला पाने में असफल रहे।

राजकीय आतंकवाद बेहतर
विभूति ने कहा हमलोग अतिरंजना में जीते हैं इसलिए हम मान लेते हैं कि सरकार तानाशाह हो गयी है। अब अगर कोइ विश्वरंजन  के आने पर उन्हें जूते की माला पहनाता तोवह पैदल तो नहीं आते, मगर ऐसा भी नहीं है कि सरकार के विरोध में बोलने वालों को प्रसाशन  उठाकर जेलों में ठूस रहा है। इन सारी हिदायतों के पूर्व पुलिस अधिकारी ने अपनी बात के अंत में कहा कि कोई भी राजसत्ता कभी भी सशसत्र  आंदोलन को नहीं बर्दाश्त   कर सकती। उन्होंने कहा कि कश्मीर  में इस्लामिक आतंकवाद के मुकाबले राजकीय आतंकवाद बेहतर है,क्योंकि हम इस्लामिक आतंकवाद से कभी मुक्त नहीं हो सकते। कार्यक्रम में सवालों से पीछा छुड़ाकर भागे और एक पार्टी में पहुंचे वीएन राय ने गोष्ठी का अनुभव कुछ साझा किया -'कुछ माओवादी टाइप छात्र वहां हंगामा करने लगे.'वीएन राय कि प्रतिक्रिया सुनने वालों ने महसूस किया कि वीएन राय बेहद घबराये हुए थे और उनकी घबराहट को भारत भारद्वाज दूर करने में लगे हुए थे.



जनतांत्रिक मूल्यों का हनन
वहीं वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने सरकार के विकास के ढांचे पर सवाल उठाया और कहा कि विकास कैसा और किसके लिए हो,यह प्रश्न  सबसे महत्वपूर्ण है। जब सरकार खुद ही जनतांत्रिक मूल्यों का हनन कर रही है तो माओवादियों को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है। समाजविज्ञानी सत्र को रेखांकित करते हुए रामशरण जोशी ने कहा कि ‘जब किसान हथियार उठाता है तो वह मानवता की निशानी  है।’



Jul 30, 2010

लेखक भी हत्यारों के साझीदार हुए ?


अच्युतानंद मिश्र

क्या राजेंद्र यादव सचमुच चाहते थे कि माओवाद को लेकर सार्थक बहस हो.यह बात गले नहीं उतरती. ऐसा इसलिए कि राजेंद्र यादव 'हंस'के संपादक भी हैं.अगर सचमुच वे चाहते थे कि इस मुद्दे पर बहस हो तो वे पत्रिका के माध्यम से भी बहस चला सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि वह उनका पक्ष नहीं था.दूसरी बात संपादकीय लिखने मात्र से ही संपादक का पक्ष उजागर नहीं होता,वह उस सामग्री से भी जाहिर होता है जिसे वह छापता है.और इस अर्थ में तो राजेंद्र यादव के पक्ष से सभी वाकिफ हैं, जो वाकिफ न भी हों वे 'हंस' के कुछ अंक देखकर वाकिफ हो सकते हैं.

मुखौटों में दर्शन.                                         तहलका से साभार.
राजेंद्र यादव जैसे लोग साहित्य की  चर्चा में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.आज साहित्य में अगर इस तरह की परम्परा बनी है कि लेखक एक दूसरे की प्रसंशा ही लिखते हैं,तो मत भूलिए की इस परम्परा के संस्थापकों में से एक राजेंद्र यादव भी हैं.नई कहानी के दौर में 'मेरा हमदम मेरा दोस्त'नाम से जो कॉलम लिखा गया था उसमें नयी कहानी की त्रयी राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर ने पहले ही तय कर रखा था कि वे एक दूसरे को उठाने के लिए ही लिखेंगे. कहना बस इतना है कि राजेंद्र जी साहित्य में इन मूल्यों को लेकर आये थे.


जहाँ तक बहस का प्रश्न है तो बहस किसके बीच होगी,यह तय कौन करेगा ?क्या वास्तव में विश्वरंजन से कोई सार्थक बहस हो सकती थी.अगर विश्वरंजन यह तय कर पाते कि उनका पक्ष गलत है तो क्या उनके कहने पर सरकार दमन छोड़ देती ?जहाँ तक लोकतान्त्रिक मूल्यों का सवाल है तो क्या सरकार की आस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों में बची हुई है ?अगर ऐसा होता तो जेएनयू से बहस से लौटने के बाद गृहमंत्री पी चिदंबरम के मंत्रालय ने बयान नहीं जारी  किया होता कि जो भी पत्रकार,बुद्धिजीवी या एनजीओ  माओवादियों का किसी भी तरह से समर्थन करेगा उसे दस वर्ष की कैद और आर्थिक दंड हो सकता है. 

जिस सरकार की आस्था किसी लोकतान्त्रिक परम्परा में न रही हो उस सरकार के एक छोटे से पुर्जे से बहस कर क्या उम्मीद पाली जा सकती है ? क्या राजेंद्र जी इतने भोले हैं कि वे इस बात को नहीं समझ पा रहे थे ? जाहिर है ऐसा नहीं है.राजेंद्र जी का शातिरपन तो जगजाहिर है. हकीकत में राजेंद्र जी चाहते थे की इसी बहाने उनकी चर्चा हो और वे ख़बरों में बने रहें.

हत्यारों के साझीदार हुए लेखक ?
क्या नई कहानी के दौर का एक संवेदनशील लेखक इतना असंवेदनशील हो सकता है कि वह हत्याओं के इस चरम अमानवीय दौर में अपनी चर्चा के लिए परेशान हो?क्या हम इस हद तक जा सकते हैं.मुक्तिबोध से शब्द उधार लें तो प्रश्न बेहद गंभीर.हत्याओं के इस दौर में लेखक,कलाकार अगर हत्यारों के साथ चाय पियें या तस्वीरें खिचवाएं तो उनका पक्ष जाहिर होता है. बकौल रघुवीर सहाय 'लेखक क्या हत्यारों के साझीदार हुए.'


