Oct 3, 2009

मिसाल हैं कोबाड गांधी



कोबाड गाँधी की गिरफ्तारी से मध्यम वर्ग को नक्सल आन्दोलन और आतंकवाद के बीच का अंतर नज़र आने लगा है.कोबाड और उनके जैसे लोगों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने कारपोरेट जगत के किसी मालदार ओहदे से बेहतर गरीब आदिवासियों और हाशिये पे जीने वाले लाखों लोगों की बेहतर ज़िन्दगी के लिए जीना मुनासिब समझा. बता रहे हैं राहुल पंडिता


शीर्ष नक्सल नेता कोबाड गाँधी की गिरफ्तारी से नक्सल आन्दोलन को तगड़ा झटका लगा है.लेकिन साथ ही इस गिरफ्तारी ने कुछ हद तक वो काम किया जिसके लिए कोबाड दिल्ली और अन्य महानगरों का गुप्त दौरा करते रहते थे.शहरों तक नक्सल आन्दोलन को ले जाना और उसके प्रति मध्यम वर्ग में जागरूकता पैदा करना. लोग इस बात से खासे हैरान है कि मुंबई में आलीशान घर में रहने वाले एक बड़े परिवार का बेटा, जिसने दून स्कूल में संजय गाँधी के साथ पढाई कि, वो लन्दन से उच्च शिक्षा अधूरी छोड़कर गढ़चिरोली और बस्तर के जंगलों की ख़ाक भला क्यूँ छान रहा था? कोबाड की गिरफ्तारी ने वो काम किया जो शायद उनके द्वारा लिखे गए सेकडों लेख भी कर नहीं पाते. उनकी गिरफ्तारी से वो लोग जिनके लिए सीमा पार मारे गए आतंकवादी और बस्तर में मारे गए नक्सल के बीच कोई अंतर नहीं था, वो भी नक्सल आन्दोलन की चर्चा करने लगे है.

आज नक्सल आन्दोलन नक्सलबाडी से कोसों आगे निकल गया है.आज १८० जिले -यानी करीब एक-तिहाई भारत लाल झंडे की छाया के नीचे जी रहा है.इस ताकत के पीछे कोबाड और उनके जैसे कई पड़े-लिखे लोगों का हाथ है जिन्होंने कारपोरेट जगत के किसी मालदार ओहदे से बेहतर गरीब आदिवासियों और हाशिये पे जीने वाले लाखों लोगों की बेहतर ज़िन्दगी के लिए अपना जीवन दांव पार लगा दिया.उन्होंने इसके लिए जो मार्ग चुना इस पर बहस हो सकती है,लेकिन उनके समर्पण और बलिदान पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता.
दिल्ली की तीस हजारी अदालत में "भगत सिंह जिंदाबाद" के नारे लगाने वाला ये शख्स आखिर कौन है? इसके लिए आपको नागपुर की इन्दोरा नाम की दलित बस्ती जाना होगा. लन्दन से अपनी पढाई अधूरी छोड़ने के बाद कोबाड अनुराधा शानबाग नाम की एक लड़की के संपर्क में आये.अनुराधा मुंबई के एक नामी-गिरामी कॉलेज की छात्रा थी और उसके पिता मुंबई के बड़े वकील थे.समाजशास्त्र में एम्.फिल करते हुए अनुराधा झुग्गी-झोंपडियों में काम करने लगी थी. कोबाड की मुलाकात उनसे वहीँ हुई और १९७७ में शादी के बाद उन्होंने नागपुर में काम करना शुरू किया.
दरअसल वो वक़्त ही कुछ ऐसा था.७० के दशक में पूरी दुनिया में क्रांति का बिगुल बज रहा था.चीन में माओ सांस्कृतिक क्रांति  लेकर आये थे. वियतनाम अमेरीकी सेना को करारी टक्कर दे रहा था. भारत में नक्सलबाडी का बीज फूट चूका था. सैकडों नौजवान अपना घर-बार छोड़कर क्रांति की आग में खुद को झोंक रहे थे.१९८० में नक्सल गुट पीपुल्स वार ने अपने कुछ दल dandakaranya भेजे.ये आंध्र प्रदेश,महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़ और उडीसा में फैला वो जंगली इलाका है जो इंडिया की तरक्की के बीच बहुत पीछे छूट गया.यहाँ के आदिवासियों तक नेहरु की कोई भी पंच-वर्षीया योजना नहीं पहुंची.इसमें एक बड़ा इलाका ऐसा है जिसकी आखिरी बार सुध लेने वाले शख्स का नाम जलालुदीन मोहम्मद अकबर था.यहाँ के लोग इतने पिछडे थे कि उन्हें हल के इस्तेमाल के बारे में भी पता नहीं था. ऐसे में नक्सल आन्दोलन से जुड़े मुट्ठी भर लोगों ने वहां काम शुरू किया. काम बहुत मुश्किल था. लेकिन यहाँ प्रशसान के पूर्ण अभाव में लोग भुखमरी और शोषण का शिकार हो रहे थे.नक्सलियों ने लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर करने के प्रयास शुरू किये. धीरे-धीरे dandakaranya की सरकार वही चलाने लगे.