 

Jul 29, 2010

शास्त्रार्थ शास्त्रियों में होता है, बधिक से नहीं


हंस के सालाना जलसे में अरुंधती राय के न शामिल होने को लेकर  राजेंद्र यादव का पक्ष 'आखिरकार मठ से ही गरजे बाबा' अब सार्वजानिक हो चुका है. साहित्य में सरोकार को लेकर चली इस बहस में हिंदी के साहित्यकार नीलाभ  ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है,खासकर तब जबकि इस मसले पर हिंदी का साहित्य जगत कानाफूसी और ठकुरसुहाती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को ही महवपूर्ण मानता हो.

एक बार फिर नीलाभ ने साहित्य के सरोकार पर कुछ तल्ख़ बातें कहीं हैं, जिसका सीधा ताल्लुक हमारे समय और समाज से है. हर रोज इस मसले पर तमाशा देखने के अंदाज़ में दूर बैठे गपियाने वाले संवेनशील साहित्कारों से,जनज्वार अपील करता है कि वह सामने आयें और रणहो-पुतहो के इंतज़ार में समय न जाया करें.यह हमारे समय के महत्वपूर्ण सवालों में से एक है,इसलिए बहस में जनपक्षधर साहित्यकारों को हम आमंत्रित करते हैं..........

नीलाभ

लेकिन ये प्रदूषित वर्ष हैं, हमारे;

दूर मारे गये आदमियों का ख़ून उछलता है लहरों में,
लहरें रंग देती हैं हमें, छींटे पड़ते हैं चांद पर.
दूर के ये अज़ाब हमारे हैं और उत्पीड़ितों के लिए संघर्ष
मेरे स्वभाव की एक कठोर शिरा है.

शायद यह लड़ाई गुज़र जायेगी दूसरी लड़ाइयों की तरह
जिन्होंने हमें बांटे रखा, हमें मरा हुआ,हुई,
हत्यारों के साथ हमारी हत्या करती हुई,
लेकिन इस समय की शर्मिन्दगी छूती है
अपनी जलती हुई उंगलियों से हमारे चेहरे,
कौन मिटायेगा निर्दोषों की हत्या में छुपी क्रूरता ?

--पाब्लो नेरुदा


आख़िरकार जैसा कि अंग्रेज़ी में कहते हैं बिल्ली बैग से बाहर आ ही गयी.हंस के सालाना जलसे पर सम्पादक राजेन्द्र जी ने ख़ामोशी तोड़ कर अपनी ओर से एक स्पष्टीकरण दे ही डाला.ऐसा लगता है कि बहस का राग अलापने वाले राजेन्द्र जी ख़ुद बहस में तभी उतरते हैं जब उन्हें यक़ीन हो जाता है कि उनकी ओर से मोर्चा संभालने वाले सिपहसालार नाकाम साबित हुए हैं या फिर उन्हें लगता है कि आख़िरी वार करने का अवसर अब उन्हीं के हाथ में है.वरना हंस के सालाना जलसे पर जिन्हें ऐतराज़ था वे तो अपनी बात कभी के कह चुके थे. लेकिन सम्भव है राजेन्द्र जी को लगा हो कि ब्लॉग के महारथी हमारे प्यारे साथी अविनाश जी और राजेन्द्र जी के बग़लबच्चे समरेन्द्र बहादुर शायद सफल नहीं हुए,लिहाज़ा हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के भीष्म पितामह को अन्तत: मैदान में उतरना ही पड़ा है.

का करूँ हाय उन्हें मौका मिल गया
लेकिन अपने पक्ष को किसी भी तरह सही साबित करने की फ़िक्र में अपने सम्पाद्कीय में राजेन्द्र जी ने दो बुनियादी चूकें की हैं.पहली चूक सैद्धान्तिक है. वे लिखते हैं --"हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्‍वास करता रहा है। हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है। वह प्रवचन होता है। जब तक प्रतिपक्ष न हो, उसे बहस का नाम देना भी गलत है। हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्‍सेदारी दी है। जब भारतीयता की अवधारणा पर गोष्‍ठी हुई,तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था। अब इस बार सोचा था कि क्‍यों न प्रतिपक्ष के लिए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍व रंजन को आमंत्रित किया जाए।"

ठीक बात है,बहस तो दो अलग-अलग विचारों वाले लोगों में ही होती है. लेकिन ऐसा लगता है कि राजेन्द्र जी बहस को भी उसी कोटि में रखते हैं जिस कोटि में साहित्य को "काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धी मताम"वाले लोग रखते थे.यानी उमस से बेहाल मौसम में कुछ चपकलश हो जाये.वरना ये विश्वरन्जन कहां के सिद्धान्तकार ठहरे ?वे सरकार के पुलिसिआ तन्त्र का एक पुर्ज़ा हैं,जिन्हें पूरी मुस्तैदी से अपना फ़र्ज़ निभाना है,कोई सिद्धान्त नहीं बघारना.अलबत्ता बहस सही मानी में बहस तब होती जब मौजूदा सरकार के नीति-निर्धारकों या उनके प्रवक्ताओं-पैरोकारों में से किसी को राजेन्द्र जी बुलाते.पर उनका इरादा तो सनसनी पैदा करना था,मौजूदा रक्तपात में किसी सक्रिय हस्तक्षेप की सम्भावनाएं तलाश करना नहीं.क्या राजेन्द्र जी का ख़याल था कि हंस की गोष्ठी के बाद विश्वरंजन शस्त्र समर्पण करके रक्तपात से उपराम हो जाते ?या अरुन्धती यह मान लेती कि छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में लड़ रहे लोगों का रास्ता ग़लत है ?इस तरह की अपेक्षाओं के साथ जिन बहसों की योजना बनती है वह बौद्धिक विलास नहीं है तो और क्या है ?

रही बात शास्त्रार्थ की पुरानी परम्परा की दुहाई देने की,तो राजेन्द्र जी यह कैसे भूल गये कि शास्त्रार्थ शास्त्रियों में होता है. हमारी नज़र में तो ऐसा कोई शस्त्रार्थ नहीं आया जिसमें एक ओर शास्त्री हो, दूसरी ओर बधिक, ख़्वाह वह कविता ही क्यों न लिखता हो.हां,एक उदाहरण ज़रूर है जब शास्त्री पराजित होने के कगार पर पहुंच कर बधिक बनने पर उतारू हो गया था और जिस शास्त्रार्थ ने शास्त्रार्थ नामक इस सत्ता विमर्श की सारी पोल पट्टी खोल कर रख दी थी.पाठक गण याग्यवल्क्य-गार्गी सम्वाद को याद करें जिस में गार्गी द्वारा अपने सारे तर्कों के खण्डन के बाद याग्यवल्क्य ने गार्गी को सीधे-सीधे धमकी दी थी कि इस से आगे प्रश्न करने पर तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा. तो यह तो है शास्त्रार्थ की वो पुरानी परम्परा.