कोबाड को पीपुल्स वार ने महाराष्ट्र में काम करने के लिए चुना.इस बीच अनुराधा ने नागपुर विश्विद्यालय में पढाना शुरू किया.इन्दोरा बस्ती दलित आन्दोलन का प्रमुख केंद्र है. यहाँ अनुराधा ने २ कमरे किराये पर लेकर रहना शुरू किया. उसके मकान मालिक बताते है कि दोनों के पास किताबों के २ बक्सों और एक मटके के अलावा कुछ भी नहीं था.अनुराधा एक टूटी-फूटी साइकिल चलाती. इन्दोरा बदनाम बस्ती थी. वहां कोई भी ऑटो या टैक्सी चालक अन्दर आने से कतराता था. लेकिन इस माहौल में अनुराधा आधी रात को काम खत्म करने के बाद सुनसान रास्तों पर साइकिल चलते हुए घर आती. बस्ती में रहकर अनुराधा ने वहां के कई लड़कों की जिंदगियां बदल दी. एक दलित लड़के ने मुझसे कहा कि उसकी ज़िन्दगी में अनुराधा ने पूरी दुनिया की एक खिड़की खोल दी. सुरेन्द्र gadling नाम के एक लड़के को अनुराधा ने वकालत की पढाई करने के लिए प्रेरित किया. आज वो नक्सल आन्दोलन से जुड़े होने के आरोपियों के केस लड़ता है.
 नब्बे के दशक में अनुराधा पर भूमिगत होने का काफी दबाव बढ़ गया था.कोबाड पहले ही भूमिगत हो चुके थे.१९९० के मध्य में अनुराधा बस्तर चली गयी.केंद्र सरकार जो भी कहे लेकिन ये सच है की नक्सल कई जगहों पर सरकार की कमी को पूरा करते है.छत्तीसगढ़ के बासागुडा गाँव में पानी के एक जोहड़ की घेराबंदी सरकार कई साल तक आदिवासियों द्वारा हाथ-पाँव जोड़ने के बावजूद नहीं कर पायी.अनुराधा की अगुवाई में कई गाँव के लोगों ने मिलकर ये काम अंजाम दिया.इसके लिए हर काम करने वाले को प्रति दिन एक किलो चावल दिया गए.घेराबंदी के बाद घबराई सरकार ने २० लाख रुपये देने की पेशकश की लेकिन उसे ठुकरा दिया गया.१९९८ तक नक्सालियों ने ऐसे करीब २०० जोहडों का निर्माण किया.
 लेकिन जंगल की ज़िन्दगी काफी कठिन होती है.अनुराधा कई बार मलेरिया का शिकार बनी. इसके चलते पिछले साल अप्रैल में उन्होने दम तोड़ दिया.तब तक कोबाड माओवादियों के बड़े नेता बना दिए गए थे. वो खुद भी कैंसर और दिल की बीमारी से ग्रस्त है. अब वो जेल की सलाखों के पीछे है लेकिन उन्होने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया. आज अरुण फरेरा जैसे कई पढ़े-लिखे नौजवान कोबाड और अनुराधा से प्रेरित होकर आन्दोलन से जुड़े हैं. (अरुण भी अब जेल में है).
अब से कुछ महीने बाद केंद्र सरकार दंडकारन्य में नक्सलियों का खात्मा करने के लिए एक बहुत बड़ी फोर्स भेज रही है. गृह मंत्री प. चिदंबरम का कहना है की नक्सली डाकू है और कुछ नहीं. लेकिन गरीब आदिवासियों के लिए वो किसी नायक से कम नहीं. ये वो लोग है जो उनके लिए स्कूल चलते है, स्वस्थ्य सेवा मुहेया कराते है, और उन्हें इज्ज़त से जीने का साहस देते है.नक्सली आन्दोलन से जुड़े गरीब आदिवासियों के लिए इस से बढकर कुछ नहीं.भरपेट खाना और सरकारी शोषण को दूर रखने के लिए एक बन्दूक.सरकार नाक्सालवाद का खात्मा करना चाहती है, लेकिन क्या वो इन इलाकों में विकास ला पाएगी? भूख और गरीबी को समूल नष्ट कर पाएगी? ये ऐसे कुछ सवाल है जिनका जवाब सरकार जितनी जल्दी खोजे उतना बेहतर होगा.

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लेखक अंग्रेजी पत्रिका ओपन के वरिष्ट विशेष संवाददाता हैं.नक्सल इलाकों से रिपोर्टिंग पर आधारित उनकी पुस्तक इस साल के अंत में हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित हो रही है.

Sep 16, 2009

हत्यारी पंचायतें

अजय प्रकाश

हर महीने आठ से दस प्रेमियों की हत्या करने वाली मध्ययुगीन बर्बर खाप पंचायतों के खिलाफ हरियाणा में मुकदमा दर्ज करने का इतिहास नहीं है।