अब राजेन्द्र जी का झूठ ! क्षमा कीजिये इसे और कोई नाम देना सम्भव नहीं है. राजेन्द्र जी कहते हैं और मैं उन्हीं को उद्धृत कर रहा हूं -- "हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों, नाराजगियों, शिकायतों या अन्‍य भड़ासों का खुला मंच है। वक्‍ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज विष्‍ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्‍कारते हुए कि हम बस्‍तर क्षेत्र के हत्‍यारे पुलिस डीजी और अरुंधती को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं।"

पंकज बिष्ट: सवाल यहीं से
झूठ इसमें यह है कि नामों पर विचार ही नहीं हो रहा था,बल्कि वे फ़ाइनल हो चुके थे.अगर ऐसा न होता तो पंकज बिष्ट अपने समयान्तर में ऐसा लेख क्यों लिखते भला. यही नहीं,जब मैंने राजेन्द्र जी से पूछा था कि यह आप क्या कर रहे हैं तो उन्होंने एक बार भी यह नहीं कहा कि अभी कुछ भी अन्तिम रूप से तय नहीं हुआ है. बल्कि वे तो सारा समय मुझसे वैसी ही कजबहसी करते रहे जैसी उन्हों ने अपने सम्पाद्कीय में की है. लेकिन इसका मलाल क्या. यह उनका पुराना वतीरा है. यह तो अरुन्धती ने भंड़ेर कर दिया और राजेन्द्र जी -मुहावरे की ज़बान में कहें तो -डिफ़ेन्सिव में चले गये वरना वे भी नामवर जी,खगेन्द्र ठाकुर,आलोकधन्वा और अरुण कमल की तरह विश्वरंजन की बग़ल में सुशोभित हो कर धन्य-धन्य हो रहे होते और बहस का पुण्य लाभ कर रहे होते. सो वे यह न कहें कि अभी नामों पर विचार ही हो रहा था.

राजेन्द्र जी ने मुझसे सीधे सवाल पूछा है कि क्या मैं उनका पक्ष नहीं जानता.वे लिखते हैं -"दिल्‍ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नीलाभ ने भी "वंदना के इन सुरों में एक सुरा मेरा मिला लो" के भाव से एक लेख पेल डाला। इसमें उन्‍होंने पूछा कि मैं किधर हूं, यह मैंने कभी साफ नहीं किया। जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों, उन्‍हें क्‍या जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें।"

हंस का जुलाई अंक मैं ने अभी नहीं देखा लेकिन मैं राजेन्द्र जी का पक्ष बख़ूबी जानता हूं. इसीलिए यह भी जानता हूं कि माओवादियों की ओर से शान्ति प्रक्रिया को संचालित करने वाले कॉमरेड आज़ाद और तीस वर्षीय युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्देय की जो निर्मम हत्या फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में पुलिस ने की है उस पर पिछ्ले एक महीने के दौरान जो बैठकें हुई हैं उनमें राजेन्द्र जी क्यों नज़र नहीं आये.हम उनसे यह नहीं कहते कि वे बहस न करें,ज़रूर करें पर अगर वह बहस हमें सम्वेदनहीन कर रही हो या ज़रूरी कामों से भटका रही हो तब हमें ऐसी बहस पर लानत भेजने का साहस होना चाहिए भले ही ऐसा करने पर हंस सम्पादक हमें फ़ासिस्ट ही क्यों न कहें.हम अच्छी तरह जानते हैं कि वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति वाले विमर्श में राजेन्द्र जी का पक्ष क्या है.

चलते चलाते एक बात और. राजेन्द्र जी ने ब्लॉग  वालों को गालियां देते हुए इस बात पर चुप्पी साध ली है कि ख़ुद उन्होंने इस विवाद को बढ़ाने में एक नहीं दो ब्लौगों की मदद ली है.पर क्या करें जब पाठकों ने इन ब्लौग वालों को ही राजेन्द्र जी का दलाल कहना शुरू कर दिया.

अन्त में यह कि हंस की परम्परा का ज़िक्र करते हुए राजेन्द्र जी उसके संस्थापक प्रेमचन्द का उल्लेख ज़रूर करते हैं.अगर प्रेमचन्द ऐसे गोष्ठी करते तो क्या वे एक ओर क्रान्तिकारियों के समर्थक गणेश शंकर विद्यार्थी और दूसरी ओर जनरल डायर को बुलाते ?


Jul 28, 2010

आखिरकार मठ से ही गरजे बाबा


पहले हत्यारों की गवाहियां अभी बाकी हैं राजेंद्र बाबू?  ,मिट्टी में मिलाने में क्यों तुले हैं आप? , फिर मर गया देश,अरे, जीवित रह गये तुम  , और  'अरुंधती ने भेजा जवाब,नहीं जाएँगी हंस के सालाना जलसे में ' ,के बाद बहुतों ने फोन कर,कुछ ने मिलकर और इन्टरनेट के जरिये भी हमें राय दी,मित्रवत कहा और बात नहीं बनी तो उकसाया और गालियाँ दी.मगर जनज्वार की टीम इस बात पर सहमत रही कि अगर हंस के सालाना जलसे पर उठे सवालों से,राजेंद्र यादव को ऐतराज़ है तो वह अपना पक्ष उन सभी माध्यमों से दर्ज करा सकते हैं जिसके वो खुद आदी हैं.यही बात लेखकीय परम्परा में हम पर भी लागू  होती है.यानी वह जरिया पत्र,ईमेल,फ़ोन या कोई और भी माध्यम हो सकता है.

इसके लिए उनके दर पर जाना जरूरी है,यह मानना हमारे लेखकीय स्वाभिमान के खिलाफ है.हमने तय किया कि हंस के जलसे से पहले राजेंद्र यादव से कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं करेंगे,क्योंकि यह मुलाकात उनका पक्ष जानने से ज्यादा मठ पर माथा टेकने के रिवाज़ के करीब है.राजेंद्र यादव के जवाबी अनुभवों से परिचित लोगों ने कहा भी था कि बाबा मठ से ही गरजेंगे.और वह गरजे भी.राजेंद्र यादव ने हंस के अगस्त अंक में सम्पादकीय के तीसरे पन्ने पर हंस के सालाना जलसे में लेखिका अरुंधती राय और छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन को एक साथ न बुला पाने की पीड़ा को कुछ इस तरह दर्ज कराया है ..........राजेंद्र यादव की राय आने बाद जनज्वार इस मसले को और व्यापक दायरे में लाने की कोशिश करेगा.....जनज्वार टीम

 राजेंद्र यादव

इकत्तीस जुलाई को होने वाली हंस की गोष्‍ठी का विषय निर्धारित किया गया था :वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति.यह सूत्र नर बलि इत्‍यादि को जायज ठहराने के लिए ब्राह्मणों ने खोजा था.अर्थ था,वेद यानी सत्ता (अथॉरिटी)द्वारा अनुमोदित हिंसा हिंसा नहीं कहलाती.यह सत्ता राज्‍य की भी हो सकती है और स्‍थापित राज्‍य के खिलाफ वैचारिक प्रतिबद्धता की भी. सरकारी दमन और नक्‍सली संघर्ष कुछ इसी प्रकार की हिंसाएं हैं.


ऐसा करम करो ना भाई, परछाई ही करण लगे हंसाई
हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्‍वास करता रहा है.हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है.वह प्रवचन होता है.जब तक प्रतिपक्ष न हो,उसे बहस का नाम देना भी गलत है.हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्‍सेदारी दी है.जब 'भारतीयता की अवधारणा'पर गोष्‍ठी हुई,तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था.इस बार सोचा था कि क्‍यों न प्रतिपक्ष के लिए रायपुर के के डीजीपी विश्‍वरंजन को आमंत्रित किया जाए.पक्ष की ओर से अरुंधती और अन्‍य तो होंगे ही.

हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों,नाराजगियों, शिकायतों या अन्‍य भड़ासों का खुला मंच है. वक्‍ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज बिष्ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्‍कारते हुए कहा कि हम बस्‍तर क्षेत्र के हत्‍यारे पुलिस डीजी और अरुंधती राय को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं.

ब्‍लॉग वालों को छद्म विवादों के लिए ऐसे ही मुद्दों की तलाश रहती है.दो पत्रकारों ने इस पर लंबी बहस छेड़ दी और विश्‍व रंजन जैसे काफिर के साथ अरुंधती जैसी निरीह को एक मंच पर लाने के लिए हमारी लानत-मलामत कर डाली.दिल्‍ली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर नीलाभ ने भी 'वंदना के इन सुरों में एक सुर मेरा मिला लो' के भाव से एक लेख पेल डाला.इसमें उन्‍होंने पूछा कि मैं किधर हूं,यह मैंने कभी साफ नहीं किया.जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों,उन्‍हें क्यों  जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें.

 हमारी मंशा इस ज्‍वलंत मुद्दे के अनेक पक्षों पर खुल कर बात करने की ही रही है. अगर इसे सिर्फ 'सहमतों का प्रस्‍ताव पारित'करने का संवाद ही बनाना है तो बात दूसरी है.मैं मित्रों से अनुरोध करता हूं कि वे कोई दूसरा विकल्‍प बताएं. लगता है अब यह विवाद और जगहों पर भी चलेगा।सबसे पहले तो मैं स्‍पष्‍ट कर दूं कि वक्‍ताओं के नाम तब तक चुने जा रहे थे,फाइनल नहीं थे. दूसरे यह कि बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं. यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है.

'मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा.'यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का.दूसरे को बोलने ही न दो,यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि 'दुश्‍मन' के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है.आप किसी भी विषय पर बात कीजिए,वे तर्क देंगे कि जब मुंबई-पंजाब में बाढ़ ने तबाही मचा रखी हो, बस्‍तर के आदिवासियों का कत्‍लेआम जारी हो, खाप पंचायतें चुन-चुनकर युवाओं को फांसी पर लटका रही हों,किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों,तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं –यह भयानक देशद्रोह है और भर्त्‍सनीय है.

इस बाजारू वाग्‍जाल के हिसाब से तो कोई भी बौद्धिक,साहित्यिक या सांस्‍कृतिक उपक्रम ऐय्याशी ही नहीं, मानव-द्रोह है. क्‍या यह हर बौद्धिक विचार-विमर्श को खारिज कर देने की साजिश नहीं है?

हमें इस माहौल में बैठकर सोचना है कि किसी भी विचार-विमर्श की उपयोगिता या जरूरत ही क्‍यों है?जब तक सारी दुनिया में अमन-चैन न हो जाए, तब तक क्‍या सारे वैचारिक, सांस्‍कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम तालिबानी सख्‍ती से बंद कर दिये जाने चाहिए? वैसे शायद उन्‍हें याद दिलाना जरूरी है कि शास्‍त्रार्थ की परंपरा हमारे यहां बहुत पुरानी है,जहां विभिन्‍न विश्‍वासों और धर्मों के लोग खुलकर एक ही मंच पर अपने अपने पक्ष रखते थे.ईसाइयों और मुसलमानों से आर्य समाजियों के शास्‍त्रार्थ दूसरे महायुद्ध से पहले तक चलते रहे हैं.

बहरहाल, इन अफवाहों से अरुंधती राय जैसों को जो असमंजस हुआ, उसके लिए हमें खेद है.
(हंस से साभार)

साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत में चुप्पी क्यों है?