मान-सम्मान के नाम पर बलात्कार, हत्या, बेदखली, सामाजिक बहिष्कार और आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली इन पंचायतों का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है जिन्हें देखकर तालिबान की याद आती है। हरियाणवी समाज में सदियों से पैठी इन तालिबानी मान्यताओं के पूजकों से आधुनिक मूल्यों के साथ खड़ा हो रहा नया समाज थर्राता है।
हरियाणा में पहली बार खाप के एक नेता को एक हत्याकांड के सिलसिले में जेल भेजा गया है। करनाल जिले के बनवाला खाप के नेता सतपाल को मातौर गांव के वेदपाल हत्याकांड मामले में गिरफ्तार किया गया है। हालांकि खाप पंचायत के खिलाफ मुकदमा दर्ज न कर पुलिस ने पंचायत को कटघरे में खड़ा होने से हमेशा की तरह फिर एक बार बचा लिया है। फिर भी न्यायालय कानून बनाने के लिए उसी राज्य का मुंह ताक रहा है जिसकी विधानसभा में खाप पंचायतों का सरेआम समर्थन करने वाले प्रतिनिधि बैठे हुए हैं।
राज्य के कानून विशेषज्ञों के मुताबिक छोटी अदालतों से लेकर हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी प्रेमी युगलों की सुरक्षा के आदश से आगे बढ़कर पंचायतों को अवैध घोषित करने या पंचायत सदस्यों के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं दिये हैं। यहां तक कि प्रेमी युगलों की हत्याओं और सुरक्षा को लेकर पिछले वर्ष उच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय कमेटी ने भी जारी अपनी रिपोर्ट में ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया है जिससे खाप या जातिगत पंचायतों के तालिबानी फरमानों पर सीधी चोट हो सके।
कमेटी के सदस्य और चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के वरिष्ठ स्थाई अधिवक्ता अनुपम गुप्ता का जवाब है, ‘मैंने जानबूझकर चर्चा नहीं की। सिर्फ जातिगत पंचायतों पर सवाल खड़ा करने से समस्या खत्म नहीं होने वाली।’ कई वकीलों से बातचीत में पता चला कि खाप पंचायतों पर इसलिए मुकदमा नहीं दर्ज किया जा सकता है कि संकट के समय उनकी एक सहयोगी भूमिका होती है। अगर इस आधार पर हम खापों को जायज ठहरायेंगे तो तालिबान के विरोध में कैसे खड़े हो पायेंगे।
कमेटी ने अपने बचाव में यह भी कहा कि कमेटी के गठन होने तक खापों के सीधे हस्तक्षेप जैसे मामले उजागर नहीं हुए थे। लेकिन सच्चाई यह है कि 27 जून 2008 में जब कमेटी का गठन हुआ तो उससे 36 दिन पहले 9 मई को बला गांव में कालीरमन खाप के आदेश पर प्रेमी जोड़े जसबीर और गर्भवती सुनीता की हत्या कर दी गयी थी। इसी तरह 2 अप्रैल को कमेटी की रिपोर्ट पेश होने से 20 दिन पहले 12 मार्च को करनाल जिले के मातौर गांव में बनवाला खाप ने वेदपाल और सोनिया को अलग होने का फरमान सुना दिया था। बाद में 26 जुलाई को वेदपाल की हत्या कर दी गयी।
इसी तरह अगस्त महीने में झज्जर जिले के धाड़ना गांव में रवींद्र और शिल्पा को भाई- बहन बनाये जाने के पक्ष में कादयान खाप का अगस्त के मध्य में चार दिनों का धरना चला। धरने में यह अभूतपूर्व था कि महिलाएं भी शामिल थीं। घोर स्त्री विरोधी इन खाप पंचायतों में महिलाओं का शामिल होना एकदम नयी घटना थी। सैकड़ों की संख्या में पुलिस ड्यूटी बजा रही थी कि कहीं पंचायत रवींद्र के घर में घुसकर आग न लगा दे, हत्या न कर दें। लेकिन किसी पंचायत प्रतिनिधि के खिलाफ इस मामले में कोई मुकदमा नहीं दर्ज हुआ।

हरियाणा पुलिस महानिदेशक विकास नारायण राय भी मानते हैं कि ‘पंचायतों पर शिकंजा कसने के मामले में कोताही बरती जाती रही है।’ पुलिस महानिदेशक को ‘प्रेमी सुरक्षा घर’ योजना से काफी उम्मीदें हैं। उल्लेखनीय है कि हरियाणा पुलिस ने प्रेमी जोड़ों को हत्यारों से बचाने के लिए ‘सेफ होम’ बनाने की घोशणा की है जिसकी देखरेख सीधे पुलिस के हाथों में होगी। लेकिन सवाल है कि हथियारों से लैस दस पुलिस वाले जब कादयान खाप के हमलावरों से वेदपाल को मरने से नहीं बचा सके तो वही पुलिसकर्मी उन घरों को खापों के हमले से कितना सुरक्षित रख पायेंगे। और इससे बड़ी बात है कितने दिन प्रेमी जोड़े गांव-घर से दूर ‘सेफ होम’ में जी पायेंगे।
इन मानवाधिकारों की रक्षा करने वाला दफ्तर मानवाधिकारआयोग’ हरियाणा में नहीं है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के शब्दों में,‘राज्य में ऐसे आयोग की आवश्यकता नहीं है।’ हां राज्य में महिला आयोग जरूर है जिसकी अध्यक्ष कांग्रेसी नेता सुशीला शर्मा हैं। खापों के खिलाफ आयोग ने किस तरह की कार्यवाई किये जाने की राज्य से सिफारिश की है, उनका जवाब था, ‘टेलीफोन न पर मैं थानों और अधिकारियों को राय सुझाती रहती हूं। महिला आयोग खापों पर शोध कर रहा है। शोध पूरा होने पर फैसला होगा।’
मुख्यमंत्री मानवाधिकार आयोग की जरूरत महसूस नहीं करते, महिला आयोग खापों पर शोध करवा रही है और अदालत की गठित कमेटी की रिपोर्ट में खाप और जातिगत पंचायतों पर कार्यवाही का जिक्र ही नहीं आता। वैसे में जीवनसाथी चुनने का अधिकार हरियाणा में कहां से मिलेगा?