कार्यकर्त्ताओं के साथ किये गये अमानवीय कुकृत्य परिवार के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया और सिद्वान्तों को पैर की जूती बना देना--जघन्य आपराधिक व सामन्ती मानसिकता का द्योतक है,जो फासीवादी राजनीतिक प्रवर्ग ही हैं।

आदेश सिंह, प्रकाशक- आह्वान कैम्पस टाईम्स

जनज्वार में कामरेड अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के निमंत्रण पत्र पर डॉं विवेक कुमार की प्रतिक्रिया से शुरू हुई बहस को लगातार देखता रहा.दरअसल यह विचारधारात्मक विपथगमन ही है. लेकिन इसका कैनवास बेहद बड़ा और गहरा है।

अतिवामपंथ और संशोधनवाद  दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है और लम्बे समय से क्रन्तिकारी आन्दोलन इन्हीं दोनों छोरों पर झूल रहा है। विचारधारात्मक विपथगमन की जडें,गौरवशाली क्रन्तिकारी आन्दोलन में अतीत से ही चली आ रही हैं। नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद किया,लेकिन पार्टी गठन और निर्माण की प्रक्रिया को सही रूपों में अन्जाम नहीं दे सका और आन्दोलन अतिवाम का शिकार हुआ और वह आज तक जारी है। हमारी धारा ने अतिवाम से विच्छेद कर एक नयी धारा और नयी मंजिलों की तलाश  तो किया लेकिन विखराव जारी रहे।

हमारा पूर्व संगठन जनवादी केन्द्रीयता,दो लाइनों के संघर्ष और कमेटी निर्माण अर्थात सांगठनिक लाइन और काम करने के दो पैरों के सिद्वान्त के प्रश्न  पर ही अलग हुआ। हमारे सामने सांगठनिक लाइन के नजरिये से इतिहास का विश्लेषण  करते हुए इसे व्यवहार में साबित करने का लक्ष्य था। लेकिन हुआ क्या?इसकी तस्वीर आपके सामने आ चुकी है।

 दूकान में सपने और भी हैं
साथियों ने अपने कटु अनुभवों और अहसासों से आप को परिचित करा दिया है। मैं इन साथियो को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं,इसलिए पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि व्यक्ति केन्द्रित उनकी टिप्पणियां किसी प्रतिशोध  या कीचड़ उछालने की नीयत से नहीं की गयीं है,बल्कि उनके अनुभव मुकम्मिल राजनीतिक प्रवर्गों के तथ्य हैं।

कार्यकर्त्ताओं के साथ किये गये अमानवीय कुकृत्य ,परिवार के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया और सिद्वान्तों को पैर की जुती बना देना--जघन्य आपराधिक व सामन्ती मानसिकता का द्योतक है,जो फासीवादी राजनीतिक प्रवर्ग ही हैं। इस संदर्भ में मैं भी कई और नये तथ्य दे सकता हूँ लेकिन महत्वपूर्ण  है बात के मर्म को समझने का मसला.
यदि तथ्य से सत्य का निर्धारण करें तो इस विचारधारात्मक विपथगमन,जो आज पूरे आन्दोलन में व्याप्त है--के डिग्री का पता चलता है। हमें इसी की पड़ताल करनी चाहिए और इसके सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक कारणों की जड़ों तक जाना चाहिए। आज विष्व पूंजीवाद द्वारा पैदा की जा रही मानसिक दासता,पराजय बोधी मानसिकता,पूंजी पूजक संस्कृति  का व्याप्तीकरण और पूंजीवादी राजनीति का फासीवादी चरित्र के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत जैसे पूर्ण औपनिवेशिक अतीत की मानसिकता व अपनी परम्पराओं और विरासत से कट जाने में और राष्टीयताओं के विकसित नहीं होने के परिप्रेक्ष्य में हमें इसकी पड़ताल करनी होगी। अन्यथा इस बहस का कोई औचित्य नहीं है।

हम विश्वासपूर्वक कह सकते है कि साथियो का कटुअनुभवों को प्रस्तुत करने का उद्देश्य  उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में बहस व विपथगमन की इस प्रक्रिया के विरूद्व खडे़ होना ही है न कि किसी की सहानूभूति पाने में। प्रगतिशील साहित्यिक- सांस्कृतिक जगत और मजदूर आन्दोलन से जुडे साथी इस पर मौन साधे रहना चाहते हों  तो यह उनकी आजादी है, परन्तु तब हम भी आजाद है भाई गोरख पाण्डेय की कविता कहने के लिए

हम भी यह खूब समझते हैं
कि आप, सब कुछ समझकर
क्यों नहीं समझते?....

(लेखक इण्डियन रेलवे टेक्निकल एर्ण्ड आर्टिजन   इम्पलाइज एसोसिएशन के केन्द्रीय कार्यकारी अध्यक्ष रहे हैं।)

आंदोलनों को बाज़ार बनने से रोकें


दस्तावेज क्रांतिकारी आंदोलन की जरूरत होते हैं किसी छापेखाने की नहीं। किसी प्रकाशन संस्थान से इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाये।

हल्द्वानी से सुधीर कुमार

मौजूदा बहस ने इस सवाल को मौजू बना दिया है कि क्रांतिकारी कम्युनिस्ट  लीग (भारत)एक क्रांतिकारी पार्टी संगठन है या नहीं?ज्यों ही हम इस सवाल का जवाब ढुंढ   लेते हैं कई गुत्थियां सुलझ जाती हैं। तब इस दल के ‘नेताओं‘का व्यवहार सहज व स्वाभाविक लगने लगता है।

हमारे सभी सवाल और आलोचनाओं की जमीन ही है कि हम ‘शशि प्रकाश एंड संस‘से कहीं न कहीं क्रांतिकारी व्यवहार की उम्मीद करते हैं। वैसे व्यवहार की जो उन्होंने खुद के लिए तय ही नहीं किया है या फिर यूं कहें कि छोड़ दिया है। अपने क्रांतिकारी अतीत को त्यागे बिना शशि प्रकाश वह सब कुछ कर ही नहीं सकते जो वह कर रहे हैं। तब उनके द्वारा मुनाफा कमाने के लिए कई अन्य हथकंडों के साथ-साथ विचारधारा एवं युगपुरुषों के इस्तेमाल पर भी हमें वैसी हैरानी-परेशानी नहीं होगी जैसी कि पढ़ने में आ रही हैं।

ये बचाने की गुहार करते हैं: इनसे बचाने की  गुहार कहाँ करें?
निहित स्वार्थों के लिए समाजवाद का बहुआयामी इस्तेमाल कोई नयी व अनोखी बात नहीं है। इसी देश में वामपंथ के नाम पर कमाने-खाने वालों और सत्ता सुख भोगने वालों की कोई भी कमी नहीं है। कई प्रकाशन संस्थानों की दुकानों में कर्मठ,ईमानदार व संकल्पबद्ध कार्यकर्ता अपनी जवानी कुर्बान करते दिखायी देते हैं। फिर शशि प्रकाश से ही शिकायत क्यों?