Aug 8, 2009

पीड़ित का पत्र

दो महीने पहले हरियाणा में माओवादी होने के आरोप में 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारों में 23 दलित और 3 महिलाएं हैं। करनाल जेल में बंद उनमें से एक दलित युवक मुकेश कुमार से पुलिस ने जबरन नाली व पखाना साफ कराया। मुकेश के विरोध करने पर उसे मारा पीटा गया, जातिगत गालियां दी गयीं। मुकेश दोबारा विरोध की हिम्मत न कर सके इसके लिए जेल पुलिस ने मुकेश का सिर और मूंछ मुड़ दिया। मुकेश ने अपने वकील बलवीर सिंह सैनी के हाथों जेल से पत्र भेजा है। चंडीगढ़ हाईकोर्ट के वरीष्ठ वकील बलवीर सिंह सैनी से प्राप्त हुए पत्र को जनज्वार बगैर संपादन के प्रकाशित कर रहा है ------------.


Jul 29, 2009

देखो, सीना ताने ताड़ खडें हैं

हत्यारा ताड़

अजय प्रकाश








वह 2003 अप्रैल के अंतिम दिन से पहले की शाम थी। उस दिन मदनपुर गांव में पंचायत बैठी थी। देवरिया जिले के रूद्रपुर तहसील में राप्ती और गोर्रा नदियों के विशाल पाट के बीच मदनपुर इतना बड़ा है कि गांव में ही थाना है। पंचायत दो मुसलमान परिवारों के बीच था। बंटवारा आकर दो ताड़ के पेड़ों में उलझ गया।
दोनों पक्ष जिसमें एक की कमान गुरफान संभाल रहे थे और दूसरे की हाजी इस्तयाक, में से कोई भी एक ताड़ के पेड़ पर अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार न था। पंचायत की राय पर सहमति नहीं बनी तो दोनों पक्ष आपस में भीड़ गये, गाली-गलौच शुरू हो गयी। गालियों से बात नहीं बनी तो गोलियां चल पड़ीं। गोली हाजी इस्तयाक को लगी और वह मौके पर ढेर हो गये। सालभर भी नहीं बिता कि हाजी इस्तयाक के बेटों ने गुफरान की हत्या कर दी।
तबसे न कोई पंचायत बैठी है और न बंटवारे पर बात छिड़ी है। सिर्फ बंदुकें चली हैं जिसमें अबतक चार लाशें गिरीं हैं। अगर किसी तरह के खतरे से कोई आश्वस्त है तो सिर्फ वे ताड़ के पेड़ जिनका इन छह सालों में कोई बाल बांका नहीं कर सका है और न ही पिछले पांच सालों से किसी ने इन पेड़ों की ताड़ी चखी है। यहां तक इन परिवारों का कोई बच्चा भी पेड़ों की ओर कदम ले जाने में सिहरता है। हां हवाओं के जोर से एक ताड़ का सिर जरूर कलम हो गया है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के मदनपुर गांव में छह साल पहले ताड के पेड़ बंटवारे को लेकर खूनी खेल का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने दोनों परिवारों को तबाही के कगार पर ला खड़ा कर दिया है। मुकदमा लड़नें में जमीनें बिक रहीं हैं, हत्यारे होने का दाग लगने पर इनके घरों में कोई रिश्ता करने को तैयार नहीं है और खुद को सुरक्षित रखने के लिए इन्हें पेशेवर गुंडों के शरण में जाना पड़ रहा है।
बावजूद इसके हत्याएं अभी रूकी नहीं हैं, सिर्फ विराम लगा है।
कल को किसी की हत्या नहीं होगी यह गारंटी दोनों में से कोई परिवार नहीं करता। गुफरान के परिवार वालों को लगता है कि हाजी के बेटे बदला जरूर लेंगे और हाजी के बेटों को डर है कि दूसरे भाईयों की तरह उनकी भी हत्या न करा दी जाये। हाजी इस्तयाक के बेटे मुस्ताक पहलवान कहते हैं, 'हमने चाहा था अमन हो, इसलिए दोनो पक्ष की एक-एक हत्याओं के बाद समझौता कर लिया। लेकिन गुरफान के बेटों ने हमारे दो और भाईयों को मार डाला। अब लगता है वह भूल थी कि दुश्मनों को दुश्मन नहीं समझा।'