क्रांतिकारी कम्युनिस्ट  लीग(भारत) सी. एल. आई.की पैतृक बीमारियों से ग्रस्त एक ऐसा धड़ा है जो लाइलाज हो चुका है। यह संगठन क्रांति की तैयारी की बात करते हुए लम्बे समय से जिन गतिविधियों में लगा रहा है उसमें इसका यहां तक पहुंचना हैरान करने वाला नहीं है। शशि प्रकाश दस्तावेज नहीं लिखते हैं क्योंकि उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं है। दस्तावेज क्रांतिकारी आंदोलन की जरूरत होते हैं किसी छापेखाने की नहीं। किसी प्रकाशन संस्थान से इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाये।

श्रमिकों को दी जाने वाली कम तनख्वाह भी जाना पहचाना रिवाज है। ऐसा खुलेआम किया जाय या श्रमिकों को विचारधारा या धर्म का झांसा देकर कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां आकर आशा राम और शशि प्रकाश एक जमीन पर खडे़ हो जाते हैं। उनसे उम्मीद करना कि वह अपना क्रांतिकारी लबादा उतार फेकेंगे बेकार है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि कोई मुनाफाखोर अपने मुनाफे में खुद ही कटौती कर ले।

जरूरत है क्रांतिकारी आंदोलनों को बाजार बनने से रोकने की ठोस नीति बनाने की। कारण कि बदलाव के विचारों को सिक्कों में ढालने से सिर्फ हमारी सदिच्छाएं नहीं रोक सकतीं।


शशि प्रकाश मेरे आदर्श थे !


हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए.मेरा साफ मानना है कि शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया.


जय प्रताप सिंह

 रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया एक कम्पनी है जो शहीदे आजम भगत सिंह नाम पर युवाओं को भर्ती करती है.इसके लिए कई तरह के अभियानों का नाम भी दिया जाता है. उदाहरण के लिए 'क्रांतिकारी लोग स्वराज अभियान. कार्यकर्ता चार पेज का एक पर्चा लेकर सुबह पांच बजे से लेकर रात 8बजे तककालोनियों, मोहल्लों, ट्रेनों, बसों आदि में घर-घर जाकर कम्पनी के मालिक माननीय श्री श्री शशि प्रकाश जी महाराज द्वारा रटाए गये चंद शब्दों को लोगों के सामने उगल देते हैं । लोग भगत सिंह के नाम पर काफी पैसा भी देते हैं। पैसा कहां जाता था यह सब तो ईमानदार कार्यकर्ताओं के लिए कोई मायने नहीं रखता था लेकिन इतना तो साफ था कि पारिवारिक मंडली ऐशो आराम की चीजों का उपभोग करती थी । उदाहरण के लिए लखनऊ और दिल्ली केपाश इलाके में रहने, और उनके बेटे जिन्हें भविष्य के लेनिन के नाम से नवाजा जाता था, उसके लिए महंगा से महंगा म्यूजिक सिस्टम, गिटार आदि उपलब्ध कराया जाता था।

इसी संगठन के एक हिस्सा थे कामरेड अरविन्द  जो अब नहीं रहे। अरविंद एक अच्च्छे मार्क्सवादी  थे, लेकिन  सब कुछ जानते हुए भी संगठन का मुखर विरोध नहीं करते थे,जो उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अरविंद चूंकि जन संगठनों से जुड़े हुए थे और जनसंघर्षों का नेत्रृत्व भीकरते थे इसलिए कार्यकर्ताओं के दिल की बात को बखूबी समझते थे। कभी-कभी शशि प्रकाश से हिम्मत करके चर्चा भी करते थे। लेकिन शशि प्रकाश के पास से लौटने के बाद अरविंद उन्हीं सवालों को जायज  कहते जिन संदेहों पर हमलोग सवाल उठाये होते. हालाँकि  वह बातें  उनके दिल से नहीं निकलती थी क्योंकि ऐसे समय में वह आंख मिलाकर बात नहीं करते थे। और फिर लोगों से उनके घरपरिवार और ब्यक्तिगत संबंधों की बातें करने लग जाते थे।

बाद में पता चला कि शशि प्रकाश और कात्यायनी के सामने अरविंद जब संगठन की गलत लाइन पर सवाल उठाते हुए कार्याकर्ताओं के सवालों को अक्षरश:रखते थे तो शशिप्रकाश इसे आदर्शवाद का नाम देकर उनकी जमकर आलोचना करते। उसके ठीक बाद  अरविन्द को  बिगुल, दायित्ववोध पत्रिकाओं के लिए लेख आदि का काम करने में शशि प्रकाश लगा देते. 

वैसे एक बात बताते चलें कि इस दुकान रूपी संगठन में जब भी कोई साथी अपना स्वास्थ्य खराब होने की बात करता तो उसे उसकी ऐसे खिल्ली उड़ाई जाती थीकि वह दोबारा चाहे जितना भी बीमार हो उल्लेख नहीं करता था। इस संगठन में आराम तो हराम था। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि दिन रात काम करते रहने के कारण साथी अरविंद का शरीर रोगग्रस्त हो गया। दवा के नाम पर मात्र कुछ मामूली दवाएं ही उनके पास होती थीं। इससे अधिक के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे क्योंकि महंगे अस्पतालों में जा कर इलाज कराने का अधिकारतो शशि प्रकाश एंड कम्पनी को ही था।
जवाब दीजिये: हिंदी कवयित्री का सांगठनिक चरित्र

शशि प्रकाश के आंख का इलाज अमेरिका में होता था। सबसे दु:ख की बात तो यह थी कि इस क्रांति विरोधी आदमी के इलाज में जो पैसा खर्च होता था वह उन मजदूरों का होता था जो अपनीरोटी के एक टुकड़ों में से अपनी मुक्ति के लिए लड़े जा रहे आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करते थे।

जहां-जहां अरविंद ने नेत्रृत्वकारी के रूप में काम किया, वहां-वहां सेउन्हें मोर्चे पर फेल हो जाना बताते हुए हटा दिया गया। अंत में उन्हें गोरखपुर के सांस्कृतिक कुटीर में अकेले सोचने के लिए पटक दिया गया। यहां तक कि उस खतरनाक बीमारी के दौरान जब किसी अपने की जरूरत होती है उस समयसाथी अरविंद अकेले उस मकान में अनुवाद कर रहे थे और दायित्वबोध और बिगुल के लिए लेख लिख रहे थे। उधर उनकी पत्नी मीनाक्षी दिल्ली के एक फ्लैट में रहकर युद्ध चला रही थीं। उन्होंने दिल्ली का फ्लैट छोड़कर अरविन्द  के  पास आना गवारा नहीं समझा या फिर शशि प्रकाश ने उन्हें अरविन्द के पासजाने नहीं दिया। यहां तक की किसी अन्य वरिष्ठ साथी तक को साथी अरविन्द के पास नहीं भेजा। जिस समय हमारा साथी अल्सर के दर्द से तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहा था उस समय उनके पास एक-दो नये साथी ही थे। इन सब चीजों पर अगर गौर करें तो शशि प्रकाशको अरविन्द का हत्यारा नहीं तो और क्या कहा जाएगा?