समझौते को भूल मानने वाले मुस्ताक को कौन बताये कि बदले का कोई अंत नहीं होता। बदला एक के मुकाबले दो के सिध्दांत पर चलता है, एक-एक के नहीं। हत्याओं के इस खेल में गुफरान का परिवार बड़ा हत्यारा साबित हुआ है। वैसे भी ये दोनों परिवार मौका मिलते ही एक दूसरे पर मुकदमें दर्ज कराते रहते हैं। मानो कि जिंदगी की हार-जीत, सामाजिक प्रतिष्ठा सबकि कुंजी एक-दूसरे को दबाने में है, नीचा दिखाने और बर्बाद करने में हैं।
हाजी इस्तयाक के बेटे गुफरान की हत्या करने के बाद अगली हत्याओं की साजिशें तो रचने में लगे रहे मगर अंजाम नहीं दे पाये। यह बात हाजी के बेटे नहीं कहते बल्कि गुफरान के घर वाले इस बात को कबूलते हैं। अभियुक्त हन्नान के घर पर मिली औरतों ने बताया कि 'हाजी के बेटे हमारे घर वालों की हत्या के लिए जिसको सुपारी देते हैं वह बब्बल भईया के दोस्त निकलते हैं। इसलिए उल्टे हाजी के बेटों की ही हत्या हो जाती है।'
गुफरान का बेटा बब्बल हत्या के आरोप में जेल में बंद है। गांव के लोग बताते हैं कि 'जेल में ही बब्बल की अपराधियों से दोस्ती हुई जिसके बाद अब उसकी तूती बोलती है।' गुफरान के दूसरे बेटे डब्बल की शादी उभरते बाहुबली नेता लाल अमीन खान की बेटी से हुई है जिसकी वजह से गुफरान के बेटों के पास आपराधिक रसूख के साथ-साथ राजनीतिक हाथ भी है। हाजी इस्तयाक का छोटा बेटा फहीम कहता है कि शमीम भाई ने केसों की पैरवी करनी शुरू की तो उनकी हत्या हो गयी, फिर शमीम की हत्या की पैरवी में नथुनी उर्फ मतलूब भाई जाने लगे तो वह भी मारे गये।
लेकिन ऐसा नहीं है कि डर के साये में सिर्फ फहीम के घर वाले ही जी रहे हैं। बल्कि मौत के भय ने गुफरान के घर वालों की जिंदगी को बेचैन करके रख दिया है। गुफरान के भाई जियाउल्लाह बुजुर्ग हो चुके हैं और खूनखराबे को रोकने के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं। उनके बेटे भी जेल में हैं। वे कहते हैं, 'इस झमेले ने रोजगार, इज्जत सबकुछ मिट्टी में मिला दिया है। मुकदमा लड़ने में लगभग 10 बीघे जमीन बिक चुकी है, अभी और पता नहीं और कितना जायेगी।'
जेल में बंद तीन हत्याओं के आरोपी अतीकुर्ररहमान की बेटी नूर सबा खातून पिता को बेकसूर कहती हैं। जब मर्द मरेंगे तो असर औरतों की जिंदगी पर भी पड़ेगा के जवाब में अभियुक्त बब्बल की चाची कहती हैं, 'असर तो पड़ेगा लेकिन हम कर ही क्या सकते हैं।' अतिकुर्ररहमान के घर में शादी योग्य चार लड़कियां दिख रही थीं। सवाल है कि क्या कोई हत्यारे परिवार में शादी करने को जल्दी तैयार होगा। इससे कहीं बुरी हालत में हाजी के घर की महिलाएं हैं जहां दो मर्दों की हत्या हुई है। औरत के लिए पति ही पूंजी होता है जिसे इन औरतों ने खो दिया है।
दुश्मनी, हत्या और मुकदमा के इस चक्रव्यूह में जिन औरतों ने पति खोयें हैं उनसे बातचीत करने की जब इच्छा जाहिर की तो हाजी के बेटे मुस्ताक ने कहा, 'वो क्या बात करेंगी जो जानना है वो हमसे पूछिये।' लेकिन उन महिलाओं का कोई पक्ष तो होगा ! जो मर्दों के जायज-नाजायज को सालों से चौखट के भीतर से ही ठीक मानने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल के जवाब में फहीम कहते हैं, 'हमारी भाभियों की बस एक ही मांग है कि हमारे भाईयों के हत्यारों को मुकम्मिल सजा हो।' मगर फहीम की यह मांग तो बदले की मांग है, औरतों की मांग को कौन बतायेगा।

Jul 23, 2009

सूखे से निकलती उम्मीदों की कोपलें

सलाम सहेलियों

अजय प्रकाश



हजारों करोड़ रूपये की योजनाएं लागू करने वाली जो सरकारें बुंदेलखंड में भुखमरी से होने वाली मौतों और आत्महत्याओं के सिलसिले को नहीं रोक पायीं, उसका हल नीतू, गुड़िया और रीना नाम की तीन लड़कियों ने निकाल लिया। महोबा जिले के पहाड़िया गांव की रहने वाली हैं इन लड़कियों न सिर्फ अपने पिता को आत्महत्या करने की मानसिकता से उबारा, बल्कि दादरा नाच आयोजित कर जो अनाज इकट्ठा हुआ, उससे कई दलितों को भूखों मरने से भी बचाया।
नीतू सक्सेना, गुड़िया परिहार और रीना परिहार नाम की इन लड़कियों को साल भर पहले तक गांव के लोग भी ठीक से नहीं जानता थे। लेकिन अब क्षेत्र के लोग उनके प्रयास का गुणगान करने से नहीं थकते। नीतू सक्सेना और गुड़िया परिहार के घर आमने-सामने हैं और वह अच्छी सहेलियां हैं। रीना परिहार गुड़िया की छोटी बहन है। गुड़िया के पिता रामकुमार सिंह परिहार चार लाख के कर्ज में थे। बैंकों की धमकी से खौफजदा रामकुमार सिंह परिहार कई दिनों से खाना पीना छोड़ पड़े हुए थे। गुड़िया और रीना ने पिता को समझाने की हर कोषिष की, पर हल नहीं निकला। गुड़िया ने पिता की हालत सहेली नीतु सक्सेना को बतायी तो नीतु ने भी अपने पिता के बारे में कुछ ऐसा ही बयान किया।
कोई उपाय सूझता न देखकर लड़कियों ने तय किया कि क्यों न पूरे गांव की हालत देखी जाये, षायद कोई रास्ता मिले। जाने की षुरूआत कैसी हुई के बारे में ये नीतू सक्सेना कहती हैं, 'हमने पहले दलित बस्ती में जाने का तय किया। हमने सोचा कि जो लोग हमलोगों के खेतों-घरों में मजूरी कर जीते हैं उनकी हालत कितनी दयनीय होगी जब हमारे खेतों में कुछ पैदा नहीं हो रहा है, कुएं-नल सूखे पड़े हैं।' दूसरे लोगों की स्थिति देखकर इन लड़कियों को अपने परिवारों के दुख कमतर जान पड़े। नीतू बताती हैं कि 'मैंने दलित परिवारों में भूख से बिलबिलाते लोगों को देखा जिनके पास कई दिन से अनाज नहीं था।'
पहाड़िया गांव की तीन हजार की आबादी में लगभग आधी से अधिक आबादी दलित और पिछड़ी जाति के लोगों की है। गुड़िया कहती हैं, 'जीवन के इस नर्क को देख हमारी आत्मा रो पड़ी थी और अगले दिन हम कॉपी-कलम के साथ निकले। फिर हम लोगों ने गांव के कुओं, नलकूपों, कर्ज और कमाई का सर्वे किया तो पाया कि गांव लगभग एक करोड़ रूपये के सरकारी-गैर सरकारी कर्ज में डूबा हुआ है। 108 में से मात्र तीन कुएं बचे हुए हैं और पंद्रह नलों में से सिर्फ स्कूल का एक नल ही पानी दे रहा है।' रीना के षब्दों में कहें तो 'अब हमारे सामने पहली चुनौती थी, भूख से मरने वालों को बचाना। लेकिन इतना अन्न किसी के घर में नहीं था जो दानदाता बनता। इसलिए पारंपरिक दादरा नाच का आयोजन हर सोमवार को कराने की ठानी गयी जो आज भी चल रहा है।'
बुंदेलखंड में दादरा नाच परंपरा का हिस्सा रहा है जिसमें सिर्फ महिलाएं ही षिरकत करती हैं। जो भी महिलाएं भाग लेने आती हैं वे एक कटोरा अन्न लेकर आती हैं। पहाड़िया गांव में यह आयोजन षुरू हुआ तो इससे मिले अनाज को दलित बस्ती में बांटना षुरू किया गया जिससे भूखों मरने की हालत में जी रहे दलित परिवारों को राहत मिली। नीतू के पिता हंसते हुए कहते हैं कि 'ये काम और बेहतर तरीके से हो इसके लिए तो नीतू और गुड़िया ने सामाजिक कामों के लिए ही अपना पूरा जीवन लगाने की तैयारी कर ली है।'
दूसरी तरफ इन लड़कियों ने सोख्ता बनाकर गांव के चार नलों को ठीक कर दिया। इन प्रयासों की जब इलाके में चर्चा हुई तो रामकुमार सिंह परिहार का कुछ कर्ज बैंक ने माफ कर दिया और बाकी वे जमा कर चुके हैं। इस बीच स्थानीय प्रषासन ने भी गांव पर ध्यान देना षुरू कर दिया है। गुड़िया और रीना के पिता रामकुमार सिंह बताते हैं, 'मुझे लड़कियों ने जीवनदान दिया है और गांव को जीने का उत्साह।'

समाजषास्त्र में एमए कर चुकीं नीतू सक्सेना, आठवीं पास गुड़िया और ग्यारहवीं की पढ़ाई कर रही रीना की तैयारी है कि गांव में महिलाओं की बदहाली दूर करने के लिए काम करेंगी। नीतू का मानना है कि 'षहरों में जैसे वृध्दों के लिए आश्रमों की व्यवस्था होती है वैसी जरूरत आज देहातों में भी है। नौकरी की तलाष में ज्यादातर नौजवान बीवी-बच्चों को लेकर महानगरों में जा चुके हैं और बूढ़े मां-बाप किसी के भरोसे जी रहे हैं नहीं तो भीख मांगकर गुजारे के लिए अभिषप्त हैं।'

Jan 24, 2009

चीलों का गांव

चीलों का गांव
अजय प्रकाश




यह चौंकाने वाला दृश्य है। हरे-भरे खेतों में चील, बाज, कौए और कुत्ते। इधर से गुजरने वाले लोग चकित रह जाते हैं। लाषों पर मंडराने वाली इन प्रजातियों को फसलों में कुछ टूंगते हुए देखकर। एकबारगी लगता है कि कहीं तेजी से बदल रही पारिस्थितिकी में इन्होंने अपना स्वाद तो नहीं बदल दिया। आलू के खेतों में निराई कर रही मजदूरिन बताती है कि 'ये मांस खा रहे हैं।' बताती है- 'वह जो सामने फैक्ट्रियां दिख रही हैं चील वहीं से मांस ले आती हैं।' तभी तमाम सवालों का एक साथ जवाब लेकर बदबू का एक भभका आता है। गावों की तरफ रूख करने पर पता चलता है कि हड्डी फैक्ट्रियों की वजह से उठ रही बदबू और सड़ांध ने प्रदुशण्ा तो फैलाया ही, पारिवारिक जीवन में भी इस कदर हस्तक्षेप किया कि रामपुर के ग्रामीण समाज का जीवन संकट में है।