मेरा मानना है  है कि शशि प्रकाश ने  बहुत सोच-समझकर अरविन्द को धीमी मौत के हवाले किया था.क्योंकि वरिष्ठ साथियों और संगठनकर्ता  में वही अब अकेले बचे थे। और सही मायने में उनके पास मजदूर वर्ग के बीच के कामों का शशि प्रकाश से ज्यादा अनुभव था।

मैं भी इस संगठन में 1998 से लेकर 2006 तक बतौर होलटाइमर के रूप में काम किया हूं। इस दौरान संगठन की पूरी राजनीति को जाना और समझा भी। हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का  शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए. मेरा साफ मानना है कि  शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे  हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया. 

ऐसे साथियों का इतने  दिनों तक जुडऩे का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे  जिस मध्यवर्गीय परिवेश से आये थे वह परिवेश ही रोके रहा हो. शशि प्रकाश के शब्दों में-हमें सर्वहारा के बीच रह कर सर्वहारा नहीं बन जाना चाहिए बल्कि हम उन्हे उन्नत संस्कृति की ओर ले जाएंगे। इसके लिए कमेटी व उच्च घराने से आये हुए लोगों को ब्रांडेड जींस और टीशर्ट तक पहनने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है। ऐसा इसलिए कि शशि प्रकाश और कात्यायनी भी उच्च मध्यवर्गीय जीवन जी रहे थे। कोई उन पर सवाल न उठाए इसलिए कमेटी के अन्य साथियों के आगे भी थोड़ा सा जूठन फेंक दिया जाता रहा है। कई कमेटी के साथी शशि प्रकाश और उनके कुनबे के उतारे कपड़े पहनकर धन्य हो जाते थे। यह रोग आगे चल कर  ईमानदार साथियों में भी घर कर गया और वे सुविधाभोगी होते गये।

यह भी एक सच्चाई है कि किसी को अंधेरे में रख कर गलत रास्ते पर नहीं चला जा सकता। यही कारण रहा कि शशि प्रकाश को जब भी लगा कि अब तो फलां कार्यकर्ता या कमेठी सदस्य भी सयाना हो गया और हमारे ऊपर सवाल उठाएगा तो उन सबको किनारे लगाने का तरीका अख्तियार किया। इतना तो वह समझ ही गए थे कि इन लोगों को इस कदर सुविधाभोगी बना दिया है कि अपनी सुविधाओं को ही जुटाने में लगे रहेंगे. 

 शशि प्रकाश इस बात को जीतें हैं कि समाज के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों में ख्याति तो ही गयी है,लोग आते रहेंगे, दुकान से जुड़ते रहेंग। रही बात कार्यकर्ताओं की तो वे चाहे ज्यादा दिनों तक रुकें या न रुकें फिर भी जितना दिन रुकेंगे भीख मांग कर लाएंगे ही और उसकी झोली भरकर चले जाएंगे। कुल मिला कर शशि प्रकाश एंड कंपनी अपनी सोच में कामयाब हो गयी है।
इसमें मैं भी अपने आप को साफ सुथरा नहीं मानता क्योंकि जब यह संगठन इतना ही मानव द्रोही था तो इतने दिनों तक मैंने काम ही क्यों किया? मैं भी सिद्धार्थ नगर जिले के ग्रामीण परिवेश से आया और भगत सिंह की सोच को आगे बढ़ाने के नाम पर देश में एक क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करने के लिए काम में जुट गया। इसके लिए मैंने ज्यादा पढऩा लिखना उचित नहीं समझा। मुझे यहशिक्षा भी मिली कि पढऩा लिखना तो बुद्धिजीवियों का काम है। हमें संगठन के लिए अधिक से अधिक पैसा जुटाना और युवाओं को संगठन से जोडऩा है। और मैंइसी काम में लग गया। मुझे संगठन की ओर से घर भी छोडवा़ दिया गया और मर्यादपुर में तीन सालों तक रहकर देहाती मजदूर किसान यूनियन,नारी सभा औरनौजवान भारत सभा के नाम पर काम करने के लिए लगा दिया गया। पीछे के सारे रिश्ते नाते एवं घर परिवार से संगठन ने विरोध करवा दिया जिससे कि हम बहुत जल्द वापस न जा पाएं। यही नहीं बल्कि अपना घर और जमीन बेचने के लिए अपने ही पिता के खिलाफ कोर्ट में केस भी लगभग करवा ही दिया गया था। लेकिन पता नहीं क्यों (शायद मैं अभी पूरी तरह उसकी गिरफ्त में नहीं आया था),मेरा मन ऐसा करने को नहीं हुआ।  

 मैं शशि प्रकाश को ही आदर्श मानता था। मुझे यह शिक्षा दी गयी थी कि भाईसाहब दुनिया में चौथी खोपड़ी हैं। मेरे अंदरयह सवाल कई बार उठा कि जब यह चौथी खोपड़ी हैं तो प्रथम, दूसरी और तीसरी खोपड़ी कौन है? बाद में पता चला कि पहली खोपड़ी मार्क्स  थे,दूसरी लेनिन,तीसरी खोपड़ी माओ थे। अब माओ के बाद तो कोई हुआ नहीं। इसलिए चौथी खोपड़ी भाई साहब हुए न। 

 भाईसाहब कहते थे कि वही   एक क्रांतिकारी संगठन है। बाकी तो दुस्साहसवादी और संशोधनवादी पार्टियां हैं। लेकिन सब्र का बांध तो एक दिन टूटना ही था। जो आप के सामने है। यदि इन सबके बावजूद कहीं कोने में भी इस मानव विरोधी संगठन को सहयोग देने के बारे में आप में से कोई सोच रहा है तो उसे बर्बाद होने से कौन रोक सकता है? 