हापुड़ की हड्डी मिलें देश में अपनी तरह की अजूबा उद्योग हैं जिनकी वजह से परिवार टूट रहे हैं, बहुएं गांव छोड़कर जा रही हैं। षादी के इंतजार में साल दर साल गुजार रहे बिनब्याहे लड़के-लड़कियां हर लगन के मौसम में सेहरा-मंडप के न्योते की राह तकते हैं। लेकिन कोई रिष्ता लेकर रामपुर गांव की दहलीज पर जल्दी दस्तक नहीं देता। क्योंकि गांव के आसपास उठने वाली मितला देने वाली दुर्गंध को कोई बाहरी व्यक्ति सहन नहीं कर पाता। गांव के मुंहाने से ही रिष्ते के लिए आने वाले यह कहते हुए लौट जाते हैं कि बदबू के इस दमघोटूं माहौल में कोई यहां अपने दुष्मन को ही भेज सकता है, षादी करके अपने जिगर के टुकड़ों को नहीं।
पिछले दो दशक से इस इलाके में चल रही इन फैक्ट्रियों से मांस की पैकिंग, चर्बी निकालने का व्यवसाय और क्राकरी इस्तेमाल के लिए हड़डी जलाने का काम होता रहा है। खुर, चर्बी ,लाद आदि को उबालकर जहां चर्बी बनायी जाती रही है वहीं हड़डी जलाकर सौंदर्यप्रसाधन व क्राकरी के उत्पाद बनाये जाते रहे हैं। मांस उबालने और हड़डी जलाने से, जानवरों की लाशें सड़ने से बदबू पैदा होती है। जिले सिंह अपने बेटे की षादी और उसके बाद जो घटित हुआ उसके बारे में कहते हैं कि 'बेटे की षादी यह कह कर की, कि बहू गांव में नहीं षहर में रहेगी। षादी के बाद अजीब लगा कि सिर्फ यहां से चार किलोमीटर दूर हापुड़ में बेटा-बहू रहें और हम गांव में। पर बहू ने चंद दिनों बाद ही ऐलान कर दिया कि यहां रहना उसे एक दिन भी गंवारा नहीं।'

दूसरे गांव वालों ने इन्हीं वजहों से इस गांव के तमाम उपनाम रख छोड़े हैं। कोई इसे चीलों का गांव कहता है तो कोई हड्डी फैक्ट्री वाला गांव। रामपरु के बाषिंदों के दिल में टीस तो तब उठती है जब उनके हरे भरे गांव को बदबूपुर कहा जाता है। खेती-बाड़ी, जमीन-जायदाद हर मामले में किसी आम गांव के मुकाबले संपन्न रामपुर को एक ऐसी पीड़ा से लगभग दो दषकों से गुजरना पड़ रहा है जिसके लिए वे गुनहगार नहीं है। यहां तक कि रामपुर का एक भी ग्रामीण कभी फैक्ट्रियों कार्यरत नहीं रहा। बताया जाता है कि जब यह फक्ट्रियां खुले आम चला करतीं थी तो स्थानीय गरीब मुसलमान और गरीब जाटव काम पर जाया करते थे। लेकिन बुजुर्ग हीरालाल जाटव को इन कंपनियों से नफरत है। वे कहते है,ं 'हम लोगों को ये हड्डी मिलें बूढ़ा, रोगी और असहाय बना रही हैं।'

पब्लिक एजेंडा से साभार

Dec 18, 2008

मुंतदिर अल जैदी को सलाम


तानाशाह और जूते

मदन कश्यप

उसके जूते की चमक इतनी तेज थी
कि सूरज उसमें अपनी झाइयां देख सकता था
वह दो कदम में नाप लेता था दुनिया
और मानता था कि पूरी पृथ्वी उसके जूतों के नीचे है
चलते वक्त वह चलता नहीं था
जूतों से रौंदता था धरती को

उसे अपने जूतों पर बहुत गुमान था
वह सोच भी नहीं सकता था
कि एक बार रौंदे जाने के बाद
कोई फिर से उठा सकता है अपना सिर
कि अचानक ही हुआ यह सब

एक जोड़े साधारण पांव से निकला एक जोड़ा जूता
और उछल पड़ा उसकी ओर
उसने एक को हाथ में थामना चाहा
और दूसरे से बचने के लिए सिर मेज पर झुका लिया
ताकत का खेल खेलने वाले तमाम मदारी
हतप्रभ होकर देखते रहे
और जूते चल पड़े
दुनिया के सबसे चमकदार सिर की तरफ
नौवों दिशाओं में तनी रह गयीं मिसाइलें
अपनी आखिरी गणना में गड़बड़ा गया
मंगलग्रह पर जीवन के आंकड़े ढूंढने वाला कम्प्यूटर
सेनाएं देखती रह गयीं
कमांडों लपक कर रोक भी न पाये
और उछल पड़े जूते

वह खुश हुआ कि आखिरकार उसके सिर पर नहीं पड़े जूते
शर्म होती तब तो पानी पानी होता
मगर यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही
खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया
चारो तरफ से फेंके जाने लगे जूते
और देखते देखते
फटे पुराने, गंदे गंधाये जूतों के ढेर के नीचे
दब गया दुनिया का सबसे ताकतवर तानाशाह

Oct 11, 2008

जेल से पत्र

उन्होंने जेलों से पत्र भेजा है

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेष कचहरी बम विस्फोट के दो मुख्य आरोपी मोहम्मद हकीम तारिक कासमी और मोहम्मद खालिद मोजाहिद पर से हाल ही में अदालत ने देषद्रोह का मुकदमा खारिज कर दिया। ये दोनों आरोपी बाराबंकी जेल में बंद हैं। इसी केस में कोलकाता से गिरफ्तार आफताब अंसारी पहले ही बाइज्जत रिहा हो चुके हैं। एसटीएफ ने गिरफ्तारी के वक्त आफताब को इंडियन मुजाहिद्दीन का कमांडर बताया था जबकि तारिक और खालिद को मास्टर माइंड कहा।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस और एसटीएफ ने आरोपियों के साथ कैसा व्यवहार किया इस बारे में तारिक और खालिद ने जज और जेल अधीक्षक के नाम जेल से पत्र लिखे। पत्र की मूल प्रतियां उर्दू में हैं। जेलों में गुजारे गये दिनों के बारे में उन पत्रों में विस्तार से चर्चा की गयी है। उसके एक छोटे से हिस्से का अनुवाद हम हिंदी में छाप रहे हैं।


श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद
मैं मुहम्मद खालिद महतवाना (मुहल्ला) मड़ियाहूं जिला जौनपुर का रहने वाला हूं। 16-12-07 की षाम एसटीएफ वाले मड़ियाहूं बाजार के दुकान से लोगों की मौजूदगी में मुझे उठाये और नामालुम जगह पर ले गये। जहां जबरदस्त तषद्दुद किया। मुख्तलिफ तरीके से मारा पिटा। दाढ़ी के बाल जगह जगह से उखाड़े गये। दोनों पैरों का चीरकर उस पर खड़े होकर अजू-ए-तनासुल (लिंग) को मुंह में डालकर चुसवाया गया। पखाना के रास्ते पेट्रोल डालना, षर्मगाह को धागे से बांधकर दूसरे किनारे पर पत्थर बांधकर खड़ा कर देना और षर्मगाह पर सिगरेट दागना आम बात थी। षराब पिलाना और सुअर का गोष्त खिलाना, पेषाब पिलाना जारी रहा। साथ ही बर्फ लगाना, मूंह और नाक के रास्ते जबरदस्ती पानी पिलाया जाता रहा,जिससे दम घुटने लगता था। इलेक्ट्रिकल षोला मारते हुए आला के जरिये से जिस्म जलाना, करंट चार्ज का देना आम बात थी। यह सिर्फ इसलिए किया जाता रहा कि हम मान लें कि गुनहगार हैं।




श्रीमान श्रीमान अधीक्षक साहब
सीजेएम साहब जिला कारागार लखनउ
फैजाबाद

तारिक कासमी

निवेदन इस प्रकार है कि मैं मुहम्मद तारिक पुत्र श्री रियाज अहमद साकिन सम्मुपुर रानी की सराय आजमगढ़ का रहने वाला हूं। 12 दिसंबर को मेरी अपनी दवाई की दुकान के आगे के रास्ते से राह चलते हुए एसटीएफ के जरिये उठाया गया और 10 दिन तक गैर इंसानी सुलूक और तषद्दुद करके झुठी कहांनियां गढ़कर विडियो बनवाई गयी। 22 दिसंबर को अपनी गाड़ी से एसटीएफ वाले बाराबंकी ले गये और आरडीएक्स और दिगर सामान के साथ हमारी गिरफ्तारी दिखाई गयी। जबकि हम 10 दिनों से इन्हीं के कब्जे में थे। हमारे पास आरडीएक्स या कोई भी सामान नहीं था। 24 दिसंबर से दो जनवरी तक रिमाण्ड पर एसटीएफ ने आफिस में ही रखा था। दूसरी रिमाण्ड सीओ फैजाबाद के जरिये 9 जनवरी को को षुरू हुई । दिन रात तषद्दुद के जरिये अपनी मकसद की बात करवाते रहे। 17 जनवरी 2008 की रात में सीओ सीटी फैजाबाद श्री राजेष पाण्डेय और एसटीएफ दरोगा ओपी पाण्डेय ने एक छोटी लाल रंग की बैटरी (जिस पर षक्ति लिखा हुआ था और उसपर कोई ऐसी चीज लगी हुई थी जो चिपक रही थी) को पकड़वाया था। इसके बाद डाबर केवड़ा की बोतलें पकड़वायी गयी और फिर आखों पर पट्टी बांधकर दूसरे कमरे में ले गये। मालुम नहीं हाथों में क्या क्या चीजें पकड़वायीं। पट्टी बंधी होने की वजह से मालुम नहीं हो पाया। हां इतना अंदाजा हुआ कि डिब्बा और बैग है। मुझे डर इस बात का है कि इन्होंने हमारे फिंगर प्रिंट मुख्तलिफ तरीकों से लिए और इस चीज की कोषिष की, हम समझने न पायें। अत: आपसे निवेदन है कि ये लोग हमको फंसाना चाहते हैं। सुबूत में ये फिंगर प्रिंट पेष करें तो आप हमारी इन बातों का जरूर ध्यान रखें, आपकी अतिकृपा होगी। मैं एक अमन पसंद, मुहिब्बे वतन षहरी हूं, मैंने कभी कोई अपराध नहीं किया है और ना ही ऐसी तबयत का हूं।