Jul 27, 2010

यह विचारधारा का भटकाव ही है


परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है, लेकिन मैं उनकी राजनीति का  कभी समर्थक नहीं रहा. राहुल फ़ाउण्डेशन को लेकर भी मेरे मन में सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना राजनीतिक दलों का काम नहीं होता.पुस्तकों का प्रकाशन भी  राजनीतिक कामकाज को बढ़ाने का साधन होता है. जब साधन ही साध्य बन जाये तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दमताल ही कर रहा है.

नीलाभ

जनज्वार पर कई दिनों से राहुल फ़ाउण्डेशन, परिकल्पना प्रकाशन और सीएलआई की एक शाख से जुड़े शशिप्रकाश, कात्यायनी, सत्यम और उनके कुछ और साथियों के ख़िलाफ़ उनके ही अनेक पुराने साथियों के आरोप पढ़ता आ रहा हूँ. किसी हद तक हतप्रभ हूँ और किसी क़दर उदास भी. कारण पहला यह है कि मैं सांगठनिक तौर पर तो नहीं, लेकिन लेखक  के नाते से शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम को जानता रहा हूँ. शशि प्रकाश को बहुत दूर से, लेकिन बाक़ी दोनों को नज़दीक से.

परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. मैं उनकी राजनीति का कभी समर्थक नहीं रहा और राहुल फ़ाउण्डेशन को लेकर भी मेरे मन में  सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना राजनीतिक दलों का काम नहीं होता और पुस्तकों का प्रकाशन भी राजनीतिक कामकाज को बढ़ाने का साधन होता है, जब वह साध्य बन जाये या राजनीतिक कामकाज की तुलना में प्राथमिकता ग्रहण कर ले तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दमताल ही कर रहा है.
मैं १९७० से ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मा.ले. (लिबरेशन) से जुड़ा था -- बतौर सदस्य नहीं, पर उससे कम भी नहीं. अपने दिवंगत साथी गोरख पांडेय की तरह पार्टी का सदस्य न होते हुए भी मैं लगभग सात साल तक पार्टी के सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहा और पार्टी और जसम के साथ अनेक सैद्धांतिक और व्यवहार सम्बन्धी अनसुलझे मतभेदों के चलते मैं अन्ततः जसम से और पार्टी की गतिविधियों से अलग हो गया. पर इसका ज़िक्र आगे या फिर कभी.


इस समय मैं यह कहना चाहता हुं कि इस सारे मुद्दे को सिर्फ़ एक ही संगठन की आलोचनात्मक चीड़-फाड़ के सहारे समझने-समझाने की मुहिम अन्त में व्यक्ति केन्द्रित हो कर असली विषय से भटक जायेगी और यह विषय है वामपन्थी राजनैतिक दलों में भटकाव की समस्या --उसके कारण और उपचार.ज़ाहिर है सी एल आई का यह भटकाव बहुत पुराना है और पार्टी तथा उसके तहत काम करने वाले संगठनों को टूटने,बंटने,विपथगामी होने की ओर ले गया है.

जब विचारधारा में खोट होती है तो वह राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रकट होती है.उस दल और संगठन से जुड़े व्यक्तियों का व्यवहार भी पूर्वाग्रहों,नफ़रतों,अमानवीयता और अतार्किकता का शिकार हो जाता है.दल में कौकस बन जाते हैं,सम्विधानेतर शक्ति केन्द्र विकसित हो जाते हैं (यह परिघटना सिर्फ़ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, वामपन्थी दल भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह पाये हैं).

पुराने मार्क्सवादी सिद्धांत में दो लाइनों के संघर्ष का बड़ा महत्व रहा है.जब-जब इस सिद्धांत को ताक पर रख कर काम किया गया है, विकृतियां पैदा हुई हैं. इन विकृतियों की क़िस्म अलग-अलग हो सकती है -- सी एल आई में एक क़िस्म की तो माले में दूसरे क़िस्म की --लेकिन इनका उत्स विचारधारात्मक भटकाव में ही है और इस भटकाव का सबसे पहला लक्षण पार्टियों और उनके संगठनों के सांस्कृतिक व्यवहार में लक्षित होता है.अनेक वामपन्थी राजनैतिक दलों के सांस्कृतिक संगठन तो दूर रहे, उनकी कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति भी नहीं है.जिन वामपन्थी दलों के सांस्कृतिक संगठन हैं भी, ज़रा उनका मुलाहिज़ा फ़र्माइए. क्या उनमें आज के राजनैतिक, सामाजिक,सांस्कृतिक संकट का सामना करने का माद्दा है ? मत भूलिए कि राजनीति का एक अंश नीति भी है जिस से नैतिक शब्द बना है.नैतिकता के बिना न राजनीति सफल होगी, न नीति और न ही सांस्कृतिक पहलक़दमी.


अगर सचमुच साथी लोग कात्यायनी,शशिप्रकाश और सी एल आई से इतने ही नालां थे और हैं तो उन पर और भी दायित्व बनता है कि इस मुद्दे तो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों तक सीमित न करके व्यापक बनायें. इसका यह मतलब नहीं है कि अगर शशिप्रकाश और उनके साथी दोषी हैं तो उनासे जवाब न मांगा जाये या उन्हें कटघरे में न खड़ा किया जाये.लेकिन अन्त में सही विचारधारा,सही काम काज और सही राजनैतिक-सांस्कृतिक दिशा और पहलक़दमी ही आपका जवाब होना चाहिए.कम्यूनिस्ट जब पतित होता है तो वह उतना ही पतित होता है जितना कोई और पर चूंकि वह सब्स ज़्यादा नैतिकता का राग अलापता है इसलिये हमें आघात पहुंचता है.क्या कम्यूनिस्टों के पतन की भर्त्सना करते हुए हम औरों के पतन का औचित्य ठहरा सकते हैं ?हम बच्चन जी को तो हम भुला चुके हैं पर उनकी दो पंक्तियां मुझे अच्छी लगती हैं -- बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले.